Translate

Sunday, May 31, 2015

अर्थ --

एकदम उसके ज़बान पर चढ़ गया था ये शब्द " काना  ", हंसी मज़ाक में किसी को भी बोल देता था वो ।
आज भी वही हुआ जब बचपन का एक मित्र आया और उसके साथ मज़ाक चल रहा था । अचानक किसी बात पर उसने बोल दिया " क्या यार काने हो क्या , इतना भी नहीं दिखता "।
और फिर वो एकदम से खामोश हो गया , दरअसल उसका बचपन का दोस्त वास्तव में काना था । उसे उस शब्द की पीड़ा का एहसास हो गया था ।

Friday, May 29, 2015

पहचान--

अचानक उसके कान में सहकर्मी राज की आवाज़ पड़ी " यार देखो , आज लूले को बहुत जल्दी है "।
बचपन में पोलियो का शिकार हो गया था वो पर ऑफिस के काम में किसी से भी कमतर नहीं था । अपने काम से अपना वज़ूद बनाने की ज़द्दोज़हद और ऐसे सम्बोधन । कभी कभी टूट जाता था वो , लेकिन साथ ही साथ एक नया हौसला भी भर उठता उसमे ।
आज अपने कार्यालय के सर्वश्रेष्ठ कर्मचारी का पुरस्कार लेते समय उसने जब राज को स्टेज पर से देखा , तो राज खुद को लूला महसूस कर रहा था । अब उसकी पहचान पुख़्ता हो चुकी थी ।

Wednesday, May 27, 2015

नासूर--

" तुमको बुरा नहीं लगता इसमें , बिना अपनी मर्ज़ी के ये सब ", उसने पूछ लिया |
" हाँ , बहुत तक़लीफ़ हुई थी मुझे , जब अस्मत लुटी थी मेरी | और उससे भी ज्यादा तक़लीफ़ तब हुई थी , जब घर वालों ने भी दरवाज़ा बंद कर दिया था "|
उसने अपना चेहरा घुमा लिया , पुराना ज़ख्म फिर उभर आया था |

Monday, May 25, 2015

पहल--

" फिर उठा लाये ये बासी फ़ल , कितनी बार कहा है कि अच्छी दुकान से ही लाया करो , सुनते क्यों नहीं आप "।
पत्नी की बातों से उसे कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता था। वो ठेले वाली बूढी औरत की संतुष्टि भरी मुस्कान के आगे इन सब बातों को कोई तवज़्ज़ो नहीं देता था।
दरअसल उसकी पत्नी को पता भी नहीं था कि उसकी माँ ने भी उसे इसी तरह ठेला लगाकर पढ़ाया था । वो तो उसकी नौकरी लगने के पहले ही चल बसी थी, पर अब वो किसी और बेटे का भविष्य सँवारने की पहल कर रहा था।

