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Wednesday, December 8, 2021

कुछ तो रिश्ता है--संस्मरण

 पिछले साल जून में जब हम उज्जैन आये थे तो हमें यह सपने में भी इल्म नहीं था कि कुछ ऐसे खूबसूरत रिश्ते बनेंगे यहाँ पर. ये अलग बात है कि इसका आभास मुझे उस पहले दिन ही हो जाना चाहिए था जब सुबह सोकर उठते ही दरवाजे पर रखी कुर्सी पर बिल्ली के दो प्यारे प्यारे बच्चे आराम फरमाते मिले थे. बहरहाल उन बच्चों को देखकर बेहद ख़ुशी हुई और फिर धीरे धीरे रोज उनको देखने की आदत सी पड़ गयी. उनके लिए दूध और ब्रेड रोज रखना हमारा नियम होने लगा और फिर उनमें से एक बिल्ली (जिसका नाम ही हम लोगों ने बिल्लू रख दिया है), वह हमसे खूब हिल मिल गया. न तो वह हमें देखकर भागता था और न ही घबराता था, बल्कि वह खेलता जरूर था. समय के साथ साथ वह बड़ा होता गया और फिर वह हमारी जिंदगी का एक हिस्सा बन गया. अगर किसी रोज वह सुबह नहीं आता तो मन में सवाल पैदा हो जाता था कि कहाँ रह गया. और अगर वह शाम तक भी नहीं नजर आया तो हम उसे ढूंढने निकल जाते थे. और आखिरकार वह अपनी कॉलोनी के ही किसी घर के आसपास मिल जाता और फिर उसे हम अपने साथ साथ लेकर आते. दूर से किसी को भी यह आभास हो सकता था कि वह हमारा पालतू बिल्ली है लेकिन दिन भर कहीं और बिताने के बाद वह सिर्फ सुबह और शाम को ही आता था. आते ही उसकी अपनी आवाज में चिल्लाना शुरू होता और वह तब तक नहीं बंद होता जब तक उसे दोष और ब्रेड नहीं मिल जाता. जाड़े में हमने अपने बरामदे में उसके लिए एक कार्टून में कुछ कपडे रख दिए थे जिसमें वह आराम से सो जाता था और सुबह जैसे ही हमारी आहट आती, वह उठकर अपनी आवाज लगाना शुरू कर देता.

इसी तरह से समय बीत रहा था और इसी दरम्यान हमारे यहाँ एक प्यारे से कुत्ते "सोबो" का आगमन हो गया. वह बहुत छोटा था जब आया था और बिल्लू के साथ वह मजे में रहता था, कोई लड़ाई झगड़ा नहीं होता था. अब हमारे पास दो प्यारे जानवर हो गए थे, एक घर के अंदर तो दूसरा घर के बाहर. इसीबीच एक दिन मैं एक दावत में बाहर गया हुआ था. वापस लौटने में रात हो गयी और जब मैं कॉलोनी के अंदर आया तो अचानक मेरी नजर एक बिल्ली पर पड़ी जो किसी के कार के पीछे लेटी हुई थी. मुझे उत्सुकता हुई कि आखिर कौन बिल्ली है जो रात के समय इस तरह कार के पीछे लेटी है. और जब मैंने पास जाकर देखा तो वह हमारा बिल्लू ही था लेकिन उस तरह लेते रहना उसके स्वाभाव में नहीं था. मुझे थोड़ा आश्चर्य हुआ और जब मैंने उसे अपनी मोबाइल की रोशनी में ध्यान से देखा तो वह बिलकुल निस्तेज पड़ा हुआ था. मैंने चिंता में उसे थोड़ा हिलाया डुलाया तो उसके अजीब तरह से कराहने की आवाज आयी. अब मुझे यकीं हो गया कि इसके साथ कोई दुर्घटना जरूर हुई है. उसके शरीर में कीचड़ लगा हुआ था और उसपर से वह खड़ा भी नहीं हो पा रहा था. मैंने गार्ड को बुलाकर पूछा तो उसने बताया कि यह नाली में गिर गया था और किसी तरह से बाहर निकलकर यहाँ पड़ा हुआ है. तब तक कॉलोनी के कुछ और लोग भी आ गए और पूछने लगे कि क्या हुआ है. मैंने उसी समय बेटी को भी बुलाया और उसने भी जब बिल्लू को देखा तो वह भी परेशान हो गयी. खैर उसने तुरंत उस डॉक्टर को फोन किया जिससे हम सोबो की दवा लेते थे और हमारे कॉलोनी के लोगों ने भी एक डॉक्टर से उसके संभावित इलाज के बारे में पूछ लिया. सोबो के डॉक्टर ने बताया कि मैं एक दवा लिख रहा हूँ, उसे मंगवा कर दे दीजिये. शायद इससे बिल्लू ठीक हो जाए और अगर नहीं ठीक हुआ और सुबह तक जिन्दा रहा तो हस्पताल लेकर आईये. हमने बिल्लू के लिए तुरंत दवा मंगवाई और फिर उसे किसी तरह पकड़कर दवा दिया गया. अबतक उसके कराह में थोड़ी कमी हो गयी थी और ऐसा लग रहा था कि शायद वह सुबह तक ठीक हो जाएगा. उसको किसी तरह बोर में डालकर हम अपने घर ले आये और फिर उसे उस कार्टून में रख दिया. उसके लिए थोड़ा सा दूध और ब्रेड भी रख दिया गया कि शायद वह इसे खा ले. इन सब में रात के लगभग बारह बज गए थे और ठण्ड भी बढ़ गयी थी तो हम लोगों ने बिल्लू को कार्टून में छोड़ा और घर के अंदर आकर सोने चले गए.

अब ऐसे में नींद तो क्या खाक आती, बस किसी तरह सुबह हुई और हम बाहर बिल्लू को देखने आये. दिल तो धड़क रहा था लेकिन उम्मीद थी कि बिल्लू ठीक हो गया होगा. जैसे ही बाहर आकर हमने कार्टून को हिलाया, बिल्लू ने छलांग लगायी और बाहर आकर खड़ा हो गया. उस समय इतनी ख़ुशी मिली जिसे शब्दों में बयां करना मुश्किल है लेकिन थोड़ी देर तक शरीर सीधा करने के बाद उसने एक छलांग लगायी और वह गेट पर चढ़ गया. हम लोग प्रसन्नता से उसे जाते हुए देख रहे थे, वह थोड़ी दूर आगे गया और फिर रुका. उसने एकबार पलटकर हमारी तरफ देखा और शायद अपनी देखभाल करने के लिए हमें धन्यवाद देकर चला गया. शाम को वह वापस आया और उसी तरह से आवाज करके खाना माँगा. अब हमें यक़ीन हो गया कि वह एकदम से ठीक हो गया है और हमारी एक बड़ी चिंता दूर हो गयी. इसके एक दो महीने बाद अचानक वह एकदिन बुरी तरह लंगड़ाते हुए आया और फिर महीनों वह लंगड़ाकर ही चलता रहा. शायद उसके पेअर में चोट लग गयी थी लेकिन उसे लेकर डॉक्टर के पास जाना मुश्किल था. फिर दो तीन महीने बाद एक दिन वह बिलकुल ठीक हो गया, वैसे ही जैसे वह लंगड़ाने लगा था. 

पिछले दो तीन महीनों से वह हफ्ते में एकाध बार ही आता था और कभी कभी उसकी चिंता होने लगती थी. लेकिन अब पिछले एक हफ्ते से वापस वह सुबह शाम आने लगा है और आकर पहले जैसे ही वह भोजन के लिए हल्ला मचाता है. अब फिर से बेहद सुखद अनुभूति हो रही है, दोनों बिल्लू और सोबो मजे में साथ साथ रहते हैं और आपस में बिलकुल झगड़ते नहीं हैं. बस उनमें थोड़ी बहुत मस्ती चलती रहती है जो देखने में बेहद सुखद लगती है. 


Thursday, November 25, 2021

एक यात्रा जो भुलाए नहीं भूलती-- यात्रा संस्मरण

 

वैसे तो यात्रायें की ही इसलिए जाती हैं कि न सिर्फ व्यक्ति उसके बाद तरोताजा हो जाए और यात्रा में देखे गए स्थलों को किसी भी हाल में भूल नहीं पाए, बल्कि उनकी स्मृतियों को अपने मन के किसी कोने में सहेज कर रख दे. इस लिहाज से हर यात्रा अविस्मरणीय ही होनी चाहिए लेकिन कुछ यात्रायें सचमुच ऐसी होती हैं जो भुलाये नहीं भूलतीं. ऐसी ही एक यात्रा हम लोगों ने जनवरी 2017 में, जब हम लोग जोहानसबर्ग, दक्षिण अफ्रीका में थे, तब की थी जो आज भी मानस पटल पर छपी हुई है. दक्षिण अफ्रीका के लगभग साढ़े तीन साल के प्रवास में हम लोगों ने उस देश की खूबसूरती को खूब देखा और जहाँ भी गए, वह जगह हमें दुबारा बुलाती रही. और इसी का नतीजा था कि एक ही जगह को हम लोगों ने कई कई बार देखा. मसलन जोहानसबर्ग से सबसे नजदीक और दर्शनीय शहर डरबन था जिसे हमने कई बार देखा. सबसे खूबसूरत शहर केपटाउन था जिसे हमने कई बार देखा और ऐसे ही कई अन्य जगहें थीं जिन्हें हमने कई बार देखा.

लेकिन अगर आपको वन्य प्राणियों में दिलचस्पी हो तो आप वहां स्थित क्रूगर नेशनल पार्क कभी भी मिस नहीं कर सकते. (वैसे भी अफ्रीका अपने बिग 5 जानवरों के लिए जाना जाता है, भैंसा, हाथी, शेर, चीता और गैंडा). एक तो यह पार्क लगभग 19000 वर्ग किमी में स्थित है जिसे पूरी तरह से देखने में आपको कई हफ्ते भी लग सकते हैं. इसी वजह से इसमें प्रवेश और निकास के लिए लगभग 10 गेट बने हुए हैं जिनमें आपस में सैकड़ों किमी का फासला है. और अमूमन आप किसी एक गेट से प्रवेश करते हैं और अगर आपको अंदर नहीं रुकना है तो शाम को 6 बजे के पहले आपको किसी अन्य गेट से बाहर निकलना पड़ता है. पार्क के अंदर गति सीमा भी निर्धारित है जो अधिकतर जगह 40 किमी प्रति घंटा है और आपको पूरा दिन लगातार चलना पड़ता है तब जाकर आप किसी दूसरे गेट से बाहर निकल सकते हैं.

खैर हमने जब दुबारा जनवरी 2017 में क्रूगर नेशनल पार्क जाने का निश्चय किया तो सबसे पहले प्रवेश द्वार के बारे में सोचा गया. इसके पहले जब हम गए थे तब हम लोगों ने फलाबोरवा गेट से प्रवेश किया था, इसलिए इस बार किसी अन्य गेट से प्रवेश करने का निर्णय लिया गया. इस निर्णय के पीछे एक कारण और भी था और वह पिछली बार शेर को नहीं देख पाने का था. इसलिए किसी अन्य गेट से अंदर जाकर घूमने में हमें उम्मीद थी कि वनराज इस बार अवश्य देखने को मिल जाएंगे. इस बार हम लोगों ने पुण्डा मारिया गेट से क्रूगर में प्रवेश करने का निर्णय लिया और उसी आधार पर मैंने उसके आस पास के एक होटल को ऑनलाइन बुक भी कर लिया. चूँकि पिछली बार वाला होटल बहुत अच्छा था जिसे हमने ऑनलाइन ही बुक किया था इसलिए इस बार भी उसी उम्मीद में हमने बुक कर लिया. होटल से कमरा बुक होने का सन्देश भी फोन पर आ गया और हम लोग वहां जाने की तैयारी में लग गए. चूँकि जोहानसबर्ग से पुण्डा मारिया गेट की दूरी लगभग 8 घंटे की थी इसलिए सुबह जल्दी निकलकर वहां पहुँचने की योजना बनी. रास्ते को खंगालते समय पता चला कि उस गेट के पास ही, जो लिंपोपो प्रान्त में था, दक्षिण अफ्रीका के सबसे पुराने पेड़ों में से एक पेड़ "सागोले बाओबाब" है जिसके बारे में धारणा थी कि वह हजारो साल पुराना है और बेहद विशालकाय है. अब हमारे पास थोड़ा समय भी था क्योंकि होटल में तो रात में आराम ही करना था जिससे सुबह तड़के ही क्रूगर में प्रवेश किया जा सके (सुबह 6 बजे से ही लोगों के लिए गेट खुल जाता है और शाम को 6 बजे बंद होता है). इसलिए हमने पहले जी पी एस की मदद लेते हुए उस बिग ट्री के पास जाने का फैसला किया और सुबह 6 बजे ही जोहानसबर्ग से अपनी कार द्वारा निकल पड़े. हर यात्रा में हम लोग कुछ खाने पीने का सामान भी लेकर ही चलते थे जिससे न सिर्फ समय की बचत होती थी बल्कि जेब पर भी वजन कम पड़ता था. सड़क के किनारे रास्ते भर आपको जगहें मिलेंगी जहाँ आप अपनी गाडी खड़ा कीजिये और मजे में भोजन कीजिये. हम लोग लगभग 2 बजे दोपहर में उस विशालकाय पेड़ "सागोले बाओबाब" के पास पहुँच गए. वास्तव में पेड़ तो बेहद विशाल था, उसकी उम्र भी लगभग 1700 साल थी और उसके चारो तरफ उसकी डालें जमीन पर कुछ इस तरह से पड़ी हुई थीं, गोया वे उसे तीनों तरफ से सहारा दे रही हों. पेड़ के तने के बीच में काफी जगह थी और उसके अंदर एक बार भी बना हुआ था जिसमें 6 -7 लोग आराम से खड़े होकर खा पी सकते हैं. बहरहाल इतने विशालकाय पेड़ को देखकर रोमांच हो आया और उसके इर्द गिर्द खूब फोटोग्राफी की गयी. एक अश्वेत महिला वहां देखभाल और टिकट देने के लिए थीं और उन्होंने हमारा स्वागत किया. वहां पर अमूमन अश्वेत महिलाओं को लोग "ममा" पुकारते हैं जो उनके लिए आदरसूचक शब्द है और हम भी उनको इसी सम्बोधन से पुकारते रहे. उस विशालकाय पेड़ के आस पास तमाम आम के पेड़ भी थे जिनपर लाल लाल आम लगे हुए थे. उनको देखकर हम लोगों के मन में उन्हें खरीदकर खाने की इच्छा हुई और हमने ममा से कहा कि हमें आम खाने हैं. ममा ने आम के मालिक को फोन करने की कई बार कोशिश की लेकिन उन्होंने फोन नहीं उठाया. दरअसल शनिवार का दिन था और वह वहां पर वीकेंड होता है जिसमें अमूमन कोई न तो कार्य करता है और न ही किसी के फोन का जवाब देता है. बहरहाल हम लोग मन मसोस कर वहां से उन आमों को खाने की हसरत मन में ही रखे आगे बढ़ गए.

