Translate

Saturday, January 15, 2022

कोई और चारा भी तो नहीं- कहानी

 आज दुक्खू पंडित बहुत पेशोपेश में थे, दिल उनका अब भी मानने को तैयार नहीं होता था। लेकिन अगर ऐसा नहीं करेंगे तो फिर खेती का क्या होगा और घर पर अन्न कैसे पहुँचेगा, वह कुछ तंय नहीं कर पा रहे थे। ख़ैर एक बार उन्होंने खेत में खड़ी मटर की फ़सल को देखा और फिर उनके हाथ बल्लम पर मज़बूती से कस गए।

पिछले दो दिन से घर पर उनकी पंडिताइन से इस मसले पर बहस हो रही थी। उनका दिल किसी भी हाल में इसके लिए तैयार नहीं था और वह उनको हर हाल में ऐसा करने से रोक रही थी। लेकिन दुक्खू पंडित भी आख़िर क्या करते, उनके सामने घर चलाने का संकट साफ़-साफ़ दिख रहा था।

"अब भूलकर भी ऐसा पाप मत करना, चाहे जो हो जाए। जैसे हमेशा हाँक देते हैं, वैसे ही हाँक दिया करिए, वरना नरक में भी जगह नहीं मिलेगा सोच लीजिएगा", पंडिताइन ने अंदर से भयभीत होते हुए बहुत दुखी मन से कहा था। उन्होंने कुछ जवाब नहीं दिया और खाने के बाद थरिया में हाथ धोकर बाहर निकल गए।

चाहे जो भी सोचकर माँ-बाप ने उनका नाम दुक्खू रखा था लेकिन आज उनको लग रहा था जैसे उन लोगों ने इनका भविष्य बचपने में ही देख लिया था। फिर एक बार उनके दिमाग़ में आया कि काश उनका नाम सुक्खू रखा होता तो कितना अच्छा होता, शायद नाम के प्रभाव से ही कुछ सुख उनके हिस्से में भी मुअस्सर होता। एक समय था जब उनके गाँव में उन लोगों का ख़ानदान पंडिताई के सहारे मज़े में जीवनयापन कर रहा था। एक यही तो काम ऐसा था जिसमें हर समय लोग याद करते थे, अब चाहे जनम हो, शादी बियाह हो या मरनी करनी। और गाँव समाज में इज़्ज़त प्रतिष्ठा अलग से थी, इसलिए खेती बारी होते हुए भी उनके घर के लोग कभी खेती बारी पर ध्यान नहीं देते थे। ज़मींदारों की बात अलग थी लेकिन बाक़ी सभी काश्तकारों से अपने को बेहतर ही मानते थे ये लोग।

धीरे-धीरे समय बदला, पंडिताई में अब वह बात नहीं रही। शादियाँ तो अब भी होती थीं और बाक़ी सब भी वैसे ही चल रहा था लेकिन उनके ख़ानदान में भी बँटवारा होते होते बहुत से लोग इस पेशे में आ गए। जैसे-जैसे कमाई घटती गई, उनके ख़ानदान के लोग भी खेती पर ध्यान देने लगे। बाप-दादा के चलते खेत ज़्यादा तो नहीं थे लेकिन काम भर का अनाज और सब्ज़ी वग़ैरा हो जाता था।

उनको याद आया कि एक समय था जब खेत में कुछ भी लगा देते थे, उसे अगोरने की ज़रूरत नहीं पड़ती थी। कितना अच्छा समय था वह, जब कई परजा भी गाहे-बगाहे उनकी खेती बारी देख ही लेते थे। और उस समय कोई भी किसी और के खेत से बिना पूछे शायद ही कुछ लेता था। लेकिन धीरे-धीरे समय बदला, ज़रूरतें बदलीं और ज़िंदगी में पैसे की अहमियत बढ़ने लगी। लोग अब ऐसे ही बिना किसी मतलब के किसी को कुछ देने से परहेज़ करने लगे। इसका असर दुक्खू पर भी पड़ा और वह भी अब बिना मतलब शायद ही किसी को कुछ देते थे, हाँ किसी से कुछ काम हो तो अलग बात थी। अब खेत को अगोरने का काम लगभग सबने शुरू कर दिया था और सबके खेतों के किनारे एक झोलंगी खटिया बिछ गई थी।

