आज दोपहर दरोगा चच्चा गुज़र गए, पिछले तीन चार हफ़्ते से बीमार चल रहे थे और उमर भी अब काफ़ी हो चली थी। दरअसल आजकल कहीं भी किसी बुज़ुर्ग का गुज़र जाना कोई घटना नहीं होती,बशर्ते वह कोई सेलेब्रिटी न हो। वैसे भी धीरे-धीरे उनकी पीढ़ी के अधिकांश बुज़ुर्ग प्रस्थान कर गए थे और कभी-कभी वह मज़ाक में कहते भी थे “आज सपना में मनोहरा ऊपर से बुलावत रहा, लागत हौ कि अब चले के पड़ी”, और ठठा कर हँस पड़ते।
ख़ैर बात यह नहीं है कि दारोग़ा चच्चा का गुज़र जाना कोई बहुत बड़ी या अप्रत्याशित घटना है, बूढ़ा गए थे, बीमार थे तो यह तो होना ही था। और अपने पीछे गाँव में भरा पूरा परिवार छोड़ गए जिसकी हर सुख-सुविधा का अपने जान में पूरा इंतज़ाम भी करके गए। घटना दरअसल कुछ और ही है, इनके जाने से एक क़िस्से का अंत हो गया जिसे लिखने की शायद अधिकतर लोगों को ज़रूरत महसूस ही नहीं होती। उस क़िस्से का सबसे महत्त्वपूर्ण किरदार “चन्नर” तो कुछ वर्ष पहले ही गुमनाम मौत मर चुका था और अब दारोग़ा चच्चा के गुज़र जाने से तो अगली पीढ़ी को कभी पता भी नहीं चलेगा चन्नरके बारे में। उसका असली नाम तो“चंदर” रहा होगा लेकिन लोगों ने अपनी सहूलियत से चन्नर बना दिया और बड़े तो उसे “चनरा” ही बुलाते थे। अब आप भी सोच रहे होंगे कि जब ऐसी कोई ख़ास बात ही नहीं थी इन घटनाओं में तो फिर मैं यह क्या लिखने बैठ गया, तो शायद इस क़िस्से से गुज़र कर आप समझसकें। वैसे भी अपने समाज में कहाँ किसी को ऐसे लोगों के बारे में सोचने की फ़ुर्सत रही है। और सिर्फअपने समाज को ही क्यों कहें, कमोबेश दुनिया के हर समाज में ऐसे लोग हासिए पर ही रहे हैं जिन्हें न तो वर्तमान में जगह मिलती है और न ही इतिहास में।
बचपन में गाँव जाना हर साल ही होता था,दरअसल उस समय छुट्टी बिताने के लिए आज की तरह न तो टी। वी। थे, न सिनेमा हाल और न ही इंटरनेट। फोन थे नहीं तो समाचार मिलने या भेजने का पत्र ही एक साधन था। गर्मियों की छुट्टी का बड़ी बेसब्री से इंतज़ार रहता था और उसकी वजह थी क़स्बे में गुज़र रहे अनुशासित जीवन से कुछ महीनों की फ़ुर्सत। गाँव में छुट्टी के दरम्यान न तो कोई टोकाटाकी होती और न पढ़ाई के लिए मारपीट। उस समय हमबच्चों को ऊँच नीच, छोटे बड़े का ख़याल नहीं रहता था, जबकि गाँव में सबके टोले अलग-अलग हुआ करते थे। बड़े अलबत्ता कोशिश करते कि बच्चे भी इन गंदगियों को अपने में आत्मसात कर लें लेकिन बच्चे तो बच्चे ही ठहरे।
ऐसी ही एक छुट्टी में गाँव पर मुलाक़ात हुई “चन्नर” से। अब उसे आप मुलाक़ात कहें या कुछ और, हमें तो हर बार कुछ-न-कुछ अलग और दिलचस्प मिल ही जाता था गाँव में। खेलते कूदते दारोग़ा चच्चा के दरवाज़े पर पहुँचने पर सामने से चन्नर दिखा, थोड़ा अलग था इसलिए याद रह गया।आगे के वर्षों में उसके चलने के तरीक़े को लेकर हम लोग अक्सर उसका मज़ाक भी उड़ाया करते थे लेकिन उसके भचक कर चलने के पीछे की दर्दनाक घटना का पता काफ़ी सालों बाद चला। एक अजीब सीमुस्कुराहट उसके चेहरे पर इस तरह रहती जैसे किसी ने पैदा होते ही उसके चेहरे पर इसे चस्पाँ कर दिया हो। और नाक से निकलती पतली आवाज़ जिससे हम लोग अँधेरे में भी चन्नरको पहचान लेते। आज भी चन्नरकी आवाज़ मन में गूँजती रहती है “कइसन हो भैया”, जो वह हमें जब भी देखता, अपनी चिरपरिचित मुस्कराहट के साथ ज़रूर पूछता।
