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Thursday, June 26, 2014

बीज--

" मुझे देखो, मेरी मदद करो, मैं आपके ही काम आता हूँ फिर मुझे क्यों इस तरह नष्ट कर रहे हो"| मैं चौंक कर इधर उधर देखने लगा कि ये किसकी आवाज है| सब तरफ तो कंक्रीट का जंगल नज़र आ रहा था, फिर ये आवाज़ कहा से आई| अचानक मुझे लगा कि ये आवाज़ तो मेरे पैर के नीचे से आ रही है| मेरे पैर के नीचे एक बीज पड़ा हुआ था, मैंने उसे उठाया और अपने हाथ में लेकर पूछने लगा
" अब बताओ क्या कह रहे थे तुम"|
बीज की आँखों में आंसू थे, उसने कराहते हुए कहा " आखिर क्यों ये मानव हमें इस तरह से ख़त्म करने पे तुला हुआ है, हम तो उसे हर तरह से जिन्दा रहने में मदद ही करते हैं "|
मैंने बीज को बताया कि आबादी बढ़ रही है, रहने की जगह कम होती जा रही है, सड़के बनानी हैं, कल कारखाने बनाने हैं, विकास करना है तो ये करना ही पड़ेगा| बीज मुस्कुराया और बोला " ठीक है कि आप अपने रहने के लिए जगह बना रहे हो लेकिन हमारे बिना रह कैसे पाओगे, ये भी सोचा है कभी| जिन्दा रहने के लिए ऑक्सीजन भी तो चाहिए न, वो कहा से लाओगे| मैं मानता हूँ कि मज़बूरी में आप हमें काट देते हो, लेकिन आप नए लगा भी तो सकते हो| विकास तो ठीक है लेकिन विनाश पे क्यों तुले हुए हो"|
मेरे हाथ कांपने लगे, बीज मेरे हाथ से गिर पड़ा| फिर मैंने उसे उठाया और बोला " चलो शुरुआत तुम्हीं से करते हैं, तुमको अपने बगीचे में लगाते हैं"|
अब बीज मुस्कुरा रहा था, अपने लिए भी और मानव समाज के लिए भी|

एहसान

सो गयी क्या , वल्लभ ने रूपा को हिलाते हुए पूछा | हाँ , सोने दो ना , बहुत थक गयी हूँ मैं | रूपा फिर करवट बदल कर सो गयी | वल्लभ बहुत देर तक जगा रहा , सोचता रहा अख़बार में निकले सम्पादकीय के बारे में |
आज का सम्पादकीय कोर्ट के उस निर्णय के बारे में था , जिसमे कहा गया था कि पत्नी की सहमति के बिना किया गया सहवास भी बलात्कार की श्रेणी में आता है | क्या सच में ऐसा है , क्या पति की इच्छा की कोई जगह नहीं है दांपत्य जीवन में | महिला अधिकार के समर्थक और बहुत सारी महिलाएं इस फैसले को लेकर बेहद उत्साहित थीं और उनकी नज़र में ये स्त्री सशक्तिकरण की ओर एक बहुत बड़ा कदम था |
वल्लभ सोचने लगा की रूपा पहले तो ऐसी नहीं थी , लेकिन शादी के पांच - छह वर्षों में ही उसका रवैया बहुत बदल गया | अब उसे ये एक निहायत गैरजरूरी और उबाऊ काम लगता था | बेमन से कभी कभी वो इसमें साथ दे तो देती थी , लेकिन अधिकांश मौकों पर वल्लभ को एहसास भी करा देती थी की वो उसकी ख़ुशी के लिए ही ये कर रही है |
अब अगर वल्लभ की इच्छा हो तो वो क्या करे , कब तक एहसान लेता रहे रूपा का | तो हल क्या है इसका ? क्या सिर्फ पति ही सम्मान करे पत्नी की इच्छा का , पत्नी नहीं | नहीं , उसे बात करनी चाहिए रूपा से और वो भी नींद के आगोश में समां गया |

