भागते हुए किसी
तरह सबको चढ़ाकर वो ट्रेन में घुसे और अपनी फूली हुई साँसों को क़ाबू में करने की
चेष्टा करने लगे पत्नी और बच्चे उस भीड़ में घुस गए थे और बैठने की जगह तलाश रहे थे
कहने को तो ये स्लीपर डब्बा था लेकिन पैर रखने की भी जगह नहीं थी| गर्मी के दिन , छुटियों का समय , आरक्षण मिलना लगभग नामुमकिन था इसलिए आज ऐसी यात्रा करनी पड़ रही थी उनको|
थोड़ी देर में
सांसें सामान्य हुईं तो अजीब सी दुर्गन्ध महसूस होने लगी , लोगों के पसीने और सांसों की गंध। अब उनको बेचैनी महसूस
होने लगी लेकिन कोई रास्ता नज़र नहीं आ रहा था। फिर ध्यान आया कि परिवार को जगह
मिली की नहीं, और थोड़ा अंदर
घुसे। पत्नी और बच्चे किसी तरह सीट से टिक कर खड़े थे और उनको देखकर मुस्कुराने की
कोशिश करने लगे। पर उनके चेहरे उनकी परेशानियों की चुगली कर रहे थे। बहुत प्रयत्न
किया उन्होंने कि लोगों से कुछ फ़ासला रहे और उस गंध से राहत , लेकिन उस भीड़ में ये संभव नहीं था।
अचानक उनके कंधे
पर कुछ गीलापन महसूस हुआ , हाथ लगाया तो
सचमुच कन्धा गीला था। उन्होंने ऊपर नज़र दौड़ाई तो छोटे बच्चे ऊपर वाली सीट से
लघुशंका कर रहे थे। उनकी माँ दूसरे किनारे बैठी हुई इन चीजों से बेखबर नींद में डूबी
थी। वो एकदम से चिल्ला उठा और लोगों की नज़र उसकी तरफ घूम गयी। अब लोग उसपर हँसने
लगे थे तो उसका गुस्सा भी काफूर हो गया और वो अपना कन्धा झाड़ कर वापस डिब्बे का
मुआयना करने लगे। चारो तरफ लोग भेड़ बकरियों की तरह ठुँसे पड़े थे लेकिन आश्चर्यजनक
रूप से बेफिक्र थे। किसी को कोई फ़र्क़ नहीं पड़ रहा था कि किसका जूता किसके शरीर से
रगड़ खा रहा था और किसी के खैनी ठोंकने से बाकियों को क्या दिक्कत हो रही थी। एक
नज़र उसने अपने कपड़ों पर भी डाली और फिर उसकी हिम्मत दुबारा उनको देखने की नहीं पड़ी
, बिलकुल डिब्बे के लोगों
की वेशभूषा से मेल खा रहे थे।
कुछ समय बीत चुका
था ट्रेन चलते और अभी ६ घंटे का सफर बाक़ी था। वो सोच में डूबे थे कि कैसे कटेगा
सफर पत्नी और बच्चों का इस हालत में तभी सीट पर बैठे कुछ लोगों ने उठ कर उनके
परिवार को बैठने की जगह दे दी। अब वो लोग उनसे सट कर खड़े थे, उसी तरह पसीने की गंध से लिपटे हुए। उनकी
साँसों से भी अजीब सी गंध आ रही थी लेकिन अब वो गंध उनको खटक नहीं रही थी।
पत्नी और बच्चे
अब सीट पर बैठे हुए थे, ट्रेन अपनी
रफ़्तार में चल रही थी, और वो भी अपने
सहयात्री के ऊपर टिक कर खड़े खड़े झपकी ले रहे थे। धीरे धीरे सब कुछ सामान्य हो चला
था और वो इस भीड़ का एक हिस्सा बन गए थे|
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