Sunday, May 24, 2015

बदलती गंध--

भागते हुए किसी तरह सबको चढ़ाकर वो ट्रेन में घुसे और अपनी फूली हुई साँसों को क़ाबू में करने की चेष्टा करने लगे पत्नी और बच्चे उस भीड़ में घुस गए थे और बैठने की जगह तलाश रहे थे कहने को तो ये स्लीपर डब्बा था लेकिन पैर रखने की भी जगह नहीं थी| गर्मी के दिन , छुटियों का समय , आरक्षण मिलना लगभग नामुमकिन था इसलिए आज ऐसी यात्रा करनी पड़ रही थी उनको|
थोड़ी देर में सांसें सामान्य हुईं तो अजीब सी दुर्गन्ध महसूस होने लगी , लोगों के पसीने और सांसों की गंध। अब उनको बेचैनी महसूस होने लगी लेकिन कोई रास्ता नज़र नहीं आ रहा था। फिर ध्यान आया कि परिवार को जगह मिली की नहीं, और थोड़ा अंदर घुसे। पत्नी और बच्चे किसी तरह सीट से टिक कर खड़े थे और उनको देखकर मुस्कुराने की कोशिश करने लगे। पर उनके चेहरे उनकी परेशानियों की चुगली कर रहे थे। बहुत प्रयत्न किया उन्होंने कि लोगों से कुछ फ़ासला रहे और उस गंध से राहत , लेकिन उस भीड़ में ये संभव नहीं था।
अचानक उनके कंधे पर कुछ गीलापन महसूस हुआ , हाथ लगाया तो सचमुच कन्धा गीला था। उन्होंने ऊपर नज़र दौड़ाई तो छोटे बच्चे ऊपर वाली सीट से लघुशंका कर रहे थे। उनकी माँ दूसरे किनारे बैठी हुई इन चीजों से बेखबर नींद में डूबी थी। वो एकदम से चिल्ला उठा और लोगों की नज़र उसकी तरफ घूम गयी। अब लोग उसपर हँसने लगे थे तो उसका गुस्सा भी काफूर हो गया और वो अपना कन्धा झाड़ कर वापस डिब्बे का मुआयना करने लगे। चारो तरफ लोग भेड़ बकरियों की तरह ठुँसे पड़े थे लेकिन आश्चर्यजनक रूप से बेफिक्र थे। किसी को कोई फ़र्क़ नहीं पड़ रहा था कि किसका जूता किसके शरीर से रगड़ खा रहा था और किसी के खैनी ठोंकने से बाकियों को क्या दिक्कत हो रही थी। एक नज़र उसने अपने कपड़ों पर भी डाली और फिर उसकी हिम्मत दुबारा उनको देखने की नहीं पड़ी , बिलकुल डिब्बे के लोगों की वेशभूषा से मेल खा रहे थे।
कुछ समय बीत चुका था ट्रेन चलते और अभी ६ घंटे का सफर बाक़ी था। वो सोच में डूबे थे कि कैसे कटेगा सफर पत्नी और बच्चों का इस हालत में तभी सीट पर बैठे कुछ लोगों ने उठ कर उनके परिवार को बैठने की जगह दे दी। अब वो लोग उनसे सट कर खड़े थे, उसी तरह पसीने की गंध से लिपटे हुए। उनकी साँसों से भी अजीब सी गंध आ रही थी लेकिन अब वो गंध उनको खटक नहीं रही थी।

पत्नी और बच्चे अब सीट पर बैठे हुए थे, ट्रेन अपनी रफ़्तार में चल रही थी, और वो भी अपने सहयात्री के ऊपर टिक कर खड़े खड़े झपकी ले रहे थे। धीरे धीरे सब कुछ सामान्य हो चला था और वो इस भीड़ का एक हिस्सा बन गए थे|

खोट--

" ज़रा इसको सिल कर बढ़िया पॉलिश कर देना "।
उसने सर हिला कर जूता ले लिया और साहब ने बड़े अनमने मन से वहाँ रखी टूटी चप्पल पैर में डाल ली ।
" लीजिये साहब , जूता ठीक हो गया ", पर उन्होंने जैसे ही पैर निकाला , मोज़ा चप्पल में लगी कील में फंस गया।
" कैसी चप्पल रखते हो तुम लोग ", नाराज़गी दिखाते हुए उन्होंने उसके बताये पैसों का आधा दिया और चल दिए।
वो अपनी टूटी चप्पल की कील दुरुस्त करते हुए सोच रहा था कि छेद मोज़े में हुआ था या नीयत में।
   

Saturday, May 23, 2015

अँधेरा घना था तुम्हारे शहर में
चिराग़े वफ़ा मैं जला चाहता हूँ ,

जो कहते थे हर दम हमें ढूँढ लेंगे
उन्हीं की नज़र से गिला चाहता हूँ ,

न जाने कहाँ से , खबर ये उड़ी थी
मैं काफ़िर हूँ पर बस भला चाहता हूँ ,

बहुत याद आओगे महफ़िल में सबको
वो महफ़िल में हो बस गिला चाहता हूँ !!