Wednesday, June 25, 2014

गलती

" तू अभी तक गयी नहीं चाय बनाने" , मम्मी चिल्ला रही थी| 
" देख नहीं रही , मैं पढ़ रही हूँ , अभी नहीं उठ सकती मैं ", शिखा ने दो टूक जवाब दिया और पढ़ाई में लगी रही| 
मम्मी का पारा अब सातवें आसमान पर था , उधर भाई भी चाय के लिए चिल्ला रहा था|
" पता नहीं पढ़ के क्या कर लेना है इसने , मैं बीमार क्या पड़ी , लड़के का ख्याल ही नहीं रखती ये लड़की ", मम्मी का बिसूरना जारी था| शिखा ने भी सब सुनते हुए भी अनसुना कर दिया और पढ़ती रही| भाई भी बिस्तर पर लेटे लेटे चुप हो गया| 
थोड़ी देर में घर पहुचने पर पत्नी की शिकायत आई, कि शिखा बात नहीं सुनती और भाई का तो बिलकुल ख्याल नहीं रखती| मैंने पूछा "शिखा , ऐसा क्यों किया तुमने", तो वो फ़ट पड़ी |
" मेरे एग्जाम हैं अगले हफ्ते और मैं पढ़ाई कर रही थी| भाई तो बेड पर लेट कर गाने सुन रहा था, पढ़ाई लिखाई से तो उसका नाता ही नहीं है| मेरे कहने से वो पढ़ता नहीं और मम्मी कभी उसको बोलती नहीं| अगर इसको वो ध्यान देना कहती है तो शायद उन्हें नहीं पता कि वो कितनी बड़ी गलती कर रही है"| 
मैं अवाक् था और उसकी मम्मी खामोश| 

फादर्स डे

अरे मिश्राजी , आज का दिन याद हैं आपको | 
क्या खास हैं आज , मुझे तो याद नहीं आ रहा , आप ही बताईये |
आज तो फादर्स डे है , आप भूल गए | 
लेकिन आपको कैसे याद रहा , इस वृद्धाश्रम में तो कोई आता भी नहीं और आपके बच्चे भी तो आये नहीं थे |
हाँ मेरे बच्चे तो नहीं आये थे लेकिन बाहर चलिए , कुछ बच्चे आये हुए हैं हम लोगों को इस दिवस की शुभकामनाएँ देने के लिए |
मिश्राजी के चेहरे पे मुस्कान आ गयी | तुरंत उठे , कुर्ता डाला शरीर पर और बाहर आ गए | बाहर हाल में कुछ बच्चे आये हुए थे , और टेबल पर फल , मिठाईयां और कुछ फूल भी रखे हुए थे | वहां के लगभग सारे बुजुर्ग हाल में इकठ्ठा थे और सबके चेहरे पर मुस्कराहट खिली हुई थी | लेकिन उस मुस्कान के पीछे छुपा हुआ दर्द भी हर कोई महसूस कर रहा था |