समय धीरे-धीरे बीत रहा था, अधिकांश घरों की स्थिति एक जैसी ही थी, बस किसी तरह दाल रोटी चल रही थी। और हर कोई धीरे-धीरे अपने आपको बदलते समय के साथ अभ्यस्त कर चुका था। दुक्खू भी अपने दरवाज़े से लगभग टूट चुकी खटिया लाकर अपने खेत के किनारे रख दिए थे और फ़सल के सीज़न में रात खेत पर ही बिता देते थे। गर्मी के समय तो ठीक था लेकिन बरसात और जाड़े में खेत के किनारे रात बिताना बेहद कष्टकारी होता था। साल इसी तरह बीत रहे थे और गाँव के तमाम लोगों की तरह उनकी ज़िंदगी भी धीरे-धीरे इन्हीं सब में जाया हो रही थी।

फिर कुछ साल पहले, या यूँ कहें कि इक्कीसवी सदी के प्रारंभ ने, उनके गाँव के लोगों को एक नई समस्या से रू-ब-रू कराया। अचानक खेतों की तरफ़ कुछ जानवर आने लगे जो देखने में गाय जैसे लगते थे। शुरूआत में लोगों को लगा कि शायद जंगली गाय जैसा कुछ है। फिर लोगों को पता चला कि ये घड़रोज (नीलगाय) हैं जो कि गाय नहीं होते बल्कि जंगली जानवर होते हैं। लेकिन दिखने में ऐसे थे कि दुक्खू को हमेशा लगता जैसे गाय ही है। कभी-कभार इक्का-दुक्का घड़रोज आते तो उतना नुक़सान नहीं होता लेकिन जब झुंड के झुंड ये खेतों में आते तो पूरा इलाक़ा तहस-नहस कर देते। किसान तबाह होने लगे तो बात प्रशासन तक पहुँची और फिर उनको मारने का लाइसेंस भी यदा-कदा जारी होने लगा। लेकिन तब भी दुक्खू और उनके जैसे तमाम हिंदू परिवार नीलगाय को मारने के बारे में नहीं सोच पाते थे, क्योंकि उसके नाम में आख़िर गाय जो लगा हुआ था।

दुक्खू के गाँव के चार तरफ़ अलग-अलग बिरादरियों के गाँव बसे हैं, एक तरफ़ हरिजन बस्ती तो दूसरी तरफ़ कुनबियों का गाँव। बीच में अहिरान है तो एक तरफ़ मुस्लिम लोगों का गाँव। मुस्लिम बस्ती के लोग तो बंदूक़ से नीलगाय का शिकार करने लगे और फिर उसकी दावत उड़ाते। दुक्खू को भी मन ही मन राहत महसूस होती कि चलो उनसे छुटकारा मिला और खेत भी बचे। इसी तरह कभी फ़सल बचती और कभी बर्बाद होती, लेकिन खेती पर नीलगायों का आतंक कम होने का नाम नहीं ले रहा था।

इस समय तक समाज ठीक-ठाक स्थिति में ही था, आपसी तनाव बहुत नहीं दिखता था। वैसे तो बाबरी मस्जिद भी ढह चुकी थी और हिंदुस्तान कई बार सांप्रदायिक दंगे की आँच में झुलस चुका था। लेकिन अभी भी दुक्खू के अपने टोले और पड़ोसी मुस्लिम टोले में बहुत फ़र्क़ नहीं दिखता था। आपस में ईद में सेवई, बकरीद में मटन और दीवाली में मिठाइयों का लेन-देन बदस्तूर जारी था, हाँ महँगाई का असर ज़रूर दिखने लगा था। तो बात हो रही थी नीलगाय की जिसके आतंक के साए में दुक्खू और उनके अगल-बगल के गाँव के किसान लगातार जी रहे थे। उनसे पार पाने के लिए कई लोगों ने चिड़िया मारने वाली बंदूक़ें ख़रीद लीं, तो कुछ ने अपने खेत कंटीले तारों से घेरने चालू कर दिए थे।

