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Thursday, September 26, 2019

समीकरण- लघुकथा

अचानक उसे लगा कि पीछे से किसी ने नाम लेकर पुकारा, उसने साइकिल रोकी और पलट कर देखा. थोड़ा पीछे ही उसके परिचित वकील साहब खड़े थे और उसकी तरफ इशारा कर रहे थे. वह साइकिल धीरे धीरे चलाते हुए वकील साहब के पास पहुंचा और उनको नमस्ते किया.
"क्या बात है मैनेजर साहब, आज साइकिल चला रहे हैं. गाड़ी पंचर हो गयी है या खराब है", वकील साहब ने मुस्कुराते हुए पूछा.
उसे हंसी आ गयी, वह क्या साइकिल सिर्फ तभी चला सकता है जब उसकी गाड़ी खराब हो. फिर उसने हँसते हुए ही कहा "अरे नहीं वकील साहब, गाड़ी ठीक है. बस यूँ ही साइकिल चला रहा था, सेहत के लिए ठीक रहता है".
वकील साहब ने अपना सर हिलाया और कुछ बुदबुदाए जो उसे सुनाई नहीं पड़ा.
"आप भी साइकिल चलाया कीजिये, अब आपकी भी उम्र हो चली है, थोड़ी एक्सरसाइज हो जायेगी", उसने वकील साहब को लक्ष्य करते हुए कहा.
वकील साहब ने इंकार में सर हिलाया, उसे लगा शायद उम्र के चलते वह मना कर रहे हों.
"अरे आपकी इतनी भी उम्र नहीं हुई है कि आप साइकिल नहीं चला सकें, चलाया कीजिये", उसने फिर कहा.
"आप नहीं समझेंगे मैनेजर साहब, मेरे लिए साइकिल चलना संभव नहीं है", वकील साहब ने थोड़ा उदास होते हुए कहा.
उसे लगा कि शायद वकील साहब शर्म के मारे साइकिल नहीं चलाते होंगे, तो उसने फिर पूछ लिया "अरे इसे चलाने में कैसी शर्म, देखिये मैं तो बड़े मजे में चला रहा हूँ". 
वकील साहब ने एक लम्बी सांस ली और कहा 'आप नहीं समझेंगे मैनेजर साहब, मैं चाह कर भी साइकिल नहीं चला सकता. आपकी अपनी एक हैसियत है समाज में, आप साइकिल से घूमेंगे तो लोग आपकी तारीफ़ करेंगे कि देखो इतना बड़ा अधिकारी होकर भी साइकिल से घूम रहा है"
वकील साहब थोड़ी देर के लिए रुके और फिर बोले "लेकिन मेरा पेशा ऐसा है कि अगर मैं साइकिल से घूमने लगा तो लोग कहना शुरू कर देंगे कि देखो इस वकील को, एकदम फटीचर हो गया है, लगता है इसकी प्रैक्टिस बिलकुल नहीं चलती. और इसके चलते शायद मेरे यहाँ आने वाले कुछ क्लाइंट भी कम हो जाएं".
इतना कहकर वकील साहब ने नमस्कार किया और आगे बढ़ गए, वह साइकिल पकड़े समाज के इस समीकरण को सोचता रह गया.

