पिछले साल जून में जब हम उज्जैन आये थे तो हमें यह सपने में भी इल्म नहीं था कि कुछ ऐसे खूबसूरत रिश्ते बनेंगे यहाँ पर. ये अलग बात है कि इसका आभास मुझे उस पहले दिन ही हो जाना चाहिए था जब सुबह सोकर उठते ही दरवाजे पर रखी कुर्सी पर बिल्ली के दो प्यारे प्यारे बच्चे आराम फरमाते मिले थे. बहरहाल उन बच्चों को देखकर बेहद ख़ुशी हुई और फिर धीरे धीरे रोज उनको देखने की आदत सी पड़ गयी. उनके लिए दूध और ब्रेड रोज रखना हमारा नियम होने लगा और फिर उनमें से एक बिल्ली (जिसका नाम ही हम लोगों ने बिल्लू रख दिया है), वह हमसे खूब हिल मिल गया. न तो वह हमें देखकर भागता था और न ही घबराता था, बल्कि वह खेलता जरूर था. समय के साथ साथ वह बड़ा होता गया और फिर वह हमारी जिंदगी का एक हिस्सा बन गया. अगर किसी रोज वह सुबह नहीं आता तो मन में सवाल पैदा हो जाता था कि कहाँ रह गया. और अगर वह शाम तक भी नहीं नजर आया तो हम उसे ढूंढने निकल जाते थे. और आखिरकार वह अपनी कॉलोनी के ही किसी घर के आसपास मिल जाता और फिर उसे हम अपने साथ साथ लेकर आते. दूर से किसी को भी यह आभास हो सकता था कि वह हमारा पालतू बिल्ली है लेकिन दिन भर कहीं और बिताने के बाद वह सिर्फ सुबह और शाम को ही आता था. आते ही उसकी अपनी आवाज में चिल्लाना शुरू होता और वह तब तक नहीं बंद होता जब तक उसे दोष और ब्रेड नहीं मिल जाता. जाड़े में हमने अपने बरामदे में उसके लिए एक कार्टून में कुछ कपडे रख दिए थे जिसमें वह आराम से सो जाता था और सुबह जैसे ही हमारी आहट आती, वह उठकर अपनी आवाज लगाना शुरू कर देता.
इसी तरह से समय बीत रहा था और इसी दरम्यान हमारे यहाँ एक प्यारे से कुत्ते "सोबो" का आगमन हो गया. वह बहुत छोटा था जब आया था और बिल्लू के साथ वह मजे में रहता था, कोई लड़ाई झगड़ा नहीं होता था. अब हमारे पास दो प्यारे जानवर हो गए थे, एक घर के अंदर तो दूसरा घर के बाहर. इसीबीच एक दिन मैं एक दावत में बाहर गया हुआ था. वापस लौटने में रात हो गयी और जब मैं कॉलोनी के अंदर आया तो अचानक मेरी नजर एक बिल्ली पर पड़ी जो किसी के कार के पीछे लेटी हुई थी. मुझे उत्सुकता हुई कि आखिर कौन बिल्ली है जो रात के समय इस तरह कार के पीछे लेटी है. और जब मैंने पास जाकर देखा तो वह हमारा बिल्लू ही था लेकिन उस तरह लेते रहना उसके स्वाभाव में नहीं था. मुझे थोड़ा आश्चर्य हुआ और जब मैंने उसे अपनी मोबाइल की रोशनी में ध्यान से देखा तो वह बिलकुल निस्तेज पड़ा हुआ था. मैंने चिंता में उसे थोड़ा हिलाया डुलाया तो उसके अजीब तरह से कराहने की आवाज आयी. अब मुझे यकीं हो गया कि इसके साथ कोई दुर्घटना जरूर हुई है. उसके शरीर में कीचड़ लगा हुआ था और उसपर से वह खड़ा भी नहीं हो पा रहा था. मैंने गार्ड को बुलाकर पूछा तो उसने बताया कि यह नाली में गिर गया था और किसी तरह