अब जोखू की आँख के आँसू सूख गए थे, आख़िर कितनी देर बहते। आँगन में पिताजी का शव एक तरफ़ सफ़ेद चादर से ढंककर रखा था और उसके चारो तरफ़ जल रही अगरबत्तियों की तेज़ गंध चारो तरफ़ फैली हुई थी। अभी दो दिन पहले ही तो पड़ोस के गाँव के डॉक्टर देखकर गए थे और उन्होंने कुछ दवाएँ दी थीं। अब डॉक्टर भी थे तो झोलाछाप ही लेकिन उनके दवा से फ़ायदा हो जाता था। ऐसे में शहर जाकर और बहुत ज़्यादा पैसा लगाकर मरीज़ को दिखाने की हिम्मत बहुत कम लोग ही कर पाते थे। जोखू को भी यही लगा कि मौसम बदला है और उसीका असर है, एकाध दिन में ठीक हो जाएगा। वह घर का इकलौता लड़का था, पिताजी के सब भाई अलग-अलग रहते थे और उनको किसी से कुछ ख़ास लेना देना नहीं था। परिवार में एक बुआ थी और एक बहन भी जो अपने-अपने घरों में कमोबेश उसी अवस्था में थीं। छोटी-सी खेती थी जिसे न छोड़ते बनता था और न वह सबका पेट ही भर पाती थी। एक किसान जिस चक्रव्यूह में फँसा अपना पूरा जीवन बिता देता है, वह भी उसी चक्रव्यूह में अटका था। ऐसे में पिता के रहने से वह बहुत सी चिंताओं से मुक्त रहता था लेकिन उनकी अचानक हुई मौत से वह टूट गया। आर्थिक स्थिति तो बदतर थी ही, पहले माँ और अब पिताजी भी, वह एकदम से बड़ा हो गया।
"जोखू, तुम चिंता मत करना, सारा किरिया करम मैं सँभाल लूँगा, तुम हिम्मत रखो", चाचा ने आकर उसके कंधे पर हाथ रखा तो उसकी रुकी हुई रुलाई फिर से फूट पड़ी। चाचा ने भी उसे थोड़ी देर रो लेने दिया, उनको अनुभव था कि कुछ देर में वह सामान्य हो जाएगा।
धीरे-धीरे पूरे गाँव में ख़बर हो गई थी और सब रिश्तेदारों को भी फोन कर दिया गया। चाचा घर पर अंतिम क्रिया की तैयारियों में लग गए। पंडित को बुलाया गया और बाँस की सीढ़ी बनवाने के लिए एक आदमी गाँव के बाहर बँसवारी की तरफ़ निकल गया। चूँकि शाम का समय हो गया तो सबने राय दी कि दाह-संस्कार के लिए कल ले जाना ही ठीक रहेगा, वैसे भी सूर्यास्त के बाद दाह-संस्कार नहीं किया जाता है।
"अब रात होने को आ रही है इसलिए लाश को कल ही घाट पर ले जाएँगे, सुबह तक कुछ रिश्तेदार भी आ जाएँगे। बाक़ी इंतज़ाम मैं देखता हूँ, तुम घर में सबको देखो", चाचा ने उसको समझाया।
उसे भी यही उचित लगा क्योंकि रात में और रिश्तेदार भी आ ही जाएँगे। अब पिताजी की तबीयत ज़्यादा ख़राब रही होती या कुछ दिन से लगातार बीमार रहे होते तो शायद बहुत से रिश्तेदार पहले ही देखने आए होते। लेकिन एकदम से चले गए तो आख़िरी वक़्त में कोई देख भी नहीं पाया।
उसकी रात आँखों-आँखों में ही कटी, ऐसे में नींद भी भला कैसे आती और सुबह के पाँच बजते बजते बुआ और बहन भी आ गईं। उनके आते ही एक बार फिर से रोना पीटना शुरू हो गया। एक अजीब-सी परंपरा है कि गाँव में चाहे शादी ब्याह हो या मरनी करनी, महिलाएँ उस संदर्भ में कुछ गीत गाकर ही अपना सुख या दुख प्रकट करती हैं। यह सिलसिला पीढ़ी दर पीढ़ी अनवरत चालू है और ये गीत कब पिछली पीढ़ी की औरतें नई पीढ़ी को दे देती हैं, पुरुषों को तो पता भी नहीं चलता है। काफ़ी देर तक तमाम ऐसे गीत रोते हुए गाकर बुआ और बहन पिताजी को याद करती रहीं। उसकी पत्नी, अड़ोस-पड़ोस की औरतें भी रोने की आवाज़ सुनकर साथ देने और ढाढस बढ़ाने आ गईं। चाचा भी आ गए और उन्होंने लगभग डाँटते हुए कहा "अब बस भी करो सब लोग, कितना रोना-धोना करोगे। जोखू अब हम लोग चलने की तैयारी करते हैं"।