वहां से हमारे होटल की दूरी लगभग 2 घंटे की थी लेकिन हम रास्ता भटक गए और इसी बहाने लिंपोपो के ग्रामीण क्षेत्रों को देखते हुए अपने होटल पर पहुंचे. होटल के पहुँचने के रास्ते से ही मुझे अंदाजा हो गया कि इस बार होटल के चुनाव में गड़बड़ी हो गयी है. दरअसल होटल जिस क्षेत्र में था वहां सिर्फ अश्वेतों की ही आबादी नजर आ रही थी और वह हमारे लिए थोड़ा असुरक्षित महसूस हो रहा था. इसके बावजूद भी हम लोग होटल पहुंचकर वहां के स्वागत कक्ष पहुंचे और सोचा कि रात ही तो बितानी है, रुक लिया जाएगा. लेकिन स्वागत कक्ष में बैठी महिला से जब हमने अपने कमरे के बारे में पूछा तो उसने किसी भी बुकिंग से इंकार कर दिया. मेरे पास बुकिंग डॉट काम से आया सन्देश था लेकिन जब मैंने उसे दिखाया तो वह अपना सर इंकार में हिलाने लगी. इसी बीच मेरे जोर देने पर उसने किसी को फोन किया और मेरी बात कराई, उस व्यक्ति ने थोड़ा समय माँगा और बोला कि मैं देखता हूँ कि आपकी क्या मदद कर सकता हूँ. अब मेरे पास थोड़ा समय था तो मैंने सोचा कि पुण्डा मारिया गेट के बारे में पूछ लिया जाए कि वहां तक जाने में कितना समय लगेगा. मुझे उम्मीद थी कि अधिक से अधिक आधे घंटे में हम गेट पर पहुँच जाएंगे लेकिन उस महिला ने बताया कि यहाँ से गेट लगभग दो घंटे की दूरी पर स्थित है. अब मुझे समझ में आ गया कि मैंने इस बुकिंग में गलती कर दी है और फिर हमें उस होटल को छोड़ना ही बेहतर लगा. वैसे भी न तो वहां बुकिंग कन्फर्म हुई थी और वहां से सुबह 6 बजे गेट पहुँचने के लिए हमें चार बजे ही निकलना पड़ता जो उचित नहीं था. इसलिए हमने अपना बैग उठाया और उस महिला को नमस्ते करके हम लोग वहां से गेट की तरफ रवाना हो गए. 

इन सब में शाम हो गयी थी और मुझे उम्मीद थी कि जैसे पिछली बार फलबोरवा गेट के एकदम पास एक होटल मिल गया था, वैसे ही इस गेट के पास भी कोई न कोई होटल मिल ही जाएगा. मन में यह भी था कि रात ही तो बितानी है, कैसा भी होटल चलेगा  और हम लोग पुण्डा मारिया गेट के पास लगभग 7 बजे पहुंचे. अब अँधेरा हो चला था और गेट एकदम सुनसान था, आसपास कोई भी रहने का ठिकाना नहीं था. गेट तक पहुँचने का रास्ता भी एकदम सुनसान था और सड़क के आस पास बेहद गरीब अश्वेत लोग कच्चे घरों में रह रहे थे. हम लोगों ने गेट पर जाकर पूछा कि आस पास कोई रहने की जगह है तो उसने बताया कि सबसे नजदीक और सबसे बढ़िया जगह कोपा कोपा रिसोर्ट है जिसका बोर्ड हमें रास्ते में आते समय भी दिखा था. अब हमारे पास वहां जाने के अलावा कोई और चारा भी नहीं था, बस चिंता इतनी ही थी कि कहीं वहां कोई कमरा नहीं मिला तो फिर कहाँ जाएंगे क्योंकि रात हो गयी थी. वापस कोपा कोपा रिसोर्ट जाते समय सड़क के दोनों तरफ धुप्प अँधेरा था, कहीं कोई बिजली बत्ती का नामोनिशान नहीं था. बस हमें कार के हेड लाइट से सड़क दिखाई दे रही थी और हम लोग तेज गति से वापस जा रहे थे. अचानक सामने सड़क पर एक गधा खड़ा मिला जो कि आते समय नहीं मिला था, वैसे भी दक्षिण अफ्रका में सड़क पर जानवर शायद ही कभी मिलते थे तो आदत भी छूट गयी थी (अपने देश में तो यह आम दृश्य है). अब कार की गति तो काफी तेज थी लेकिन उस समय दिमाग ने काम करना बंद नहीं किया था इसलिए ब्रेक लगाकर कार को जैसे ही बगल की तरफ मोड़ा और आगे निकले तभी सामने एक गाय भी खड़ी मिल गयी. अब उस समय कैसे मैंने उस गाय को बचाते हुए सड़क पार किया, मुझे भी याद नहीं, बस हम लोग बिना दुर्घटना के किसी तरह निकल गए. दिल की धड़कनें काफी बढ़ गयी थीं और जल्दी जल्दी गेस्ट हाउस पहुँचने का ख्याल ही दिमाग में आ रहा था. दरअसल उस समय कई चीजें एक साथ गलत हो रही थीं इसलिए घबराना स्वाभाविक ही था और ऐसी अवस्था में दिमाग सही काम करे, यह थोड़ा अस्वाभाविक था. थोड़ी देर में वह चौराहा आ गया जहाँ से हमें दाहिने मुड़कर रिसोर्ट पहुंचना था. आगे रास्ता भी थोड़ा खराब था और उस समय दुर्भाग्य से उस इलाके में बिजली भी गायब थी इसलिए घटाटोप अँधेरा छाया हुआ था (दक्षिण अफ्रीका में अमूमन बिजली रहती ही है, शायद ही कभी इस तरह का अनुभव हुआ हो). किसी तरह हम लोग रिसोर्ट पहुंचे और वहां के स्वागत कक्ष में प्रवेश किया. रात के लगभग 9 बज रहे थे और हम लोग पिछले तीन घंटे के खराब अनुभवों से सहमें हुए थे. बहरहाल वहां एक प्रौढ़ पुरुष मिले जो अँधेरे में लालटेन जलाकर बैठे हुए थे, जैसे हमने उनका अभिवादन किया उसी समय हमें समझ में आ गया कि वह सज्जन नशे में धुत्त थे लेकिन जब हमने कमरे के बारे में पूछा तो उन्होंने हाँ में सर हिलाया. उस एक हाँ ने हमें तमाम तनावों से मुक्त कर दिया जो हमारे दिमाग में लगातार चल रहा था कि यदि यहाँ पर रहने की जगह नहीं मिली तो इस अँधेरी रात में और इस बियाबान में हम लोग कहाँ जाएंगे.  

बहरहाल हमें चंद मिनट लगे अपने आप को सामान्य करने में और यह महसूस करने में कि अब सब सही होगा. मैंने जाकर कार से अपना सामान निकाला और फिर हम लोग वापस उस स्वागत कक्ष में आ गए. बिजली अभी भी गायब थी और उस जगह के मैनेजर ने हमें बता दिया कि उस रिसोर्ट में एक कॉटेज हमें दे रहा है. वहां की औपचारिकता पूरा करके हम लोग उसी लालटेन की रौशनी में अपने फ्लैट की तरफ बढ़े जहाँ हमें रात बितानी थी. अंदर का पूरा इलाका जंगल का ही एक भाग जैसा लग रहा था और पगडण्डी पर चलते समय लग रहा था कि न जाने किस तरफ से कोई जंगली जानवर आ जायेगा. लगभग आधा किमी चलने के बाद हमारा कॉटेज आ गया और वह सज्जन उसे खोल कर चले गए. फिलहाल तो हम लोगों ने मोबाइल की रोशनी में अपना सामान अंदर किया लेकिन थोड़ी देर में ही समझ में आ गया कि बिना किसी लालटेन या लैंप के भोजन इत्यादि कैसे किया जाएगा. बहरहाल उस प्रौढ़ सज्जन को हमने इण्टरकॉम पर फोन किया तो वह थोड़ी देर में ही हमारे लिए भी एक लालटेन लेकर आ गए. अब उसी लालटेन की रोशनी में हम लोगों ने भोजन किया और सोने की तैयारी करने लगे. उस समय रात के लगभग 11 बज चुके थे और अगले दिन हमें सुबह 6 बजे पुण्डा मारिया गेट भी पहुंचना था. लेकिन जैसे ही हम लोग लेटे, उसी समय बिजली आ गयी और फिर हम लोगों ने एक बार आसपास का मुआयना करना शुरू कर दिया. कॉटेज के पीछे की तरफ एक बढ़िया सा स्विमिंग पूल था और ब्राई करने की जगह भी थी, कुल मिलाकर बेहद शानदार जगह थी. लेकिन सुबह के चलते हमें फटाफट सोना पड़ा और जल्दी ही नींद आ गयी.

सुबह 6 बजे तक हम लोग उस रिसोर्ट से निकल गए और वापस उसी सड़क पर चल पड़े जो पिछली रात के भयानक अनुभव समेटे हुए थी. लेकिन सुबह बहुत खुशनुमा थी, ठण्ड लग रही थी और सड़क बिलकुल सुनसान. हम लोगों ने थोड़ी देर में ही उस जगह को भी पार किया जहाँ पिछली रात हमें गधा और गाय मिली थी लेकिन सुबह उनमें से कोई भी मौजूद नहीं था. शायद रात को वे भी डर गए थे और फिर कभी सड़क पर खड़े नहीं होने की कसम खाकर चले गए थे. 7 बजते बजते हमने पुण्डा मारिया गेट से क्रूगर नेशनल पार्क में प्रवेश किया और फिर धीरे धीरे चारो तरफ देखते हुए आगे बढ़ने लगे. सबसे पहले हमें बिग फाइव में से जंगली भैंसे के दर्शन हुए जो मजे में जंगल की घास चर रहे थे. चूँकि उस जंगल में शेरों का एक निश्चित क्षेत्र था इसलिए ये भैंसे बिना किसी फिक्र के भोजन कर रहे थे. थोड़ा और आगे चलने पर सड़क के दोनों तरफ हिरन इत्यादि जानवर भी दिखाई पड़े. लगभग 30 किमी की यात्रा के बाद पहला जंगली हाथी का झुण्ड मिला जो सड़क पार कर रहा था. हम लोग उन्हें देखकर दूर ही खड़े हो गए और उनकी तस्वीरें लेने लगे तथा वीडियो बनाने लगे. उनके गुजरने के बाद हम लोग आगे बढ़े तो एक और हाथियों का झुण्ड मिला जो सड़क के किनारे खड़ा था. हम लोग दुबारा रुके और उनको देखने लगे. थोड़ी देर में ही जब वे सड़क पार करने लगे और हमें उनके छोटे छोटे बच्चे भी सड़क पार करते दिखाई पड़े तो हम कौतूहलवश उनके नजदीक तक अपनी कार लेकर आ गए. वहीं हमसे गलती हो गयी और एक मादा हाथी ने हमारी तरफ गुस्से में दौड़ना शुरू किया तो हमें अपनी गलती का एहसास हुआ. हम लोग वहां से सरपट भागे और एकाध किमी बाद जब पीछे देखा तो हाथी नहीं थे और हमारी जान में जान आयी. एक तो वहां के हाथी हमारे देश में पाए जाने वाले हाथियों से डील डौल में काफी ज्यादा बड़े और ताकतवर थे और उनके सामने हमारी कार भी खिलौने जैसी ही दिखाई पड़ती थी. वास्तव में मादा हाथी अपने बच्चों को लेकर बहुत पजेसिव होती है और उसे अगर लगता है कि कोई उनको नुक्सान पहुंचा सकता है तो वह तुरंत उसपर आक्रमण कर देती है. खैर हम लोग सकुशल आगे बढ़ गए और फिर भविष्य में कभी भी हाथी के बच्चों के आस पास भी नहीं जाने का निश्चय कर लिया.   

