Translate

Saturday, January 15, 2022

जीत का जश्न - कहानी

 दूर से बजते नगाड़ों की आवाज़ सुनाई दे रही थी, खटिया पर लेटे लेटे बंशी ने बाहर देखा। लगता है कि नतीजा आ गया और जिस तरह से उसके पट्टी में उत्तर की तरफ़ नगाड़े बज रहे थे, उसे आभास हो गया कि नन्हे चच्चा जीत गए। थोड़ी दूर पर दूसरी खटिया में जोखू भी खाँसते हुए पड़ा था, आज उसकी तबीयत भी गड़बड़ लग रही थी।

"का हो जोखू, तबीयत कैसी है हो", बंशी ने कंहरते हुए पूछा।

"बुख़ार चढ़ रहा है और खाँसी भी लगता है, कल सुबह शहर चले जाएँगे", जोखू को बोलते बोलते फिर से खाँसी आ गई। घर के अंदर जोखू-बो काढ़ा बना रही थी, वह बाहर आ गई।

"पानी लाएँ का सोनू के पापा", उसने जोखू को देखते हुए दूर से ही पूछा। आज भी वह जोखू को नाम से नहीं बुलाती है, हालाँकि अब उसकी पीढ़ी की कुछ लड़कियां अपने शौहर को नाम से बुलाने लगी हैं।

"ले आओ और अदरक भी काट के ले आना, खाँसी से राहत मिल जाएगी", जोखू ने खटिया पर बैठते हुए कहा।

अब नगाड़े की आवाज़ काफ़ी नज़दीक आ गई थी, बंशी किसी तरह खटिया से उठकर बाहर जाने का उपक्रम करने लगे। आख़िर इसी के लिए तो वह अपना पूरा कुनबा लेकर महानगर से गाँव आए थे।

"बाहर मत जा, सब लोग अंदर आएँगे", जोखू ने कहा तो बंसी वापस खटिया पर ढह गए।

गाँव में पिछले तीन बार से चुनाव में आरक्षण के चलते उनके पट्टी से ही लोग खड़े होते थे। पहले तो सिर्फ़ बड़ी जाति के लोग चुनाव लड़ते, परधान बनते और फिर पाँच साल बाद दुबारा यही सब होता। जितने लोग परधान बने, उन सबका घर पक्का हो गया और उनके दरवाज़े पर एकाध गाड़ी भी खड़ी हो गई। लेकिन बड़ी जाति के लोगों के परधान बनने पर उनके पट्टी में में फ़र्क़ बस इतना होता कि बदहाली थोड़ी और बढ़ जाती और कुछ नए घरों पर ताला लटक जाता, लोग रोटी और रोज़गार के लिए गाँव से बाहर पलायन कर जाते। आज की तारीख़ में कम-से-कम 25 घर ऐसे थे जहाँ के सभी लोग महानगर जा चुके थे और सिर्फ़ शादी बियाह और परधानी के चुनाव में घर आते।

"अरे का हो बंसी काका, ल लड्डू खा, नन्हे चच्चा जीत गए", नन्हे के भतीजे ने आकर लड्डू का एक छोटा पैकेट उनकी तरफ़ बढ़ाया और फिर बिना उनके जवाब का इंतज़ार किए आगे बढ़ गया। बंसी ने डिब्बा खटिया पर ही रख दिया, उनकी इच्छा नहीं हो रही थी कि वह लड्डू खाते।

"अरे का भईल, लड्डू न खइबा का?,जोखू ने कहा तो उसकी आवाज़ में तंज़ साफ़ झलक रहा था। तब तक जोखू-बो पानी और कटा हुआ अदरक लेकर आ गई, उसने पानी जोखू को पकड़ाया और धीरे-से लड्डू का डिब्बा उठा लिया।

बंसी कुछ नहीं बोले, वापस खटिया पर लेट गए। उनको यह तो पता ही था कि जोखू इस बार गाँव आने पर ख़ुश नहीं था। वैसे भी पूरा देश इस समय महामारी के क़हर से जूझ रहा था और जोखू पूरे घर को मुश्किल में डालकर गाँव आने का ख़तरा नहीं लेना चाहता था।

लगभग दस बरस पहले बंसी भी गाँव छोड़कर महानगर चले गए थे और वहाँ पर एक बंगले पर चौकीदारी करने लगे थे। जोखू की माँ और जोखू को लेकर कुल तीन लोग थे और रहने का ठिकाना भी मिल गया था। जोखू की माँ भी घर से ही पापड़ बड़ी आदि बनाने लगी और थोड़ी-बहुत कमाई उससे भी होने लगी। गाँव के ही कुछ और लोग भी वहीं रहते थे और सबका मन लगा रहता था, बस साल में एकाध बार गाँव आना होता था।

जोखू कुछ साल तक तो किसी तरह से पढ़ाई करता रहा, फिर उसने भी एक फ़ैक्ट्री में काम करना शुरू कर दिया। अब आमदनी ठीक-ठाक होने लगी और बंसी का परिवार आराम से रहने लगा। दो साल पहले एक रात जोखू की माँ को बुख़ार आया और अगले सात दिन तक चढ़ता उतरता रहा। बाद में हस्पताल में जाने के बाद अगले दिन ही वह चल बसी। अब घर में सिर्फ़ दो प्राणी बचे, दोनों नौकरी करने वाले तो खाना बनाने का संकट आ गया। इसलिए तीन महीने बाद ही जोखू की शादी हो गई और घर के देखभाल के लिए एक औरत आ गई।

जैसे-जैसे इस महामारी ने अपना पाँव फैलाना शुरू किया, लोगों की नौकरियों पर संकट आने लगा। ऐसे में एक दिन बंसी को भी अगले दिन से काम पर नहीं आने का फ़रमान मिला तो वह मन ही मन रो पड़ा। लेकिन जोखू की नौकरी क़ायम थी तो खाने के लाले नहीं पड़े और फिर जोखू-बो ने भी अपनी सास वाला काम शुरू कर दिया। दिन बस इस संकट के टलने के इंतज़ार में बीत रहे थे और सबकी तरह बंसी भी इसी आस में जी रहे थे कि सब ठीक हो जाएगा।

दस दिन पहले ही गाँव से नन्हे चच्चा का फोन आया "का हाल हौ बंसी, सब ठीक हौ न"।

बंसी ने भी हामी भर दी "पाँय लागूं चच्चा, सब ठीक हौ इहाँ, उहाँ गाँव में सब ठीक बा न"।

"हाँ, इहाँ भी सब ठीक हौ लेकिन तोहरे परिवार का ज़रूरत हौ। अब तोंहके त पता हौ कि गाँव पर परधानी क चुनाव होत हौ अउर इ बार हम खड़ा हुई। पिछला परधान त गाँव ख़ातिर कुछ नाहीं कइलेस, अब हमहीं के कुछ करे के पड़ी", नन्हे चच्चा एक साँस में बोल गए।

बंसी हूँ हाँ करते रहे, चच्चा आगे बोलना शुरू किए "अब अगर तू लोग न अईबा त के हमार मदद करी, के हमके वोट देई। ए से तूँ फटाफट गाँव चल आवा। तोहके हमार परचार भी त करे के पड़ी"।

बंसी ने थोड़ा सोचा, फिर बोले "ठीक हौ चच्चा, हम आ जाईब"। उनको लगा कि वैसे भी वह घर पर खाली ही बैठे हैं तो गाँव जाएँगे तो कुछ मन बहल जाएगा।

"अरे तोंहके अकेले नाहीं आवे के हौ, पूरा परिवार लेके आवा। आख़िर तीन वोट हौ तोहार, सबकर आपन आपन लोग ए समय आवत हउअन", नन्हे चच्चा ने बात ख़त्म कर दी।

बंसी दिनभर सोचते रहे कि जोखू से चलने के लिए कहें या नहीं, वैसे भी जोखू गाँव से कोई मतलब नहीं रखता था। लेकिन अब बात उनके अपने सगे पट्टीदारी की थी, नन्हे चच्चा अगर परधान बने तो उसके लिए भी शायद कुछ बढ़िया ही हो।

शाम को जोखू घर आया तो बंसी ने बात छेड़ी "आज नन्हे चच्चा का फोन आया था, इस बार परधानी में खड़े हो रहे हैं"।

"अच्छा", जोखू ने कोई उत्साह नहीं दिखाया।

बंसी एक बार ठिठके, आगे कुछ कहें या नहीं। लेकिन बात कहनी भी ज़रूरी थी इसलिए फिर से बोले "चच्चा हम सब को गाँव बुलाए हैं, उनकी मदद करना हमारा भी फ़र्ज़ है"।

जोखू ने पलटकर देखा, उसकी आँखों में आश्चर्य और ग़ुस्सा था 'आपका दिमाग़ तो नहीं ख़राब हो गया है बाऊ, इस समय चारो तरफ़ महामारी फैली है और आपकी भी तबीयत अब ठीक नहीं रहती। अब ऐसे में हम गाँव जाने का सोच भी नहीं सकते, आप चच्चा से कोई बहाना मार दीजिएगा"।