और अगर सच कहूँ तो बचपन में तो हमें पता भी नहीं था कि चन्नरदरोगा चच्चा के घर का नहीं था। उस समय बच्चे बहुत साल तक बच्चे ही रहते थे और धीरे-धीरे उनके अंदर समाज की बुराई पैठ बनाती थी। और इसकी सबसे बड़ी वजह थी टी। वी। और इंटरनेट का न होना। और दूसरा कारण हर घर में बुज़ुर्गों की उपस्थिति थी हमारा ख़ूब ख़याल रखते। वरना आजकल तो बच्चों का बचपन जैसे पैदा होने के साथ ही खो जाता है। वह तो काफ़ी सालों बाद पता चला कि मंदबुद्धि चन्नर बचपन में ही पता नहीं कैसे उनके घर आ गया था और उसके बाद फिर उसकी लाश ही दारोग़ा चच्चा के घर से निकली। इस क़िस्से की शुरूआत तब हुई थी जब देश अंग्रेजों से तो कई साल पहले ही आज़ाद हो चुका था लेकिन जाति और धर्म के बंधन से ज़रा भी आज़ाद नहीं हुआ था। वैसे अपना समाज आज भी इन चीज़ों से आज़ाद कहाँ हुआ है, बस कहने के लिए हम विकसित होते जा रहे हैं। गाँव में ठाकुरों के लगभग 30 घर एक साथ थे और उसके एक तरफ़ यादव टोली, उसके पीछे बनिया और धोबियों के घर और सबसे पीछे गंदगी से बजबजाती जगह में चमरौटी। तब चमरौटी का पता गंदे और बदबूदार जगह से ही होता था, आज की तरह बाबा अंबेडकर की मूर्ति नहीं होती थी। कुनबी और कोईरी जातियाँ दूसरे तरफ़ बसी हुई थीं तो सबसे उपेक्षित और कमज़ोर तबक़ा मुसहरों का था जो गाँव से काफ़ी दूर बसे हुए थे। शादी हो या मरनी करनी, पत्तल मुसहर लोग ही बनाकर लाते थे, पुरवा इत्यादि कोंहार (कुम्हार) लोग बनाते थे। समाज में हर तबक़े का स्थान सदियों से निर्धारित था और उसमें किसी परिवर्तन की बात सोचना भी उस दौर में संभव नहीं लगता था।
उस समय खेतीबाड़ी अधिकतर ठाकुरों के पास ही थी,ये अलग बात थी कि कागज़ों पर ज़मींदारी प्रथा का उन्मूलन हो गया था। थोड़ी-बहुत ज़मीन यादव या कुर्मी लोगों के पास भी थी जिसमें वह लोग सब्ज़ी और थोड़ा गेहूँ चावल उगा लेते थे। ट्रैक्टर इत्यादि उस समय होते नहीं थे और खेती में बैल ही काम आते थे। लिहाज़ा ठाकुरों के हर घर में एक से दो जोड़ी बैल, कुछ गाय भैंस और उनके बच्चे। कुल मिलाकर हर घर में 6 से 12 जानवर थे और उनके सानी पानी (खाना-पीना) और देखभाल के लिए एक मजूर (मज़दूर) भी होता था। अधिकतर तो यह मजूर गाँव के ही चमरौटी से या अन्य निचली जात के लोग होते लेकिन कभी-कभी दूसरे गाँव से भी मजूर मिल जाते थे। जानवरों के गोबर से खाद बनती थी जो खेती में इस्तेमाल होती,हाँ बहुत साल बाद जब ईंधन की कमी होने लगी तो गोबर से ऊपरी (उपले) की पथाई भी शुरू हो गई।
