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Tuesday, October 9, 2018

मुर्दा परम्पराएँ- कहानी

अब जोखू की आँख के आँसू सूख गए थे, आख़िर कितनी देर बहते। आँगन में पिताजी का शव एक तरफ़ सफ़ेद चादर से ढंककर रखा था और उसके चारो तरफ़ जल रही अगरबत्तियों की तेज़ गंध चारो तरफ़ फैली हुई थी। अभी दो दिन पहले ही तो पड़ोस के गाँव के डॉक्टर देखकर गए थे और उन्होंने कुछ दवाएँ दी थीं। अब डॉक्टर भी थे तो झोलाछाप ही लेकिन उनके दवा से फ़ायदा हो जाता था। ऐसे में शहर जाकर और बहुत ज़्यादा पैसा लगाकर मरीज़ को दिखाने की हिम्मत बहुत कम लोग ही कर पाते थे। जोखू को भी यही लगा कि मौसम बदला है और उसीका असर है, एकाध दिन में ठीक हो जाएगा। वह घर का इकलौता लड़का था, पिताजी के सब भाई अलग-अलग रहते थे और उनको किसी से कुछ ख़ास लेना देना नहीं था। परिवार में एक बुआ थी और एक बहन भी जो अपने-अपने घरों में कमोबेश उसी अवस्था में थीं। छोटी-सी खेती थी जिसे न छोड़ते बनता था और न वह सबका पेट ही भर पाती थी। एक किसान जिस चक्रव्यूह में फँसा अपना पूरा जीवन बिता देता है, वह भी उसी चक्रव्यूह में अटका था। ऐसे में पिता के रहने से वह बहुत सी चिंताओं से मुक्त रहता था लेकिन उनकी अचानक हुई मौत से वह टूट गया। आर्थिक स्थिति तो बदतर थी ही, पहले माँ और अब पिताजी भी, वह एकदम से बड़ा हो गया।
"जोखू, तुम चिंता मत करना, सारा किरिया करम मैं सँभाल लूँगा, तुम हिम्मत रखो", चाचा ने आकर उसके कंधे पर हाथ रखा तो उसकी रुकी हुई रुलाई फिर से फूट पड़ी। चाचा ने भी उसे थोड़ी देर रो लेने दिया, उनको अनुभव था कि कुछ देर में वह सामान्य हो जाएगा।
धीरे-धीरे पूरे गाँव में ख़बर हो गई थी और सब रिश्तेदारों को भी फोन कर दिया गया। चाचा घर पर अंतिम क्रिया की तैयारियों में लग गए। पंडित को बुलाया गया और बाँस की सीढ़ी बनवाने के लिए एक आदमी गाँव के बाहर बँसवारी की तरफ़ निकल गया। चूँकि शाम का समय हो गया तो सबने राय दी कि दाह-संस्कार के लिए कल ले जाना ही ठीक रहेगा, वैसे भी सूर्यास्त के बाद दाह-संस्कार नहीं किया जाता है।
"अब रात होने को आ रही है इसलिए लाश को कल ही घाट पर ले जाएँगे, सुबह तक कुछ रिश्तेदार भी आ जाएँगे। बाक़ी इंतज़ाम मैं देखता हूँ, तुम घर में सबको देखो", चाचा ने उसको समझाया।
उसे भी यही उचित लगा क्योंकि रात में और रिश्तेदार भी आ ही जाएँगे। अब पिताजी की तबीयत ज़्यादा ख़राब रही होती या कुछ दिन से लगातार बीमार रहे होते तो शायद बहुत से रिश्तेदार पहले ही देखने आए होते। लेकिन एकदम से चले गए तो आख़िरी वक़्त में कोई देख भी नहीं पाया।