जोखू की पत्नी भी तब तक पानी का गिलास लेकर आ गई थी। वह अमूमन इन सब बातों में अपनी कोई राय नहीं देती थी इसलिए पानी देकर वह चुपचाप खड़ी हो गई।

बंसी ने जोखू के पानी पीने का इंतज़ार किया और एक बार फिर बोले 'अरे तुम समझते नहीं हो, आख़िर पटिदारी का मामला है। हमको भी आज नहीं तो कल गाँव तो जाना ही है, उस समय क्या मुँह लेकर जाएँगे"।

जोखू ने कुछ नहीं कहा और कपड़ा बदलने लगा। कपड़ा बदलकर जब वह आया तो बंसी उसको ही देख रहे थे। उसे समझ में आ गया कि कुछ जवाब तो देना ही पड़ेगा तो उसने कहा 'न तो आप जाएँगे और न हम लोग, समझ गए न"।

बंसी का मुँह उतर गया, उनको उम्मीद तो थी कि जोखू को एक-दो बार कहना पड़ेगा लेकिन उनको ये भी उम्मीद थी कि वह आख़िर में मान जाएगा। अगले दो घंटे बेहद ख़ामोशी में बीते, रात का खाना भी बंसी ने आधे मन से ही खाया और वह जोखू और उसकी पत्नी को भी दिख गया।

सोते समय उसकी पत्नी ने बात छेड़ी "अगर बाऊजी कह रहे हैं तो उनकी बात मान क्यों नहीं लेते। अब बड़े हैं और गाँव समाज भी उनको ही देखना है, तुम्हारे मना करने से समाज में उनकी क्या इज़्ज़त रह जाएगी"।

जोखू भड़क गया 'तुम्हारा भी दिमाग़ फिर गया है क्या, ऐसे समय में कौन जाता है गाँव। अगर ग़लती से यह बीमारी लग गई तो मुश्किल हो जाएगा, वैसे भी बाऊजी कमज़ोर हो गए हैं आजकल"।

"वो तो ठीक है लेकिन उनको मना करना भी ठीक नहीं है। एक काम करो, आप चले जाओ गाँव, हम बाऊजी का ध्यान रख लेंगें", जोखू की पत्नी ने मनौती करते हुए कहा।

यह बात जोखू को ठीक लगी, वह दो-तीन दिन के लिए गाँव चला जाएगा और वोट देकर वापस आ जाएगा। उसने करवट बदल ली और सोने का उपक्रम करने लगा।

सुबह बंसी चुपचाप कुर्सी पर बैठे ऊपर ताक रहे थे, जोखू की पत्नी ने चाय दिया और पूछा "बाऊजी तबीयत तो ठीक है न, काहें उदास लग रहे हैं"।

बंसी ने चाय का कप पकड़ा और फीकी हँसी हँस दिए। कारण दोनों को पता था लेकिन उनकी आपस में इससे ज़्यादा कभी बात नहीं होती थी इसलिए बंसी ख़ामोशी-से चाय सुड़पने लगे। थोड़ी देर में जोखू आया तो उसे भी बाऊजी का लटका मुँह दिख गया। रात की बात उसे याद आई और उसने आवाज़ लगाई "अरे सुनो, मुझे भी चाय देना। अच्छा बाऊजी एक काम करते हैं, मैं गाँव चला जाता हूँ और चच्चा को वोट देकर आ जाऊँगा। ये ठीक रहेगा न?

बंसी को एक बार तो लगा कि ठीक ही है, जोखू गाँव जाकर वोट दे आएगा और चच्चा की बात भी रह जाएगी। लेकिन फिर उनको लगा कि वह नहीं जाएँगे तो चच्चा बुरा मान जाएँगे, वैसे भी उनके साथ के कुछ लोग इसी चुनाव के लिए गाँव जाने वाले थे। उन्होंने जोखू की तरफ़ देखा, वह चाय पी रहा था।

'ऐसा है जोखू कि यहीं से कुछ लोग गाँव जा रहे हैं और अगर हम नहीं गए तो चच्चा बुरा मान जाएँगे। आख़िर मेरे जाने में तुमको क्या दिक़्क़त है, चच्चा ने भी सबको बुलाया है"।

"आपकी तबीयत आजकल ठीक नहीं रहती है और ये महामारी भी फैली हुई है। ऐसे में गाँव जाना कोई समझदारी का काम नहीं है, आप बात को समझते क्यों नहीं?, जोखू ने उनको फिर से समझाने का प्रयास किया।

लेकिन बंसी जाने पर आमादा थे उन्होंने कह दिया "अगर हम नहीं गए तो हमारी तबीयत ज़्यादा ख़राब हो जाएगी। अरे गाँव में लोगों से मेल मुलाक़ात होगी तो मन बहल जाएगा हमारा"।

जोखू समझ गया कि बाऊजी बात नहीं मानने वाले हैं, ऐसे में अगर दोनों जाएँगे तो यहाँ उसकी पत्नी अकेले रह जाएगी और वहाँ गाँव पर भी भोजन कौन बनाएगा। इसलिए उसने हार मानते हुए कहा "ठीक है बाऊजी, बस चार पाँच दिन के लिए चलेंगे हम लोग और फिर आप हमारे साथ ही वापस आएँगे'।

बंसी के लिए इससे बढ़िया बात और क्या हो सकती थी, वह एकदम ख़ुश हो गए 'ठीक हौ, तोहरे संघे हम भी वापस आ जाएँगे"।

उधर जोखू अपने फ़ैक्ट्री गया, इधर बंसी ने गाँव चच्चा को फोन लगाया "पालागी चच्चा, हम लोग गाँव आ जाएँगे, आख़िर तोहरे परधानी का मामला हौ"।

अगले दिन पूरा परिवार गाँव के लिए निकल पड़ा, जोखू ने बाऊजी को भी मास्क पहनाया और ख़ुद भी पूरी सावधानी बरतते हुए गाँव चला। सड़क वही थी लेकिन लगता था जैसे उसका मिजाज़ ही बदल गया हो। कहाँ इस सड़क पर निकलने पर बस भीड़ ही भीड़ दिखाई पड़ती थी, चारो तरफ़ चिल्लाते हॉर्न, धुआँ उगलती गाड़ियाँ और एक-दूसरे से आगे निकलने की होड़ में लगे लोग। लेकिन आज तो सब बदला हुआ था, भीड़ भी नहीं के बराबर थी और चिल्ल पों भी ग़ायब। ख़ैर पहले बस से, फिर टेम्पो से धक्का-मुक्की करते शाम होते होते वे लोग गाँव पहुँच गए। गाँव पहुँचते ही बंसी मुँह हाथ धोकर नन्हे चच्चा के यहाँ निकल गए।

"पालागी चच्चा, हम लोग आ गए। और सब कइसन चल रहा है, परचार तो ठीक हौ न?

नन्हे भी उनको देखकर ख़ुश हो गए, उनका तीन वोट पक्का हो गया था। उन्होंने भी हाथ जोड़कर नमस्कार किया और घर में आवाज़ लगाई 'अरे बंसी आए हैं, तनी चाय तो पिलाओ"। बाहर एक तरफ़ गोहरी पर बट्टी बन रहा था तो दूसरी तरफ़ दाल। कुछ लोग सलाद काट रहे थे तो कुछ बैंगन का चोखा बना रहे थे। कुछ खलीहर बीड़ी पीते हुए कुर्सी पर बैठे देश प्रदेश की राजनीति पर बहस छेड़े थे। उनमें से बहुत से लोग बंसी को पलग्गी करने के लिए खड़े हो गए तो कुछ लोग आकर हालचाल भी पूछने लगे। बंसी की सफ़र की थकान लगभग ग़ायब हो गई, आख़िर इसी के लिए ही तो वह गाँव आना चाहते थे। एक चीज़ सबमें कामन थी, किसी ने भी चेहरे पर मास्क नहीं लगाया था।

चाय पीते समय नन्हे चच्चा ने बंसी से धीरे-से कहा "बाक़ी लोग भी तोहरे पास वोट माँगने आएँगे, चालाकी से बात करना। किसी को अहसास न हो कि तोहार वोट हमको ही मिलेगा"।

लगभग साढ़े तीन सौ की आबादी वाले इस गाँव में तीन चौथाई पिछड़ी जाती के लोग थे। गाँव में तीन अलग-अलग पट्टी थी जिसमें पक्के घर वाले मकान ऊँची जाति वालों के थे। दूसरी पट्टी में यादव और कुनबी कोइरी थे जो बीच वाले थे, उनके पास खेती भी थी और कुछ धंधा भी करते थे। तीसरी पट्टी उनके लोगों की थी जिसमें अधिकांश घर बस किसी तरह से बने हुए थे। दो-चार अच्छे घर भी थे और उस घर से कोई या तो नौकरी कर रहा था या महानगर में अच्छा धंधा कर रहा था। वैसे तो ऊपर से देखने पर लगता था जैसे गाँव में बहुत शांति है, आपसी संबंध मधुर है लेकिन वास्तव में ऐसा नहीं था। जातिगत वैमनस्य और किसी की तरक्क़ी पर जलना हर आम गाँवों की तरह यहाँ भी मौजूद था। और असली फ़र्क़ चुनाव के समय नज़र आता था जब ऊँची जाती के लोग चाहते थे कि पिछड़ी बस्ती से उनका कोई अपना आदमी ही परधान बने। और इसके लिए वह रुपया पैसा भी ख़र्चने को तैयार रहते थे। लेकिन अब समय बदल गया था और पिछड़ी जाति के लोग भी अपना महत्त्व समझने लगे थे। उनको पता था कि चूँकि उनमें से ही किसी को परधान बनना है तो वे भी चाहते थे कि कोई ठीक आदमी ही बने।