वहां से आगे बढ़ने पर थोड़ी थोड़ी दूर पर कभी हिरणों के झुण्ड तो कभी जिराफ तो कभी जेब्रा के झुण्ड मिलते रहे और हम लोग उनको निहारते, उनकी तस्वीरें खींचते आगे बढ़ते रहे. एकाध जगह जंगली सूअर भी दिखाई दिए और कहीं कहीं सांभर इत्यादि भी दिखे. एकाध घंटे बाद एक जगह हमारी नजर सड़क के किनारे मजे में घूमते छोटे से कछुए पर पड़ी जो स्टार कछुए जैसा था. वह देखने में इतना सुंदर लग रहा था कि हमारी गाड़ी अपने आप ही वहां रुक गयी. हम लोगों ने उसे प्यार से उठाया, कुछ मिनट तक हम सब उसे देखते रहे, फिर उसके फोटो कई ऐंगल से खींची गयी और उसके बाद उसे वहीं छोड़कर हम सब आगे बढ़ गए. कुछ आगे जाने पर हमें एक जगह चीता के भी दर्शन हुए जो पेड़ पर मजे में आराम फरमा रहे थे. क्रूगर पार्क के अंदर हर 40 से 50 किमी पर कोई न कोई पेट्रोल पंप और पिकनिक का स्थान रहता है और आप बिना पेट्रोल के खत्म होने की चिंता किये आराम से घूम सकते हैं. हम लोग भी कुछ घंटे घूमने के बाद के बाद एक पिकनिक वाली जगह पर रुके, थोड़ा नाश्ता किया और पेट्रोल भरकर आगे बढ़ गए.  

एकाध घंटे और घूमने के बाद हम लोग उस क्षेत्र में पहुँच गए थे जहाँ अमूमन शेर पाए जाते हैं. पिछली यात्रा में हम उन्हें नहीं देख पाए थे इसलिए इस बार मन ही मन ठान के आये थे कि हर हाल में उनको देखकर ही जाना है. अचानक दूर सामने ढेर सारी गाड़ियां खड़ी दिखाई पड़ी तो लगा जैसे हो न हो आज तो शेर के दर्शन हो ही गए. जब हम पास पहुंचे तो लोगों ने बता दिया कि सड़क के साथ साथ बहती बरसाती नदी के तलछट में कई शेर आराम फरमा रहे हैं और यह भीड़ उनको ही देखने के लिए खड़ी है. सड़क के किनारे भी पेड़ थे और नीचे नदी के ढलान पर भी पेड़ थे तो दूर से वनराज के दर्शन संभव नहीं थे. अब इन्तजार करने के सिवाय और कोई रास्ता भी नहीं था कि लोग वहां से हटें तो हम लोग शेरों को नजदीक से देखें. आधे घंटे में सारी गाड़ियां वहां से चली गयीं और सिर्फ हम लोग ही बचे तो हमने अपनी कार सड़क से नीचे उतार ली और शेरों को देखने लगे. लगभग 10 शेर रहे होंगे जो आराम से लेटे हुए थे और बिलकुल भी हिल डुल नहीं रहे थे. अब कोई और पास था नहीं तो हमारे मन में आया कि शेर तो आराम फरमा रहे हैं इसलिए हम लोग गाड़ी से उतर कर उनको पास से देखते हैं और कुछ फोटो भी खींच लेते हैं. हमें सपने में भी यह गुमान नहीं था कि हम अपनी जिंदगी की शायद सबसे बड़ी भूल करने जा रहे हैं और आगे आने वाले तमाम वर्षों में अपनी इस भूल को याद करके हम लोग सिहरते रहेंगे.  

 हमारी कार सड़क के नीचे कच्ची जगह पर खड़ी थी और वहां से नदी का किनारा बिलकुल सटा हुआ था. मतलब कि हम तीन चार कदम चलकर नदी के कगार पर पहुँच सकते थे और शेरों को नीचे साफ़ साफ़ देख सकते थे. लेकिन जैसे ही हम दोनों कार से उतरकर बमुश्किल दो कदम आगे बढ़े होंगे, तभी हमें नदी के तलहटी में हलचल नजर आयी. तीन चार शेर जो शायद मानव से बिलकुल भी नजदीकी पसंद नहीं करते थे, वे उठकर खड़े हुए और पलट कर भाग गए. तीन चार शेर हमारी तरफ मुंह करके खड़े हो गए और शायद अंदाज लगाने लगे कि अगर हम लोग उनके पास जाते हैं तो उनको क्या करना चाहिए. बचे हुए एक दो शेर भी वापसी के लिए तैयार हो गए थे. इन सब में शायद दस सेकेण्ड ही लगा होगा और हमें यह एहसास हो गया कि हमने एक बहुत बड़ी भूल कर दी है. वैसे तो ऐसे मौकों पर दिमाग काम करना बंद कर देता है लेकिन उस वक़्त दिमाग ने काम किया और हम बिजली की फुर्ती से वापस अपने कार की तरफ मुड़े और फटाफट अंदर जाकर दरवाजा बंद कर लिया. हमारे दिल बुरी तरह धड़क रहे थे और हम अगले दस मिनट तक यही सोचते रहे कि अगर शेरों ने हमारी तरफ छलांग लगायी होती तो क्या होता. वो शेर बस इतनी दूरी पर थे कि वे दो तीन छलांग में हमारे पास आ सकते थे, लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं सोचा और हम सही सलामत अपनी कार में बैठे थे. उसके बाद अगले कई घंटे, जब तक हम क्रूगर पार्क में विचरण कर रहे थे, हम अपने दिमाग से इस घटना को निकाल ही नहीं पाए. आगे हमें एक जगह अफ्रीकन गैंडा भी दिखाई दिया, फिर से जिराफ और अन्य जंगली जानवर भी दिखे लेकिन शायद वह आनंद नहीं आया जो ऐसे में आना चाहिए था. लेकिन एक बात जरूर हुई कि इस बार हमने अफ्रीका के बिग फाइव जानवरों के दर्शन कर लिए, जिनके लिए अफ्रीका जाना जाता है और जिनको देखे बिना आपकी जंगल यात्रा पूरी नहीं मानी जाती है.  

शाम छह बजे से पहले हमें फाबेनी गेट पहुंचना था जहाँ से हमें आगे ग्रासकोप जाना था और फिर आगे की यात्रा अगले दिन प्रारम्भ होनी थी. हम लोग लगभग छह बजे फाबेनी गेट पहुँच गए और फिर वहां से डूबता सूरज को निहारते हुए ग्रासकोप के लिए निकल पड़े. जिंदगी में कुछ यात्रायें ऐसे ऐसे अनुभव दे कर जाती हैं जिन्हें अमूमन हम लेना नहीं चाहते. लेकिन दो दिन की यह यात्रा जिसमें बहुत रोमांचक और खतरनाक अनुभव हुए थे, वह आज भी दिमाग पर काबिज है और हम चाह कर भी उसे भूल नहीं सकते. 

Tuesday, October 26, 2021

सैलाना की यात्रा--यात्रा संस्मरण

 वैसे तो मध्य प्रदेश में बहुत से दर्शनीय स्थल हैं और ऐसे भी हैं जो बहुत प्रसिद्द हैं. उदहारण के तौर पर हम अगर सबसे मशहूर जगह की बात करें जहाँ सबसे ज्यादा विदेशी सैलानी भी आते हैं तो "खजुराहो" इसमें निर्विवाद रूप से सबसे आगे होगा. प्रदेश की राजधानी भोपाल के आस पास भी एक से बढ़कर एक दर्शनीय स्थल हैं जिनमें एक तरफ प्राचीन भोज मंदिर है तो दूसरी तरह "भीम बैठका" है जहाँ महाभारत कालीन गुफाएं हैं और बड़े बड़े पत्थरों पर प्राचीन कालीन भित्तिचित्र बने हुए हैं. खैर इस प्रदेश में जहाँ भी जाईये, कुछ न कुछ दर्शनीय नजर ही आ जाता है लेकिन मशहूर जगहों के साथ एक बड़ी दिक्कत यह भी है कि वहां जाने पर भीड़ भाड़ का सामना करना पड़ जाता है. कोविड के पहले तो भीड़ भाड़ से कोई परेशानी नहीं थी और चाहे कितनी भी भीड़ हो, लोग मजे में घूमते फिरते थे. लेकिन कोविड संकट के बाद सबसे बड़ा दर भीड़ को देखकर ही लगने लगा है और सभी लोग ऐसी जगहों से बचना चाह रहे हैं जहाँ जाने पर ज्यादा भीड़ का सामना करना पड़े.

अब ऐसे में एक चीज लोगों को खूब भा रही है और वह है ऐसी जगहों पर घूमना जहाँ भीड़ भाड़ नहीं हो. कम से कम कोविड की चिंता तो नहीं रहेगी और घूमने फिरने का कोटा भी पूरा हो जाएगा जो पिछले लगभग डेढ़ सालों से बचा हुआ है. ऐसी ही जगह की तलाश में हमें याद आया रतलाम से लगभग 25 किमी दूर एक शांत लेकिन बेहद रमणीय जगह "सैलाना" जहाँ जाना तो हर सैलानी को चाहिए लेकिन बहुत कम लोग ही जाना पसंद करते हैं. दरअसल वहां न तो कोई ऐसा प्रसिद्द मंदिर है जहाँ भक्तों का सैलाब उमड़े और न ही कोई ऐसा हिल स्टेशन या प्राकृतिक पर्यटन स्थल जो बहुत मशहूर हो. इस जगह के बारे में वैसे तो मुझे पिछले दो साल से पता था और मैं पिछले साल एक बार दो तीन घंटे के लिए वहां गया भी था लेकिन इसे पूरी तरह देखने का लोभ मन में बना हुआ था. खैर इस बार दो अक्टूबर को गाँधी और शास्त्री जयंती के कार्यक्रम के बाद रविवार पड़ा और फिर से इस रमणीक लेकिन बहुत कम मशहूर जगह जाने की इच्छा बलवती हो गयी. एक बार वहां मौजूद दोस्त से फोन पर बात हुई और जब उसने बताया कि वह भी सैलाना में ही मौजूद है तो फटाफट वहां जाने का कार्यक्रम बन गया. 

सुबह साढ़े आठ बजे उज्जैन से निकलने का कार्यक्रम बनाया गया था जो लगभग नियत समय पर ही प्रारम्भ हो गया. पहले तो यात्रा में हम तीन ही हुआ करते थे लेकिन पिछले आठ महीने से हमारा कुत्ता 'सोबो" भी हर सफर का हिस्सा बन गया है. दो घंटे के सफर के पश्चात हम जब रतलाम पहुँचने ही वाले थे तो इच्छा हुई कि चाय पीकर फिर आगे बढ़ा जाए. अब एक बार चाय की तालाब लग गयी तो फिर बिना उसे पिए आगे बढ़ना थोड़ा मुश्किल हो जाता है. रास्ते में एक अच्छा सा होटल दिखा जहाँ रुक कर हमने पूछा कि क्या चाय मिलेगी तो रिसेप्शन पर बैठे कर्मचारी ने हाँ में सर हिलाया और रेस्टॉरेंट में न जाकर वहीं चाय पीने के लिए कहने लगा. हमारे लिए तो ठीक ही था, वहीं पर रखे बढ़िया सोफे पर बैठकर हम चाय का इन्तजार करते हुए आगे की यात्रा के बारे में बात करने लगे. थोड़ी देर में चाय आ गयी और चाय के साथ चीनी का पाउच भी प्लेट में रखा था. अब अगर अलग से चीनी का पाउच रखा हो तो हम यही सोचते हैं कि चाय बिना शक्कर की होगी. इस लिहाज से हमने एक पाउच फाड़ा और उसे चाय के कप में डाल दिया. इसी दरम्यान बेटी ने चाय का घूंट बिना शक्कर डाले लिया तो उसे चाय काफी मीठी लगी. उसने तुरंत मुझे टोका लेकिन तब तक मैं शक्कर चाय में डाल चुका था. अब मैंने भी चाय का घूंट लिया तो काफी मीठी चाय थी, बस गनीमत यही थी कि जो शक्कर मैंने डाली थी उसे कप में मिलाया नहीं था. अब मुझसे रहा नहीं गया और मैंने रिसेप्शन वाले से पूछ ही लिया कि अगर चाय पहले से ही मीठी थी तो अलग से पाउच क्यों दिया. और अगर अलग से दे भी दिया तो कम से कम बताना तो था कि चाय मीठी है, आप की इच्छा हो तो आप और शक्कर डाल सकते हैं. अब वह बेचारा क्या कहता, उसने रेस्टॉरेंट में फोन करके पूछा और बाद में झेंपते हुए बोला कि मैं आपके लिए दूसरी चाय बनवा देता हूँ. हमने भी हँसते हुए कहा कि कोई जरुरत नहीं है, चलो इसी बहाने कम से कम बढ़िया मीठी चाय तो पीने को मिली. 

इसके बाद हम लोग अगले 45 मिनट में सैलाना पहुँच गए और फिर एक जगह नाश्ता करने के बाद हमारा सैलाना भ्रमण प्रारम्भ हो गया. दरअसल सैलाना शहरी भीड़भाड़ से दूर एक आदिवासी क्षेत्र है जहाँ प्रकृति अपने बेहद खूबसूरत और सौम्य रूप से मौजूद है. चारो तरफ न तो कोई शोरगुल और न ही कोई प्रदूषण, बस हरियाली, पहाड़, झरने, मंदिर और छोटी छोटी नदियां जो बरसात के मौसम में कलकल करती बहती रहती हैं और बाकी मौसम में सूख जाती हैं. सबसे पहले सैलाना के मशहूर "कैक्टस गार्डन" में जाना था लेकिन रास्ते में ही बाजार के मध्य में हमें रुकना पड़ गया. उस समय एक जुलूस निकल रहा था जो आसाराम बापू के लिए था. बाद में मुझे पता चला कि यहाँ पर आसाराम के बहुत से शिष्य हैं और उनके आश्रम में सैकड़ों बीघा जमीं इत्यादि भी है. खैर लोग आज भी आसाराम को गुनहगार मानने के लिए तैयार नहीं हैं, यह भी एक आश्चर्य का विषय है. 