उसकी रात आँखों-आँखों में ही कटी, ऐसे में नींद भी भला कैसे आती और सुबह के पाँच बजते बजते बुआ और बहन भी आ गईं। उनके आते ही एक बार फिर से रोना पीटना शुरू हो गया। एक अजीब-सी परंपरा है कि गाँव में चाहे शादी ब्याह हो या मरनी करनी, महिलाएँ उस संदर्भ में कुछ गीत गाकर ही अपना सुख या दुख प्रकट करती हैं। यह सिलसिला पीढ़ी दर पीढ़ी अनवरत चालू है और ये गीत कब पिछली पीढ़ी की औरतें नई पीढ़ी को दे देती हैं, पुरुषों को तो पता भी नहीं चलता है। काफ़ी देर तक तमाम ऐसे गीत रोते हुए गाकर बुआ और बहन पिताजी को याद करती रहीं। उसकी पत्नी, अड़ोस-पड़ोस की औरतें भी रोने की आवाज़ सुनकर साथ देने और ढाढस बढ़ाने आ गईं। चाचा भी आ गए और उन्होंने लगभग डाँटते हुए कहा "अब बस भी करो सब लोग, कितना रोना-धोना करोगे। जोखू अब हम लोग चलने की तैयारी करते हैं"।
कुछ देर में ही पूरब से सूरज देवता निकले, आज उस जगह सब थे, बस पिताजी नहीं थे उनको देखने के लिए। उसे याद आया, शायद ही कोई दिन ऐसा बीता हो जब वह सूर्योदय से पहले नहीं जगा हो। पिताजी इन बातों में नियम क़ानून के बहुत पक्के थे और उनका स्पष्ट मानना था कि जिस घर में लोग सूर्योदय के बाद उठते हैं, लक्ष्मी उस घर से रूठ जाती हैं। ये अलग बात थी कि उसके आज तक रोज़ सुबह उठने के बाद भी लक्ष्मी क्यों रूठी हुई थीं, उसे कभी पता नहीं चला। पिछली बार खेत का एक टुकड़ा माँ के गुज़रने पर बिक गया था और अब पिताजी उसका अफ़सोस लिए ही परलोक सिधार गए।
"जोखू, ज़रा किसी को परधान के दरवाज़े भेजो ट्रैक्टर भेजने के लिए, समय से निकल चलेंगे तो सब जल्दी निपट जाएगा", चाचा ने फिर आवाज़ लगाई तो जोखू ने रग्घू को प्रधान के घर भेज दिया।
अगल-बगल से लोग जुटने शुरू हो गए और शव को जल्दी से घाट ले चलने की आवाज़ हर तरफ़ से आने लगी। गाँव के प्रधान के घर से ट्रैक्टर ट्रॉली के साथ दरवाज़े पर आ गया। शव को ट्रैक्टर पर रखा गया और उसके साथ ही एक बार फिर से रोना-धोना शुरू हो गया। गाँव के कुछ लोग ट्रैक्टर पर उसके साथ बैठ गए। बाक़ी लोग अपनी मोटरसाइकिल और साइकिल से ट्रैक्टर के साथ-साथ चल पड़े। हर गाँव की तरह उसके गाँव के लोगों का अंतिम संस्कार भी एक पूर्व निश्चित घाट पर ही होता था। गंगा नदी के किनारे स्थित वह घाट गाँव से क़रीब २० किमी दूर था।
पहले के ज़माने में तो लोग पैदल ही शव को कंधे पर उठाए घाट पहुँच जाते थे और उसे भी कई शवयात्राएँ याद थीं जिसमें वह भी पैदल ही घाट तक गया था। गाँव के कुछ मज़बूत लोग अधिकांश समय शव को अपने कंधे पर ही लेकर जाते थे। लेकिन अब तो साधन उपलब्ध थे इसलिए घाट पर पहुँचने में आसानी हो जाती थी। गाँव से निकलने के बाद धीरे-धीरे लोग शवयात्रा में जुड़ते गए और कुछ रिश्तेदार तो सीधे घाट पर ही पहुँच गए थे। लगभग ११ बजे ट्रैक्टर और बाक़ी वाहन घाट पर पहुँचे और लोग शव को उतारकर गंगाजी में स्नान के लिए ले जाने लगे। समय के साथ-साथ सरकार ने विद्युत् शवदाहगृह भी बनवा दिया है लेकिन लोगों के दिमाग़ में उसका ख़याल ही नहीं आता था। समाज के दबाव और पंडितों के समझाने के चलते लोग अक्सर विद्युत् शवदाहगृह का उपयोग नहीं करते और दिन में एकाध बार ही वह इस्तेमाल होता था। ऐसी तमाम पुरानी परम्पराएँ भला इतनी आसानी से कहाँ छूटती हैं, चाहे अब उन्होंने बदलते समय के साथ अपना अर्थ ही खो दिया हो। कितनी लकड़ियाँ बच सकती हैं विद्युत शवदाहगृह के इस्तेमाल से लेकिन इस दिशा में सोचने वाले आज भी कम ही हैं। घाट पर एक किनारे एक बोर्ड भी लगा हुआ था कि मृत्यु का पंजीकरण कराना अनिवार्य है लेकिन वह बोर्ड भी अपने अस्तित्त्व के लिए संघर्ष कर रहा था।