शहर में तो महामारी के चलते लोग थोड़ा सतर्क थे, मास्क वग़ैरा लगाते थे। लेकिन गाँव में तो जैसे उस महामारी का कोई ख़ौफ़ ही नहीं था। इसकी एक वजह तो यह थी कि जब पिछले साल यही महामारी पहली बार आई थी तो गाँवों में इसका कोई असर नहीं हुआ था। इसलिए लोगों को इस बार भी भरोसा था कि गाँव में इसका कोई असर नहीं होगा। बंसी ने तो उसी समय मास्क उतार दिया लेकिन जोखू ने अगले दिन भी लगाए रखा।

"का जोखू भैया, तबीयत ख़राब हौ का", एक गाँव के लड़के ने उसे टोका तो उसे आश्चर्य हुआ।

"हम त एकदम ठीक हैं, काहें पूछत हौ", उसने पूछा।

"अरे गाँव में कउनो महामारी न हौ, फिर इ बीमारन वाला मास्क काहें लगाए हो। पूरे गाँव में और कोई दिखाई देत हौ मास्क लगइले", उस लड़के ने हँसते हुए कहा।

ख़ैर उसने मास्क तो नहीं उतारा लेकिन उसे गाँव में कई लोग खाँसते और छींकते दिखाई दिए। उसने किसी से पूछा तो उसने बड़े आराम से जवाब दिया 'अरे मौसमी खाँसी हौ, दिन में एतना धूप और रात में ठंडी, एही से इ सब होत हौ"।

रात को जब बाऊजी आए तो उनको भी खाँसी हो रही थी। उसकी पत्नी ने काढ़ा बनाया और अदरक के टुकड़े खाने के लिए दिए जिससे कि बाऊजी कि खाँसी ठीक हो जाए।

"बाऊजी, थोड़ा अपना भी ख़याल रखिए, मुझे तो लगता है कि यहाँ भी महामारी फ़ैल रही है। अपने आपको लोगों से दूर ही रखिए", उसने बाऊजी के सर पर हाथ रखते हुए कहा। उनका सर हल्का गरम था लेकिन बाऊजी ने मुस्कुरा कर उसका हाथ हटा दिया "अरे मैं ठीक हूँ जोखू, बस मौसमी सर्दी खाँसी है, ठीक हो जाएगा"।

अगला तीन दिन चुनावी दौड़भाग में बीता, नन्हे चच्चा के अलावा पाँच और उम्मीदवार थे लेकिन असली मुक़ाबला नन्हे चच्चा और छुन्नन में ही था। तीनों दिन कभी एक प्रत्याशी उनके घर आता तो कभी दूसरा आता। जो भी आता, झुककर प्रणाम करता और सबका हालचाल भी पूछता। सभी रात को अपने यहाँ होने वाली दावत में आने का न्यौता ज़रूर देते और साथ में बँटने वाली दारू का भी इशारा कर जाते। बंसी ने अब दारू पीना लगभग बंद कर दिया था, और जोखू को इससे सख़्त चिढ़ थी। उसने अपनी पट्टी के कई घर इस दारू के चलते बर्बाद होते देखे थे इसलिए उसने दारू से तौबा कर ली थी। जोखू की पत्नी के आने के बाद बंसी को लगा कि अब पतोहू के सामने कभी जोखू ने दारू के लिए कुछ बोल दिया तो उनकी सारी इज़्ज़त धूल में मिल जाएगी। इसलिए उन्होंने भी दारू से दूरी बना ली थी। फिर चुनाव के दिन ख़ूब चहल-पहल रही और जब शाम को चुनाव ख़त्म हुआ तब सबको राहत मिली। उस रात बंसी जब घर पर सोए तो उनको तगड़ा बुख़ार आ गया और जोखू को भी हरारत महसूस होने लगी।

गाँव के बाज़ार वाले डॉक्टर से दवाई लेने के बाद कुछ देर तक तो ठीक रहता लेकिन बाऊजी को बुख़ार फिर आ जाता। धीरे-धीरे गाँव के कई लोगों को बुख़ार ने जकड़ लिया और हर घर के सामने खटिया पर छींकते लोग नज़र आने लगे। उसने वापस चलने के लिए कहा तो बंसी ने दो दिन और रुकने के लिए कहा "जब इतना दिन रुके तो दो दिन में रिज़ल्ट आ जाएगा, फिर चलेंगे। नन्हे चच्चा के जीत का नगाड़ा भी तो बजाना है"।

वह ख़ुद भी दवा लेता रहा और बाऊजी को भी खिलाता रहा। गाँव में न तो उस महामारी के लिए कोई टेस्टिंग की व्यवस्था थी और न ही कोई ऐसा हस्पताल जहाँ ज़्यादा बीमार होने पर किसी को भर्ती कराया जा सके। उसके लिए गाँव से बीस किमी दूर क़स्बे के हस्पताल में ही जाना पड़ता था।

जुलुस आगे बढ़ा और बंसी वापस खटिया पर लोट गए। जोखू भी पत्नी को खाने के लिए बोलकर वहीं टहलने लगा, कल सुबह ही यहाँ से निकल जाना है, उसके दिमाग़ में बस यही चल रहा था। हल्की खिचड़ी बनी थी जिसे खाने का मन नहीं था लेकिन बाऊजी को खिलाने के चलते उसे भी साथ-साथ खाना पड़ा। खाना खाकर दोनों लेटे ही थे कि नन्हे चच्चा के यहाँ से एक आदमी आया और अगले दिन के दावत का न्यौता दे गया।

"काल जीत के ख़ुशी में खस्सी का दावत हौ बंसी भैया, ज़रूर से आवा"।

रात को अचानक जोखू की आँख बाऊजी के कंहरने से खुली, उसने घड़ी देखी, रात के दो बज रहे थे। वह बाऊजी के खटिया पर गया और बाऊजी को उठाया। उनकी साँस बहुत तेज़ चल रही थी और ऐसा लग रहा था कि उनसे साँस लेते नहीं बन रहा है।

"बाऊजी, गहरी साँस लीजिए", वह घबरा गया।

उसकी पत्नी भी इतने में आ गई और दोनों मिलकर बाऊजी को साँस देने की कोशिश करने लगे। लेकिन बंसी की हालत देखकर उनको लगने लगा कि इनको तुरंत हस्पताल लेकर जाना पड़ेगा।

"मैं नन्हे चच्चा को बुलाता हूँ, इनको तुरंत हस्पताल लेकर जाना पड़ेगा", उसने घबराते हुए कहा। उसे भी हल्का बुख़ार था और कमज़ोरी भी थी। वह नन्हे चच्चा के घर भागा और थोड़ी देर बाद वहाँ से उनके लड़के को लेकर आया। पीछे से ड्राइवर भी जीप लेकर आ गया और दोनों ने बंसी को उठाकर जीप में लिटाया और शहर की तरफ़ चल पड़े।

इधर सुबह की पहली किरण निकली, उधर बंसी ने जीप में ही आख़िरी साँस ली। गाँव में भी तब तक जगाहट हो गई थी और नन्हे चच्चा के घर से कुछ लोग खस्सी ख़रीदने के लिए बगल के गाँव के लिए निकल गए। आख़िर आज उनकी परधानी में जीत का जश्न मनना था।


चन्नर - कहानी

आज दोपहर दरोगा चच्चा गुज़र गए, पिछले तीन चार हफ़्ते से बीमार चल रहे थे और उमर भी अब काफ़ी हो चली थी। दरअसल आजकल कहीं भी किसी बुज़ुर्ग का गुज़र जाना कोई घटना नहीं होती,बशर्ते वह कोई सेलेब्रिटी न हो। वैसे भी धीरे-धीरे उनकी पीढ़ी के अधिकांश बुज़ुर्ग प्रस्थान कर गए थे और कभी-कभी वह मज़ाक में कहते भी थे “आज सपना में मनोहरा ऊपर से बुलावत रहा, लागत हौ कि अब चले के पड़ी”, और ठठा कर हँस पड़ते।

