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Friday, July 25, 2014

भाषण

गाड़ी रुकते ही सामने से एक छोटी बच्ची अपने पीठ पर भाई को टांगे हुए लपकी । "बाबूजी , कुछ दे दो ना , भाई को भूख लगी है" , सुनते ही एक पल को तो दया आई लेकिन फिर न जाने क्यों क्रोध आ गया । "तुम लोग भी , इतनी कम उम्र में भीख मांगने लगते हो , पता नहीं कैसे माँ बाप हैं जो पैदा करके इनको सड़क पर छोड़ देते हैं"। 
" चल बाबू , ये साहब भी भाषण ही देंगे , कुछ और नहीं दे सकते" और वो दूसरे गाड़ी की ओर बढ़ गयी ।

Monday, July 21, 2014

स्वाद

"ये क्या मम्मी , फिर आपने इस ठेले वाले से सब्ज़ी खरीद ली । कितनी बार कहा है की सामने वाले शॉपिंग माल से ले लिया करो । सब्ज़ियाँ ताज़ी भी मिलती हैं और अच्छी भी । क्या मिलता है आपको इसके पास"।
"बेटा , इसकी सब्ज़ी में अपनापन है और उसमे जो स्वाद मिलता है न वो और कहीं नहीं मिलता"। 

बूढ़ा--

रोज़ देखता था वो उस बूढ़े को , गली के कोने में एक फटी हुई दरी पर बैठे हुए । सामने एक कटोरा , झुकी हुई नज़र , कमज़ोर और ज़र्ज़र शरीर । शायद ही किसी से कुछ कहता था वो , बस बीच बीच में कटोरे को उठा कर देख लेता , किसी ने कुछ डाल दिया हो तो निकाल कर रख लेता ।
पता नहीं क्यों , लेकिन उसके दिमाग में हमेशा आता था कि पूछना चाहिए कि वो कौन है और कब से यहाँ है । आखिर एक दिन शाम को वो उस बूढ़े के पास खड़ा हो गया , उसके कटोरे में पांच का सिक्का डाला और इंतज़ार करने लगा कि वो उसकी तरफ देखे तो कुछ पूछे उससे ।
बूढ़े ने बिना सर उठाये कटोरे से सिक्का निकाला और रख लिया , ऊपर देखा तक नहीं । उसने धीरे से पूछा " बाबा , तुम कौन हो और कहाँ से आये हो यहाँ पर "। बूढ़े ने कोई जवाब नहीं दिया तो उसने फिर थोड़ी तेज़ आवाज़ में अपना सवाल दुहराया , लेकिन जवाब नहीं आया । अब उसे शक होने लगा कि कहीं ये बहरा तो नहीं है , उसने एक बार फिर से अपना सवाल चिल्लाकर किया , लेकिन कोई हरकत नहीं हुई बूढ़े में ।
अब उसे विश्वास हो गया था कि वो बहरा ही है और वो चला गया । धीरे धीरे उसकी आदत सी हो गयी , रोज़ शाम को बूढ़े को कुछ देना और थोड़ी देर इंतज़ार करना कि शायद वो उसे देखे , उससे कुछ कहे । लेकिन न तो उसने कभी कुछ कहा , न ही उसकी तरफ देखा ।
आखिरकार उसका मानव स्वभाव जागा, और वो उस बूढ़े की तरफ से उदासीन होने लगा | जब वो बूढ़ा कोई प्रतिक्रिया नहीं दे रहा तो वो ही क्यूँ उसके बारे में सोचे , उसने अब बूढ़े को नज़रअंदाज़ करना शुरू कर दिया |
एक दिन अचानक वो नज़र नहीं आया , पता चला कि उसकी मौत हो गयी ।
काश वो जान पाया होता कि वो बूढ़ा बहरा ही नहीं था बल्कि अँधा भी था । 

वहम

बात उस समय की है जब हॉस्टल में रहते थे , ग्रेजुएशन की पढ़ाई के समय | एक कमरे में दो चौकियों को मिलाकर डबल बेड बना दिया गया था और उस पर तीन लोग सोते थे | रात को सोते सोते अक्सर २ बज ही जाते थे और सुबह ९ बजे के पहले आँख का खुलना थोड़ा मुश्किल ही होता था |
खैर ऐसे ही किसी रात को आँख लगी लेकिन थोड़ी देर बाद ही लगा कि पैर के अंगूठे में किसी चीज ने काट लिया है | काफी तेज दर्द हुआ तो उठना पड़ा और देखा कि अंगूठे से खून निकल रहा था | गौर से देखने पर एक दांत का निशान भी दिखा और जो एकलौती चीज दिमाग में आई कि शायद सांप ने काट लिया | अब , नींद गायब , रात के ३ बज रहे थे और बाकि दोनों दोस्त खर्राटे भरते हुए सो रहे थे | एक बार सोचा कि उनको जगाया जाये , फिर उनकी नींद देखकर जगाने कि इच्छा नहीं हुई | लेकिन डर भी लगा हुआ था कि सांप ने काटा है तो सुबह तक जाने क्या हो | फिर सोचा कि सो जाते हैं , अगर नींद खुल गयी सुबह तो ठीक , नहीं तो कोई बात ही नहीं | इसी उधेड़बुन में करीब एक घंटा बीत गया और नींद ने अपने आगोश में ले ही लिया |
सुबह आँख खुली , अपने को ठीक पाया , अंगूठे में दर्द तो था लेकिन काफी कम | फिर अचानक दिमाग में आया कि सांप कैसे हॉस्टल के थर्ड फ्लोर के कमरे में आ सकता है , शायद किसी छछूंदर ने काटा होगा , और फिर अपने ख्याल पर तरस आया कि ये छोटी सी बात रात में दिमाग में क्यों नहीं आई |