Friday, September 20, 2019

व्यस्तता- लघुकथा

"अब गांव चलें बहुत दिन बिता लिए यहाँ", शोभाराम ने जब पत्नी ललिता से कहा तो जैसे उनके मुंह की बात ही छीन ली.
लेकिन बेटे और बहू से क्या कहेंगे, गांव पर तो कोई रहता नहीं था,पट्टीदारों के अलावा. वैसे वहां पर अपने हिसाब से जीने की आज़ादी थी लेकिन यहाँ भी तो है ही, कोई बंधन नहीं है. उनके दिमाग में कई दिनों से यह सब घूम रहा था.
"अच्छा यह बताओ, आखिर क्या कह कर गांव जाओगे. बेटा तो यही कहकर शहर लाया था कि गांव में अकेले रहते हैं, कौन है जो आपका अकेलापन बाँटने के लिए", ललिता के सवाल पर लाजवाब हो गए शोभाराम.
बात भी सही थी, न तो बहू का वर्ताव ऐसा था जिससे कोई शिकायत की जा सके और न बेटे का. बच्चे भी रोज एकाध बार उनके पास आ ही जाते थे, ये अलग बात थी कि वे अपने फोन में ही कुछ दिखाने आते थे. 
आखिर ललिता ने चुप्पी तोड़ी "लेकिन यह कौन सी बात है कि सब अपने फोन में ही लगे रहते हैं, न तो आपस में बात करते हैं और न हमसे. इससे तो अच्छे गांव में ही थे जहाँ पड़ोसी बातचीत तो करते थे".
शोभाराम ने सहमति में गर्दन हिलायी और कुछ बोलते उसके पहले ही बहू आयी "आपकी चाय ठंडी हो रही है पिताजी", और फोन को देखते हुए बाहर निकल गयी.
शोभाराम ने ललिता को देखा और दोनों धीरे धीरे अपने कमरे से बाहर आ गए. सोफे पर बैठे हुए बेटे के हंसने की आवाज आ रही थी, कोई चुटकुला पढ़ लिया था उसने अपने फोन में.  

Wednesday, September 11, 2019

उजास- लघुकथा

घर तक पहुँचते पहुँचते वह बिलकुल थक के चूर हो गया था, थकान सिर्फ शारीरिक होती तो और बात थी, वह मानसिक ज्यादा थी. आज भी कुछ लोगों की खुसुर फुसुर उसके कानों में पड़ गयी थी "अरे ये तो सरकारी दामाद हैं, इनको कौन बोल सकता है, जो चाहे करें".  जैसे ही वह सोफे पर बैठा, उसकी नजर सुपुत्र राघव पर पड़ी. उसकी कुहनी पर खून के दाग थे लेकिन वह मजे में खेल रहा था.
"बेटा राघव, यहाँ आओ. यह चोट कैसे लग गयी", उसने जैसे ही कहा, राघव को अपने चोट का ध्यान आया. वह लड़खड़ाते हुए पापा की तरफ आया और उसकी शिकायत शुरू हो गयी "बहुत गन्दा स्कूल है पापा, सब बच्चे मुझे बहुत चिढ़ाते हैं. आज तो मैदान में किसी ने धक्का दे दिया और मैं गिर पड़ा, देखो खून भी निकल आया".
"अच्छा चलो दवा लगा देता हूँ, घाव ठीक हो जायेगा. एक काम करता हूँ, तुम्हारा नाम किसी और स्कूल में लिखवा देता हूँ, ऐसे गंदे बच्चों से तो पीछा छूटेगा", उसने गंभीरता से कहा.
राघव, जो अभी तक शिकायत के ही मूड में था, वह चौंक सा गया. उसने पापा की तरफ गौर से देखा और बोला "नहीं पापा, मुझे स्कूल नहीं बदलना है. मेरे कितने ही दोस्त हैं जो मेरा ध्यान रखते हैं, मैं वहीँ पढूंगा".
वह सोच में पड़ गया, राघव के पैरों में समस्या थी जिसके चलते वह लंगड़ाकर चलता था. इस वजह से बच्चे उसे बहुत चिढ़ाते थे, यह भी उसे मालूम था. लेकिन फिर भी वह अपने कुछ अच्छे दोस्तों के चलते स्कूल छोड़ने के लिए राजी नहीं था. और वह अपने कुछ कलीग्स के मानसिक विकलांगता के चलते इस्तीफा देने तक के बारे में सोच रहा था.
"तो फिर पार्क में चलें, रेस लगाते हैं", उसने राघव को गोद में उठाते हुए कहा. राघव के चेहरे पर खिलखिलाहट फ़ैल गयी, उसने उस खिलखिलाहट को अपने अंदर भी भर लिया.