ख़ैर बात यह नहीं है कि दारोग़ा चच्चा का गुज़र जाना कोई बहुत बड़ी या अप्रत्याशित घटना है, बूढ़ा गए थे, बीमार थे तो यह तो होना ही था। और अपने पीछे गाँव में भरा पूरा परिवार छोड़ गए जिसकी हर सुख-सुविधा का अपने जान में पूरा इंतज़ाम भी करके गए। घटना दरअसल कुछ और ही है, इनके जाने से एक क़िस्से का अंत हो गया जिसे लिखने की शायद अधिकतर लोगों को ज़रूरत महसूस ही नहीं होती। उस क़िस्से का सबसे महत्त्वपूर्ण किरदार “चन्नर” तो कुछ वर्ष पहले ही गुमनाम मौत मर चुका था और अब दारोग़ा चच्चा के गुज़र जाने से तो अगली पीढ़ी को कभी पता भी नहीं चलेगा चन्नरके बारे में। उसका असली नाम तो“चंदर” रहा होगा लेकिन लोगों ने अपनी सहूलियत से चन्नर बना दिया और बड़े तो उसे “चनरा” ही बुलाते थे। अब आप भी सोच रहे होंगे कि जब ऐसी कोई ख़ास बात ही नहीं थी इन घटनाओं में तो फिर मैं यह क्या लिखने बैठ गया, तो शायद इस क़िस्से से गुज़र कर आप समझसकें। वैसे भी अपने समाज में कहाँ किसी को ऐसे लोगों के बारे में सोचने की फ़ुर्सत रही है। और सिर्फअपने समाज को ही क्यों कहें, कमोबेश दुनिया के हर समाज में ऐसे लोग हासिए पर ही रहे हैं जिन्हें न तो वर्तमान में जगह मिलती है और न ही इतिहास में।

बचपन में गाँव जाना हर साल ही होता था,दरअसल उस समय छुट्टी बिताने के लिए आज की तरह न तो टी। वी। थे, न सिनेमा हाल और न ही इंटरनेट। फोन थे नहीं तो समाचार मिलने या भेजने का पत्र ही एक साधन था। गर्मियों की छुट्टी का बड़ी बेसब्री से इंतज़ार रहता था और उसकी वजह थी क़स्बे में गुज़र रहे अनुशासित जीवन से कुछ महीनों की फ़ुर्सत। गाँव में छुट्टी के दरम्यान न तो कोई टोकाटाकी होती और न पढ़ाई के लिए मारपीट। उस समय हमबच्चों को ऊँच नीच, छोटे बड़े का ख़याल नहीं रहता था, जबकि गाँव में सबके टोले अलग-अलग हुआ करते थे। बड़े अलबत्ता कोशिश करते कि बच्चे भी इन गंदगियों को अपने में आत्मसात कर लें लेकिन बच्चे तो बच्चे ही ठहरे।

ऐसी ही एक छुट्टी में गाँव पर मुलाक़ात हुई “चन्नर” से। अब उसे आप मुलाक़ात कहें या कुछ और, हमें तो हर बार कुछ-न-कुछ अलग और दिलचस्प मिल ही जाता था गाँव में। खेलते कूदते दारोग़ा चच्चा के दरवाज़े पर पहुँचने पर सामने से चन्नर दिखा, थोड़ा अलग था इसलिए याद रह गया।आगे के वर्षों में उसके चलने के तरीक़े को लेकर हम लोग अक्सर उसका मज़ाक भी उड़ाया करते थे लेकिन उसके भचक कर चलने के पीछे की दर्दनाक घटना का पता काफ़ी सालों बाद चला। एक अजीब सीमुस्कुराहट उसके चेहरे पर इस तरह रहती जैसे किसी ने पैदा होते ही उसके चेहरे पर इसे चस्पाँ कर दिया हो। और नाक से निकलती पतली आवाज़ जिससे हम लोग अँधेरे में भी चन्नरको पहचान लेते। आज भी चन्नरकी आवाज़ मन में गूँजती रहती है “कइसन हो भैया”, जो वह हमें जब भी देखता, अपनी चिरपरिचित मुस्कराहट के साथ ज़रूर पूछता।

और अगर सच कहूँ तो बचपन में तो हमें पता भी नहीं था कि चन्नरदरोगा चच्चा के घर का नहीं था। उस समय बच्चे बहुत साल तक बच्चे ही रहते थे और धीरे-धीरे उनके अंदर समाज की बुराई पैठ बनाती थी। और इसकी सबसे बड़ी वजह थी टी। वी। और इंटरनेट का न होना। और दूसरा कारण हर घर में बुज़ुर्गों की उपस्थिति थी हमारा ख़ूब ख़याल रखते। वरना आजकल तो बच्चों का बचपन जैसे पैदा होने के साथ ही खो जाता है। वह तो काफ़ी सालों बाद पता चला कि मंदबुद्धि चन्नर बचपन में ही पता नहीं कैसे उनके घर आ गया था और उसके बाद फिर उसकी लाश ही दारोग़ा चच्चा के घर से निकली। इस क़िस्से की शुरूआत तब हुई थी जब देश अंग्रेजों से तो कई साल पहले ही आज़ाद हो चुका था लेकिन जाति और धर्म के बंधन से ज़रा भी आज़ाद नहीं हुआ था। वैसे अपना समाज आज भी इन चीज़ों से आज़ाद कहाँ हुआ है, बस कहने के लिए हम विकसित होते जा रहे हैं। गाँव में ठाकुरों के लगभग 30 घर एक साथ थे और उसके एक तरफ़ यादव टोली, उसके पीछे बनिया और धोबियों के घर और सबसे पीछे गंदगी से बजबजाती जगह में चमरौटी। तब चमरौटी का पता गंदे और बदबूदार जगह से ही होता था, आज की तरह बाबा अंबेडकर की मूर्ति नहीं होती थी। कुनबी और कोईरी जातियाँ दूसरे तरफ़ बसी हुई थीं तो सबसे उपेक्षित और कमज़ोर तबक़ा मुसहरों का था जो गाँव से काफ़ी दूर बसे हुए थे। शादी हो या मरनी करनी, पत्तल मुसहर लोग ही बनाकर लाते थे, पुरवा इत्यादि कोंहार (कुम्हार) लोग बनाते थे। समाज में हर तबक़े का स्थान सदियों से निर्धारित था और उसमें किसी परिवर्तन की बात सोचना भी उस दौर में संभव नहीं लगता था।

उस समय खेतीबाड़ी अधिकतर ठाकुरों के पास ही थी,ये अलग बात थी कि कागज़ों पर ज़मींदारी प्रथा का उन्मूलन हो गया था। थोड़ी-बहुत ज़मीन यादव या कुर्मी लोगों के पास भी थी जिसमें वह लोग सब्ज़ी और थोड़ा गेहूँ चावल उगा लेते थे। ट्रैक्टर इत्यादि उस समय होते नहीं थे और खेती में बैल ही काम आते थे। लिहाज़ा ठाकुरों के हर घर में एक से दो जोड़ी बैल, कुछ गाय भैंस और उनके बच्चे। कुल मिलाकर हर घर में 6 से 12 जानवर थे और उनके सानी पानी (खाना-पीना) और देखभाल के लिए एक मजूर (मज़दूर) भी होता था। अधिकतर तो यह मजूर गाँव के ही चमरौटी से या अन्य निचली जात के लोग होते लेकिन कभी-कभी दूसरे गाँव से भी मजूर मिल जाते थे। जानवरों के गोबर से खाद बनती थी जो खेती में इस्तेमाल होती,हाँ बहुत साल बाद जब ईंधन की कमी होने लगी तो गोबर से ऊपरी (उपले) की पथाई भी शुरू हो गई।

अब ऐसे में किसी को कोई ऐसा लड़का मजूरी के लिए मिल जाता जो कहीं दूर का हो और दिमाग़ी रूप से भी कमज़ोर हो तो उसके भाग्य का कहना ही क्या। अब अपने दारोग़ा चच्चा भी ऐसे ही भाग्यवान थे जिसे चन्नर बचपन में ही मिल गया। किस गाँव का था और उसकी जात क्या थी, शायददरोगा चच्चा को ही पता थी। लेकिन यह हम लोगों को पता नहीं था और न कभी इसकी ज़रूरत ही महसूस हुई। लेकिन इतना तो था कि चन्नर बाहर के साथ-साथ घर के अंदरके काम भी करता था और इससे ये अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि उसकी जाति बहुत निचली नहीं थी। शुरुआती सालों में हमने चन्नर को सिर्फ़ मानसिक रूप से ही कमज़ोर देखा था, शारीरिक रूप से वह स्वस्थ और तंदरुस्त था। लगभग 12 जानवर थे दारोग़ा चच्चा के घर,सबका सानी पानी, गोबर, खेत पर काम और घर पर इनारा (कुआँ) से पानी काढ़ कर लाना, सब काम चन्नर के हीजिम्मे था। अक्सर तो वह हमें मुसकुराता हुआ ही दिखता लेकिन कभी-कभी उसके चेहरे से पता लगता था जैसे वह रोया हो और बाद में उसकी पिटाई की बात हमें पता चल जाती। कुछ बड़े होने पर ही हम लोगों को पता चला कि दारोग़ा चच्चा, जो हमें सिर्फ़ बड़ी-बड़ी मूँछों के चलते डरावने दिखते थे, वास्तव में बहुत ख़तरनाक आदमी थे। अगल-बगल के गाँव वाले भी उनसे भय खाते और चमरौटी तथा अन्य निचली जतियों में तो उनके नाम से लोग सिहर जाते।