सैलाना पैलेस का कैक्टस गार्डन, जो न सिर्फ मध्य प्रदेश का सबसे बेहतरीन गार्डन है (एक समय में यह एशिया का सबसे अच्छा कैक्टस गार्डन माना जाता था), बल्कि हिन्दुस्तान का सबसे पुराना भी है  यह सैलाना महल के पीछे के हिस्से में मौजूद है जिसकी एक बार फिर से देखभाल की जा रही है ताकि ज्यादा से ज्यादा संख्या में लोग यहाँ देखने के लिए आएं. वैसे महल का एक हिस्सा भी अब होटल के रूप में तब्दील किया जा रहा है जिससे कि रतलाम में रुकने वाले लोग भी सैलाना के महल में ही रुकें और पुराने वैभव को महसूस कर सकें. गार्डन में लगभग 45 मिनट बिताने के बाद हम लोग वहां से निकले और सबसे पहले "अडवानीय केदारेश्वर" मंदिर गए जो जमीं से लगभग 100 मीटर अंदर स्थित है. मंदिर के पास जाते समय ही एक झरने की आवाज आने लगी और जैसे ही हम नीचे पहुंचे, एक खूबसूरत झरना मंदिर के सामने स्थित तालाब में गिर रहा था. मौसम भी अब काफी सुहावना हो गया था और बादलों के चलते धूप का नामोनिशान नहीं था. मंदिर पर लगभग 25 लोग ही मौजूद थे और इस लिहाज से उसे भीड़ नहीं कहा जा सकता था. बस माहौल ऐसा था कि वहां से हिलने का मन नहीं कर रहा था, झरना, पहाड़, मंदिर के घंटे की आवाज और आँखों को सुकून देती हरियाली. लेकिन अभी सैलाना को पूरा देखना था और लगभग 12 बज रहे थे तो वहां से मन मारकर निकलना ही पड़ा. इसबीच वहां खूब सारे फोटो खींचे गए और वहां की यादों को मन में सजोंकर हम आगे बढ़े. अब आगे सैलाना के आस पास के पहाड़, जंगल और हरियाली को देखना था और किसी रमणीक स्थल पर भोजन करने का लुत्फ़ भी उठाना था. हम लोग केदारेश्वर से भेरूघाटा की तरफ बढ़े जहाँ एक घाटी जैसी जगह से नीचे का पूरा क्षेत्र एक हरे भरे कैनवास की तरह दिखाई पड़ रहा था. चारो तरफ हरियाली, पहाड़, बीच में पानी से लबालब एक डैम ऐसे दिख रहा था जैसे किसी चित्रकार ने अपनी कूंची से एक बेहतरीन चित्र बनाया हो. हम लोग काफी देर ताका वहां खड़े होकर इस बेहतरीन और बिलकुल शांत खूबसूरती को निहारते रहे. लगभग आधे घंटे खड़े रहने के दरम्यान न तो कोई गाड़ी वहां से गुजरी और न ही कोई शोर शराबा, अगर कुछ था तो हवा की सरसराहट, पक्षियों की आवाज और वहीं पास के एक आदिवासी के झोपड़े के पास खेलते हुए कुछ बच्चों की कुतूहल भरी आवाज. बच्चे भी कौतुहल से हमें देख रहे थे और शायद आपस में एक दूसरे से पूछ भी रहे थे कि यहाँ हमारी शांति को भांग करने ये कौन से लोग आ गए हैं. बहरहाल हम लोग वहां से आगे बढ़े और थोड़ी दूर जाने पर एक और आदिवासी गांव पड़ा. लगभग सभी घर कच्चे थे, बीच बीच में कुछ ईंट के बिना पलस्तर के मकान भी बने दिखाई दिए और पूछने पर पता चला कि ये मकान राज्य सरकार के द्वारा चलाये गए एक योजना के तहत बैंकों से ऋण देकर बनवाये गए हैं. उन मकानों को देखकर सहज ही अंदाजा लग जाता है कि किसी भी राज्य सरकार या केंद्र सरकार की योजना का क्या हश्र होता है. भ्रष्टाचारी बाबुओं के चलते शायद ही कोई योजना उस तरह से लागू हो पाती है जिसकी कल्पना उसकी योजना बनाते समय की जाती है. यकबयक ही अपने भूतपूर्ण प्रधानमंत्री स्व श्री राजीव गाँधी का एक बहुचर्चित कथन याद आ गया जो इसी सिलसिले में कहा गया था. उसी समय एक टेम्पो ने ध्यान भंग किया और जब साथ वाले व्यक्ति ने उस पर बैठे लोगों की संख्या की तरफ ध्यान दिलाया तो ऑंखें खुली की खुली रह गयी. जितने लोग टेम्पो के अंदर बैठे थे, उससे ज्यादा टेम्पो के ऊपर बैठे थे और मैंने आजतक एक टेम्पो में इतने ज्यादा व्यक्ति बैठे हो सकने की कल्पना भी नहीं की थी, देखना तो दूर की बात है. अंदाजन लगभग 30 लोग तो रहे ही होंगे उस टेम्पो में और जितने भी बैठे थे, सब ख़ुशी ख़ुशी जा रहे थे, किसी को भी इस तरह से सफर करने का कोई अफ़सोस नहीं था. साथ चल रहे मित्र ने बताया कि यह क्षेत्र राजस्थान का बॉर्डर है और यहाँ पर चाहे टेम्पो हो या जीप हो, सभी पर ऐसे ही लोग सफर करते हैं. बाद में हमें ऐसी तमाम जीपें जाती दिखाई पड़ीं जिसमें जितने लोग नीचे बैठे थे, कमोबेश उतने ही लोग ऊपर भी बैठे थे. एक दो किस्से भी याद आ गए, पहला किस्सा तो बिहार का था जहाँ हमने बस पर सबसे पहले लोगों को ऊपर ही बैठते देखा था. मतलब जैसे ही वहां बस रूकती थी, लोग सबसे पहले ऊपर छत पर जाकर बैठते थे, बाद वाले बस के अंदर बैठते थे. वह दृश्य भी हमारे लिए बिलकुल गुरुत्वाकर्षण बल के विपरीत जैसा ही था क्योंकि मैं जहाँ से हूँ, वहां लोग अव्वल तो बस के छत पर यात्रा करते ही नहीं हैं और अगर करते भी हैं तो पहले लोग बस के अंदर घुसते हैं और जगह नहीं होने की स्थिति में ही बस की छत का रुख करते हैं. दूसरा किस्सा हमारे नौकरी के दरम्यान का ही याद आया जब बनारस में हमारे एस्टीम कार में लगभग 12 बच्चे बैठकर एक हॉस्टल गए थे और जब वहां एक एक करके बच्चे बाहर निकलने लगे तो लोगों का हँसते हँसते बुरा हाल हो गया था. इस हैरतअंगेज नज़ारे को देखकर हम लोग उसी सड़क पर आगे बढ़े और हमारी मंजिल पर बोरखेड़ा तथा सकरवाड़ा था. बोरखेड़ा से आगे बढ़ते ही सड़क के दोनों तरफ ऊँचे ऊँचे पहाड़ नजर आये जिसपर मंदिर बने हुए थे. अब सोचा गया कि इन्हीं पहाड़ों में से किसी एक पर चढ़ा जाए और जाने के रास्ते की जानकारी के लिए वहीं सड़क के किनारे स्थित एक किसान के घर के सामने हम लोग रुके. पुरानी किताबों में वर्णित किसी भी आम किसान का घर जैसा होता है बिलकुल वैसा ही घर था उस किसान का. घर के सामने कुछ मुर्गे मुर्गियां टहल रही थी, एक तरफ कुछ बकरियां भी घास चार रही थीं और दो भैंस तथा कुछ गायें भी घर के सामने बंधी हुई थीं. चारो तरफ खेत और हरियाली तथा उसके बीच अपने घर में सर पर पगड़ी बांधे मौजूद वह किसान. उसने बड़े प्यार से एक पहाड़ी पर जाने का रास्ता समझाया और इसी बीच मैंने उससे उसके बैंकिंग के बारे में भी पूछ लिया. खैर इस बातचीत में जो बात मुझे पता चली उसने मन को गुस्से और दर्द से भर दिया जो बहुत देर तक मुझे सालता रहा. दरअसल उसने बताया कि उसका ऋण खाता सैलाना में ही स्थित किसी और बैंक में है और जिस एजेंट ने उसे ऋण दिलवाया था, उसने एक बड़ी रकम रिश्वत के तौर पर हड़प ली थी. उस किसान की स्थिति को देखने के बाद मुझे लगा कि जिसने भी ऐसे व्यक्ति से रिश्वत लिया होगा, वह निश्चित रूप से इंसान तो नहीं ही होगा, अलबता उसे भेड़िया जरूर कहा जा सकता है. खैर मैंने अपने मित्र को कहा कि वह उसकी बैंकिंग सम्बन्धी जो भी मदद हो सकती है, वह जरूर करे और हम मन में एक तीस लेकर आगे बढ़ गए.

थोड़ी दूर पर ही पहाड़ी थी और उसके बगल से ऊपर जाने के लिए एक कच्चा रास्ता था. उस रास्ते पर जीप ही जा सकती थी और हमारे मित्र की एस यू वी भी बड़े आराम से ऊपर चली गयी. हम लोग तो पैदल ही आनंद लेते हुए ऊपर पहाड़ी पर पहुंचे जहाँ से एक बार फिर चारो तरफ का दृश्य इतना खूबसूरत था मानों हम सब चम्बा में आ गए हों. थोड़ी देर बाद ही नजर पड़ी मंदिर के आसपास बकरी और गाय भैंस चराते बच्चों पर जो मजे में वहां खेल रहे थे और उनके जानवर अपने हिसाब से हरी घांस का सेवन कर रहे थे. पहाड़ी के ऊपर से चारो तरफ घूम घूमकर हमने सैलाना की हरियाली को निहारा और फिर यह निश्चित हुआ कि भोजन भी वहीं उस शानदार वातावरण में किया जाए. ऊपर एक हैंडपम्प भी लगा हुआ था जिसे चलने पर ठंडा जल निकला जो पीने में बहुत बढ़िया था. अभी हम लोग साथ लायी दरी को बिछाने ही जा रहे थे कि मौसम ने एकदम से करवट लिया और बूंदाबांदी होने लगी. दूर दूसरी पहाड़ी के पीछे काले काले बादल दिखाई पड़ रहे थे जिससे यह स्पस्ट था कि उस तरफ बरसात हो रही थी और यहाँ भी किसी भी वक़्त मूसलाधार बरसात हो सकती है. अब हम लोग थोड़ा उदास हो गए कि शायद इस पहाड़ी पर भोजन करने का सूख नहीं मिल पायेगा. लेकिन चंद मिनटों में ही बूंदाबांदी कम हो गयी और वहीं पर मौजूद एक पेड़ के नीचे हम लोगों ने चटाई बिछायी और फटाफट भोजन के लिए बैठ गए. भोजन में ठेठ राजस्थानी स्वाद था, दाल बाफले के साथ कढ़ी थी और प्याज तथा मिर्ची के भजिये थे. अमूमन राजस्थान के नजदीक के इलाके में यह भोजन किया जाता है लेकिन ये लोग मिर्ची और मीठा बहुत ज्यादा इस्तेमाल करते हैं. जैसे ही हमने दाल को चखा, खांसी आने लगी और आंख तथा नाक से पानी गिरने लगा, दाल बहुत ज्यादा तीखी थी और बड़ी मिर्च के भजिये मानों और डरा रहे थे. खैर कढ़ी ने थोड़ी राहत दी और हम लोग बमुश्किल एक बाफले दाल और कढ़ी के साथ खा पाए. बस भजिये खूब सारा खाया गया क्योंकि मिर्च के साथ साथ सादे भजिये भी थे और उनको खाने में बहुत आनंद आया. अक्सर ऐसे समय में जो होता है, वही हुआ और ढेर सारा भोजन बच गया. फिर हम लोगों ने वहां खेल रहे बच्चों को आवाज देकर बुलाया और उनको भोजन दे दिया कि वह जहाँ चाहें इसे खा लें. बच्चों ने भोजन लिया और उसे लेकर दूसरी तरफ निकल गए जहाँ उन्होंने तसल्ली से बैठकर खाया होगा. इस बीच बकरियों को देखकर सोबो भौंक रहा था जिसके चलते कुछ कुत्ते भी वहां पहुँच गए लेकिन किसी ने भी सोबो को डराने का प्रयास नहीं किया. भोजन करने के बाद तथा सारा कूड़ा एक बड़े से बैग में भरकर हमने गाड़ी में डाल लिया और उस पहाड़ी पर कम से कम २०-२५ पेड़ अपनी तरफ से लगाने का प्राण लेकर हम लोग नीचे उतरे. नीचे सड़क के पास एक झोपडी थी जहाँ आते समय कोई मौजूद नहीं था लेकिन इस समय एक बुजुर्ग किसान बढ़िया पगड़ी बांधे बैठा हुआ था और कुछ दूर पर उसकी बकरियां चर रही थीं. मैंने अपनी आदत के मुताबिक उस किसान से बात करने की सोची और मुझे लगा कि इस झोपडी में रहनेवाला और अपनी बकरियां चराने वाला किसान कोई छोटा मोटा किसान होगा. जब मैं उसके पास पहुंचा तब वह जमीन पर बैठकर बीड़ी पी रहा था. मैंने जब उनसे पूछा कि क्या मैं आप से बातचीत कर सकता हूँ तो वह हड़बड़ा कर अपनी बीड़ी फेंकने के लिए उद्यत हुआ. मैंने कहा कि आप तसल्ली से बीड़ी पी लो फिर बात करते हैं तो उसने बीड़ी के दो कस खींचे और बात करने लगा. मैंने उससे उसकी बकरियों के बारे में पूछा तो उसने बताया कि पहले एक बकरी थी और धीरे धीरे काफी हो गयी. फिर उसने बताया कि कई बकरों और बकरियों को वह अच्छे दामों में बेच भी चूका है. मैंने जब पूछा कि बरसात में आपकी झोपड़ी तो टपकती होगी तो उसने हंसकर इंकार कर दिया. थोड़ी देर की बातचीत के बाद ही मेरा भ्रम चकनाचूर हो गया जब उसने बताया कि उसके पास काफी खेत है और उसकी पिकअप वैन भी चलती है. अब मैंने पूछ ही लिया कि अगर इतना कुछ है तो आप इस टूटी सी झोपडी में क्यों रहते हो तो उसने बताया कि यह झोपडी तो बस यहाँ आकर लेटने के लिए है. उसका घर सड़क के उस पार थोड़ी दूर पर था जो उसने दिखाया. उसके बाद मैंने झोपड़ी के अंदर जाकर देखा, एक खटिया पड़ी हुई थी जो उसके लेटने के लिए थी. आखिर में जब मैंने उससे पूछा कि वह किस बैंक से अपनी बैंकिंग करता है तो उसने हमारे बैंक का ही नाम लिया और हमारे साथ मौजूद एक स्टाफ को पहचान भी लिया. फिर उस स्टाफ ने भी बताया कि यह दादा बैंक आते रहते हैं और इनका हमारे यहाँ ठीकठाक खाता है. उन्होंने फसल ऋण तथा गाड़ी का ऋण भी हमारी बैंक से ही लिया था और यह बात मेरे लिए काफी सुकून पहुंचाने वाली थी. फिर हम लोग वहां से निकले और अपनी अपनी गाडी लेकर मुख्य मार्ग पर आ गए जहाँ से हमारी मंजिल आगे आने वाला गांव था. 