Monday, September 9, 2019

अब बात कुछ और है- लघुकथा

लगभग १५ मिनट बीत गए थे उस रेस्तरां में बैठे हुए, अभी तक खाना सर्व नहीं हुआ था. कलीग के बच्चे के ट्वेल्थ के रिजल्ट की ख़ुशी में आज दोनों फिर उस रेस्तरां में आये थे. अमूमन इतनी देर में बौखला जाने वाली उसकी कलीग ख़ामोशी से मेनू को उलट पलट कर देख रही थी. उसे थोड़ा अजीब लगा, उसने यूँ ही कहा "कितना समय लेते हैं ये बड़े होटल वाले खाना सर्व करने में, मुझे तो समझ ही नहीं आता. वैसे आज तुम कुछ बोल नहीं रही हो, क्या बात है?
कलीग ने सर उठाकर उसकी तरफ देखा और मुस्कुराते हुए बोली "अरे समय लग जाता है, ये लोग कोई खाना बनाकर नहीं रखते, आर्डर देने पर ही बनाते हैं".
"अच्छा, पहले तो मैं यह दलील देता था तो तुम उखड़ जाती थी कि यह तो इनका काम है तो जल्दी करें, हमारे समय की कीमत नहीं है क्या?
बहरहाल अगले दस मिनट में खाना टेबल पर था और दोनों खाने में लग गए. पनीर कुछ ख़ास नहीं था और दाल तड़का भी जैसे तड़क नहीं था. उसे लगा अब पक्का यह चिल्लायेगी लेकिन वह ख़ामोशी से खाना खाती रही.
उसने फिर कुछ कहना चाहा लेकिन कलीग ने जैसे भांप लिया "अब कोशिश तो कोई भी अच्छा बनाने की ही करता है, वैसे खाना स्वादिष्ट था".
उसे सब कुछ अजीब लग रहा था लेकिन अब चुप रहने में ही उसने भलाई समझी. कलीग ने पैसे देने के लिए अपना बैगनुमा पर्स खोला. उसकी नजर बैग पर पड़ी, अंदर होटल मैनेजमेंट के एक कालेज का ब्रोशर दिखाई दे रहा था.     

Monday, August 26, 2019

मंडप में बैठा वह सोच रहा था, कहाँ उसका कुरूप चेहरा और कहाँ यह बेहद खूबसूरत लड़की. लेकिन अब हो भी क्या सकता था, बात इतना आगे बढ़ चुकी थी 