गाँव में रहने के दौरान हमारे बाबा उनके कई क़िस्से सुनाते जिसमें अधिकतर उनके अत्याचार के ही होते थे, ये अलग बात थी कि उनको इसका कभी अफ़सोस नहीं होता था। कभी-कभी तो उनके आवाज़ में गर्व भी झलकता था जैसे दारोग़ा बहुत बड़े योद्धा हों। चमरौटी में सुबह-सुबह अगर उनकी आवाज़ सुनाई दे जाए तो मजाल नहीं थी कि वहाँ के मजूरा उनके खेत में काम के लिए नहीं पहुँचें। और उसके बाद जो भी दारोग़ा चच्चा दे दें, सब ठीक, कोई शिकायत करने की हिम्मत नहीं करता था। चमरौटी के पता नहीं कितने पुरुष उनके द्वारा पिटाई के बाद हफ़्तों शरीर पर हल्दी का लेप लगवाकरइलाज कराते थे और कितने ही लोगों के हाथ पैर उन्होने तोड़े थे। लेकिन न तो कोई पुलिस में शिकायत कराने की हिम्मत कर पाया और न ही प्रधान से। उस समय तो प्रधान भी ठाकुरों के ही घर से होते थे,बहुत बाद में जब प्रधानी का पद महिला और अनुसूचित जाति के लिए रिज़र्व हो गई तब भी सिर्फ़ नाम की अनुसूचित जाति की महिला प्रधान होने लगी, काम तो सब ठाकुर लोग ही करवाते थे। एक बात तो थी कि पहले वाले ठाकुर जब ग्राम प्रधान होते थे तो वह कम-से-कम अपने भाई और पटीदारों का कुछ लिहाज़ करते थे लेकिन जैसे-जैसे गाँवों में पैसा पहुँचने लगा, सारे रिश्ते नाते उसकी भेंट चढ़ने लगे। अब ठाकुरों में भी भैया, चाचा, बब्बा इत्यादि रिश्ते सिर्फ़ नाम के ही बचे, वास्तव में उनके अंदर की गर्माहट ख़त्म हो गई।

समय में एक सबसे अच्छी बात यह होती है कि वह जैसा भी हो, बीत जाता है। हमारे क्षेत्र में भी समय अपनी गति से बीतता गया,धीरे-धीरे विकास की किरण दस्तक देने लगी। पंचवर्षीय योजनाओं का असर धीरे-धीरे ही सही, हमारे गाँव और आसपास भी दिखने लगा। गाँव में पहले पक्की सड़क बनी, मोटर गाड़ियाँ चलने लगीं और अंततोगत्त्वा बिजली भी आ गई। कुछ बड़े जोत वालों के घर ट्रैक्टर भी आ गया था जो उसकी हैसियत में चार चाँद लगा देता था। इस विकास का असर दहेज़ पर भी पड़ा, पहले जहाँ शादियों में रेडियो और साइकल मिलना बड़ी बात होती थी,वहीं रेडियो की जगह पहले टू इन वन ने ली और फिर टी।वी सेट ने ले ली। टी।वी भी धीरे-धीरे स्वेत श्याम से रंगीन हुए और साइकल भी मोपेड, स्कूटर से होती हुई मोटर साइकल तक पहुँच गई। ट्रैक्टर आने के साथ सबसे बड़ा दुख हमें इस बात का हुआ कि अब गेहूँ की दंवाई (मंडाई) थ्रेशर से होने लगी। वरना पहले तो खलिहान में गेहूँ की फ़सल काटकर बिछा दी जाती और हम लोग बैलों द्वारा चलने वाले दंवाई मशीन पर बैठकर घूमा करते। गेंहू की दंवाई के साथ-साथ हमारी मौज भी होती थी।

ख़ैर इसी सिलसिले में एक और क़िस्सा अपने कल्लन बब्बा का है। गाँव के अधिकतर बड़े बुज़ुर्ग एकदम भोर में जग जाते थे और फिर उनका राम राम शुरू हो जाता था। उन्हीं में से एक थे कल्लन बब्बा जिनकी आवाज़ ऐसी ज़बरदस्त थी कि अगर गाँव के एक किनारे खड़े होकर आवाज़ लगाएँ तो गाँव के दूसरे किनारे तक उनकी आवाज़ साफ़ सुनाई पड़ती। गेंहू की दंवाईअक्सर गर्मी के चलते तड़के ही शुरू हो जाती, चारो तरफ़ सन्नाटा रहता और सिर्फ़ बैलों के गले की घंटियाँ ही सुनाई देती। बैल भी दो शब्दों को बख़ूबी समझते थे, एक तो चलने के लिए “चल” और दूसरा रुकने के लिए “होर रह।” अब कहा यह जाता था कि सबके खलिहान में बैल मशीन के साथ दंवाई के लिए लग जाते और फिर कल्लन बब्बा की आवाज़ से ही पूरे गाँव के बैल चलते और रुकते। वैसे इस क़िस्से में भी अतिशयोक्ति तो ज़रूर रही होगी लेकिन कम-से-कम अगल-बगल के चार छह खलिहान के बैल तो ज़रूर उनकी आवाज़ से ही काम करते रहे होंगे।

गाँव में आपसी रिश्तों को तोड़ने में दूसरा सबसे बड़ा कारण चकबंदी थी, पैसा तो सबसे पहला और निर्विवाद कारण था ही। जिन घरों ने कभी कोर्ट-कचहरी का मुँह भी नहीं देखा था, उनके घर का एक सदस्य अब कचहरी का नियमित मेम्बर हो गया। अब तमाम कामों में एक काम तारीख़ पर शहर की कचहरी जाना भी हो गया। कुर्ता पायजामा की जगह अब शर्ट पैंट ने ले ली और सुबह-सुबह अगर किसी को शर्ट पैंट पहने साइकल पोंछते देख लिया तो लोग समझ जाते थे कि कचहरी की तैयारी है। ये मुक़द्दमे अंतहीन थे और विरासत की तरह अगली पीढ़ी को पूरी ईमानदारी से अंतरित किए जाते थे। इसी बहाने गांवोंमे भी वकीलों की नई फ़ौज तैयार होने लगी और आपस के पैसे से ही सही, उनकी भी रोज़ी रोटी चल पड़ी।

इस विकास के साथ-साथ एक और घटना घटी जिसके बारे में हमें बहुत बाद में पता चला। एक साल गर्मी की छुट्टी में जब हम घर आए तो देखा कि चन्नर ठीक से चलनहीं पा रहा है। थोड़ी उत्सुकता हुई और उससे पूछा तो वह हँसकर रह गया। शायद बताना नहीं चाहता था या भय था, पता नहीं। लेकिन अपने घर पर बाबा ने बताया “एक दिन चन्नर गाय चराकर बहुत देर से लौटा और तब तकबाकी जानवरों के सानी पानी का समय बीत रहा था। ऐसे में दरोगाने ही जानवरों को नांद पर बाँधा और सानी पानी किया। फिर जैसे ही चन्नरवापस आया, बिना उससे कारण पूछे दरवाज़े पर पड़ी गोजी (लाठी) लेकर उसपर टूट पड़े और तब तक मारते रहे जब तक उसकी कमर और एक पैर टूट नहीं गया। चन्नर बाप बाप चिल्लाता रहा लेकिन कोई उसे बचाने नहीं आया। बाद में दारोग़ा ख़ुद ही डॉक्टर को बुलाए और थोड़ा-बहुत इलाज़ भी करवाया लेकिन मंदबुद्धि चन्नर फिर विकलांग भी हो गया।

इसे सुनकर ही हमारे रोंगटे खड़े हो गए कि कोई इनसान होकर ऐसा भी हो सकता है। ऐसे ही तमाम क़िस्से बाबा के पास होते थे जिसे वह हमको गाहे-बगाहे सुनाते रहते थे। इन्हीं क़िस्सों में बाबा का एक और क़िस्सा था कि एक बार तो उन्होने चमरौटी के एक आदमी को बल्लम मार दिया था और पूरे चमरौटी में किसी की हिम्मत नहीं पड़ी उसको बचाने की। बाद में ठकुराने के लोग पहुँचे और उसको बचाया, बस ग़नीमत यही थी कि वह ज़िंदा बच गया नहीं तो गड़बड़ हो जाता। दरअसल देश में उस समय हरिजन ऐक्ट लागू हो चुका था और बड़ी जातियों का दबदबा अब घटने लगा था। कुछ गाँवों में तो इसके चलते गिरफ्तारियाँ भी होने लगी थीं।