उनके घाट पर पहुँचते ही कुछ पंडो ने आख़िरी क्रियाकर्म के लिए घेरा। दरअसल दूरदराज़ से आए लोग अपने साथ पंडित नहीं लाते थे जिसके चलते घाट के पण्डे ही सब काम कराते थे। लेकिन गाँव के बुज़ुर्गों ने उन्हें समझा दिया कि गाँव के पण्डे आए हैं सब करने के लिए। चार लोगों ने शव को गंगाजी में डुबकी लगाकर किनारे रख दिया और इस बीच उसके चाचा लकड़ियों के इंतज़ाम के लिए चल दिए। जैसे ही चाचा लकड़ी की टाल की ओर बढ़े, कई दुकानदारों ने उनको घेर लिया। लकड़ियों के बारे में वे इस तरह से बता रहे थे जैसे वह जलाने के लिए नहीं बल्कि किसी की शादी में बेड बनाने के लिए उपयोग की जाने वाली हो। ख़ैर एक लकड़ी वाले से बात तंय हुई और उसने शव के वज़न के हिसाब से कितनी लकड़ी लगेगी बताया। गाँव के कुछ बुज़ुर्ग, जिनको इन सब का पुराना अनुभव था, उन्होंने थोड़ा कम करवाया और फिर कुछ लोगों ने लकड़ियों को तौलवाना शुरू किया। अधिकांश लकड़ियाँ या तो गीली थीं या हरी, बड़ी मुश्किल से कुछ सूखी लकड़ियाँ मिलीं। साथ ही साथ चन्दन की लकड़ी के कुछ टुकड़े भी ले लिए गए। एक बोर्ड वहाँ पर भी लगा हुआ था जिसपर लकड़ी का मूल्य अंकित था लेकिन वह भी अपना मूल्य खो चुका था। शवदाह से सम्बंधित बाक़ी सब सामान भी ले-लिया गया और घाट पर मौजूद नाई ने जोखू के सर के बाल मूड़ दिए। शव को जलाने के लिए आग लेने उनको डोमराज के पास ही जाना था और वह चाचा के साथ चल पड़ा। आग देने के लिए भी डोमराज ने बड़ा-सा मुँह खोला, पहले ५००० की माँग की फिर किसी तरह उनको ५०० में तैयार किया गया।
शव को चिता पर लिटाकर उसको लकड़ियों से ढँक दिया गया। चिता की लकड़ियों को इस तरह से जलाना कि शव पूरी तरह से जल जाए, यह भी एक कला है जिसके कुछ जानकार हर गाँव में होते हैं। उसने जैसे ही चिता में आग लगाई, गाँव के दो लोग आगे आए और उन्होंने चिता जलाने की ज़िम्मेदारी बख़ूबी सँभाल ली। लकड़ियों को ऊपर-नीचे करके और बीच-बीच में जलते हुए शव को भी उलट-पलट कर उन लोगों ने अपना काम पूरी तसल्ली से पूरा किया। इस बीच बाक़ी सब लोग जगह-जगह बैठकर आपसी चर्चा में मसगूल थे, उसको छोड़कर शायद ही किसी के चेहरे पर दुख की कोई परछाई नज़र आ रही थी।
अगले तीन घंटे में दाह-संस्कार निपट गया, डोम ने चिता में से बची हुई अस्थियाँ निकालकर दे दीं और उनको उसने गंगाजी में प्रवाहित कर दिया। उसके बाद उसने नदी के पानी में दो-चार बार डुबकी लगाई। फिर घाट पर उपस्थित सभी लोगों ने एक-एक बार नदी के मटमैले पानी में डुबकी लगाई और फिर सब वापस चलने की तैयारी करने लगे।