इस बीच भारतीय राजनीति में बदलाव का दौर शुरू हुआ जिसकी आहट सबको सुनाई पड़ रही थी। अब जय सियाराम के नारे की जगह जय श्रीराम ने ले ली थी और गाँव के कुछ घरों पर भगवा झंडे टंगने शुरू हो गए थे। टेलीविजन और कई अख़बारों ने धीरे-धीरे दुक्खू और उनके जैसे अनेक हिंदुओं के मन में ये भावना पुख़्ता करना शुरू कर दी कि पहले वाली सरकार ने दूसरी क़ौम के लोगों का विशेष ध्यान रखा था। और अब समय आ गया है कि वह लोग भी अपने हिसाब की सरकार चुनें और अपने लोगों को आगे बढ़ाएँ। और मतदान के बाद जब केंद्र में नई सरकार आई तो दुक्खू और उन जैसे तमाम लोगों को लगा जैसे अब उनके तमाम दुखों का अंत हो जाएगा।

अब अख़बार की सुर्ख़ियाँ गाय और मंदिर जैसी ख़बरें होने लगीं और इनको पढ़कर कहीं-न-कहीं दुक्खू को बहुत सुकून मिलता। उसकी माली हालत में तो कोई बदलाव नहीं हो रहा था लेकिन उसका कोई मलाल दुक्खू और उनके जैसे अनेक लोगों को नहीं था। कई जगहों पर गौ सेवकों के तांडव की ख़बरें आतीं लेकिन दुक्खू को पढ़कर अच्छा ही लगता था। गाय से जुड़ी हुई भावना के चलते ऐसी ख़बरें दुक्खू और अधिकतर गाँव वालों को विचलित नहीं करती थीं। और कुछ लोग जो ऐसी ख़बरों का विरोध करते थे वह इन लोगों को फूटी आँखों नहीं सुहाते थे। फिर समय ने और करवट ली और प्रदेश में भी यही सरकार आ गई। बस अब दुक्खू को लगा कि जैसे रामराज्य फिर से स्थापित होने का समय आ गया।

नई सरकार के आने के कुछ समय बाद ही बूचड़खानों पर कार्यवाही शुरू हुई और वजह चाहे जो भी रही हो, दुक्खू को लगा जैसे अब गौ माता की रक्षा में कोई कोर-कसर बाक़ी नहीं रहेगी। गाँव की चौपालों पर चलने वाली बहस अब सिमटकर इन्हीं मुद्दों पर आ गई और दुक्खू और उसके जैसे लोग अपनी बात को हर क़ीमत पर मनवाने लगे। ख़ैर इन सबसे न तो दुक्खू के रहन-सहन में कोई फ़र्क़ आया और न ही उनकी ख़ुशहाली बढ़ी लेकिन धीरे-धीरे एक नया संकट खेती किसानी पर मंडराने लगा।

पहले भी गाँवों में गायें उतनी ही थीं और उनके बच्चे भी लेकिन आश्चर्यजनक बात यह थी कि दुक्खू के दरवाज़े पर ही क्या किसी और गाँव में भी किसी के भी दरवाज़े पर कोई बछड़ा नहीं दिखता था। सबके दरवाज़े पर सिर्फ़ गाय और बछिया ही नज़र आती थी, किसी किसी के दरवाज़े पर कोई बछवा अगर दीखता भी था तो बेहद कमज़ोर और बीमार सा। आख़िर गायों से पैदा हुए बछड़े कहाँ जाते थे, इसपर न तो किसी ने सोचने की ज़हमत उठाई और जो शायद जानते भी थे उन्होंने इस बात की चर्चा कभी की। आज के समय में खेत की जुताई के लिए हर तरफ़ ट्रैक्ट्रर आ गए थे, यहाँ तक कि दुक्खू का खेत भी मनोहर यादव का ट्रैक्टर जोतता था, तो किसी को भी अब बैल रखने की कोई ज़रूरत महसूस नहीं होती थी। बैल अब बिल्कुल अप्रासंगिक और ग़ैरज़रूरी हो गए थे, उनका न तो कोई उपयोग था और न कोई उन्हें गौ माता की तरह सम्मान देता था। लेकिन हर घर में गायें थीं तो उनके बच्चे भी थे, कुछ बछिया देतीं तो कुछ बछड़ा भी। लेकिन ये बछड़े जैसे ही थोड़े बड़े होते, लोग उनको सिवान में ले जाकर हाँक देते थे। और कुछ दिन बाद ही वे बछड़े परिदृश्य से कुछ यूँ ग़ायब हो जाते थे जैसे चुनाव के बाद अपने क्षेत्र से नेता। पता तो शायद सबको ही था कि इन बछड़ों का क्या होता था लेकिन चूँकि सबने अपने दरवाज़े से उनको हाँक दिया होता था तो किसी को उनकी चिंता भी नहीं होती थी।