समय के साथ-साथ हम बड़े हुए तो चन्नर के चेहरे पर भी कुछ मूँछ दाढ़ी आई। वह ख़ुद को किसी तरह घसीटते हुए ज़िंदगी को भी घसीटता रहा। अब वह बहुत काम का नहीं रह गया था लेकिन फिर भी खेतअगोरने और गाय भैंस चराने जैसा काम अपनी समझ और हिम्मत के अनुसार करता रहता। गाहे-बगाहे दारोग़ा चच्चा से पिटना उसकी नियति में शामिल था और उसकी चींखे उस घर में मौजूद किसी भी पुरुष या महिला को विचलित नहीं करती थीं। वही महिलाएँ जो अपने बच्चों के बहते ख़ून देखकर अमूमन बेहोश होने लगती थीं, उनको चन्नर के बहते ख़ून और चीख़ से कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता था। कई बार तो बुरी तरह पिटने के बाद वह दो-तीन दिन तक अपनी टूटी खटिया पर पड़ा रहता। ऐसे में घर से जो कुछ रूखा-सूखा खाने को मिल जाता, उसी से अपनी साँसें जारी रखता। और अगर घर में किसी को दया आ गई तो चन्नर की दवा भी करा देता। फिर ठीक होते ही वह वापस अपने काम में ऐसे जुट जाता जैसे कुछ हुआ ही नहीं हो। प्रतिरोध करना तो पशुओं को भी आता है और इनसान न करे, ऐसा हो ही नहीं सकता। चन्नर से भी जब उससे हो रही मारपीट की बात हम करते, तो उसके चेहरे पर कुछ पल के लिए तनाव आ जाता। लेकिन मानसिक और शारीरिक रूप से अपंग चन्नर के लिए इससे ज़्यादा प्रतिरोध कर पाना संभव भी नहीं था। एक चीज़ जो बड़े होकर बहुत परेशान करती थी वह यह थी कि हमारे गाँव में बहुत से लोग पढ़ लिखकर अच्छे पदों पर आ गए थे, लेकिन किसी को भी चन्नर के लिए दारोग़ा चच्चा से कुछ कहते नहीं सुना। उल्टा उसकी पीड़ा में रस लेने वाले ज़रूर बढ़ गए थे।

जीवन का एक पहलू यह भी है कि समय के साथ-साथ उनसे भी लगाव हो जाता है जिससे नफ़रत का ही रिश्ता रहा हो। और यही हुआ चन्नर के साथ भी, उसे दारोग़ा चच्चा के घर के अलावा और किसी जगह अच्छा नहीं लगता। अब शरीर की तो अपनी केमिस्ट्री होती है और चन्नर की बढ़ती उम्र के साथ-साथ उसके शरीर की ज़रूरत भी पैदा होने लगी। दरअसल चमरौटी की बहुत सी महिलाएँ काफ़ी हंसोड़ और मज़ाकिया थीं और उनको चन्नर को छेडने में मज़ा आता था। वैसे भी चन्नर से ठकुराने की औरतें तो चाहकर भी मज़ाक नहीं कर सकती थीं, वह उनका मजूर जो ठहरा। ऐसे में उसको चमरौटी से जोड़कर कई क़िस्से बन गए, हालाँकि मुझे कभी भी उन क़िस्सों पर भरोसा नहीं हुआ। गाँव में कई लोग उसे छेड़ते भी कि चन्नर फ़लाने से बियाह कर लो लेकिन वह अपनी अस्पष्ट आवाज़ में इनकार कर देता।

साल दर साल बीतते रहे, हर गर्मी की छुट्टी में चन्नर एक साल में ही दस साल बूढ़ा दिखने लगता। लेकिन मिलने पर वही मुस्कराहट और “कइसन हो भैया” जारी रहा। अब उसका चलना फिरना बहुत कठिन हो गया था और दिखाई देना भी काफ़ी कम लेकिन ज़िंदगी से उसका लगाव कभी कम नहीं दिखा। दारोग़ा चच्चा भी अब बढ़ती उमर का शिकार हो रहे थे लेकिन अभी भी अपने सब काम करते रहते। गाँव में विकास बढ़ता रहा, घर और खेत छोटे होते गए और लोगों के इगो विकास से भी दोगुनी रफ़्तार से बढ़ते रहे। अब गाँव जाने पर सबके घर-घर जाने का उत्साह पहले जैसा नहीं था, आपसी रिश्तों के बीच एक ठंडापन नज़र आने लगा। ऐसे ही एक साल दारोग़ा चच्चा के दरवाज़े पर चन्नर नहीं दिखा तो चिंता हुई। पूछने पर पता चला कि अब उससे चला फिरा नहीं जाता है और उसे दिखाई भी नाममात्र ही देता है। यह पता चलने पर कि वह कुन्बियाने के तरफ़ के खेत पर गया है, मेरे क़दम अपने-आप उधर मुड़ गए। मन में एक बात लगातार चल रही थी कि चन्नर मुझे पहचान पाएगा कि नहीं। खेत के सामने पहुँचते ही चन्नर एक झोलंगी खटिया पर बैठा दिख गया, उसके हाथ में एक पतला-सा डंडा था और वह आहट आने पर आवाज़ की तरफ़ देखते हुए कुछ बोलने लगता।

मैं उसके सामने जाकर खड़ा हो गया और मेरी आहट मिलते ही चन्नर ने बुदबुदाते हुए कहा “देखत हुई।” मुझे थोड़ा समय लगा उसका कहा समझने में लेकिन फिर बात समझ में आते ही दिल भर आया। एक देख पाने में असमर्थ व्यक्ति देख लेने का दावा कर रहा है, और समाज के कर्णधार जिन्हें सब दिखता है, वह जानबूझ कर अंधे बन रहे हैं। कुछ पल बाद जैसे ही मैंने उसे आवाज़ दी, उसके चेहरे पर वही पुरानी मुस्कराहट खिल गई और उसने अस्पष्ट शब्दों में कहा “कइसन हो भैया।” कुछ देर वहाँ खड़ा रहने के बाद मैं भारी क़दमों से वापस आ गया लेकिन मन में कुछ चुभ गया।

वैसे इस बार घर पर बब्बा ने बातचीत के दौरान एक बात बताई थी जिसको सुनकर मुझे बेहद सुकून हुआ। गाँव में कई लोगों ने दारोग़ा चच्चा से कहा कि अब चन्नर को काहे घर पर रक्खे हो,बनारस जाकर गंगा के घाट पर क्यों नहीं छोड़ देते, वहीं भीख माँगकर पड़ा रहेगा। लेकिन दारोग़ा चच्चा ने उनको पलटकर ऐसा जवाब दिया कि लोगों की बोलती बंद हो गई “अइसन हौ, आपन पूरा उमर चनरा हमरे यहाँ काम कइले हौ, अब ई ससुर यहीं मरी। घरे के कुक्कुर बिलार से भी लगाव हो जाला, ई त तब्बो इनसान हौ।” मैं इसके बाद बहुत देर तक मानव स्वभाव के पेंचीदगियों में उलझा रहा, कहाँ इसी चन्नर को दारोग़ा चच्चा जानवर की तरह पीटते थे और कहाँ उसी को घर पर ही रक्खे जब तक वह ज़िंदा रहा।

एक सेवानिवृत्त व्यक्ति का सबसे बड़ा दुख होता है उसकी पहचान का ख़त्म होना, उसकी कुर्सी के साथ जुड़ी इज़्ज़त का समाप्त हो जाना। कुछ यही हो रहा था हमारे गाँव में भी, फ़र्क़ बस इतना था कि गाँव पर ठाकुरों की झूठी और भयवश होने वाली इज़्ज़त अब धीरे-धीरे कम हो रही थी। सूबे में सरकार बदलने से पिछड़े और कमज़ोर तबक़े के लिए, कागज़ों पर ही सही, तमाम योजनाएँ आने लगीं और बहुत से गाँव “अंबेडकर ग्राम” बन गए। हमारा गाँव भी इस लहर से अछूता नहीं रहा और वह भी इसीका हिस्सा बन गया। जिस चमरौटी में एक भी पक्का घर नहीं था, वहाँ अब सरकारी मदद से कुछ पक्के मकान खड़े होने लगे। गाँव से लगभग 10 किमी दूर एक बैंक की शाखा भी खुल गई और बहुत से पिछड़े लोग जो कभी ठाकुरों और बनियों के सामने आर्थिक मदद के लिए हाथ फैलाते थे, वह लोग कुछ दलालों के मार्फत बैंक से लोन लेने लगे। आरक्षण का, सीमित ही सही, फ़ायदा दिखाई पड़ने लगा और गाँव के चमरौटी के एक-दो घर के लड़के अब सरकारी मुलाज़िम बन गए। अब धीरे-धीरे ठाकुरों का दबदबा कम हो रहा था और उनके सामने हाथ जोड़कर खड़े रहने वाले और उनकी बेगारी करनेवाले अब कम होते जा रहे थे। दारोग़ा चच्चा का भी यही दर्द था, किसी समय उनके सामने जिनके मुँह से बकार भी नहीं निकलती थी, अब उन्हीं लोगों के लड़के उनके सामने खटिया से भी खड़े नहीं होते थे।