अब ऐसे में किसी को कोई ऐसा लड़का मजूरी के लिए मिल जाता जो कहीं दूर का हो और दिमाग़ी रूप से भी कमज़ोर हो तो उसके भाग्य का कहना ही क्या। अब अपने दारोग़ा चच्चा भी ऐसे ही भाग्यवान थे जिसे चन्नर बचपन में ही मिल गया। किस गाँव का था और उसकी जात क्या थी, शायददरोगा चच्चा को ही पता थी। लेकिन यह हम लोगों को पता नहीं था और न कभी इसकी ज़रूरत ही महसूस हुई। लेकिन इतना तो था कि चन्नर बाहर के साथ-साथ घर के अंदरके काम भी करता था और इससे ये अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि उसकी जाति बहुत निचली नहीं थी। शुरुआती सालों में हमने चन्नर को सिर्फ़ मानसिक रूप से ही कमज़ोर देखा था, शारीरिक रूप से वह स्वस्थ और तंदरुस्त था। लगभग 12 जानवर थे दारोग़ा चच्चा के घर,सबका सानी पानी, गोबर, खेत पर काम और घर पर इनारा (कुआँ) से पानी काढ़ कर लाना, सब काम चन्नर के हीजिम्मे था। अक्सर तो वह हमें मुसकुराता हुआ ही दिखता लेकिन कभी-कभी उसके चेहरे से पता लगता था जैसे वह रोया हो और बाद में उसकी पिटाई की बात हमें पता चल जाती। कुछ बड़े होने पर ही हम लोगों को पता चला कि दारोग़ा चच्चा, जो हमें सिर्फ़ बड़ी-बड़ी मूँछों के चलते डरावने दिखते थे, वास्तव में बहुत ख़तरनाक आदमी थे। अगल-बगल के गाँव वाले भी उनसे भय खाते और चमरौटी तथा अन्य निचली जतियों में तो उनके नाम से लोग सिहर जाते।
गाँव में रहने के दौरान हमारे बाबा उनके कई क़िस्से सुनाते जिसमें अधिकतर उनके अत्याचार के ही होते थे, ये अलग बात थी कि उनको इसका कभी अफ़सोस नहीं होता था। कभी-कभी तो उनके आवाज़ में गर्व भी झलकता था जैसे दारोग़ा बहुत बड़े योद्धा हों। चमरौटी में सुबह-सुबह अगर उनकी आवाज़ सुनाई दे जाए तो मजाल नहीं थी कि वहाँ के मजूरा उनके खेत में काम के लिए नहीं पहुँचें। और उसके बाद जो भी दारोग़ा चच्चा दे दें, सब ठीक, कोई शिकायत करने की हिम्मत नहीं करता था। चमरौटी के पता नहीं कितने पुरुष उनके द्वारा पिटाई के बाद हफ़्तों शरीर पर हल्दी का लेप लगवाकरइलाज कराते थे और कितने ही लोगों के हाथ पैर उन्होने तोड़े थे। लेकिन न तो कोई पुलिस में शिकायत कराने की हिम्मत कर पाया और न ही प्रधान से। उस समय तो प्रधान भी ठाकुरों के ही घर से होते थे,बहुत बाद में जब प्रधानी का पद महिला और अनुसूचित जाति के लिए रिज़र्व हो गई तब भी सिर्फ़ नाम की अनुसूचित जाति की महिला प्रधान होने लगी, काम तो सब ठाकुर लोग ही करवाते थे। एक बात तो थी कि पहले वाले ठाकुर जब ग्राम प्रधान होते थे तो वह कम-से-कम अपने भाई और पटीदारों का कुछ लिहाज़ करते थे लेकिन जैसे-जैसे गाँवों में पैसा पहुँचने लगा, सारे रिश्ते नाते उसकी भेंट चढ़ने लगे। अब ठाकुरों में भी भैया, चाचा, बब्बा इत्यादि रिश्ते सिर्फ़ नाम के ही बचे, वास्तव में उनके अंदर की गर्माहट ख़त्म हो गई।