कुछ देर में ही पूरब से सूरज देवता निकले, आज उस जगह सब थे, बस पिताजी नहीं थे उनको देखने के लिए। उसे याद आया, शायद ही कोई दिन ऐसा बीता हो जब वह सूर्योदय से पहले नहीं जगा हो। पिताजी इन बातों में नियम क़ानून के बहुत पक्के थे और उनका स्पष्ट मानना था कि जिस घर में लोग सूर्योदय के बाद उठते हैं, लक्ष्मी उस घर से रूठ जाती हैं। ये अलग बात थी कि उसके आज तक रोज़ सुबह उठने के बाद भी लक्ष्मी क्यों रूठी हुई थीं, उसे कभी पता नहीं चला। पिछली बार खेत का एक टुकड़ा माँ के गुज़रने पर बिक गया था और अब पिताजी उसका अफ़सोस लिए ही परलोक सिधार गए।
"जोखू, ज़रा किसी को परधान के दरवाज़े भेजो ट्रैक्टर भेजने के लिए, समय से निकल चलेंगे तो सब जल्दी निपट जाएगा", चाचा ने फिर आवाज़ लगाई तो जोखू ने रग्घू को प्रधान के घर भेज दिया।
अगल-बगल से लोग जुटने शुरू हो गए और शव को जल्दी से घाट ले चलने की आवाज़ हर तरफ़ से आने लगी। गाँव के प्रधान के घर से ट्रैक्टर ट्रॉली के साथ दरवाज़े पर आ गया। शव को ट्रैक्टर पर रखा गया और उसके साथ ही एक बार फिर से रोना-धोना शुरू हो गया। गाँव के कुछ लोग ट्रैक्टर पर उसके साथ बैठ गए। बाक़ी लोग अपनी मोटरसाइकिल और साइकिल से ट्रैक्टर के साथ-साथ चल पड़े। हर गाँव की तरह उसके गाँव के लोगों का अंतिम संस्कार भी एक पूर्व निश्चित घाट पर ही होता था। गंगा नदी के किनारे स्थित वह घाट गाँव से क़रीब २० किमी दूर था।
पहले के ज़माने में तो लोग पैदल ही शव को कंधे पर उठाए घाट पहुँच जाते थे और उसे भी कई शवयात्राएँ याद थीं जिसमें वह भी पैदल ही घाट तक गया था। गाँव के कुछ मज़बूत लोग अधिकांश समय शव को अपने कंधे पर ही लेकर जाते थे। लेकिन अब तो साधन उपलब्ध थे इसलिए घाट पर पहुँचने में आसानी हो जाती थी। गाँव से निकलने के बाद धीरे-धीरे लोग शवयात्रा में जुड़ते गए और कुछ रिश्तेदार तो सीधे घाट पर ही पहुँच गए थे। लगभग ११ बजे ट्रैक्टर और बाक़ी वाहन घाट पर पहुँचे और लोग शव को उतारकर गंगाजी में स्नान के लिए ले जाने लगे। समय के साथ-साथ सरकार ने विद्युत् शवदाहगृह भी बनवा दिया है लेकिन लोगों के दिमाग़ में उसका ख़याल ही नहीं आता था। समाज के दबाव और पंडितों के समझाने के चलते लोग अक्सर विद्युत् शवदाहगृह का उपयोग नहीं करते और दिन में एकाध बार ही वह इस्तेमाल होता था। ऐसी तमाम पुरानी परम्पराएँ भला इतनी आसानी से कहाँ छूटती हैं, चाहे अब उन्होंने बदलते समय के साथ अपना अर्थ ही खो दिया हो। कितनी लकड़ियाँ बच सकती हैं विद्युत शवदाहगृह के इस्तेमाल से लेकिन इस दिशा में सोचने वाले आज भी कम ही हैं। घाट पर एक किनारे एक बोर्ड भी लगा हुआ था कि मृत्यु का पंजीकरण कराना अनिवार्य है लेकिन वह बोर्ड भी अपने अस्तित्त्व के लिए संघर्ष कर रहा था।