"चलो सब निपट गया जोखू, अब कुछ नास्ता पानी करा दिया जाए सबको", चाचा ने अपना गमछा कंधे पर डालते हुआ आवाज़ लगाई। जोखू भारी मन से घाट से उठा, पिताजी की अब कोई निशानी वहाँ शेष नहीं थी। अपने आँखों के किनारे आए आँसुओं को उसने पोंछा और गाँव के लोगों की तरफ़ बढ़ गया।
एक परंपरा यह भी सदियों से चली आ रही थी कि शवदाह के बाद जितने लोग घाट पर रहते हैं उनको जलपान कराना पड़ता है। अब कोई बहुत बुज़ुर्ग चल बसा हो तो फिर भी बहुत अटपटा नहीं लगता लेकिन जब किसी के घर कोई जवान या बच्चा गुज़र जाता है तो ऐसे में यह जलपान कई लोगों को बेहद ख़राब लगता था। लेकिन जब भी किसी ने इसका विरोध करने की कोशिश की, लोगों ने उन्हें अपनी परंपरा के नाम पर चुप करा दिया। एक व्यक्ति को तो लोगों ने यह तक कह दिया कि चूँकि उसके घर के एक बुज़ुर्ग बहुत बीमार हैं इसलिए वह ऐसी बातें कर रहा है। इसके चलते अब बहुत कम लोग ही इसका सबके सामने विरोध करते हैं, हाँ जिन्हें जलपान करना नहीं अच्छा लगता वह घाट से चुपचाप चले जाते हैं।
एक किनारे गाँव के बुज़ुर्ग चाचा के साथ बहस में लगे हुए थे कि किस मिठाई की दुकान पर जलपान किया जाएगा। बात बड़ी-बड़ी दुकानों से होते हुए रास्ते में पड़ने वाली एक दुकान पर तंय हुई और सबको बता दिया गया कि वहाँ पहुँच जाएँ। अपनी-अपनी गाड़ियों से थोड़ी देर में सब वहाँ इकट्ठा हुए। कुछ देर तक कौन सी मिठाई होगी और समोसा कितने होंगे इसपर बहस चलती रही। दुकानदार भी स्थिति समझकर अपनी राय दे रहा था और थोड़े समय में नाश्ते का मेनू फ़ाइनल हुआ। फिर तो सबने कुछ इस अंदाज़ में जमकर नाश्ता किया, गोया किसी के तिलक में आए हों। दो के बदले चार मिठाई खाना, समोसा भी दो-तीन खा लेना वह भी ऐसी परिस्थिति में, लोग पता नहीं कैसे कर पाते हैं यह सब। ऊपर से कुछ लोग तो घर के लिए भी यह कहते हुए मिठाई समोसे बंधवा लिए कि आज तो घर में कुछ बनेगा नहीं तो यहीं से ले जाते हैं। शायद अगर वह अपना घुटा सर लेकर वहाँ नहीं होता तो दुकान में मौजूद अन्य लोग अन्दाज़ा भी नहीं लगा पाते कि ये लोग शवदाह करके नाश्ता कर रहे हैं। भर-पेट नाश्ता करके सब लोग अपने-अपने वाहन से निकल पड़े, वह भी चाचा के साथ ट्रैक्टर पर गाँव चल पड़ा। घर में मौजूद लोगों के लिए भी चाचा ने नाश्ता ले-लिया गया था, क्योंकि फ़िलहाल तो घर पर चूल्हा नहीं जलना था।
घर पहुँचकर कुछ देर में सब लोग अपने-अपने घर की तरफ़ निकल गए और जोखू अपने घुटे सर और शरीर पर लपेटी धोती के साथ एक चौकी पर बैठ गया। जिस व्यक्ति ने आग दी होती है उसे खटिया पर नहीं बैठना होता है, इसीलिए पहले से ही उसकी चौकी बाहर लग गई थी। थोड़ी देर बाद चाचा ने उसको सारे ख़र्च का ब्यौरा दिया तो वह धम्म से सर पकड़कर बैठ गया। सिर्फ़ शवदाह और जलपान में जितने रुपये ख़र्च हुए थे, उतने का इंतज़ाम भी उसके लिए तत्काल संभव नहीं था। अभी तो अगले तेरह दिन तमाम कर्मकांड होने थे और उसके बाद ब्राह्मणभोज जिसमें पूरे गाँव को और रिश्तेदारों को भी खिलाना था। उसे लगने लगा जैसे उसके बचे हुए थोड़े-से खेत भी पिताजी के साथ गुज़र गए हैं और वह बिल्कुल बेआसरा हो गया है।