समय में एक सबसे अच्छी बात यह होती है कि वह जैसा भी हो, बीत जाता है। हमारे क्षेत्र में भी समय अपनी गति से बीतता गया,धीरे-धीरे विकास की किरण दस्तक देने लगी। पंचवर्षीय योजनाओं का असर धीरे-धीरे ही सही, हमारे गाँव और आसपास भी दिखने लगा। गाँव में पहले पक्की सड़क बनी, मोटर गाड़ियाँ चलने लगीं और अंततोगत्त्वा बिजली भी आ गई। कुछ बड़े जोत वालों के घर ट्रैक्टर भी आ गया था जो उसकी हैसियत में चार चाँद लगा देता था। इस विकास का असर दहेज़ पर भी पड़ा, पहले जहाँ शादियों में रेडियो और साइकल मिलना बड़ी बात होती थी,वहीं रेडियो की जगह पहले टू इन वन ने ली और फिर टी।वी सेट ने ले ली। टी।वी भी धीरे-धीरे स्वेत श्याम से रंगीन हुए और साइकल भी मोपेड, स्कूटर से होती हुई मोटर साइकल तक पहुँच गई। ट्रैक्टर आने के साथ सबसे बड़ा दुख हमें इस बात का हुआ कि अब गेहूँ की दंवाई (मंडाई) थ्रेशर से होने लगी। वरना पहले तो खलिहान में गेहूँ की फ़सल काटकर बिछा दी जाती और हम लोग बैलों द्वारा चलने वाले दंवाई मशीन पर बैठकर घूमा करते। गेंहू की दंवाई के साथ-साथ हमारी मौज भी होती थी।
ख़ैर इसी सिलसिले में एक और क़िस्सा अपने कल्लन बब्बा का है। गाँव के अधिकतर बड़े बुज़ुर्ग एकदम भोर में जग जाते थे और फिर उनका राम राम शुरू हो जाता था। उन्हीं में से एक थे कल्लन बब्बा जिनकी आवाज़ ऐसी ज़बरदस्त थी कि अगर गाँव के एक किनारे खड़े होकर आवाज़ लगाएँ तो गाँव के दूसरे किनारे तक उनकी आवाज़ साफ़ सुनाई पड़ती। गेंहू की दंवाईअक्सर गर्मी के चलते तड़के ही शुरू हो जाती, चारो तरफ़ सन्नाटा रहता और सिर्फ़ बैलों के गले की घंटियाँ ही सुनाई देती। बैल भी दो शब्दों को बख़ूबी समझते थे, एक तो चलने के लिए “चल” और दूसरा रुकने के लिए “होर रह।” अब कहा यह जाता था कि सबके खलिहान में बैल मशीन के साथ दंवाई के लिए लग जाते और फिर कल्लन बब्बा की आवाज़ से ही पूरे गाँव के बैल चलते और रुकते। वैसे इस क़िस्से में भी अतिशयोक्ति तो ज़रूर रही होगी लेकिन कम-से-कम अगल-बगल के चार छह खलिहान के बैल तो ज़रूर उनकी आवाज़ से ही काम करते रहे होंगे।
गाँव में आपसी रिश्तों को तोड़ने में दूसरा सबसे बड़ा कारण चकबंदी थी, पैसा तो सबसे पहला और निर्विवाद कारण था ही। जिन घरों ने कभी कोर्ट-कचहरी का मुँह भी नहीं देखा था, उनके घर का एक सदस्य अब कचहरी का नियमित मेम्बर हो गया। अब तमाम कामों में एक काम तारीख़ पर शहर की कचहरी जाना भी हो गया। कुर्ता पायजामा की जगह अब शर्ट पैंट ने ले ली और सुबह-सुबह अगर किसी को शर्ट पैंट पहने साइकल पोंछते देख लिया तो लोग समझ जाते थे कि कचहरी की तैयारी है। ये मुक़द्दमे अंतहीन थे और विरासत की तरह अगली पीढ़ी को पूरी ईमानदारी से अंतरित किए जाते थे। इसी बहाने गांवोंमे भी वकीलों की नई फ़ौज तैयार होने लगी और आपस के पैसे से ही सही, उनकी भी रोज़ी रोटी चल पड़ी।
इस विकास के साथ-साथ एक और घटना घटी जिसके बारे में हमें बहुत बाद में पता चला। एक साल गर्मी की छुट्टी में जब हम घर आए तो देखा कि चन्नर ठीक से चलनहीं पा रहा है। थोड़ी उत्सुकता हुई और उससे पूछा तो वह हँसकर रह गया। शायद बताना नहीं चाहता था या भय था, पता नहीं। लेकिन अपने घर पर बाबा ने बताया “एक दिन चन्नर गाय चराकर बहुत देर से लौटा और तब तकबाकी जानवरों के सानी पानी का समय बीत रहा था। ऐसे में दरोगाने ही जानवरों को नांद पर बाँधा और सानी पानी किया। फिर जैसे ही चन्नरवापस आया, बिना उससे कारण पूछे दरवाज़े पर पड़ी गोजी (लाठी) लेकर उसपर टूट पड़े और तब तक मारते रहे जब तक उसकी कमर और एक पैर टूट नहीं गया। चन्नर बाप बाप चिल्लाता रहा लेकिन कोई उसे बचाने नहीं आया। बाद में दारोग़ा ख़ुद ही डॉक्टर को बुलाए और थोड़ा-बहुत इलाज़ भी करवाया लेकिन मंदबुद्धि चन्नर फिर विकलांग भी हो गया।