एक बार फिर हम लोग हरे भरे रास्तों और पहाड़ों के बीच से निकलते हुए आगे बढे, थोड़ी दूर आगे जाने पर एक घाटी जैसा नजारा था जहाँ से नीचे एक बड़ा सा तालाब जिसपर बांध बना हुआ था, नजर आया. दूर पहाड़ भी दिखाई दे रहे थे और एक तरफ जंगल भी था. लोगों ने बताया कि एक समय था जब प्रदेश के मुख्यमंत्री इसी जगह पर रात बिताने आते थे और ग्रामीणों से उनके दुःख दर्द भी सुनते थे. अब खैर दुःख दर्द तो क्या ही सुनते रहे होंगे लेकिन इसी बहाने इस जिले के अधिकारियों के लिए एक हफ्ते का हाड़तोड़ परिश्रम जरूर हो जाता रहा होगा. एक बार इच्छा हुई कि किसी तरह वहां से नीचे उतरा जाए और उस डैम को पास से देखा जाए लेकिन फिर लगा कि वहां तक पहुंचना मुश्किल होगा. दरअसल बरसात के चलते रास्ता बहुत अच्छा नहीं रह गया था और कुछ किमी शायद पैदल भी चलना पड़ता. हमारे साथ के एक व्यक्ति ने किसी परिचित को फोन लगाने का प्रयास किया जिससे कि उस डैम तक जाने में मदद मिले लेकिन उनके फोन में नेटवर्क गयाब था. फिर मैंने अपने फोन से काल किया तो फोन लग गया लेकिन फोन उनके बच्चे ने उठाया और बताया कि उसके पिताजी कहीं गए हैं और फोन उसके पास है. खैर इस कोविड काल में पढ़ाई के लिए ये स्मार्ट फोन ही काम आये और बहुत से लोगों ने अपने फोन बच्चों को दे दिए जिससे कि वह पढ़ाई जारी रख सकें. बहरहाल वहां जाने का इरादा त्यागकर हम लोग आगे बढे और आगे जाकर एक जगह हमारी गाड़ी रुक गयी. सामने एक जगह थी जहाँ सड़क के ऊपर से पानी बाह रहा था और वहां कोई छोटी सी पुलिया भी थी. अब हमें तो अंदाजा नहीं लग रहा था कि वास्तव में सड़क पर कितना पानी है और हम सोच ही रहे थे कि इतने में सामने से एक चरवाहा अपने गाय भैंस के साथ उस पानी भरे पुल को पार करते हुए हमारी तरफ आने लगा. इसी बीच में एक मोटरसाइकिल सवार भी उस पानी भरे सड़क से गुजर गया तो हमें तसल्ली हुई कि हम सब भी निकल सकते हैं. आगे कई गांवों से गुजरते हुए हम एक ऐसे इलाके में पहुंचे जहाँ सड़क के किनारे बहती हुई नदी बहुत छिछली थी और वहां आसानी से पानी में उतरा जा सकता था. वहां पर हम लोगों ने अपनी गाड़ियां रोकीं और फिर धीरे धीरे पानी में उतर गए. पानी में जो पत्थर थे उसपर फिसलन काफी थी और हम लोग कई बार फिसलने से बचे भी. लेकिन फिर हमने उसे पार किया और उस तरफ जाकर कुछ समय बिताया. इस बीच वहां कुछ बच्चे भी आ गए थे और वे हमें कुतूहल से देख रहे थे मानों हम किसी और गृह के प्राणी हों. वैसे उनका कौतुहल जायज ही था क्योंकि उनके लिए तो हम लोग सचमुच किसी अन्य लोक के ही निवासी थे जिनके पास सभी भौतिक सुख सुविधाएँ उपलब्ध थीं.

लेकिन जो चीज उनके पास थी, हम उसी की तलाश में उस क्षेत्र में भटक रहे थे और वह चीज थी "सुकून, शांति, प्रकृति का सानिध्य और स्वच्छ हवा". खैर चलते समय हमने उन बच्चों को बिस्किट का पैकेट पकड़ाया जिससे हम यह महसूस कर सकें कि हमने उनको थोड़ा तो दिया. उसी दरम्यान वहां पर एक ग्रामीण कुछ पूजन की सामग्री ले आया था और पूछने पर उसने बताया कि यहीं सड़क पर वह पूर्वजों के लिए पूजा पाठ करेगा. 

वहां से जब हम आगे बढे तो जंगल शुरू हो गया था और साथ चल रहे लोगों ने बताया कि यहाँ पर जानवर भी मिलते हैं. खैर वहां ग्रामीणों के घर पर बहुत से मवेशी थे और कभी कभी एकाध बकरी इत्यादि जानवर उठा ले जाते थे. लेकिन ऐसा बहुत कम ही होता था, दरअसल जानवर भी सबसे ज्यादा हम इंसानों से ही डरते हैं और यथासंभव हमसे दूर ही रहने में अपनी भलाई समझते हैं. इसी बीच हमारे मित्र ने एक दिलचस्प लेकिन खतरनाक किस्सा सुनाया, खतरनाक उनके लिए था लेकिन हमें सुनने में बहुत दिलचस्प लगा. एक बार वह अपने एक साथी के साथ, ऐसे ही किसी गांव में जो जंगल के आसपास था, गया जहाँ पर किसान से मिलने के लिए उसके खेत पर जाना पड़ा. वहां उसने ध्यान दिया कि खेत के बीचोबीच एक गड्ढा जैसा इलाका है जहाँ सोयाबीन नहीं लगी है. उसे कौतुहल हुआ तो उसने उस किसान से पूछ लिया. जवाब में किसान ने जो बताया उसे सुनकर उसके होश उड़ गए "क्या बताएं साहब, यहाँ पर कुछ दिन पहले दो शेर लड़े थे जिसके चलते वहां की फसल नष्ट हो गयी" और उसने उस जगह को वैसे ही खाली छोड़ दिया. अब हमारे मित्र की हालत खराब हो गयी कि कहीं वे शेर दुबारा जोर आजमाईस करने इसी जगह आ गए तो क्या होगा. और उन्होंने किसान को सलाम किया और तुरंत नौ दो ग्यारह हो गए. अब ऐसे में हम भी रहे होते तो उस गांव की तरफ अगले एक साल भी अपना रुख नहीं करते.

पीछे दो घंटे में हम जहाँ भी थे वहां पर फोन का नेटवर्क भी नहीं था इसलिए बाहरी समाज से हमारा संपर्क बंद था. जैसे हम लोग थोड़ा बाहर आये, फोन के मैसेज टन ने बता दिया कि हमारी शांति भंग होने का समय वापस शुरू हो गया है. अब ऐसे इलाकों में जहाँ फोन का नेटवर्क भी नहीं आता हो, वहां बैंकिंग सेवा भी देना एक दुरूह कार्य है. इसलिए इन गांव के लोगों को नदी और पहाड़ पार करके मीलों दूर बैंक या अन्य सरकारी कार्यालय आना पड़ता है. इसका एक दूसरा पहलू भी है कि इन गांवों के ऐसे लोग जिनको सरकार द्वारा छोटी मोटी पेंशन जैसे वृद्धावस्था पेंशन इत्यादि लेने के बहाने ही गांव से निकल कर शहर या कस्बे में आते हैं और वापस जाते समय घर के बच्चों के लिए कुछ मिठाई या खिलौने ले जाते हैं. तभी हमारे एक साथी के फोन पर कोई काल आया और वह एक जगह के बारे में बात करने लगा जहाँ पर उस फोन करने वाले से मुलाकात हो सके. थोड़ी देर में हम कुछ अन्य गांवों को पार करते हुए एक और पुलिया के पास पहुंचे जहाँ एक सज्जन मोटरसाइकिल से हमारा इन्तजार कर रहे थे. उनके पास लौकी जैसी कोई सब्जी थी जिसके बारे में हमें बाद में पता चला कि इसे "बालम खीरा" कहते हैं. कोई भी व्यक्ति उसे पहले नजर में लौकी ही समझेगा क्योंकि वह लौकी जितना बड़ा होता है और उसका रंग भी बिलकुल वैसा ही होता है. इस सीजन में ही यह एक गांव "बालम" में खूब पैदा होता है और वहां से व्यापारी इसे थोक भाव में खरीदकर महानगर भेज देते हैं. वैसे हमारे लिए इस खीरे को देखने का यह पहला ही अवसर था, पढ़ा तो मैंने इसके बारे में पहले भी था. 

अब हम सर्वं गांव से होते हुए अपनी आखिरी जगह की तरफ बढ़ चले जो "कोटड़ा केदारेश्वर" था. शाम होने लगी थी और वापस उज्जैन भी आना था इसलिए हम लोग जल्दी जल्दी वहां पहुंचे. यह भी एक मंदिर है जो पहाड़ी के बीच में जमीं से लगभग 500 मीटर नीचे स्थित है और इस मंदिर के सामने भी एक झरना अपनी पूरी खूबसूरती से गिर रहा था. नीचे एक गुफा थी और उसी में मंदिर था तथा मंदिर के दूसरी तरफ एक और झरना गिर रहा था. मंदिर के अंदर से गिरते हुए झरने के संगीत को महसूस करना बहुत अद्भुत अनुभव था और हम लोग काफी देर तक वहीँ खड़े रहे. इसी बीच ढेर सारी तस्वीरें भी ली गयीं और हम लोगों ने खूब आनंद उठाया. हम लोग जब वापस मंदिर से निकलकर ऊपर आये तो एक साथी ने कहा कि हम लोग दूर बाह रहे उस दूसरे झरने तक जा सकते हैं. अब ऐसा अवसर मिले तो भला हम उसे कैसे जाने देते इसलिए हम लोग तुरंत उस दूसरे झरने को नजदीक से देखने के लिए निकल गए. चारो तरफ पहाड़, बीच में खेत और झरने के जल द्वारा बानी हुई एक संकरी नदी, कुल मिलाकर एक अविष्मरणीय दृश्य था और नखें इसे देखकर भरती नहीं थीं. यही सब निहारते हुए हम लोग उस दूसरे झरने तक पहुंचे और उसके जल में हाथ और पैर धुलने का लोभ संवरण नहीं कर पाए. थोड़ी देर वहां बिताने के बाद यह एहसास हो गया कि अगर हम दिल की बात सुनेंगे तो यहाँ से जाने की इच्छा नहीं होगी. लेकिन दिमाग की बात सुनते हुए हम लोग वहां से वापस आये क्योंकि उज्जैन भी जाना था. वहां से निकलकर हम लोग लगभग दो किमी आये और फिर वहां से हमारे रास्ते अलग हो गए, हम लोग उज्जैन के लिए रावण हो गए और वे लोग सैलाना निकल गए.

वापस आते समय दिल एक तरफ तो बहुत प्रसन्न था कि आज प्रकृति के सचमुच पास वक़्त गुजरने का मौका मिला था लेकिन वह समय इतना कम था कि हमने भविष्य में एक बार और वहां जाने और एक रात उस आदिवासी क्षेत्र में बिताने के बारे में भी सोच लिया. अब देखते हैं कि वह मौका कब आता है लेकिन उम्मीद है कि जरूर आएगा और फिर उस यात्रा संस्मरण को शब्दों में ढालने का प्रयास किया जाएगा. 


Monday, August 30, 2021

कीमत- लघुकथा

 आज राजेश बहुत दुखी था, उसे समझ में नहीं आ रहा था कि आखिर रजत उससे इतना रुखा व्यवहार क्यों करता है. उसे तो याद भी नहीं है कि कभी उसने उसके साथ किसी भी तरह का गलत व्यवहार किया हो, बल्कि वह हमेशा उसका समर्थन ही करता था अपने ऑफिस में. और आज तो बात भी ऐसी थी जिसमें उसे बधाई देना बनता ही था. दरअसल कल ही पदोन्नति का परिणाम आया था और उसके ऑफिस से रजत इकलौता था जिसे पदोन्नति मिली थी. उसे याद आया कितने रूखे तरीके से रजत ने उसकी बधाई का जवाब दिया था "धन्यवाद, वैसे हम लोग भी अब आगे बढ़ सकते हैं, है कि नहीं?