Saturday, October 6, 2018

रिश्तों की चिता-- लघुकथा

चिता पर चाचाजी का शरीर लकड़ियों से ढंका हुआ पड़ा था और उसको आग लगाने की तैयारी चल रही थी. चाचाजी उम्र पूरा करके गुजरे थे इसलिए घर में बहुत दुःख का माहौल नहीं था लेकिन उनकी सेहत के हिसाब से अभी कुछ और साल वह सामान्य तरीके से जी सकते थे.  अभी भी सारा परिवार एक में था इसलिए पूरा घर वहां मौजूद था. चचेरे भाई ने चिता जलाने के लिए जलती फूस को हाथ में लिया और चिता के चारो तरफ चक्कर लगाने लगा.
कुछ ही पल में चिता ने आग पकड़ ली और वह एक किनारे से एकटक जलती चिता को देखता रहा. चाचाजी से पिछले कई सालों से उसकी बातचीत बंद थी और उनके जिद्दी स्वभाव के चलते आपस में रिश्ता सुधरने की कोई गुन्जाईस भी नहीं थी. घर के लोगों के साथ साथ उसने भी शुरू के सालों में उनके साथ सम्बन्ध सुधारने की कोशिश की लेकिन हर बार बात और खराब होती गयी. सब लोग उसे समझाते कि चाचाजी का स्वभाव ही ऐसा है, उनकी सोच के उलट कुछ भी करने की मत सोचो. लेकिन उसे आत्मसम्मान को लगी ठेस ने उसे उनसे बहुत दूर कर दिया.
आग पूरा जोर पकड़ चुकी थी और अब चाचाजी का जलता शरीर उसे दिखाई दे रहा था. उसके मन में भी चाचाजी को लेकर जो विरोध था, उसपर धीरे धीरे मंथन चल रहा था. अचानक चटाक की आवाज आयी, उसने देखा आग से कोई हड्डी चटक कर टूट गयी. एकदम से उसकी आंख में पानी आ गया, उसके मन में जमी हुई बर्फ भी चटक गयी. धीरे से उसने जलती हुई चिता की तरफ अपने हाथ जोड़े और वापस घरवालों की तरफ चल दिया.

Wednesday, October 3, 2018

अपराधबोध-लघुकथा

ट्रैफिक सिग्नल की बत्ती लाल हो गयी थी तो उसने ब्रेक लगाया और बाहर देखने लगा. जाने और आने वालों की दो दो लेन थी और हर आदमी ने अपनी गाड़ी थोड़े थोड़े फासले पर खड़ा कर रखी थी. जोहानसबर्ग की यह बात उसे बेहद पसंद थी कि अमूमन हर व्यक्ति कानून का पूरी तरह से पालन करता था और शायद ही कभी लाल बत्ती पर सड़क पार करता था. हॉर्न बजाना तो बेहद असभ्यता की बात मानी जाती थी और किसी की गलती को जताने के लिए ही लोग हॉर्न बजाते थे.
रोज की तरह ही वह अफ़्रीकी नवयुवक, जिसे वह शक्ल से पहचानता था, लेकिन कभी उसने उसका नाम भी नहीं पूछा था, आकर चुपचाप उसके बगल में खड़ा हो गया. अक्सर उसकी गाड़ी इस सिग्नल पर रूकती और वह नवयुवक आकर मुस्कुराते हुए उसके बगल में खड़ा हो जाता. कभी भी उसने न तो मांगने के लिए आवाज लगायी और न ही उसके शीशे पर नॉक किया. बस लोगों की देखा देखी वह भी उसको कुछ रैंड दे देता था.
आज पता नहीं उसे कुछ देने का मन नहीं किया, शायद किसी बात पर अपसेट था. ६० सेकेण्ड वाले सिग्नल का काउंट डाउन चल रहा था और वह युवक सिग्नल पर नजर डालते हुए चुपचाप खड़ा था. लगभग १० सेकेण्ड बचे थे तभी उसकी नजर उस नवयुवक से मिली और ऐसा लगा जैसे उसकी ऑंखें शिकायत कर रही हों.
सिग्नल हरा हुआ और वह उस युवक से नजरें बचाते हुए झटके से आगे बढ़ गया. रास्ते भर उसे अजीब सी बेचैनी महसूस होती रही, ऐसा लग रहा था जैसे उसने किसी का हक़ मार दिया हो.