अगले कुछ सालों तक मैं गाँव जाता रहा, आर्थिक परिवर्तन का असर दिखाई पड़ने लगा था। अब गाँव के ठकुराने के कुछ लोग भी चमरौटी में चाय पानी पीने लगे और एक-दो घरों की शादियों में भी आना-जाना होने लगा (उन्हीं घरों में जो सरकारी मुलाज़िम बन गए थे)। एक और चीज़ ने इस भेदभाव को दूर करने में बहुत बड़ा काम किया था और वह थी अमूमन हर गाँव में बनने वाली देशी शराब। अक्सर इस शराब की भट्ठी चमरौटी या ऐसे ही इलाक़ों में ही होती और उसे पीने वालों में कोई सामाजिक भेदभाव नहीं दिखाई पड़ता। ख़ैर अब आपसी भेदभाव काफ़ी कम होने लगा और ऐसे में दारोग़ा चच्चा जैसे पुरानी सोच के लोगों का दुखी होना लाज़मी था। फिर एक बार गाँव जाने पर पता चला कि चन्नर गुज़र गया। बाबा ने बताया कि उसका अंतिम संस्कार दारोग़ा चच्चा ने हिंदू रीति रिवाज़ों के हिसाब से किया और उसकी आत्मा की शांति के लिए कुछ पंडितों को भी खिलाया। चन्नर के गुज़र जाने के बाद उनके दरवाज़े पर फिर कोई मजूर नहीं आया, दरअसल अब मजूर मिलना संभव भी नहीं था। चमरौटी के लोग या तो शहर जाकर मज़दूरी करने लगे थे या साड़ी की बुनाई। अब चमरौटी में भी मोटर साइकल और टी।वी आ गए थे और दारोग़ा चच्चा ने उधर जाना छोड़ दिया था। इसी तरह समय आगे बढ़ता गया और एक दिन ख़बर मिली कि दारोग़ा चच्चा भी दुनिया से कूच कर गए। और एक ऐसे क़िस्से का अंत हो गया जिसे हमारी आने वाली पीढ़ी क़िस्से कहानियों में तो शायद कभी पढ़ लेगी लेकिन उसपर भरोसा नहीं कर पाएगी।

कोई और चारा भी तो नहीं- कहानी

 आज दुक्खू पंडित बहुत पेशोपेश में थे, दिल उनका अब भी मानने को तैयार नहीं होता था। लेकिन अगर ऐसा नहीं करेंगे तो फिर खेती का क्या होगा और घर पर अन्न कैसे पहुँचेगा, वह कुछ तंय नहीं कर पा रहे थे। ख़ैर एक बार उन्होंने खेत में खड़ी मटर की फ़सल को देखा और फिर उनके हाथ बल्लम पर मज़बूती से कस गए।

पिछले दो दिन से घर पर उनकी पंडिताइन से इस मसले पर बहस हो रही थी। उनका दिल किसी भी हाल में इसके लिए तैयार नहीं था और वह उनको हर हाल में ऐसा करने से रोक रही थी। लेकिन दुक्खू पंडित भी आख़िर क्या करते, उनके सामने घर चलाने का संकट साफ़-साफ़ दिख रहा था।

"अब भूलकर भी ऐसा पाप मत करना, चाहे जो हो जाए। जैसे हमेशा हाँक देते हैं, वैसे ही हाँक दिया करिए, वरना नरक में भी जगह नहीं मिलेगा सोच लीजिएगा", पंडिताइन ने अंदर से भयभीत होते हुए बहुत दुखी मन से कहा था। उन्होंने कुछ जवाब नहीं दिया और खाने के बाद थरिया में हाथ धोकर बाहर निकल गए।

चाहे जो भी सोचकर माँ-बाप ने उनका नाम दुक्खू रखा था लेकिन आज उनको लग रहा था जैसे उन लोगों ने इनका भविष्य बचपने में ही देख लिया था। फिर एक बार उनके दिमाग़ में आया कि काश उनका नाम सुक्खू रखा होता तो कितना अच्छा होता, शायद नाम के प्रभाव से ही कुछ सुख उनके हिस्से में भी मुअस्सर होता। एक समय था जब उनके गाँव में उन लोगों का ख़ानदान पंडिताई के सहारे मज़े में जीवनयापन कर रहा था। एक यही तो काम ऐसा था जिसमें हर समय लोग याद करते थे, अब चाहे जनम हो, शादी बियाह हो या मरनी करनी। और गाँव समाज में इज़्ज़त प्रतिष्ठा अलग से थी, इसलिए खेती बारी होते हुए भी उनके घर के लोग कभी खेती बारी पर ध्यान नहीं देते थे। ज़मींदारों की बात अलग थी लेकिन बाक़ी सभी काश्तकारों से अपने को बेहतर ही मानते थे ये लोग।

धीरे-धीरे समय बदला, पंडिताई में अब वह बात नहीं रही। शादियाँ तो अब भी होती थीं और बाक़ी सब भी वैसे ही चल रहा था लेकिन उनके ख़ानदान में भी बँटवारा होते होते बहुत से लोग इस पेशे में आ गए। जैसे-जैसे कमाई घटती गई, उनके ख़ानदान के लोग भी खेती पर ध्यान देने लगे। बाप-दादा के चलते खेत ज़्यादा तो नहीं थे लेकिन काम भर का अनाज और सब्ज़ी वग़ैरा हो जाता था।

उनको याद आया कि एक समय था जब खेत में कुछ भी लगा देते थे, उसे अगोरने की ज़रूरत नहीं पड़ती थी। कितना अच्छा समय था वह, जब कई परजा भी गाहे-बगाहे उनकी खेती बारी देख ही लेते थे। और उस समय कोई भी किसी और के खेत से बिना पूछे शायद ही कुछ लेता था। लेकिन धीरे-धीरे समय बदला, ज़रूरतें बदलीं और ज़िंदगी में पैसे की अहमियत बढ़ने लगी। लोग अब ऐसे ही बिना किसी मतलब के किसी को कुछ देने से परहेज़ करने लगे। इसका असर दुक्खू पर भी पड़ा और वह भी अब बिना मतलब शायद ही किसी को कुछ देते थे, हाँ किसी से कुछ काम हो तो अलग बात थी। अब खेत को अगोरने का काम लगभग सबने शुरू कर दिया था और सबके खेतों के किनारे एक झोलंगी खटिया बिछ गई थी।

समय धीरे-धीरे बीत रहा था, अधिकांश घरों की स्थिति एक जैसी ही थी, बस किसी तरह दाल रोटी चल रही थी। और हर कोई धीरे-धीरे अपने आपको बदलते समय के साथ अभ्यस्त कर चुका था। दुक्खू भी अपने दरवाज़े से लगभग टूट चुकी खटिया लाकर अपने खेत के किनारे रख दिए थे और फ़सल के सीज़न में रात खेत पर ही बिता देते थे। गर्मी के समय तो ठीक था लेकिन बरसात और जाड़े में खेत के किनारे रात बिताना बेहद कष्टकारी होता था। साल इसी तरह बीत रहे थे और गाँव के तमाम लोगों की तरह उनकी ज़िंदगी भी धीरे-धीरे इन्हीं सब में जाया हो रही थी।

फिर कुछ साल पहले, या यूँ कहें कि इक्कीसवी सदी के प्रारंभ ने, उनके गाँव के लोगों को एक नई समस्या से रू-ब-रू कराया। अचानक खेतों की तरफ़ कुछ जानवर आने लगे जो देखने में गाय जैसे लगते थे। शुरूआत में लोगों को लगा कि शायद जंगली गाय जैसा कुछ है। फिर लोगों को पता चला कि ये घड़रोज (नीलगाय) हैं जो कि गाय नहीं होते बल्कि जंगली जानवर होते हैं। लेकिन दिखने में ऐसे थे कि दुक्खू को हमेशा लगता जैसे गाय ही है। कभी-कभार इक्का-दुक्का घड़रोज आते तो उतना नुक़सान नहीं होता लेकिन जब झुंड के झुंड ये खेतों में आते तो पूरा इलाक़ा तहस-नहस कर देते। किसान तबाह होने लगे तो बात प्रशासन तक पहुँची और फिर उनको मारने का लाइसेंस भी यदा-कदा जारी होने लगा। लेकिन तब भी दुक्खू और उनके जैसे तमाम हिंदू परिवार नीलगाय को मारने के बारे में नहीं सोच पाते थे, क्योंकि उसके नाम में आख़िर गाय जो लगा हुआ था।

दुक्खू के गाँव के चार तरफ़ अलग-अलग बिरादरियों के गाँव बसे हैं, एक तरफ़ हरिजन बस्ती तो दूसरी तरफ़ कुनबियों का गाँव। बीच में अहिरान है तो एक तरफ़ मुस्लिम लोगों का गाँव। मुस्लिम बस्ती के लोग तो बंदूक़ से नीलगाय का शिकार करने लगे और फिर उसकी दावत उड़ाते। दुक्खू को भी मन ही मन राहत महसूस होती कि चलो उनसे छुटकारा मिला और खेत भी बचे। इसी तरह कभी फ़सल बचती और कभी बर्बाद होती, लेकिन खेती पर नीलगायों का आतंक कम होने का नाम नहीं ले रहा था।

इस समय तक समाज ठीक-ठाक स्थिति में ही था, आपसी तनाव बहुत नहीं दिखता था। वैसे तो बाबरी मस्जिद भी ढह चुकी थी और हिंदुस्तान कई बार सांप्रदायिक दंगे की आँच में झुलस चुका था। लेकिन अभी भी दुक्खू के अपने टोले और पड़ोसी मुस्लिम टोले में बहुत फ़र्क़ नहीं दिखता था। आपस में ईद में सेवई, बकरीद में मटन और दीवाली में मिठाइयों का लेन-देन बदस्तूर जारी था, हाँ महँगाई का असर ज़रूर दिखने लगा था। तो बात हो रही थी नीलगाय की जिसके आतंक के साए में दुक्खू और उनके अगल-बगल के गाँव के किसान लगातार जी रहे थे। उनसे पार पाने के लिए कई लोगों ने चिड़िया मारने वाली बंदूक़ें ख़रीद लीं, तो कुछ ने अपने खेत कंटीले तारों से घेरने चालू कर दिए थे।