इसे सुनकर ही हमारे रोंगटे खड़े हो गए कि कोई इनसान होकर ऐसा भी हो सकता है। ऐसे ही तमाम क़िस्से बाबा के पास होते थे जिसे वह हमको गाहे-बगाहे सुनाते रहते थे। इन्हीं क़िस्सों में बाबा का एक और क़िस्सा था कि एक बार तो उन्होने चमरौटी के एक आदमी को बल्लम मार दिया था और पूरे चमरौटी में किसी की हिम्मत नहीं पड़ी उसको बचाने की। बाद में ठकुराने के लोग पहुँचे और उसको बचाया, बस ग़नीमत यही थी कि वह ज़िंदा बच गया नहीं तो गड़बड़ हो जाता। दरअसल देश में उस समय हरिजन ऐक्ट लागू हो चुका था और बड़ी जातियों का दबदबा अब घटने लगा था। कुछ गाँवों में तो इसके चलते गिरफ्तारियाँ भी होने लगी थीं।
समय के साथ-साथ हम बड़े हुए तो चन्नर के चेहरे पर भी कुछ मूँछ दाढ़ी आई। वह ख़ुद को किसी तरह घसीटते हुए ज़िंदगी को भी घसीटता रहा। अब वह बहुत काम का नहीं रह गया था लेकिन फिर भी खेतअगोरने और गाय भैंस चराने जैसा काम अपनी समझ और हिम्मत के अनुसार करता रहता। गाहे-बगाहे दारोग़ा चच्चा से पिटना उसकी नियति में शामिल था और उसकी चींखे उस घर में मौजूद किसी भी पुरुष या महिला को विचलित नहीं करती थीं। वही महिलाएँ जो अपने बच्चों के बहते ख़ून देखकर अमूमन बेहोश होने लगती थीं, उनको चन्नर के बहते ख़ून और चीख़ से कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता था। कई बार तो बुरी तरह पिटने के बाद वह दो-तीन दिन तक अपनी टूटी खटिया पर पड़ा रहता। ऐसे में घर से जो कुछ रूखा-सूखा खाने को मिल जाता, उसी से अपनी साँसें जारी रखता। और अगर घर में किसी को दया आ गई तो चन्नर की दवा भी करा देता। फिर ठीक होते ही वह वापस अपने काम में ऐसे जुट जाता जैसे कुछ हुआ ही नहीं हो। प्रतिरोध करना तो पशुओं को भी आता है और इनसान न करे, ऐसा हो ही नहीं सकता। चन्नर से भी जब उससे हो रही मारपीट की बात हम करते, तो उसके चेहरे पर कुछ पल के लिए तनाव आ जाता। लेकिन मानसिक और शारीरिक रूप से अपंग चन्नर के लिए इससे ज़्यादा प्रतिरोध कर पाना संभव भी नहीं था। एक चीज़ जो बड़े होकर बहुत परेशान करती थी वह यह थी कि हमारे गाँव में बहुत से लोग पढ़ लिखकर अच्छे पदों पर आ गए थे, लेकिन किसी को भी चन्नर के लिए दारोग़ा चच्चा से कुछ कहते नहीं सुना। उल्टा उसकी पीड़ा में रस लेने वाले ज़रूर बढ़ गए थे।