क्षोभ - लघुकथा

वह भीख मांगने वाला बूढ़ा बड़ी देर से उस घर का दरवाजा खटखटा रहा था. कमोबेश रोज उसे उस घर से कुछ न कुछ मिल ही जाता था लेकिन आज अभी तक दरवाजा नहीं खुला था. इतनी देर में बगल वाले घर से एक औरत निकली और उसने बूढ़े को बुलाकर कुछ खाने के लिए दे दिया.
बेचन अपने घर के अहाते से यह सब देख रहा था, पतली सी सड़क के उस पार दोनों घर थे. अब उसे भी अब कहीं आना जाना नहीं होता था तो अहाते में पड़ा पड़ा यह सब देखा करता था. जिस घर से बूढ़े को कभी कभार कुछ मिलता था, आज वहां से मिल गया और बूढ़ा बहुत खुश था. लेकिन जब काफी देर तक दूसरे घर से कोई नहीं निकला तो बूढ़ा बड़बड़ाते हुए आगे बढ़ गया.
जाते समय उसकी आवाज बेचन के कानों में गूंज रही थी "आज उस घर से भी खाने को मिल गया लेकिन मरे रोज वाले ने तो दरवाजा ही नहीं खोला".

साफ़ सफाई- लघुकथा

गाँववालों की भीड़ इकठ्ठा हो चुकी थी, उनको भी पता था कि जब किसी गाड़ी में लोग आते हैं तो कुछ न कुछ बांटते हैं. गाड़ी में से कुछ पैकेट निकाले जा रहे थे और चारो तरफ खड़े लोगों में से कई निगाहें बड़ी हसरत से उन्हें निहार रही थीं.
कुछ समय बाद छोटा सा मंच सज गया और गाड़ी से आये कुछ लोगों ने गांववालों को समझाना शुरू किया "सफाई बहुत जरूरी है चाहे वह घर की हो या अपने शरीर की. आप लोग आज से यह प्रण कीजिये कि आगे से सफाई का पूरा ध्यान रखेंगे. आज हम लोग स्वछता से सम्बंधित सामग्री वितरित करेंगे".
बीमार और कमजोर रग्घू भी पोते के सहारे चला आया था कि कुछ तो मिल ही जायेगा. जैसे ही पैकेट बाँटने शुरू हुए, एक और व्यक्ति ने ऊँची आवाज़ में कहा "और खाना खाने के पहले भी अपने हाथ साफ़ करना बहुत जरुरी है वर्ना गन्दगी पेट में चली जाती है और बीमार बना देती है".
रग्घू के कानों में अचानक खाना शब्द सुनाई दिया और उसकी आँखों में एक चमक दौड़ गयी. उसने अपने सूखे होठों पर जीभ फेरी और अगले ही पल वह पोते का हाथ पकडे भीड़ में पूरी ताक़त से घुस गया.  

Friday, September 28, 2018

बंटवारा--लघुकथा

बुद्धू भैया आज उदास थे, उनकी आँखों के सामने ही वो सब हो रहा था जिसकी उन्होंने अपने जीते जी कल्पना नहीं की थी. पूरा परिवार सहमत था, बस एक उनको छोड़कर. क्या क्या नहीं किया था उन्होंने इस परिवार के लिए, आजीवन कुँवारे रहे, लेकिन आज उन सबकी कोई कीमत नहीं थी.
कुछ बुजुर्ग रिश्तेदार, गांव के मुखिया और कुछ पट्टीदारों की उपस्थिति में सब कुछ तंय हो गया. घर, खेत, सामान और यहाँ तक कि दरवाजे पर बंधे जानवरों का भी बंटवारा हो गया. दालान में बैठे हुए बुद्धू भैया सूनी सूनी आँखों से सब देख रहे थे कि कैसे उनके दोनों भाई और उनका परिवार इस बंटवारे को लेकर बहुत उत्साहित थे. अचानक वह उठे और दरवाजे पर बंधी गायों के बीच चले गए. रोज दिन में कई घंटे इन गायों के साथ ही उनका समय बीतता था, खूब चराते थे उनको. गायों की प्रसन्नता से हिलते हुए सर को देखकर उनकी उदासी एक पल के लिए दूर हो गयी.
कुछ मिनट के बाद वह वापस दालान में आये और उन्होंने वहां उपस्थित सभी लोगों के सामने जोर से कहा "तुम लोगों ने जैसे चाहा, बंटवारा कर लिया. लेकिन इन गायों के बारे में मुझे कुछ कहना है". इतना कह कर वह सांस लेने के लिए रुके और उनके दोनों भाईयों की सांस रुकने लगी. शायद भैया गायों को हम लोगों को देना नहीं चाहते हैं, यही उनके दिमाग में आ रहा था.
"देखो चाहे तुम लोगों ने हर चीज का बंटवारा कर लिया है, लेकिन मैं उम्मीद करता हूँ कि एक चीज का हक़ तुम लोग मुझसे नहीं छीनोगे. आगे भी सभी गायों को चराने लेकर मैं ही जाया करूँगा और सबको उनकी गायों का दूध दुहकर दूंगा".
बुद्धू भैया वहां उपस्थित सभी लोगों से बेखबर बस गायों को प्यार भरी नजरों से देख रहे थे. उनकी उम्मीद जिन्दा थी और उनके भाई एक दूसरे से नजर चुरा रहे थे.