Friday, July 11, 2014

अंतिम संस्कार--

" मेरे पास समय बहुत कम है , डाक्टर ने बता दिया है कि कैंसर अपने आखिरी स्टेज में है , प्लीज बेटे को बुला लो अब" | पापा की दर्द भरी आवाज सुनकर वो अपने आप को रोक नहीं सकी , आँसू बेशाख्ता आँखों से बह निकले | माँ तो जैसे जड़ हो गयी थी , सिर्फ सूनी सूनी आँखों से कभी पापा को , तो कभी उसे देखती रहती |
कैसे बताये उनको , कल ही तो उसने फोन किया था भाई को | पूरी बात सुनने से पहले ही बोल पड़ा " मैं बार बार नहीं आ सकता वहां , अभी १५ दिन पहले ही तो आया हूँ | इतनी छुट्टी नहीं मिल सकती मुझे , और हाँ पैसों की जरुरत हो तो मुझे बता देना , भेज दूंगा"|
रात बीती , सुबह हुई | पापा नहीं रहे | हस्पताल के सभी बिल चुकाने के बाद , पापा का पार्थिव शरीर एम्बुलेंस से घर ले आई | और भाई को उसने मैसेज कर दिया " तुम्हारे भेजे हुए पैसों से हस्पताल के बिल चुकाने के बाद करीब छः हज़ार बच गए थे , तुम्हारे अकॉउंट में डलवा दूंगी | और हाँ , अंतिम संस्कार तो मैं करवा दूंगी , अगर छुट्टी मिल जाये तो ब्राह्मणों को भोजन कराने तेरहवीं में आ जाना"|  
तलाश -- पूनमजी की कहानी का अगला पार्ट--
दीपिका अपराधबोध से भर गयी थी , जिस सौरभ को उसने क्या , क्या नहीं कहा था , उसी ने आड़े वक़्त में निस्वार्थ भाव से उसकी मदद की थी | लेकिन अब वो उसका फोन ही नहीं उठा रहा था , कैसे माफ़ी मांगे अपने दुर्व्यवहार की , कैसे उस बोझ को उतारे अपने सर से | कुछ समझ नहीं आ रहा था उसे |
अचानक उसके चेहरे पर मुस्कान आ गयी | आखिर ये टेक्नोलॉजी कब काम आएगी उसने सोचा और उसने फेसबुक पर एक नए नाम से अपना प्रोफाइल बनाया और फ्रेंड रिक्वेस्ट भेज दिया सौरभ को | कुछ देर बाद नोटिफिकेशन आया " फ्रेंड रिक्वेस्ट एक्सेप्टेड"| अब लाइक , कमेंट्स का सिलसिला चल पड़ा , धीरे धीरे चैटिंग बढ़ने लगी और दीपिका अपने बारे में उसे सब कुछ बताने लगी | कहीं ये दीपिका तो नहीं , सौरभ एक पल को चौंका , लेकिन नाम , पता , उम्र सब अलग थे तो उसने इसे एक कोइन्सिडेंस समझा |
फिर वो घड़ी भी आ गयी जब सौरभ ने मिलने की बात की | दीपिका को तो इसी मौके का इंतज़ार था , अगले दिन शाम को कैफ़े कॉफ़ी डे में मिलना तंय हुआ | सौरभ बहुत एक्ससाईटेड था तो दीपिका भी नर्वस कि पता नहीं वो कैसे रियेक्ट करे |

Thursday, July 10, 2014

अपने

" क्या बात है वर्माजी , बड़े खुश नज़र आ रहे हैं आप , कोई लाटरी तो नहीं लग गयी इस उम्र में" | "
नहीं भाई , दरअसल अख़बार में खबर थी कि एक वृद्धाश्रम बन रहा है अपने शहर में , अब कम से कम बाक़ी जिंदगी तो अपनों में गुजरेगी "|