उनके घाट पर पहुँचते ही कुछ पंडो ने आख़िरी क्रियाकर्म के लिए घेरा। दरअसल दूरदराज़ से आए लोग अपने साथ पंडित नहीं लाते थे जिसके चलते घाट के पण्डे ही सब काम कराते थे। लेकिन गाँव के बुज़ुर्गों ने उन्हें समझा दिया कि गाँव के पण्डे आए हैं सब करने के लिए। चार लोगों ने शव को गंगाजी में डुबकी लगाकर किनारे रख दिया और इस बीच उसके चाचा लकड़ियों के इंतज़ाम के लिए चल दिए। जैसे ही चाचा लकड़ी की टाल की ओर बढ़े, कई दुकानदारों ने उनको घेर लिया। लकड़ियों के बारे में वे इस तरह से बता रहे थे जैसे वह जलाने के लिए नहीं बल्कि किसी की शादी में बेड बनाने के लिए उपयोग की जाने वाली हो। ख़ैर एक लकड़ी वाले से बात तंय हुई और उसने शव के वज़न के हिसाब से कितनी लकड़ी लगेगी बताया। गाँव के कुछ बुज़ुर्ग, जिनको इन सब का पुराना अनुभव था, उन्होंने थोड़ा कम करवाया और फिर कुछ लोगों ने लकड़ियों को तौलवाना शुरू किया। अधिकांश लकड़ियाँ या तो गीली थीं या हरी, बड़ी मुश्किल से कुछ सूखी लकड़ियाँ मिलीं। साथ ही साथ चन्दन की लकड़ी के कुछ टुकड़े भी ले लिए गए। एक बोर्ड वहाँ पर भी लगा हुआ था जिसपर लकड़ी का मूल्य अंकित था लेकिन वह भी अपना मूल्य खो चुका था। शवदाह से सम्बंधित बाक़ी सब सामान भी ले-लिया गया और घाट पर मौजूद नाई ने जोखू के सर के बाल मूड़ दिए। शव को जलाने के लिए आग लेने उनको डोमराज के पास ही जाना था और वह चाचा के साथ चल पड़ा। आग देने के लिए भी डोमराज ने बड़ा-सा मुँह खोला, पहले ५००० की माँग की फिर किसी तरह उनको ५०० में तैयार किया गया।
शव को चिता पर लिटाकर उसको लकड़ियों से ढँक दिया गया। चिता की लकड़ियों को इस तरह से जलाना कि शव पूरी तरह से जल जाए, यह भी एक कला है जिसके कुछ जानकार हर गाँव में होते हैं। उसने जैसे ही चिता में आग लगाई, गाँव के दो लोग आगे आए और उन्होंने चिता जलाने की ज़िम्मेदारी बख़ूबी सँभाल ली। लकड़ियों को ऊपर-नीचे करके और बीच-बीच में जलते हुए शव को भी उलट-पलट कर उन लोगों ने अपना काम पूरी तसल्ली से पूरा किया। इस बीच बाक़ी सब लोग जगह-जगह बैठकर आपसी चर्चा में मसगूल थे, उसको छोड़कर शायद ही किसी के चेहरे पर दुख की कोई परछाई नज़र आ रही थी।
अगले तीन घंटे में दाह-संस्कार निपट गया, डोम ने चिता में से बची हुई अस्थियाँ निकालकर दे दीं और उनको उसने गंगाजी में प्रवाहित कर दिया। उसके बाद उसने नदी के पानी में दो-चार बार डुबकी लगाई। फिर घाट पर उपस्थित सभी लोगों ने एक-एक बार नदी के मटमैले पानी में डुबकी लगाई और फिर सब वापस चलने की तैयारी करने लगे।
"चलो सब निपट गया जोखू, अब कुछ नास्ता पानी करा दिया जाए सबको", चाचा ने अपना गमछा कंधे पर डालते हुआ आवाज़ लगाई। जोखू भारी मन से घाट से उठा, पिताजी की अब कोई निशानी वहाँ शेष नहीं थी। अपने आँखों के किनारे आए आँसुओं को उसने पोंछा और गाँव के लोगों की तरफ़ बढ़ गया।