इन्वेस्टमेंट- लघुकथा

थाने के अंदर जाकर उसने एक किनारे अपनी बाइक खड़ी की और चारो तरफ का मुआयना करने लगा. काफी बड़ा अहाता था इस थाने का और एक तरफ संतरी बंदूक जमीन पर टिकाये उसी को देख रहा था. वह धीरे धीरे संतरी की तरफ बढ़ा तभी उसकी नज़र एक खम्भे से बंधे एक आदमी पर पड़ी. गंदे कपडे पहने उस पुरुष की पीठ उसकी तरफ थी और उसके पास दो पुलिस वाले खड़े थे.
इतने में इंस्पेक्टर बाहर आये और उसको देखते ही एक सिपाही को आवाज़ लगाया "अरे दो कुर्सी निकालो बाहर". उसने इंस्पेक्टर से हाथ मिलाया और दोनों कुर्सियों पर बैठ गए.
"जल्दी से दो चाय लाना" बोलकर वह उठा और उस खम्बे की तरफ बढ़ा. खम्भे में बंधा आदमी कांपने लगा, उसे लग गया कि अब उसकी शामत आने वाली है.
"इसी हरामजादे ने मोटर चुराई थी ना, जरा लाठी लाना, बहुत चर्बी चढ़ गयी है इसपर", बोलते हुए वह खम्बे के पास पहुँच गया. खम्बे में बंधा आदमी अब रोने लगा था और एक पुलिस वाले ने लाठी लाकर उसे पकड़ा दिया.
"रस्सी खोलकर इसके दोनों हाथ पकड़ो, साले को चोरी का इनाम देता हूँ", वह गुर्राया. रस्सी से बंधा आदमी अब जोर जोर से रोने लगा, उसकी रस्सी खोलकर दोनों पुलिस वालों ने उसके हाथ पकड़ लिए.
"चोप्प साला, नाटक करता है, अभी समझाता हूँ", और उसने ताबड़तोड़ लाठियां उसके पिछवाड़े पर बरसानी शुरू कर दी.
इस बीच एक पुलिसवाले ने चाय लाकर रख दी थी, वह आदमी बुरी तरह चिल्ला रहा था. कुछ ही समय बाद वह एक पुलिसवाले की तरफ झूल गया और  इंस्पेक्टर ने लाठी मारना बंद कर दिया.
"ले जाओ साले को और बंद कर दो अंदर. अगर अब भी नहीं कबूलेगा तो रात को इसका दूसरा इलाज करेंगे", कहकर वह हाथ झाड़ता हुआ आया और कुर्सी पर बैठ गया.
'लीजिये चाय पीजिये, ये सब यही भाषा समझते हैं. पिछले महीने भी एक मोटर चुराया था इस साले ने और बाद में इसके बाप ने लौटाया. अच्छा कोई बढ़िया स्कीम बताईये मैनेजर साहब जहाँ हम इन्वेस्ट करें", इंस्पेक्टर ने बड़े आराम से कहा जैसे कुछ हुआ ही नहीं हो और चाय उठाकर पीने लगा.
सामने कप में रखी चाय उसे खून जैसी लग रही थी, उसे अख़बारों और पत्रिकाओं में पढ़े मानवाधिकार की बातें याद आने लगीं. फिर उसे याद नहीं रहा कि उसने इंस्पेक्टर को क्या बताया, लेकिन रात को खाना खाने के बाद उसे उल्टी हो गयी.