जीवन का एक पहलू यह भी है कि समय के साथ-साथ उनसे भी लगाव हो जाता है जिससे नफ़रत का ही रिश्ता रहा हो। और यही हुआ चन्नर के साथ भी, उसे दारोग़ा चच्चा के घर के अलावा और किसी जगह अच्छा नहीं लगता। अब शरीर की तो अपनी केमिस्ट्री होती है और चन्नर की बढ़ती उम्र के साथ-साथ उसके शरीर की ज़रूरत भी पैदा होने लगी। दरअसल चमरौटी की बहुत सी महिलाएँ काफ़ी हंसोड़ और मज़ाकिया थीं और उनको चन्नर को छेडने में मज़ा आता था। वैसे भी चन्नर से ठकुराने की औरतें तो चाहकर भी मज़ाक नहीं कर सकती थीं, वह उनका मजूर जो ठहरा। ऐसे में उसको चमरौटी से जोड़कर कई क़िस्से बन गए, हालाँकि मुझे कभी भी उन क़िस्सों पर भरोसा नहीं हुआ। गाँव में कई लोग उसे छेड़ते भी कि चन्नर फ़लाने से बियाह कर लो लेकिन वह अपनी अस्पष्ट आवाज़ में इनकार कर देता।
साल दर साल बीतते रहे, हर गर्मी की छुट्टी में चन्नर एक साल में ही दस साल बूढ़ा दिखने लगता। लेकिन मिलने पर वही मुस्कराहट और “कइसन हो भैया” जारी रहा। अब उसका चलना फिरना बहुत कठिन हो गया था और दिखाई देना भी काफ़ी कम लेकिन ज़िंदगी से उसका लगाव कभी कम नहीं दिखा। दारोग़ा चच्चा भी अब बढ़ती उमर का शिकार हो रहे थे लेकिन अभी भी अपने सब काम करते रहते। गाँव में विकास बढ़ता रहा, घर और खेत छोटे होते गए और लोगों के इगो विकास से भी दोगुनी रफ़्तार से बढ़ते रहे। अब गाँव जाने पर सबके घर-घर जाने का उत्साह पहले जैसा नहीं था, आपसी रिश्तों के बीच एक ठंडापन नज़र आने लगा। ऐसे ही एक साल दारोग़ा चच्चा के दरवाज़े पर चन्नर नहीं दिखा तो चिंता हुई। पूछने पर पता चला कि अब उससे चला फिरा नहीं जाता है और उसे दिखाई भी नाममात्र ही देता है। यह पता चलने पर कि वह कुन्बियाने के तरफ़ के खेत पर गया है, मेरे क़दम अपने-आप उधर मुड़ गए। मन में एक बात लगातार चल रही थी कि चन्नर मुझे पहचान पाएगा कि नहीं। खेत के सामने पहुँचते ही चन्नर एक झोलंगी खटिया पर बैठा दिख गया, उसके हाथ में एक पतला-सा डंडा था और वह आहट आने पर आवाज़ की तरफ़ देखते हुए कुछ बोलने लगता।
मैं उसके सामने जाकर खड़ा हो गया और मेरी आहट मिलते ही चन्नर ने बुदबुदाते हुए कहा “देखत हुई।” मुझे थोड़ा समय लगा उसका कहा समझने में लेकिन फिर बात समझ में आते ही दिल भर आया। एक देख पाने में असमर्थ व्यक्ति देख लेने का दावा कर रहा है, और समाज के कर्णधार जिन्हें सब दिखता है, वह जानबूझ कर अंधे बन रहे हैं। कुछ पल बाद जैसे ही मैंने उसे आवाज़ दी, उसके चेहरे पर वही पुरानी मुस्कराहट खिल गई और उसने अस्पष्ट शब्दों में कहा “कइसन हो भैया।” कुछ देर वहाँ खड़ा रहने के बाद मैं भारी क़दमों से वापस आ गया लेकिन मन में कुछ चुभ गया।
वैसे इस बार घर पर बब्बा ने बातचीत के दौरान एक बात बताई थी जिसको सुनकर मुझे बेहद सुकून हुआ। गाँव में कई लोगों ने दारोग़ा चच्चा से कहा कि अब चन्नर को काहे घर पर रक्खे हो,बनारस जाकर गंगा के घाट पर क्यों नहीं छोड़ देते, वहीं भीख माँगकर पड़ा रहेगा। लेकिन दारोग़ा चच्चा ने उनको पलटकर ऐसा जवाब दिया कि लोगों की बोलती बंद हो गई “अइसन हौ, आपन पूरा उमर चनरा हमरे यहाँ काम कइले हौ, अब ई ससुर यहीं मरी। घरे के कुक्कुर बिलार से भी लगाव हो जाला, ई त तब्बो इनसान हौ।” मैं इसके बाद बहुत देर तक मानव स्वभाव के पेंचीदगियों में उलझा रहा, कहाँ इसी चन्नर को दारोग़ा चच्चा जानवर की तरह पीटते थे और कहाँ उसी को घर पर ही रक्खे जब तक वह ज़िंदा रहा।
