वह भीख मांगने वाला बूढ़ा बड़ी देर से उस घर का दरवाजा खटखटा रहा था. कमोबेश रोज उसे उस घर से कुछ न कुछ मिल ही जाता था लेकिन आज अभी तक दरवाजा नहीं खुला था. इतनी देर में बगल वाले घर से एक औरत निकली और उसने बूढ़े को बुलाकर कुछ खाने के लिए दे दिया.
बेचन अपने घर के अहाते से यह सब देख रहा था, पतली सी सड़क के उस पार दोनों घर थे. अब उसे भी अब कहीं आना जाना नहीं होता था तो अहाते में पड़ा पड़ा यह सब देखा करता था. जिस घर से बूढ़े को कभी कभार कुछ मिलता था, आज वहां से मिल गया और बूढ़ा बहुत खुश था. लेकिन जब काफी देर तक दूसरे घर से कोई नहीं निकला तो बूढ़ा बड़बड़ाते हुए आगे बढ़ गया.
जाते समय उसकी आवाज बेचन के कानों में गूंज रही थी "आज उस घर से भी खाने को मिल गया लेकिन मरे रोज वाले ने तो दरवाजा ही नहीं खोला".
बेचन अपने घर के अहाते से यह सब देख रहा था, पतली सी सड़क के उस पार दोनों घर थे. अब उसे भी अब कहीं आना जाना नहीं होता था तो अहाते में पड़ा पड़ा यह सब देखा करता था. जिस घर से बूढ़े को कभी कभार कुछ मिलता था, आज वहां से मिल गया और बूढ़ा बहुत खुश था. लेकिन जब काफी देर तक दूसरे घर से कोई नहीं निकला तो बूढ़ा बड़बड़ाते हुए आगे बढ़ गया.
जाते समय उसकी आवाज बेचन के कानों में गूंज रही थी "आज उस घर से भी खाने को मिल गया लेकिन मरे रोज वाले ने तो दरवाजा ही नहीं खोला".
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