नई सरकार के द्वारा जब कुछ बूचड़खाने बंद करवा दिए गए और कई दूसरे धर्म और निचली जात के लोगों को गाय की तस्करी के आरोप में गौ सेवकों द्वारा, जिनको प्रशासन का खुला समर्थन था, पीट दिया गया तो लोगों में इसके प्रति डर बैठ गया। अब धीरे-धीरे बछड़े, जो पहले बड़े होने के पहले ही अंतर्ध्यान हो जाते थे, वे सड़क पर घूमते फिरते दिखाई देने लगे। अब उनको खाना पानी तो कोई देता नहीं था तो वे अपने भोजन की तलाश में खेतों में उतरने लगे। किसान, जो कि अभी तक नीलगाय के आतंक से उबर भी नहीं पाए थे, उनके सर पर यह दूसरी बड़ी आपदा थी। इन बछड़ों को मारने के बारे में कोई सोच भी नहीं सकता था, एक तो गाय की संतान, दूसरे वर्तमान सरकार और उसके संरक्षित गौरक्षक। दुक्खू के खेत पर भी उनका आक्रमण शुरू हुआ तो शुरूआत में दुक्खू उनको पुचकार कर भगाने का उपक्रम करते रहे। लेकिन जब खेत में खड़ी लहलहाती फ़सल उनके सामने बर्बाद होने लगी तो उनके सामने भी कोई चारा नहीं बचा। अपने आपको ज़िंदा रखना ही था तो वह भी अन्य गाँव वालों की तरह ही इनसे छुटकारा पाने की तरकीब सोचने लगे।

पंडिताइन भी इन सबसे अनजान नहीं थीं, उनकी भी अपनी मंडली थी जिसमें गाँव और घर गृहस्थी की पंचायत चलती थी। उनको भी अपनी मंडली और अगल-बगल के घरों से इन बछड़ों के आतंक के बारे में पता चलता रहता था। लेकिन जिस गौ माता के बारे में उनके मन में अगाध श्रद्धा थी, उनके बछड़े के बारे में कोई ग़लत विचार लाना उनको पाप लगता। एकाध बार दुक्खू ने कहा भी कि लगता है कि इन बछड़ों का कुछ करना पड़ेगा नहीं तो अनाज का एक दाना भी घर नहीं आएगा, तो पंडिताइन ने उनको कुछ भी ग़लत करने से रोक दिया।

"आख़िर हैं तो गौ माता के बछड़े ही, हाँक दिया करो उनको। मारना मत नहीं तो बड़े पाप के भागी बनोगे", पंडिताइन हर हालत में दुक्खू को किसी भी ऐसे क़दम लेने से रोकती थीं।

"तो का चाहती हो, हवा फांकें हम लोग, या पानी पीकर ज़िंदा रहें। बड़ी मुश्किल से तो अपनी फ़सल नीलगाय से बच रही थी कि यह नई मुसीबत भी आ गई। यही हाल रहेगा तो भीख माँगना पड़ेगा हम लोगों को", दुक्खू अपना पक्ष रखते। और यह बात सिर्फ़ दुक्खू की ही नहीं थी, कमोबेश सभी गांववालों की थी। लेकिन कुछ-कुछ सहमत होते हुए भी पंडिताइन ने दुक्खू को हमेशा ऐसा करने से रोका।

गाँव में लोग आपस में बात करते, दबी ज़ुबान से लगभग सबकी इच्छा यही थी कि जैसे घड़रोजों को मारकर भगाने में कोई दिक़्क़त नहीं होती, वैसे ही इन बछड़ों को भी मारना होगा। लेकिन कोई भी खुलकर यह बात कह नहीं सकता था, आख़िर सरकार इसके ख़िलाफ़ थी।

बल्लम पर हाथ कसे हुए दुक्खू के मन में यह सारी बातें घूम रही थीं तभी उनको सामने से बछड़ों का दल आता दिखाई पड़ा। एक बार तो उनके हाथ कांपे, आज तक नीलगाय पर भी कभी बल्लम नहीं चलाया था उन्होंने। लेकिन अपनी फ़सल की दुर्दशा और आसन्न भविष्य को सोचकर उनके हाथ बल्लम को उठाकर अपने-आप तन गए और उन्होंने उसे सामने से आ रहे बछड़े की तरफ़ फेंक दिया।


No comments:

Post a Comment