से बाहर निकलकर यहाँ पड़ा हुआ है. तब तक कॉलोनी के कुछ और लोग भी आ गए और पूछने लगे कि क्या हुआ है. मैंने उसी समय बेटी को भी बुलाया और उसने भी जब बिल्लू को देखा तो वह भी परेशान हो गयी. खैर उसने तुरंत उस डॉक्टर को फोन किया जिससे हम सोबो की दवा लेते थे और हमारे कॉलोनी के लोगों ने भी एक डॉक्टर से उसके संभावित इलाज के बारे में पूछ लिया. सोबो के डॉक्टर ने बताया कि मैं एक दवा लिख रहा हूँ, उसे मंगवा कर दे दीजिये. शायद इससे बिल्लू ठीक हो जाए और अगर नहीं ठीक हुआ और सुबह तक जिन्दा रहा तो हस्पताल लेकर आईये. हमने बिल्लू के लिए तुरंत दवा मंगवाई और फिर उसे किसी तरह पकड़कर दवा दिया गया. अबतक उसके कराह में थोड़ी कमी हो गयी थी और ऐसा लग रहा था कि शायद वह सुबह तक ठीक हो जाएगा. उसको किसी तरह बोर में डालकर हम अपने घर ले आये और फिर उसे उस कार्टून में रख दिया. उसके लिए थोड़ा सा दूध और ब्रेड भी रख दिया गया कि शायद वह इसे खा ले. इन सब में रात के लगभग बारह बज गए थे और ठण्ड भी बढ़ गयी थी तो हम लोगों ने बिल्लू को कार्टून में छोड़ा और घर के अंदर आकर सोने चले गए.
अब ऐसे में नींद तो क्या खाक आती, बस किसी तरह सुबह हुई और हम बाहर बिल्लू को देखने आये. दिल तो धड़क रहा था लेकिन उम्मीद थी कि बिल्लू ठीक हो गया होगा. जैसे ही बाहर आकर हमने कार्टून को हिलाया, बिल्लू ने छलांग लगायी और बाहर आकर खड़ा हो गया. उस समय इतनी ख़ुशी मिली जिसे शब्दों में बयां करना मुश्किल है लेकिन थोड़ी देर तक शरीर सीधा करने के बाद उसने एक छलांग लगायी और वह गेट पर चढ़ गया. हम लोग प्रसन्नता से उसे जाते हुए देख रहे थे, वह थोड़ी दूर आगे गया और फिर रुका. उसने एकबार पलटकर हमारी तरफ देखा और शायद अपनी देखभाल करने के लिए हमें धन्यवाद देकर चला गया. शाम को वह वापस आया और उसी तरह से आवाज करके खाना माँगा. अब हमें यक़ीन हो गया कि वह एकदम से ठीक हो गया है और हमारी एक बड़ी चिंता दूर हो गयी. इसके एक दो महीने बाद अचानक वह एकदिन बुरी तरह लंगड़ाते हुए आया और फिर महीनों वह लंगड़ाकर ही चलता रहा. शायद उसके पेअर में चोट लग गयी थी लेकिन उसे लेकर डॉक्टर के पास जाना मुश्किल था. फिर दो तीन महीने बाद एक दिन वह बिलकुल ठीक हो गया, वैसे ही जैसे वह लंगड़ाने लगा था.
पिछले दो तीन महीनों से वह हफ्ते में एकाध बार ही आता था और कभी कभी उसकी चिंता होने लगती थी. लेकिन अब पिछले एक हफ्ते से वापस वह सुबह शाम आने लगा है और आकर पहले जैसे ही वह भोजन के लिए हल्ला मचाता है. अब फिर से बेहद सुखद अनुभूति हो रही है, दोनों बिल्लू और सोबो मजे में साथ साथ रहते हैं और आपस में बिलकुल झगड़ते नहीं हैं. बस उनमें थोड़ी बहुत मस्ती चलती रहती है जो देखने में बेहद सुखद लगती है.
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