Thursday, August 22, 2019

तबादला - एक अधूरी कहानी

थोड़ी उत्सुकता तो उसको भी थी क्योंकि वहां का लगभग हर कर्मचारी उसके बारे में बता चुका था, सिर्फ वही नहीं आ रहा था. दो दिन पहले ही उसका तबादला यहाँ हुआ था, नया शहर और एकदम नए लोग. अब कोई भी नयी जगह हो तो शुरुआत में मुश्किल तो होती ही है, अपनी पुरानी जगह भी बहुत शिद्दत से याद आती है. अच्छे लोग, साथी कर्मचारी और पुराना वातावरण तो याद आता ही है, कुछ ऐसे लोग भी, जिन्हें आप सख्त नापसंद करते हों, वह भी ऐसे में यादों के कोने में अपनी उपस्थिति दर्ज करा देते हैं.
लेकिन उसे, मतलब मनोहर लाल वर्मा को नयी जगहों पर जाना और नए लोगों से मिलना बहुत पसंद है. उसकी पत्नी तो कहती भी है "तुम्हें तो टूरिज्म डिपार्टमेंट में होना चाहिए था, कहाँ से इस गलत डिपार्टमेंट में आ गए. जब भी मौका मिले, फटाक से तबादला करा लेना उस विभाग में". अलबत्ता ये बात दोनों ही जानते थे कि उसे इसी विभाग से सेवानिवृत्त होना है. खैर पत्नी की तो अब आदत पड़ गयी है लेकिन उसके तबादले से बच्चे अभी भी चिढ़ जाते हैं. अब ये भी बात नहीं है कि वह तबादला जानबूझ कर करवाता है, लेकिन उसकी कार्यप्रणाली ही ऐसी है कि लोग उसे ज्यादा दिन झेल नहीं पाते. वैसे भी आजकल ईमानदार अधिकारी कौन बर्दास्त कर पाता है, सबको तो ऐसा अधिकारी चाहिए जो खुद भी प्रसन्न रहे और अपने मातहतों को भी प्रसन्न रखे.
इस कार्यालय का पहला दिन तो बस लोगों से मिलते जुलते ही बीत गया. वैसे भी व्यक्ति के ख्याति की गति किसी भी वाहन से तेज होती है, क्योंकि उसकी ख्याति उसके पहुँचने से पहले ही पहुँच जाती है. उसके पोस्टिंग के चलते वहां के कर्मचारियों ने तो अपना सर पीट ही लिया था, लेकिन सबको यह सुकून भी था कि वह किसी भी जगह ज्यादा दिन नहीं टिकता है. मतलब बला चाहे जैसी भी हो, जल्द ही कट जायेगी. वैसे भी दुःख चाहे जितना भी बड़ा हो, अगर यह पता चल जाए कि वह कुछ दिन का ही मेहमान है, तो उसे बर्दास्त करना बहुत आसान हो जाता है. मानव स्वभाव ही कुछ ऐसा है कि उसे दुःख तो ऐसा चाहिए जिसकी मियाद कम हो और सुख के मामले में वह मियाद को बीच में लाना ही नहीं चाहता, मतलब बेमियादी सुख.
रात में पत्नी ने फोन किया "कैसा लग रहा है, ऑफिस तो ठीक ही होगा, बस लोग दुखी होंगे, है ना?
उसकी हंसी फूट गयी, उसको तो उसकी पत्नी उससे ज्यादा समझती है. उसने इकरार में सर हिलाया तो अगला सवाल आया "हम लोगों को कब तक निकलना है, बच्चों के स्कूल में टी सी के लिए अप्लाई कर दिया है. सामान समेटने तो आओगे या पिछली बार की तरह मुझे ही सब करना पड़ेगा".
कुछ सवाल ऐसे होते हैं जिनके जवाब वक़्त ही देता है. अब पिछली बार उसे कहाँ पता था कि वह सामान बंधवाने भी नहीं जा पायेगा, बमुश्किल दो दिन कि छुट्टी मिली थी और जाकर सामान सहित वापस आ गया था. खैर उसने दिलासा दिया "तुम तैयारी रखो, मैंने पैकर वाले को बोल दिया है. जैसे ही छुट्टी मिलती है, आ जाऊँगा. वैसे यह जगह बहुत दिलचस्प है, इसे आगरा के समकक्ष रख सकती हो". 
आखिरी वाक्य पर पत्नी चौंकी "आगरा के समकक्ष, अरे वह तो औरंगाबाद है जहाँ बीबी का मकबरा है, बिलकुल ताजमहल की रेप्लिका. बुरहानपुर में ऐसा क्या है?
"तुम आना तो खुद ही देख लेना, वैसे जानकारी के लिए बता दूँ कि मुमताज बेगम की मौत यहीं पर हुई थी और उनको यहाँ पर लगभग छह माह तक दफनाया भी गया था. खैर जैसे ही छुट्टी मिलती है, बताता हूँ", और उसने फोन काट दिया.
परसों रविवार है और उस दिन मुमताज बेगम की पुरानी कब्र को देखने वह जरूर जाएगा. भोपाल से बुरहानपुर की दूरी तो बहुत ज्यादा नहीं थी लेकिन सड़क मार्ग थोड़ा गड़बड़ था. वैसे ट्रेनों की संख्या ठीकठाक थी और उससे पहुँचने में समय भी काफी कम लगता था. इसलिए उसने भोपाल से जाते समय ट्रेन ही पसंद किया था. बस एक फ़र्क़ था भोपाल और बुरहानपुर में, जहाँ भोपाल में पेड़ पौधे, हरियाली और अच्छी सड़कें थीं, वहीँ बुरहानपुर में काफी गर्मी थी और इसकी एक वजह जो उसे महसूस हो रही थी, वह थी पेड़ों की कमी. कसबे की सड़कें शाम होते होते पिघल सी जाती थीं और कई बार उसे लगा जैसे उसके जूते सड़क से चिपक कर रह जाएंगे। कूलर की हवा दिन में ऑफिस में तो राहत देती लेकिन शाम को ऑफिस से निकलते ही लू के थपेड़े हालत खराब कर देते थे.
अगले दिन सुबह रोज से कुछ मिनट पहले ही मनोहर अपने कार्यालय में था. कुछ ही देर में लोगों का आना प्रारम्भ हो गया और एक नया चेहरा उसकी नजर में आया. यक़ीनन यह वही होगा, उसने सोचा और अपनी कुर्सी पर बैठे बैठे उसका इंतजार करने लगा.
"मैं अंदर आ जाऊँ सर", उसकी आवाज ने उसे सोच की दुनिया से बाहर निकाल लिया।
"आईये, कैसे हैं आप? उसने मुस्कुराते हुए कहा तो वह भी मुस्कुरा पड़ा.
"मैं शिवचरन, यहाँ पर अकाउंटेंट हूँ. आपके बारे में बहुत सुना है सर", गंभीर आवाज में शिवचरन ने कहा.
"अरे बैठिये शिवचरन जी, मैंने भी आपके बारे में बहुत सुना है. उम्मीद है कि हम दोनों की अच्छी निभेगी, आपके और मेरे विचारों में बहुत साम्य है".
शिवचरन मुस्कुरा दिए, बहुत कम अफसर ऐसे मिले थे जिन्होंने उसे पसंद किया था. दरअसल गलत कार्यों से दूर रहने की प्रवृत्ति के चलते उनको विभाग में अक्सर किनारे कर दिया जाता था. और उनको कुछ लोग तो दबी जबान में बेवकूफ भी कहते थे जो बहती गंगा में हाथ नहीं धोता है. अब ऐसे में अगर अफसर बोले कि हमारी अच्छी निभेगी तो शिवचरण का खुश होना स्वाभाविक था. 