सरनेम

जिंदगी में कई बातें इस तरह की होती हैं , जिनको साझा कर लेने से ही उनकी चुभन कम हो जाती है , लेकिन ये बात तो आत्मा को झिंझोड़ चुकी थी | स्कूल के समय की बात थी , शायद क्लास 5 की , एक नया नया मास्टर आया था स्कूल में | पहले ही दिन जब उसने क्लास में नज़र डाली , तो उसका मन कुछ खट्टा सा हो गया |
किसी शहर से ताल्लुक रखता था वो और क्लास में जब फ़टे पुराने कपड़े पहने गंदे बच्चों को देखा तो उसका मन बहुत ख़राब हो गया | खैर जब उसने हाजिरी लेनी शुरू की और मैंने अपना पूरा नाम बताया तो वो ठिठक गया | एक बार फिर उसने पूछा और दुबारा जब मैंने अपना सरनेम बताया तो वो बड़े हिकारत से बोला "ये सरनेम तो बड़ी जात वालों का होता है , तुम्हारा कैसे "| मैं कुछ समझ नहीं पाया लेकिन उसने फिर कहा कि अपना सरनेम बदलो नहीं तो क्लास से निकाल देंगे |
खैर रोता , बिसूरता मैं घर पहुंचा और सब बात बताई | लेकिन घर में छायी चुप्पी ने हिम्मत तोड़ दी | अगले कई दिनों तक उस मास्टर के भय से स्कूल नहीं गया | फिर किसी तरह हिम्मत जुटा के स्कूल गया लेकिन अंदर से कुछ टूट चुका था | पता नहीं मास्टर को दया आ गयी थी या वो बाक़ी चीजों में इतना उलझ गया था कि उसने मुझसे पूछा नहीं | लेकिन मैं फिर अगले कई सालों तक किसी को अपना सरनेम बताने कि हिम्मत नहीं जुटा पाया |
आज वो सरनेम तो मेरे नाम के साथ जुड़ा है लेकिन कहीं कुछ चुभा हुआ है आज भी | 

परछाईयाँ

वक़्त कभी नहीं ठहरता , किसी के लिए भी नहीं , चाहे हम जो भी कर लें | अभी कुछ दिनों पहले तक ही कितना खुशनुमा माहौल था , और आज ये सन्नाटा , सचमुच वक़्त नहीं ठहरता |
एक औसत इन्सान की जिंदगी कुछ छोटी छोटी खुशियों और बड़े बड़े मुश्किलात के बीच हिचखोले खाती रहती है | जब ग़म का समय होता है तो समय ही नहीं बीतता , और खुशियों के पल तो सचमुच पल समान ही होते हैं , कब उड़ जाते हैं , पता ही नहीं चलता | वो भी एक आम इन्सान ही था , पढ़ाई पूरी होने के बाद छोटी सी नौकरी मिल गयी थी तो लगा दुनियाँ जहान की खुशियां मिल गयी हैं | फिर शादी हुई और पहले बच्चे के आने की आहट सुनाई देने लगी | बड़े खुश थे वे , तमाम कल्पनायें कर रहे थे बच्चे के बारे में , नाम क्या रखेंगे , कहाँ पढ़ाएंगे , वगैरह , वगैरह |
आखिर वो दिन भी आ गया और हस्पताल पहुंच गए वे दोनों | रात आँखों में ही बीत गयी और सुबह एक प्यारे से बच्चे का आगमन हुआ उनकी दुनियाँ में | खुशियों का पारावार नहीं रहा उस समय , लेकिन कुछ घंटो बाद भी जब बच्चा सुस्त ही पड़ा रहा तो उन्हें चिंता हुई | डॉक्टर के चेहरे की लकीरें बता रहीं थीं कि सब ठीक नहीं है | अगले कुछ दिनों तक उनको होश नहीं था और जब डॉक्टर ने बताया कि बच्चे के दिल में छेद है तो जैसे पहाड़ टूट पड़ा उनपर |
आज सारी कोशिशों के बाद भी जब वो बच्चे को नहीं बचा पाया तो बुरी तरह टूट गया था | और हस्पताल के बाहर दीवाल से पीठ टिका कर बैठे बैठे देख रहा था कि परछाईयाँ भी ग़मों कि तरह बढ़ रहीं हैं | 

Sunday, June 15, 2014

पिता

हर वो शख्श जो बच्चों के लिए जीता ,
हर वो शख्श जो उनके लिए गरल पीता ,
एक सच्चा गुरु , एक सच्चा मार्गदर्शक ,
धरती पर ख़ुदा का रूप , ऐसा होता है पिता !!
इस धरती के सारे पिताओं , और उन अकेली महिलाओं को भी जो दोनों फ़र्ज़ निभा रही हैं , को पितृ दिवस पर सादर प्रणाम एवम नमन |