घर पर उसके चेहरे को देखते ही बाबूजी ने समझ लिया कि आज ऑफिस में कुछ हुआ है. "क्या हो गया राजेश, कोई गंभीर मसला है तो मैं मदद करूँ? उसके बाबूजी आज भी उसके अच्छे दोस्त हैं और हर मुश्किल घड़ी में उसके खेवनहार भी.

उसने पहले तो सोचा कि बात टाल जाए लेकिन फिर उसने बाबूजी को बता ही दिया "आखिर रजत मुझसे ऐसा व्यवहार क्यों करता है बाबूजी, मैंने तो कभी भी उसको यह महसूस नहीं होने दिया कि वह आरक्षित वर्ग से है?

बाबूजी ने एक गहरी सांस ली और उसको समझाते हुए बोले "देखो राजेश, सदियों से हमारे पुरखों ने जो उनके साथ किया है, उसकी कीमत तो हमको चुकानी ही पड़ेगी. तुम निराश मत हो, शायद आगे चलकर रजत को एहसास हो कि पुरखों के द्वारा की गयी गलतियों की सजा आने वाली पीढ़ियों को नहीं देनी चाहिए".






Monday, August 9, 2021

चम्बा की यात्रा-- यात्रा संस्मरण

हिमाचल की हरी-भरी वादियां और वहां की ताज़गी मुझे हमेशा अपनी तरफ आकर्षित करती थी।

मैं पिछली बार लगभग 15 साल पहले गया था और इन पंद्रह सालों में मेरा मन मुझे पचीसों बार वापस

हिमाचल के शिमला, कुल्लू और मनाली इत्यादि जगहों में ले गया था ।किसी न किसी वजह से मेरा जाना

टल जाता था और मैं मन मसोसे अगली बार जल्दी जाऊंगा का प्रण करके रह जाता। हाँ, इस बीच मैं उत्तराखंड के कुछ जिलों में जरूर घूम आया था लेकिन मेरा पहला प्यार हिमाचल मुझे हमेशा याद आता रहता।

इस बार जैसे ही मुझे कुछ दिनों की छुट्टी मिली, मैंने तुरंत अपने प्यारे प्रदेश में जाने का मन बना लिया।

और इस बार मेरी मंजिल चम्बा थी जिसकी खूबसूरती के चर्चे मैं गाहे-बगाहे सुनता रहता था। दरअसल

चम्बा में मेरी भतीजी पहाड़ी पेंटिंग सीखने के लिए पिछले दो महीने से गयी हुई थी और रहने का इंतज़ाम

एक फ्लैट में हो गया था। रांची से सीधे जाने के लिए कोई साधन नहीं था तो मैंने बनारस से ट्रेन

पकड़ने का सोचा। अब सफर के साथी संतोष भैया से पूछना था कि वह चलेंगे कि नहीं।

भैया, मैं कल बनारस आ रहा हूँ और दोपहर में हम लोग चम्बा के लिए निकलेंगे। आपका भी आने-जाने का

टिकट मैंने करा दिया है, सामान बांधकर कल 11 बजे तक अपने फ्लैट से निकलने की तयारी करेंगेउसने एक तरह से भैया को ना करने का कोई मौका ही नहीं दिया।

अरे विनय, थोड़े दिन पहले तो बता दिया करो, ऑफिस में किसी को बैठाना पड़ता है। तुम्हारी तरह की नौकरी नहीं है ना हमारी कि जब चाहे निकल लिए।भैया ने थोड़ी नाराज़गी दिखाई. वैसे मुझको पता था कि यह नाराज़गी उतनी ही नकली है जितना भैया का हर सफर के बाद यह कहना कि अगली बार तुम्हारे साथ नहीं जाऊंगा, तुम बहुत पैदल घुमाते हो।

पता नहीं किसने आप लोगों के दिमाग में यह बैठा दिया है कि बैंक की नौकरी में कोई काम नहीं होता और

जब चाहे छुट्टी मिल जाती है। मैंने पिछले तीन महीने में चार बार प्लान बनाया लेकिन हर बार किसी न किसी

वजह से छुट्टी नहीं मिली। इस बार भी सिर्फ चार दिन की छुट्टी मिली है, वह भी बहुत एहसान जताकर।

मैंने गहरी सांस ली और फोन रख दिया।

बेगमपुरा एक्सप्रेस में स्लीपर में वेटिंग का टिकट मिला लेकिन रेलवे के एक परिचित ने टिकट कन्फर्म हो

जाने का आश्वासन दिया तो मैं निश्चिंत होकर बनारस निकल गया। रेल का सफर हम दोनों को स्लीपर में ही

करने में मजा आता था जिसके कई कारण थे। सबसे बड़ी चीज थी कि मुझे लोगों से मिलना और बातचीत

करना पसंद था। इस पसंद के पीछे भी बहुत दिलचस्प कहानी है, आज से चार साल पहले तक मैं अमूमन

ए सी में ही सफर करता था। पढ़ने का शौक हमें बचपन से था तो बहुत सी पत्रिकाएं, उपन्यास इत्यादि मैं नियमित तौर पर पढता था। लेकिन पिछले दो-तीन वर्षों में लिखने का शौक पैदा हुआ और धीरे धीरे मुझे महसूस हुआ कि जिंदगी की सबसे सच्ची और अनूठी कहानियां तो आम जीवन में ही मिलती हैं। एकाध बार मुझे जब मज़बूरी में स्लीपर में जाना पड़ा तो उस सफर में मुझे कुछ दिलचस्प कहानियां मिलीं। फिर तो मुझे यह पता चल गया कि सफर में अगर कहानियां ढूंढनी है तो आम लोगों के क्लास स्लीपर में ही सफर करना पड़ेगा। दूसरा प्रमुख कारण था पैसे की बचत जिसके चलते हमें कहीं भी जाने के लिए सोचना नहीं पड़ता

था।

बनारस से मेरे सफर के साथी भैया भी चम्बा चलने के लिए तैयारी में लग गए| पिछले लगभग 30 वर्षों

से भैया मेरे हर छोटे-बड़े सफर के साथी थे और अब तो मैं अकेले सफर की कल्पना भी नहीं कर पाता

था। मेरी बस सुबह बनारस पहुँचने वाली थी और फिर दोपहर में हम दोनों लोग पठानकोट के लिए निकलने

वाले थे। सफर में सामान जितना कम हो उतना बढ़िया, हम दोनों की यही सोच थी और इसीलिए हर

सफर का हम भरपूर आनंद उठाते थे। बनारस पहुंचकर मैंने अपने फ्लैट पर जाकर स्नान किया और खाना

खाकर अगले सफर की तयारी में लग गया। 11 बजते बजते भैया भी आ गए, 12.30 की ट्रेन थी।

जरा पी एन आर से देखो तो टिकट कन्फर्म हुआ कि नहीं, वैसे हो ही गया होगा।भैया ने कहा तो मैं नेट पर देखने लगा। लेकिन नेट पर हमारे उम्मीद के विपरीत टिकट अभी भी वेटिंग में ही था और टिकट अगर कन्फर्म नहीं हुआ तो अपने आप कैंसिल हो जायेगा, यह हम दोनों को पता था।

इस बार तो धोखा हो गया, अब तो चार्ट भी बन गया होगा। ट्रेन तो गयी भैया, अब क्या किया जाए?”

मैंने कहा तो भैया भी चिंता में पड़ गए।

आधा घंटा और देख लेते हैं, फिर सोचेंगे।भैया ने गहरी सांस ली। हम दोनों को ही पता था कि अब टिकट तो गया, इसलिए नेट पर बस की तलाश शुरू हुई। एक बस में दिल्ली तक का टिकट मिला तो हम दोनों की जान में जान आयी। ट्रेन तो सीधे पठानकोट उतारती और फिर वहां से चम्बा लगभग 5 घंटे का सफर था।

चलो भाई, पहले दिल्ली चलते हैं, फिर वहां से दूसरी बस लेंगे। शायद चम्बा के लिए कोई सीधी बस भी मिल जाए।भैया ने कहा तो मैंने भी सर हिला दिया।

5 बजे की बस थी जिसे दिल्ली सुबह 6 बजे तक पहुंचना था । एक ही गनीमत थी कि बस स्लीपर थी तो सोने को मिल जायेगा, यही सोचकर हम दोनों अपना बैग लेकर लहरतारा निकल गए। बस ने चलते चलते 6 बजा दिए और कुछ खा पीकर हम दोनों सोने के लिए लेट गए।

इस बार का सफर तो और यादगार रहेगा भैया, देखते हैं दिली से चम्बा के लिए क्या साधन मिलता है?” मैंने आंख मूंदते हुए कहा।  थोड़ी देर में हम दोनों बस के हिचकोलों में सोने लगे और नींद खुली सुबह जब बस एक ढाबे पर रुकी।  कंडक्टर आवाज़ लगा रहा था-“जिसे भी चाय पीना हो या फ्रेश होना हो वह हो ले. इसके बाद बस दिल्ली में ही रुकेगी।

भैया तो लेटे रहे, मैं उतरकर बाथरूम की तरफ निकल गया। काफी लोग आधी नींद में जगे नित्यक्रिया में लगे थे और कुछ तो ब्रश भी कर रहे थे. मैं भी फ्रेश होकर निकला और ढाबे पर जाकर एक प्याली चाय पीने लगा। उम्मीद से बेहतर चाय मिली तो मैंने भैया को फोन लगायाचाय पीना है क्या, बढ़िया बनी है।

रहने दे भाई, चाय पिया तो प्रेशर बन जायेगा और मुश्किल होगी. तू मजे में चाय पी और आजा।भैया ने ऊंघते हुए जवाब दिया तो वह समझ गया कि इनकी नींद अभी नहीं खुलेगी।

दिल्ली पहुँचने में लगभग दस बज गए, बस स्टैंड पर उतरकर भैया फ्रेश होने गये और मैं पूछताछ काउंटर की तरफ बढ़ा जहाँ मुझे चम्बा के लिए बस का पता लगाना था।

चम्बा के लिए शाम 7 बजे एक बस है जो कल सुबह 11 बजे तक पहुंचाएगी. आप चाहो तो बस से लुधियाना या पठानकोट निकल जाओ और वहां से चम्बा के लिए साधन मिल जाएगा।

मैंने हिसाब लगाया, अगले 8 घंटा यहाँ बैठने से बेहतर है कि लुधियाना या पठानकोट ही निकल चला जाए और फिर वहां से चम्बा रात 12 बजे तक तो पहुँच ही जायेंगे। फिर सुबह उठकर आराम से घूमना-फिरना किया जायेगा. कुछ देर में भैया आये तो मैंने अपनी योजना बताई. भैया को क्या दिक्कत होती, वह तो उसके साथ कहीं भी निकल जाते थे। दरअसल रास्ते और सफर की सारी योजना बनाने का काम मैं ही करता था, भैया सामान इकठ्ठा करने और खाने पीने के इंतज़ाम में रहते।

बस स्टैंड पर नाश्ता करने के बाद हम दोनों ने लुधियाना का टिकट लिया और बस में जाकर बैठ गए। लुधियाना जाने का एक कारण उसका एक दोस्त था जो उस समय लुधियाना में ही पोस्टेड था। बस में बैठने के बाद उसने उसको फोन लगायाहलो, परमिंदर, कैसा है भाई और कहाँ है इस समय?”

परमिंदर ने उसे पहचान लिया और बड़े उत्साह के साथ जवाब दियाभाई मैं तो लुधियाने ही हूँ, तू कहाँ निकला है इस समय?” दरअसल मेरे सभी दोस्तों को पता था कि मैं जबरदस्त घुमक्कड़ हूँ और किसी भी समय कहीं भी जा सकता हूँ। अक्सर कोई न कोई कहताअबे तू भी वही नौकरी करता है जो हम लोग करते हैं, लेकिन हम लोग तो बाजार जाने के लिए भी दस बार सोचते हैं. और एक तू है कि जब देखो तब कभी इस शहर तो कभी उस प्रदेश।और मैं हंस कर उनको बताताभाई अपने-अपने तरीके हैं जिंदगी गुजारने के, तुम लोग आराम करते हो और मैं घूमता हूँ।  लेकिन सभी अपने मन का ही काम करते हैं। इसलिए कभी सोचना नहीं चाहिए कि दूसरा ज्यादा मजे कर रहा है।

भाई मैं तो अभी दिल्ली से निकला हूँ और लुधियाना की बस में बैठा हूँ. अब तू बता कि शाम को दो घंटे के लिए मुलाक़ात हो सकती है क्या?”

कुछ पल फोन पर ख़ामोशी रही फिर परमिंदर ने पूछाअच्छा, तो कितने दिन रुकना है लुधियाने, किसी काम से आ रहा है या बस घूमने-फिरने?”

मैं तो घूमने ही निकला हूँ लेकिन चम्बा जाना है. ट्रेन छूट गयी इसलिए बस से जा रहा हूँ, तुमसे मिलने की इच्छा थी, अगर चाहे तो दो घंटे गप-शप करेंगे और फिर चम्बा निकल जाऊंगा।मैंने काफी उत्साहित होकर बताया।

उधर से फिर थोड़ी देर की ख़ामोशी रही और फिर परमिंदर ने बतायायार पहले बताना था, मैं तो अभी लुधियाने से बाहर हूँ और कल ही वापस आ पाऊँगा। खैर तुमको अभी लुधियाने आने में 7 घंटे लगेंगे और लुधियाने से चम्बा के लिए कोई बस नहीं है।  तो बेहतर होगा कि तुम पठानकोट तक निकल जाओ। अच्छा यह बस कहाँ तक जाएगी?” परमिंदर की आवाज़ में नहीं मिल पाने की निराशा साफ़ सुनाई पड़ रही थी.