इस बीच भारतीय राजनीति में बदलाव का दौर शुरू हुआ जिसकी आहट सबको सुनाई पड़ रही थी। अब जय सियाराम के नारे की जगह जय श्रीराम ने ले ली थी और गाँव के कुछ घरों पर भगवा झंडे टंगने शुरू हो गए थे। टेलीविजन और कई अख़बारों ने धीरे-धीरे दुक्खू और उनके जैसे अनेक हिंदुओं के मन में ये भावना पुख़्ता करना शुरू कर दी कि पहले वाली सरकार ने दूसरी क़ौम के लोगों का विशेष ध्यान रखा था। और अब समय आ गया है कि वह लोग भी अपने हिसाब की सरकार चुनें और अपने लोगों को आगे बढ़ाएँ। और मतदान के बाद जब केंद्र में नई सरकार आई तो दुक्खू और उन जैसे तमाम लोगों को लगा जैसे अब उनके तमाम दुखों का अंत हो जाएगा।

अब अख़बार की सुर्ख़ियाँ गाय और मंदिर जैसी ख़बरें होने लगीं और इनको पढ़कर कहीं-न-कहीं दुक्खू को बहुत सुकून मिलता। उसकी माली हालत में तो कोई बदलाव नहीं हो रहा था लेकिन उसका कोई मलाल दुक्खू और उनके जैसे अनेक लोगों को नहीं था। कई जगहों पर गौ सेवकों के तांडव की ख़बरें आतीं लेकिन दुक्खू को पढ़कर अच्छा ही लगता था। गाय से जुड़ी हुई भावना के चलते ऐसी ख़बरें दुक्खू और अधिकतर गाँव वालों को विचलित नहीं करती थीं। और कुछ लोग जो ऐसी ख़बरों का विरोध करते थे वह इन लोगों को फूटी आँखों नहीं सुहाते थे। फिर समय ने और करवट ली और प्रदेश में भी यही सरकार आ गई। बस अब दुक्खू को लगा कि जैसे रामराज्य फिर से स्थापित होने का समय आ गया।

नई सरकार के आने के कुछ समय बाद ही बूचड़खानों पर कार्यवाही शुरू हुई और वजह चाहे जो भी रही हो, दुक्खू को लगा जैसे अब गौ माता की रक्षा में कोई कोर-कसर बाक़ी नहीं रहेगी। गाँव की चौपालों पर चलने वाली बहस अब सिमटकर इन्हीं मुद्दों पर आ गई और दुक्खू और उसके जैसे लोग अपनी बात को हर क़ीमत पर मनवाने लगे। ख़ैर इन सबसे न तो दुक्खू के रहन-सहन में कोई फ़र्क़ आया और न ही उनकी ख़ुशहाली बढ़ी लेकिन धीरे-धीरे एक नया संकट खेती किसानी पर मंडराने लगा।

पहले भी गाँवों में गायें उतनी ही थीं और उनके बच्चे भी लेकिन आश्चर्यजनक बात यह थी कि दुक्खू के दरवाज़े पर ही क्या किसी और गाँव में भी किसी के भी दरवाज़े पर कोई बछड़ा नहीं दिखता था। सबके दरवाज़े पर सिर्फ़ गाय और बछिया ही नज़र आती थी, किसी किसी के दरवाज़े पर कोई बछवा अगर दीखता भी था तो बेहद कमज़ोर और बीमार सा। आख़िर गायों से पैदा हुए बछड़े कहाँ जाते थे, इसपर न तो किसी ने सोचने की ज़हमत उठाई और जो शायद जानते भी थे उन्होंने इस बात की चर्चा कभी की। आज के समय में खेत की जुताई के लिए हर तरफ़ ट्रैक्ट्रर आ गए थे, यहाँ तक कि दुक्खू का खेत भी मनोहर यादव का ट्रैक्टर जोतता था, तो किसी को भी अब बैल रखने की कोई ज़रूरत महसूस नहीं होती थी। बैल अब बिल्कुल अप्रासंगिक और ग़ैरज़रूरी हो गए थे, उनका न तो कोई उपयोग था और न कोई उन्हें गौ माता की तरह सम्मान देता था। लेकिन हर घर में गायें थीं तो उनके बच्चे भी थे, कुछ बछिया देतीं तो कुछ बछड़ा भी। लेकिन ये बछड़े जैसे ही थोड़े बड़े होते, लोग उनको सिवान में ले जाकर हाँक देते थे। और कुछ दिन बाद ही वे बछड़े परिदृश्य से कुछ यूँ ग़ायब हो जाते थे जैसे चुनाव के बाद अपने क्षेत्र से नेता। पता तो शायद सबको ही था कि इन बछड़ों का क्या होता था लेकिन चूँकि सबने अपने दरवाज़े से उनको हाँक दिया होता था तो किसी को उनकी चिंता भी नहीं होती थी।

नई सरकार के द्वारा जब कुछ बूचड़खाने बंद करवा दिए गए और कई दूसरे धर्म और निचली जात के लोगों को गाय की तस्करी के आरोप में गौ सेवकों द्वारा, जिनको प्रशासन का खुला समर्थन था, पीट दिया गया तो लोगों में इसके प्रति डर बैठ गया। अब धीरे-धीरे बछड़े, जो पहले बड़े होने के पहले ही अंतर्ध्यान हो जाते थे, वे सड़क पर घूमते फिरते दिखाई देने लगे। अब उनको खाना पानी तो कोई देता नहीं था तो वे अपने भोजन की तलाश में खेतों में उतरने लगे। किसान, जो कि अभी तक नीलगाय के आतंक से उबर भी नहीं पाए थे, उनके सर पर यह दूसरी बड़ी आपदा थी। इन बछड़ों को मारने के बारे में कोई सोच भी नहीं सकता था, एक तो गाय की संतान, दूसरे वर्तमान सरकार और उसके संरक्षित गौरक्षक। दुक्खू के खेत पर भी उनका आक्रमण शुरू हुआ तो शुरूआत में दुक्खू उनको पुचकार कर भगाने का उपक्रम करते रहे। लेकिन जब खेत में खड़ी लहलहाती फ़सल उनके सामने बर्बाद होने लगी तो उनके सामने भी कोई चारा नहीं बचा। अपने आपको ज़िंदा रखना ही था तो वह भी अन्य गाँव वालों की तरह ही इनसे छुटकारा पाने की तरकीब सोचने लगे।

पंडिताइन भी इन सबसे अनजान नहीं थीं, उनकी भी अपनी मंडली थी जिसमें गाँव और घर गृहस्थी की पंचायत चलती थी। उनको भी अपनी मंडली और अगल-बगल के घरों से इन बछड़ों के आतंक के बारे में पता चलता रहता था। लेकिन जिस गौ माता के बारे में उनके मन में अगाध श्रद्धा थी, उनके बछड़े के बारे में कोई ग़लत विचार लाना उनको पाप लगता। एकाध बार दुक्खू ने कहा भी कि लगता है कि इन बछड़ों का कुछ करना पड़ेगा नहीं तो अनाज का एक दाना भी घर नहीं आएगा, तो पंडिताइन ने उनको कुछ भी ग़लत करने से रोक दिया।

"आख़िर हैं तो गौ माता के बछड़े ही, हाँक दिया करो उनको। मारना मत नहीं तो बड़े पाप के भागी बनोगे", पंडिताइन हर हालत में दुक्खू को किसी भी ऐसे क़दम लेने से रोकती थीं।

"तो का चाहती हो, हवा फांकें हम लोग, या पानी पीकर ज़िंदा रहें। बड़ी मुश्किल से तो अपनी फ़सल नीलगाय से बच रही थी कि यह नई मुसीबत भी आ गई। यही हाल रहेगा तो भीख माँगना पड़ेगा हम लोगों को", दुक्खू अपना पक्ष रखते। और यह बात सिर्फ़ दुक्खू की ही नहीं थी, कमोबेश सभी गांववालों की थी। लेकिन कुछ-कुछ सहमत होते हुए भी पंडिताइन ने दुक्खू को हमेशा ऐसा करने से रोका।

गाँव में लोग आपस में बात करते, दबी ज़ुबान से लगभग सबकी इच्छा यही थी कि जैसे घड़रोजों को मारकर भगाने में कोई दिक़्क़त नहीं होती, वैसे ही इन बछड़ों को भी मारना होगा। लेकिन कोई भी खुलकर यह बात कह नहीं सकता था, आख़िर सरकार इसके ख़िलाफ़ थी।

बल्लम पर हाथ कसे हुए दुक्खू के मन में यह सारी बातें घूम रही थीं तभी उनको सामने से बछड़ों का दल आता दिखाई पड़ा। एक बार तो उनके हाथ कांपे, आज तक नीलगाय पर भी कभी बल्लम नहीं चलाया था उन्होंने। लेकिन अपनी फ़सल की दुर्दशा और आसन्न भविष्य को सोचकर उनके हाथ बल्लम को उठाकर अपने-आप तन गए और उन्होंने उसे सामने से आ रहे बछड़े की तरफ़ फेंक दिया।