एक परंपरा यह भी सदियों से चली आ रही थी कि शवदाह के बाद जितने लोग घाट पर रहते हैं उनको जलपान कराना पड़ता है। अब कोई बहुत बुज़ुर्ग चल बसा हो तो फिर भी बहुत अटपटा नहीं लगता लेकिन जब किसी के घर कोई जवान या बच्चा गुज़र जाता है तो ऐसे में यह जलपान कई लोगों को बेहद ख़राब लगता था। लेकिन जब भी किसी ने इसका विरोध करने की कोशिश की, लोगों ने उन्हें अपनी परंपरा के नाम पर चुप करा दिया। एक व्यक्ति को तो लोगों ने यह तक कह दिया कि चूँकि उसके घर के एक बुज़ुर्ग बहुत बीमार हैं इसलिए वह ऐसी बातें कर रहा है। इसके चलते अब बहुत कम लोग ही इसका सबके सामने विरोध करते हैं, हाँ जिन्हें जलपान करना नहीं अच्छा लगता वह घाट से चुपचाप चले जाते हैं।
एक किनारे गाँव के बुज़ुर्ग चाचा के साथ बहस में लगे हुए थे कि किस मिठाई की दुकान पर जलपान किया जाएगा। बात बड़ी-बड़ी दुकानों से होते हुए रास्ते में पड़ने वाली एक दुकान पर तंय हुई और सबको बता दिया गया कि वहाँ पहुँच जाएँ। अपनी-अपनी गाड़ियों से थोड़ी देर में सब वहाँ इकट्ठा हुए। कुछ देर तक कौन सी मिठाई होगी और समोसा कितने होंगे इसपर बहस चलती रही। दुकानदार भी स्थिति समझकर अपनी राय दे रहा था और थोड़े समय में नाश्ते का मेनू फ़ाइनल हुआ। फिर तो सबने कुछ इस अंदाज़ में जमकर नाश्ता किया, गोया किसी के तिलक में आए हों। दो के बदले चार मिठाई खाना, समोसा भी दो-तीन खा लेना वह भी ऐसी परिस्थिति में, लोग पता नहीं कैसे कर पाते हैं यह सब। ऊपर से कुछ लोग तो घर के लिए भी यह कहते हुए मिठाई समोसे बंधवा लिए कि आज तो घर में कुछ बनेगा नहीं तो यहीं से ले जाते हैं। शायद अगर वह अपना घुटा सर लेकर वहाँ नहीं होता तो दुकान में मौजूद अन्य लोग अन्दाज़ा भी नहीं लगा पाते कि ये लोग शवदाह करके नाश्ता कर रहे हैं। भर-पेट नाश्ता करके सब लोग अपने-अपने वाहन से निकल पड़े, वह भी चाचा के साथ ट्रैक्टर पर गाँव चल पड़ा। घर में मौजूद लोगों के लिए भी चाचा ने नाश्ता ले-लिया गया था, क्योंकि फ़िलहाल तो घर पर चूल्हा नहीं जलना था।
घर पहुँचकर कुछ देर में सब लोग अपने-अपने घर की तरफ़ निकल गए और जोखू अपने घुटे सर और शरीर पर लपेटी धोती के साथ एक चौकी पर बैठ गया। जिस व्यक्ति ने आग दी होती है उसे खटिया पर नहीं बैठना होता है, इसीलिए पहले से ही उसकी चौकी बाहर लग गई थी। थोड़ी देर बाद चाचा ने उसको सारे ख़र्च का ब्यौरा दिया तो वह धम्म से सर पकड़कर बैठ गया। सिर्फ़ शवदाह और जलपान में जितने रुपये ख़र्च हुए थे, उतने का इंतज़ाम भी उसके लिए तत्काल संभव नहीं था। अभी तो अगले तेरह दिन तमाम कर्मकांड होने थे और उसके बाद ब्राह्मणभोज जिसमें पूरे गाँव को और रिश्तेदारों को भी खिलाना था। उसे लगने लगा जैसे उसके बचे हुए थोड़े-से खेत भी पिताजी के साथ गुज़र गए हैं और वह बिल्कुल बेआसरा हो गया है।
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