उसने कंडक्टर से पूछा कि बस कहाँ तक जाएगी तो पता चला कि बस जालंधर तक जाएगी।

यार यह बस तो जालंधर तक जाएगी।उसने परमिंदर को बताया।

कोई बात नहीं, तुमको वहां से पठानकोट के लिए बस मिल जाएगी। अच्छा मैं एक काम करता हूँ, लुधियाने में मेरे दोस्त को बोल देता हूँ, तुमको नाश्ता वगैरह करा देगा। फिर तुम वहां से पठानकोट की बस ले लेना।परमिंदर को सचमुच नहीं होने का अफ़सोस हो रहा था.

अरे तुम चिंता मत करो दोस्त, मैं जालंधर निकल जाऊंगा और फिर वहां से पठानकोट।  सिर्फ तीन दिन की छुट्टी है इसलिए समय का पूरा उपयोग करना है। अगली बार बताकर आऊंगा, पक्का।उसने परमिंदर को दिलासा दिया और फोन रख दिया।

इस बीच भैया बस से बाहर देखते हुए सो गये थे।  मैंने उन्हें डिस्टर्ब नहीं किया और खुद बाहर देखने लगा।

बहुत महीनों बाद हमने रोडवेज बस की यात्रा की थी लेकिन यह बस बहुत अच्छी थी। और दिल्ली से थोड़ा आगे आने के बाद से ही रास्ता बहुत बढ़िया था तो रास्ते में कहीं भी तकलीफ नहीं हुई। एक और ढाबे पर बस रुकी, दोनों उतरे और तगड़ा नाश्ता करके वापस बस में बैठ गए।

मुझे अक्सर सड़क के किनारे के ढाबे बहुत आकर्षित करते हैं, खासकर ऐसे ढाबे जहाँ खाट बिछी हो और दाल फ्राई में मक्खन डालकर तंदूरी रोटी के साथ गरमागरम खाने को मिलती हो। खैर यह ढाबा उस तरह का नहीं था, थोड़ा आधुनिक किस्म का था जहाँ चाउमीन और नूडल मिल रहे थे। भैया के साथ सबसे अच्छी बात यह थी कि जो भी मिलता, वह खा लेते थे। और मैं आराम से रास्ते भर सोता रहता और भैया रास्ते को अधिक से अधिक देर तक देखना पसंद करते।

बस अपनी रफ़्तार से दौड़ रही थी कि अचानक मेरे फोन पर किसी अनजाने नंबर से कॉल आया। बात करने पर पता चला कि वह परमिंदर का दोस्त था और उसे परमिंदर ने ही नंबर दिया था कि वह मुझसे पूछ ले कि मुझे लुधियाने में कुछ खाने-पीने के लिए तो नहीं चाहिए। मैंने विनम्रता से मना कर दिया और उसको धन्यवाद भी दिया। बस लगभग 7 बजे जालंधर पहुंची, उतर कर पूछने पर पता चला कि आधे घंटे में एक बस पठानकोट जाएगी। दोनों वहां एक बार फ्रेश हुए और एक कप चाय पीकर पठानकोट वाली बस में बैठ गए।

जालंधर बस स्टैंड पर कुछ लोगों ने बताया कि पठानकोट से एक बस आपको मिल जाएगी जो चम्बा रात में जाती है। दोनों को यह सुनकर बहुत राहत मिली और फिर कुछ देर में बस आगे बढ़ी। तीन घंटे के सफर के बाद जब उनकी बस पठानकोट पहुंची तो मैं लपक कर स्टैंड के अंदर बने पूछताछ कार्यालय पहुंचा। वहां पहुँचने पर अंदर तो कोई नहीं मिला लेकिन बाहर मौजूद लोगों ने बताया कि अब चम्बा के लिए अगली बस सुबह करीब 4 बजे मिलेगी।

अरे यार, गजब हाल है, साला दिन भर यात्रा किये और मामला वही टांय-टांय फिस्स। इससे अच्छा तो दिल्ली में ही रुके होते और डायरेक्ट बस मिलती चम्बा की।मैं अब थोड़ा झल्ला गया।

भैया ने मुझे ढांढस बंधाया, उधर चम्बा से भतीजी का फोन भी आया कि हम लोग कहाँ पहुंचे।

हम लोग तो पठानकोट आकर अटक गए, अब यहाँ से सुबह ही बस मिलेगी और हम लोग 11 बजे तक पहुंचेंगे।मेरी आवाज में निराशा थी.

ओह, कोई बात नहीं चाचाजी, आप लोग आराम से आईये, वहीँ कहीं कमरा लेकर सो लीजिये और फिर आराम से सुबह निकलिए।भतीजी ने दिलासा दिया।

मैं तब तक बस स्टैंड के बाहर निकल गया और चारो तरफ देखकर वापस लौटा। चम्बा जाने की कोई सूरत नजर नहीं आ रही थी, हलकी ठण्ड भी पड़ रही थी और पेट में चूहे भी अब दौड़ लगाने लगे थे।

कुछ खा लेते हैं फिर यहीं कुर्सियों पर लुढ़का जायेगा सुबह तक।भैया ने कहा तो मैंने भी सहमति जताई। उतनी रात में खाने के लिए बहुत विकल्प नजर नहीं आ रहे थे तो ब्रेड ऑमलेट ही हमें बेहतर लगा। भैया दो प्लेट ब्रेड ऑमलेट और एक बोतल पानी ले आये और हम दोनों बैग रखकर खाने में जुट गए। पानी पीकर शरीर में ताजगी आ गयी और मैं एक बार फिर बाहर टहलने के लिए निकला। तभी मेरी नजर सामने से आ रहे तीन चार लड़कों पर पड़ी। उन्होंने भी अंदाजा लगा लिया कि हम लोग बस के

इंतज़ार में बैठे हैं तो एक लड़के ने आकर पूछा –“आप लोग कहाँ जायेंगे?”

इतनी रात को एक अनजाने बस स्टैंड पर कोई ऐसा सवाल पूछे तो अजीब तो लगता ही है लेकिन चम्बा जाने की बेसब्री में तुरंत मेरे मुंह से निकल गया –“चम्बा जाना था लेकिन अब तो सुबह ही बस मिलेगी।

जवाब देने के साथ ही उसके मन में एक उम्मीद भी जग गयी कि शायद इन लड़कों को भी चम्बा ही जाना है।

हम लोगों को भरमौर जाना है लेकिन आपको चम्बा छोड़ते हुए निकल जायेंगे। अगर साथ चलना चाहें तो एक टवेरा है जो जा सकती है।सामने से मिले इस ऑफर पर मेरी ख़ुशी का ठिकाना नहीं रहा।

ठीक है, हम लोग भी चलते हैं।उसने कहा और भैया को फोन करके बुलाया। अगले दस मिनट में भाड़े का मामला फाइनल हुआ, वैसे तो वह बस की तुलना में चार गुना था लेकिन उम्मीद थी रात के दो बजे तक पहुँच जायेंगे और फिर थोड़ा सोकर सुबह घूमने निकल जायेंगे।

भैया आये और दोनों अपना सामान उठाकर लड़कों के साथ बाहर निकल गए। बस स्टैंड के बाहर ही एक टैक्सी ऑपरेटर का ऑफिस था जहाँ से उनको टवेरा मिलनी थी। अब पांच लड़के और हम दोनों, कुल सात लोग और एक ड्राइवर, दिक्कत तो होती लेकिन समय इतना कीमती था कि उसके आगे यह बातें बेमानी थीं।

बहरहाल अगले आधे घंटे में ड्राइवर आया और फिर गाड़ी चम्बा की तरफ चल दी। अबतक ठण्ड काफी हो चुकी थी और भूख भी सबको लग गयी थी तो तंय हुआ कि आगे एक ढाबे पर रूककर खाना खाया जायेगा और फिर चम्बा निकलेंगे। ढाबे पहुँचने के बाद सब लोग गर्मागर्म भोजन पर टूट पड़े, भैया और मैंने भी तंदूरी रोटी और दाल फ्राई का आनंद लिया और फिर जब सारे लोग बाहर निकले तो पता चला कि गाड़ी तो पंचर है। अब रात के ग्यारह बजे उतनी ठण्ड में क्या होगा, पंचर बनेगा या रात वहीँ गुजारनी पड़ेगी इसकी चिंता सबको सताने लगी। खैर ड्राइवर ने किसी तरह स्टेपनी निकाली और लगाकर आगे चल पड़ा।

लोगों से बातचीत करके और इसके पहले के हिमाचल के अनुभव से मुझे इस बात का अंदाजा तो था कि रास्ता पूरा पहाड़ी होगा और काफी उतर चढ़ाव से गुजरना होगा। मेरी आदत थी कि रात को कार या टैक्सी के सफर में मुझे नींद नहीं आती थी और मैं बाहर देखने का असफल प्रयास करते हुए जगा रहा।

अँधेरे में बहुत कुछ तो नहीं दिख रहा था लेकिन सामने की सड़क और ऊबड़खाबड़ रास्ता दिखाई दे रहा था। उन लड़कों ने झन्नाटेदार पंजाबी गाने लगा दिए थे और सफर मजे में बीत रहा था।

ढाबे से निकलते ही मैंने भतीजी स्मिता को फोन कर दिया कि हम दोनों टैक्सी से चम्बा के लिए निकल गए हैं। हमें उम्मीद थी कि तक़रीबन भोर 3 बजे हम लोग चम्बा पहुँच जायेंगे और स्मिता और उसके रूम मेट उनको लेने बस स्टैंड आ जायेंगे। गाड़ी सुबह के साढ़े तीन बजे चम्बा बस स्टैंड पहुँच गयी और दोनों गाड़ी से उतरे. चंद मिनट में स्मिता और उसके रूम मेट आ गए और अगले आधे घंटे में काफी चढ़ाई चढ़ने के बाद दोनों फ्लैट पर पहुंचे. उस समय तो नहीं लगा लेकिन जब फ्लैट पर पहुंचकर थोड़ी सांस में सांस आयी तो लगा कि हिन्दुस्तान में भी ऐसी जगहें हैं जहाँ रात के तीन बजे लड़कियां बड़े आराम से अपने फ्लैट से बस

स्टैंड तक बिना परेशानी के जा सकती हैं। और इस विचार के आते ही सफर में हुई अब तक की थकान एक मुस्कान में बदल गयी।

नींद तो गहरी आनी ही थी, बड़ी मुश्किल से सुबह आठ बजे नींद खुली। और फिर फटाफट फ्रेश होकर हमने नाश्ता किया और चम्बा घूमने निकल पड़े। कहाँ बनारस और दिल्ली का कंक्रीट का जंगल और कहाँ दूर से दिखते खूबसूरत पहाड़, घूमने का असली मजा ऐसी जगहों पर ही आता है। फ्लैट काफी ऊंचाई पर था और उससे भी काफी ऊपर जाकर रास्ता था जिसपर हम लोग हांफते हुए पहुंचे. स्मिता और उसके दोस्तों की पिछले दो महीने में चढ़ान पर चढ़ने उतरने की आदत पड़ गयी थी लेकिन हमारी हालत खराब होने लगी।

बहरहाल थोड़ा रुकते थोड़ा चलते हम लोग चामुंडा मंदिर की तरफ बढे जो सड़क से काफी ऊपर एक पहाड़ी पर था । जैसे जैसे हम लोग ऊपर पहाड़ी पर चढ़ना प्रारम्भ किये, वैसे वैसे चम्बा के चारों तरफ के पहाड़ और उनमें से बहती रावी नदी दिखाई पड़ने लगी। अब हर पांच मिनट पर हम ठहरते, चारों तरफ की खूबसूरती निहारते और फिर ऊपर चढ़ते। इसी सब में हम लोग कब ऊपर मंदिर में पहुँच गए, पता ही नहीं चला। खैर मंदिर तो सब जगह के एक जैसे ही होते हैं लेकिन चामुंडा मंदिर के बाहर बैठकर चम्बा को निहारने में जो अलौकिक आनंद की अनुभूति हुई, उसे शब्दों में वर्णन करना आसान नहीं था। कहाँ हमारा अपना घर बनारस जहाँ अगर शहर में निकल गए तो सिर्फ ट्रैफिक का शोर और प्रदूषण और कहाँ चम्बा जहाँ न तो ट्रैफिक और न ही कोई प्रदूषण। हाँ बनारस में भी गंगा के किनारे सुबह शाम जाना अपने आप में बहुत सुकूनदायी अनुभव होता है लेकिन शहर आपको हदसा देता है। वहां बैठे बैठे लगभग एक घंटा होने को आया तो स्मिता ने टोकाचाचाजी, आज आपको खजियार भी जाना है और वहां आने जाने में 5 से 6 घंटे लग जाएंगे। इसलिए अब यहाँ से निकलिए।

नहीं चाहते हुए भी हमें वहां से उठना पड़ा और फिर ढलान से उतरते हुए एक बार फिर चम्बा के नैसर्गिक सौंदर्य को हम लोगों ने अपनी निगाहों में भरसक कैद किया। अब चम्बा का बस स्टैंड मंदिर से लगभग ६ किमी दूर था लेकिन रास्ता ढलान वाला था इसलिए पहुँचने में कोई दिक्कत नहीं हुई। पूरा रास्ता बाजार से होता हुआ गुजरा जहाँ कहीं कोई मंदिर था तो कहीं दुकाने. आधे रास्ते पहुँचने पर एक बड़ा सा पार्क जैसा मैदान मिला जिसके चारो तरफ दुकानें सजी हुई थीं। लोगों ने बताया कि इसे चौगान कहते हैं और यहाँ पर हर साल मिंजर मेले का आयोजन किया जाता है। एक सप्ताह तक चलने वाले इस मेले में स्थानीय निवासी रंग बिरंगी वेशभूषा में आते हैं. इस अवसर पर यहां बड़ी संख्या में सांस्कृतिक और खेलकूद की गतिविधियां आयोजित की जाती हैं।

