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Monday, July 21, 2014

बूढ़ा--

रोज़ देखता था वो उस बूढ़े को , गली के कोने में एक फटी हुई दरी पर बैठे हुए । सामने एक कटोरा , झुकी हुई नज़र , कमज़ोर और ज़र्ज़र शरीर । शायद ही किसी से कुछ कहता था वो , बस बीच बीच में कटोरे को उठा कर देख लेता , किसी ने कुछ डाल दिया हो तो निकाल कर रख लेता ।
पता नहीं क्यों , लेकिन उसके दिमाग में हमेशा आता था कि पूछना चाहिए कि वो कौन है और कब से यहाँ है । आखिर एक दिन शाम को वो उस बूढ़े के पास खड़ा हो गया , उसके कटोरे में पांच का सिक्का डाला और इंतज़ार करने लगा कि वो उसकी तरफ देखे तो कुछ पूछे उससे ।
बूढ़े ने बिना सर उठाये कटोरे से सिक्का निकाला और रख लिया , ऊपर देखा तक नहीं । उसने धीरे से पूछा " बाबा , तुम कौन हो और कहाँ से आये हो यहाँ पर "। बूढ़े ने कोई जवाब नहीं दिया तो उसने फिर थोड़ी तेज़ आवाज़ में अपना सवाल दुहराया , लेकिन जवाब नहीं आया । अब उसे शक होने लगा कि कहीं ये बहरा तो नहीं है , उसने एक बार फिर से अपना सवाल चिल्लाकर किया , लेकिन कोई हरकत नहीं हुई बूढ़े में ।
अब उसे विश्वास हो गया था कि वो बहरा ही है और वो चला गया । धीरे धीरे उसकी आदत सी हो गयी , रोज़ शाम को बूढ़े को कुछ देना और थोड़ी देर इंतज़ार करना कि शायद वो उसे देखे , उससे कुछ कहे । लेकिन न तो उसने कभी कुछ कहा , न ही उसकी तरफ देखा ।
आखिरकार उसका मानव स्वभाव जागा, और वो उस बूढ़े की तरफ से उदासीन होने लगा | जब वो बूढ़ा कोई प्रतिक्रिया नहीं दे रहा तो वो ही क्यूँ उसके बारे में सोचे , उसने अब बूढ़े को नज़रअंदाज़ करना शुरू कर दिया |
एक दिन अचानक वो नज़र नहीं आया , पता चला कि उसकी मौत हो गयी ।
काश वो जान पाया होता कि वो बूढ़ा बहरा ही नहीं था बल्कि अँधा भी था । 

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