एक सेवानिवृत्त व्यक्ति का सबसे बड़ा दुख होता है उसकी पहचान का ख़त्म होना, उसकी कुर्सी के साथ जुड़ी इज़्ज़त का समाप्त हो जाना। कुछ यही हो रहा था हमारे गाँव में भी, फ़र्क़ बस इतना था कि गाँव पर ठाकुरों की झूठी और भयवश होने वाली इज़्ज़त अब धीरे-धीरे कम हो रही थी। सूबे में सरकार बदलने से पिछड़े और कमज़ोर तबक़े के लिए, कागज़ों पर ही सही, तमाम योजनाएँ आने लगीं और बहुत से गाँव “अंबेडकर ग्राम” बन गए। हमारा गाँव भी इस लहर से अछूता नहीं रहा और वह भी इसीका हिस्सा बन गया। जिस चमरौटी में एक भी पक्का घर नहीं था, वहाँ अब सरकारी मदद से कुछ पक्के मकान खड़े होने लगे। गाँव से लगभग 10 किमी दूर एक बैंक की शाखा भी खुल गई और बहुत से पिछड़े लोग जो कभी ठाकुरों और बनियों के सामने आर्थिक मदद के लिए हाथ फैलाते थे, वह लोग कुछ दलालों के मार्फत बैंक से लोन लेने लगे। आरक्षण का, सीमित ही सही, फ़ायदा दिखाई पड़ने लगा और गाँव के चमरौटी के एक-दो घर के लड़के अब सरकारी मुलाज़िम बन गए। अब धीरे-धीरे ठाकुरों का दबदबा कम हो रहा था और उनके सामने हाथ जोड़कर खड़े रहने वाले और उनकी बेगारी करनेवाले अब कम होते जा रहे थे। दारोग़ा चच्चा का भी यही दर्द था, किसी समय उनके सामने जिनके मुँह से बकार भी नहीं निकलती थी, अब उन्हीं लोगों के लड़के उनके सामने खटिया से भी खड़े नहीं होते थे।
अगले कुछ सालों तक मैं गाँव जाता रहा, आर्थिक परिवर्तन का असर दिखाई पड़ने लगा था। अब गाँव के ठकुराने के कुछ लोग भी चमरौटी में चाय पानी पीने लगे और एक-दो घरों की शादियों में भी आना-जाना होने लगा (उन्हीं घरों में जो सरकारी मुलाज़िम बन गए थे)। एक और चीज़ ने इस भेदभाव को दूर करने में बहुत बड़ा काम किया था और वह थी अमूमन हर गाँव में बनने वाली देशी शराब। अक्सर इस शराब की भट्ठी चमरौटी या ऐसे ही इलाक़ों में ही होती और उसे पीने वालों में कोई सामाजिक भेदभाव नहीं दिखाई पड़ता। ख़ैर अब आपसी भेदभाव काफ़ी कम होने लगा और ऐसे में दारोग़ा चच्चा जैसे पुरानी सोच के लोगों का दुखी होना लाज़मी था। फिर एक बार गाँव जाने पर पता चला कि चन्नर गुज़र गया। बाबा ने बताया कि उसका अंतिम संस्कार दारोग़ा चच्चा ने हिंदू रीति रिवाज़ों के हिसाब से किया और उसकी आत्मा की शांति के लिए कुछ पंडितों को भी खिलाया। चन्नर के गुज़र जाने के बाद उनके दरवाज़े पर फिर कोई मजूर नहीं आया, दरअसल अब मजूर मिलना संभव भी नहीं था। चमरौटी के लोग या तो शहर जाकर मज़दूरी करने लगे थे या साड़ी की बुनाई। अब चमरौटी में भी मोटर साइकल और टी।वी आ गए थे और दारोग़ा चच्चा ने उधर जाना छोड़ दिया था। इसी तरह समय आगे बढ़ता गया और एक दिन ख़बर मिली कि दारोग़ा चच्चा भी दुनिया से कूच कर गए। और एक ऐसे क़िस्से का अंत हो गया जिसे हमारी आने वाली पीढ़ी क़िस्से कहानियों में तो शायद कभी पढ़ लेगी लेकिन उसपर भरोसा नहीं कर पाएगी।
No comments:
Post a Comment