चौगान को थोड़ी देर देखने के बाद हम लोग बस स्टैंड की तरफ बढे जो वहां से थोड़ी ही दूर पर था। चम्बा का बस स्टैंड किसी भी आम बस स्टैंड की तरह ही था और वहां से बहुत सी जगह जाने के लिए बसें खड़ी थीं। बस स्टैंड से ही लगी हुई रावी नदी बहती है जिसे देखने का लोभ संवरण करना आसान नहीं था और हम लोग कुछ देर के लिए नदी के किनारे जाकर खड़े हो गए। मन तो वहां से आगे जाने का नहीं हो रहा था लेकिन खजियार भी जाना था जिसे मिनी स्विटज़रलैंड भी कहा जाता है, उसे देखने का आकर्षण इससे भी बड़ा था। तो थोड़ी देर में हम दोनों एक बस में बैठकर खजियार के लिए निकल पड़े। पहाड़ी रास्ता, खूबसूरत नज़ारे और स्वच्छ ताज़ी हवा, सफर में थकान तो महसूस ही नहीं होनी थी। खैर लगभग दो घंटे में हम खजियार पहुँच गए, बस से उतरते ही सामने फैला बेहद खूबसूरत हरा भरा घास का मैदान, किनारे की तरफ बड़े बड़े पेड़ और हौले हौले बहती हवाएं, दिल तो मानो बावला सा हो गया। पहले तो एक जगह चाय की टपरी पर एक एक प्याली चाय पी गयी, फिर हम लोग आगे मैदान में बढ़ गए। इसी बीच में घोड़े वाले भी पीछे पड़े कि घोड़े पर घूम लीजिये लेकिन न तो इच्छा थी और न ही ज्यादा समय था हमारे पास। इसलिए हम मैदान में एक बेंच पर आकर बैठ गए और चारो तरफ देखते हुए ताज़ी हवा को अपने फेफड़ों में भरने लगे। कुछ ही मिनट में एक स्थानीय बच्चा एक टोकरी में खरगोश लेकर आया और बोला कि इसके साथ फोटो खिंचवानी है आपको? इतने खूबसूरत और प्यारे खरगोश थे कि क्या बताया जाए, उनसे निगाह हटा पाना मुश्किल था। लेकिन यह सब बच्चों को ही ठीक लगेगा और हमारे साथ तो कोई बच्चा नहीं था इसलिए हमने खरगोश के साथ फोटो का इरादा मुल्तबी किया और वहां की खूबसूरती को निहारते रहे।

कुछ देर बैठने के बाद हमने पूरे इलाके को घूमकर देखने का फैसला किया। मैदान काफी बड़ा था और बीच में छोटा-सा तालाब भी था जिसके आस पास लकड़ी का पुल बना था। कुल मिलाकर बेहद रूमानी वातावरण था और चारो तरफ नौजवान जोड़े एक दूसरे के हाथ में हाथ डाले घूम रहे थे. हम लोगों ने भी लगभग तीन घंटे वहां बिताए और भोजन के बदले वहां पर नाश्ता ही किया। शाम के लगभग चार बजने जा रहे थे और हमारे बस के लौटने का समय भी हो रहा था तो हम लोग बस स्टैंड की तरफ लौटे। लेकिन वहां

जाकर पता चला कि हमारी बस तो चली गयी है और अब सिर्फ टैक्सी ही वापस जाने का सहारा थी। वैसे अधिकांश टैक्सियां तो लोगों को लेकर ही आयी थीं जिन्हें उनके साथ ही वापस जाना था लेकिन कुछ खाली टैक्सियां भी थीं जिन्होंने इतना ज्यादा पैसे मांग लिए कि हमारी हिम्मत जवाब देने लगी।

हम लोग इसी उधेड़बुन में थे कि वापस कैसे चला जाए तभी एक स्थानीय व्यक्ति ने बताया कि यहाँ से लगभग 7 किमी नीचे उतरने के बाद एक छोटा क़स्बा है जहाँ से बस मिल जाती है। अब हमें थकावट तो नाम मात्र की भी नहीं थी इसलिए हमने पैदल ही 7 किमी चलने का फैसला किया. सामान भी कुछ नहीं था तो पैदल यात्रा कोई कठिन नहीं थी और रास्ता भी ढलान का था इसलिए हम दोनों पैदल ही अगले पड़ाव की तरफ चल पड़े। एकाध किमी चलने के बाद ही सड़क के किनारे एक जगह दो पहाड़ी महिलाएं बैठकर

कुछ खाते दिखाई पड़ीं तो हम उनके पास बात करने पहुँच गए। उन्होंने बताया कि वे मंदिर का प्रसाद खा रही हैं और उन्होंने हमें भी खाने का ऑफर दिया। अब इतनी बेशर्मी भी नहीं थी कि उनके हिस्से का प्रसाद खा जाते लेकिन उन मुस्कुराते चेहरों के साथ एक सेल्फी जरूर ले ली। धीरे धीरे हम लोग ढलान पर मजे में उतरते गए, चारो तरफ का प्राकृतिक नजारा किसी को भी सम्मोहित करने के लिए सक्षम था और हम भी सम्मोहित होने से बच नहीं पाए। लगभग दो किमी आगे आने पर एक जगह पहाड़ी से पानी की पतली धार गिर रही थी और वहां पर कुछ महिलाएं मूली धो रही थीं। दूर से देखने पर दूधिया चमकती मूलियां हमें जैसे खाने का निमंत्रण दे रही थीं और मैं अपने को रोक नहीं पाया। सड़क के उस तरफ जाकर, जहाँ वे लोग मूलियों को धो रही थीं, मैंने पूछा कि क्या ये मूली आपके खेत की है, तो उन्होंने हाँ में सर हिला दिया। अब उनको भी समझ में आ गया था और मैंने भी अगला सवाल पूछ लियाक्या ये मूलियां हम ले सकते हैं?”

उन्होंने तुरंत हँसते हुए दो मूली मेरी तरफ बढ़ाया। मैंने लेकर उनसे पूछाकितने पैसे देने होंगे इसके?”

यह सुनते ही वह महिला थोड़ा नाराज हो गयी हुए बोलीखाने-पीने की चीजों के पैसे लगते हैं क्या?”

अब मेरे पास मूलियों को ले लेने के अलावा कोई और रास्ता नहीं था। भैया ने मूली खाने से मना कर दिया तो एक मूली वापस लौटाकर हम लोग वापस चल पड़े। अब मेरे हाथ में बड़ी सफ़ेद मूली थी जिसे तोड़कर खाते हुए पैदल सफर बहुत ही शानदार था। एक घंटे में ही हम लोग उस कसबे में पहुँच गए जहाँ से बस मिलनी थी, बस स्टैंड के पास भी एक हनुमान मंदिर था जहाँ भंडारा चल रहा था| हम लोगों ने भी थोड़ा थोड़ा प्रसाद लिया और फिर बस का इन्तजार करने लगे। थोड़ी देर में ही बस आ गयी और हम उसपर

सवार होकर वापस चम्बा की तरफ चल पड़े। चम्बा पहुँचते पहुँचते रात हो गयी और फिर ठहरने के स्थान पर पहुँचने के लिए काफी चढ़ाई चढ़नी थी। फोन पर बात करके स्मिता भी अपने दोस्तों के साथ चौगान पर पहुँच गयी और फिर हम सब बाजार घूमते हुए वापस कमरे पर आ गए।

खाना बना हुआ था और भूख भी लग गयी थी, फिर सबने जम कर खाना खाया और एक एक कप चाय पीकर बिस्तर में घुस गए। थोड़ी देर दिन भर की घटनाओं पर बात करने के बाद सब लोग नींद की आगोश में समां गए।

अगले दिन सुबह जल्दी जल्दी करते हुए भी 8 बज गए, फटाफट नाश्ता करके हम लोग निकल पड़े। आज हमें डलहौजी जाना था जो कि चम्बा से लगभग 50 किमी दूर है। डलहौजी धौलाधार पर्वत श्रृंखलाओं के बीच स्थित एक बेहद खूबसूरत स्थल है और हम लोग चम्बा से मिनीबस द्वारा वहां के लिए निकले।

डलहौजी पहुँचने में लगभग 2 घंटे लग गए और उस समय दिन के 12 बज गए थे। पहले गाँधी चौक, फिर सुभाष चौक पहुंचे जहाँ पर उस दिन आज़ादी से सम्बंधित एक कार्यक्रम चल रहा था और उसे देखने के लिए हम लोग कुछ देर तक रुके रहे। उसके बाद वहां के बाजार में टहलते हुए कुछ खाया पिया गया और फिर हम लोग पंचफुल्ला गए। यहाँ पर सरदार भगत सिंह के चाचा सरदार अजित सिंह की समाधि थी जहाँ पर हम लोगों ने थोड़ा समय बिताया। मौसम इतना खुशनुमा था कि डलहौजी में कुछ दिन रुकने की इच्छा हो रही थी लेकिन मज़बूरी यह थी कि अगले दिन हमें वापस यात्रा करनी थी और इस वजह से मन मार कर हम लोग शाम को मिनी बस से ही चम्बा वापस आ गए।

रात में चम्बा के बाजार में ही हमने भोजन किया और थोड़ी बहुत खरीददारी भी की. अब अगर आप कहीं गए हैं और वहां से कुछ ख़रीदा नहीं है तो आपका जाना सफल नहीं माना जाता. खैर रात काफी देर तक हम लोग वहां के बाजार में टहलते रहे, फिर चढ़ाई चढ़कर हम लोग रहने के ठिकाने पर पहुंचे. अगले एक घंटे खूब गपशप हुआ और फिर अगले दिन की यात्रा की तैयारी होने लगी. न तो हमें अच्छा लग रहा था और न ही स्मिता को, इस जगह तो कम से कम एक हफ्ता बिताना चाहिए था. लेकिन तीन दिन की छुट्टी के बाद ऑफिस भी पहुंचना था और अगले दिन शाम को कठुआ से हमारी ट्रैन थी जो बनारस अगले दिन शाम तक पहुंचती.

अगली सुबह भी वैसी ही ठंडी थी जैसी की पिछले दो दिन की लेकिन आज कुछ उदासी सी थी. इतना जल्दी यह यात्रा समाप्त होने जा रही थी कि बिलकुल अच्छा नहीं लग रहा था. बहरहाल बस से पठानकोट पहुँचने में लगभग 6 घंटे लगने थे और शाम को ट्रैन भी थी. कठुआ में आनंद के यहाँ भी मिलने जाना था इसलिए सुबह 8 बजे ही हम लोग बस स्टैंड निकल गए. स्मिता और उसके दोस्त हमें छोड़ने स्टैंड तक आये और फिर हमारी बस पठानकोट के लिए रवाना हो गयी. आते समय तो हम लोग रात में आये थे इसलिए

रास्ते का सौंदर्य देख नहीं पाए थे लेकिन जाते समय तो दिन था इसलिए पूरा रास्ता हम लोग बस बाहर खूबसूरती ही देखते रह गए. पहाड़ी रास्ता, हरियाली, बीच में बहती नदी और खेत, कुल मिलाकर लग रहा था मानो हम सफर नहीं कर रहे बल्कि कोई फिल्म देख रहे हैं. इस सफर में कभी भी यह महसूस नहीं हुआ कि बस धीरे चल रही है या रास्ता लम्बा है, बस यही लगता था कि यह सफर चलता रहे.

2 बजे के आसपास हम लोग पठाकोट पहुँच गए और फिर वहां से कठुआ. अब दो घंटे बाद हमारी ट्रेन थी इसलिए आनंद ने फटाफट कुछ खिलाया और फिर हमारे लिए रास्ते का खाना भी पैक करा दिया. दौड़ते भागते हम लोग स्टेशन पहुंचे और ट्रेन में सवार हो गए. इस बार हमारी ट्रेन छूटी नहीं, सबसे ज्यादा सुकून इसी बात का था. ट्रेन की यात्रा ठीक ही थी, बस खाते पीते और कुछ पढ़ते, बतियाते हम अगली शाम मिर्जापुर पहुंचे। वैसे तो हमारा टिकट चुनार तक था लेकिन हमें मालूम था कि चुनार से बनारस के लिए रात में सवारी मिलना मुश्किल था। इसलिए हम लोग मिर्ज़ापुर में ही ट्रेन से उतर गए और फिर वहां के बस स्टैंड पहुंचे। पता चला कि अगले तीन घंटे तक वहां से कोई बस बनारस के लिए नहीं है और अगर बनारस जाना है तो बस स्टैंड से मिर्ज़ापुर के बाईपास तक जाना होगा और फिर वहां से बनारस जाने वाली कोई बस मिल सकती है। अब कोई चारा नहीं बचा था इसलिए हमने एक टेम्पो पकड़ा और भागते हुए हम लोग वहां पहुंचे। वहां रात में सड़क के किनारे लगभग आधे घंटे खड़ा रहना पड़ा फिर बनारस जाने वाली एक बस नजर आयी। उसे रोका गया और फिर हम लोग बनारस के लिए रवाना हुए। उम्मीद थी कि हम लोग अगले 3 घंटे में बनारस अपने घर पहुँच जाएंगे और हम बस की सीट पर सर टिकाकर सो गए।  रात 11 बजे बस बनारस कैंट पहुंची और फिर वहां से टेम्पो पकड़कर हम रात 12 बजे अपने घर पहुंचे. शरीर तो थककर चूर हो गया था लेकिन चम्बा की याद ने हमें महसूस नहीं होने दिया। खैर यह यात्रा, जो कि सुखद थी, रोमांचक थी और नए नए अनुभव सिखाने वाली थी, हमें हमेशा याद रहेगी। लेकिन अगली बार जब चम्बा यात्रा की योजना बनेगी तो कम से कम एक हफ्ते का समय लेकर ही जाऊँगा और संभव हुआ तो चम्बा से मणिमहेश की यात्रा भी जरूर करूंगा।