Monday, August 5, 2019

हवस - लघुकथा

पिछले दो घंटे से उसका परिवार इस टाइगर रिज़र्व में घूम रहा था. मौसम भी बेहद शानदार था इसलिए सब खुश थे. अभी तक काफी जानवर दिखाई पड़ गए थे लेकिन शेर से सामना नहीं हुआ था. गाइड लगातार बता रहा था कि वह ऐसी जगह ले चलेगा जहाँ कई शेर देखने को मिलेंगे, पहले बाकी जानवर देख लिए जाएँ. उसने भी सहमति दे दी और उनकी जीप धीरे धीरे जंगल में घूम रही थी.
"अरे यहाँ सिग्नल कमजोर है, आवाज कट रही है. मैंने एक मैसेज किया है, उसे पढ़कर लेक के किनारे वाले फ्लैट की रजिस्ट्री की तैयारी कर लो. मैं परसों तक आ जाऊंगा, मैसेज का जवाब जरूर भेज देना", उसने लगभग चिल्लाते हुए फोन पर बोला. गाइड लगातार उसे शांत रहने का इशारा कर रहा था "सर, यहाँ शोर मत मचाइए, जानवर डिस्टर्ब हो जाते हैं".
एक बार उसके दिल में आया कि वह गाइड को डपट दे, जानवर डिस्टर्ब हो जाते हैं. उसको क्या पता कि उसके इस फ्लैट की रजिस्ट्री कितने दिन से अटकी पड़ी थी, घूमने का मजा किरकिरा हो जाता अगर यह गड़बड़ा जाता. लेकिन उसने पत्नी को अपनी तरफ घूरते पाया तो खामोश रह गया.
"आज रजिस्ट्री का फाइनल हो जाएगा, कितने दिन से फंसा था मामला. आखिरकार सभी बच्चों के नाम एक एक फ्लैट हो गए", उसने खुशी से उछालते हुए पत्नी से कहा. पत्नी ने भी मुस्कुराकर उसका हाथ दबा दिया.
"वो देखिये, दो शेर एक साथ, मैंने कहा था ना", गाइड ने एक तरफ इशारा करते हुए धीरे से कहा.
सब लोग उस तरफ देखने लगे, एक भैंसे के शरीर का कुछ हिस्सा बगल में पड़ा था और शेर आराम से लेटे हुए थे. बेटे ने थोड़ी देर बाद आश्चर्य से पूछा "गाइड अंकल, ये शेर आराम से लेटे हुए हैं, कुछ दूर खड़े हिरन को मार क्यों नहीं रहे?
गाइड ने उसकी तरफ देखते हुए जवाब दिया "बेटे, ये जानवर बस उतना ही खाते हैं जितने से उनकी भूख मिट जाए, उनको ज्यादा की हवस नहीं होती".