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Sunday, November 30, 2014

गुनाह--

पुलिस ने उसे गिरफ्तार करके सलाखों के पीछे डाल दिया था | वजह थी किसी ऐसे का क़त्ल जो एक लड़की का अपहरण करके उसे जिस्मफरोशी के दलदल में धकेलने जा रहा था | समाज और मीडिया उस पर थू थू कर रहा था क्योंकि उसका भी जुर्म का इतिहास था | उस लड़की को भी शक़ की निगाह से देखा जा रहा था |
जब अदालत में मामला पहुंचा तो लड़की का बयान था " जज साहब अगर ये आदमी मुजरिम है तो फिर उससे बड़ी मुजरिम मैं हूँ , क्यूंकि मेरी वजह से ही इसने क़त्ल किया | किसी की जान और उसकी इज़्ज़त बचाना गुनाह है इसीलिए ये समाज ऐसा नहीं करता है "| 

अपने--

" पिताजी देखो तो , कितनी बढ़िया गाड़ी ले आया हूँ मैं , आधे दाम में मिल गयी "|
" लेकिन बेटा , अभी तो स्कूटर से काम चल जा रहा था और घर की मरम्मत भी करानी थी , फिर ये कार "?
" क्या पिताजी , आपको तो बस कमियां ही निकालनी होती हैं मुझमे "|
" क्या करूँ , तुम्हारा दुश्मन हूँ न "|

Friday, November 28, 2014

सन्नाटा--

एक बार फिर आवाज आई , लगता था कहीं दूर से आ रही थी | चारो तरफ घटाटोप अँधेरा , उसपर कड़ाके की ठण्ड , हाँथ को हाँथ नहीं सूझ रहा था | हिम्मत करके बिस्तर से उठा और दरवाजे की तरफ बढ़ा | अचानक पैर से ज़मीन पर पड़ा गिलास टकराया और उसके लुढ़कने की आवाज पूरे घर में गूंज गयी | बुरी तरह चौंक गया वो , आजकल हर बात पर जैसे चौंक जाना उसकी आदत में शामिल हो गया था |
उम्र बढ़ने के साथ अब अकेलापन भी बिमारियों में शुमार हो गया है उसके | कभी यही घर कितना भरा रहता था , देर रात तक बच्चों के चिल्लाने की आवाजें , लगता ही नहीं कि कभी सन्नाटा भी था यहाँ | कब बच्चे अपनी दुनियां में खोते और उससे दूर होते चले गए , उसे अहसास ही नहीं हुआ | अब , वो अकेला जिंदगी के अंधेरों से रोशनी का क़तरा ढूँढ रहा था |
कितनी बार वो लड़ पड़ती थी उससे कि मैं जल्दी जाउंगी दुनिया से और तुम बाद में | लेकिन उसने हमेशा यही कहा कि मेरे रहते तुम कैसे जा सकती हो , मैं अकेला नहीं पड़ जाऊंगा | धीरे से बीवी को अपनी आँखों के किनारों को पोंछते देखता था वो , लेकिन अगले ही पल सब भूल जाता था | उसका दिल ये मानने को तैयार ही नहीं था कि कभी ऐसा अकेलापन भी होगा |
कांपते हांथों से उसने दरवाजा खोला , ठण्ड का एक झोंका उसके बदन को चीर गया | बाहर घना अँधेरा था , शायद उसकी जिंदगी से ज्यादा घना | कुत्ता आकर उसके पैरों को छूने लगा | उसने दरवाजे को बंद किया और वापस बिस्तर पर लेट गया , नींद आज फिर उसकी आँखों से कोसों दूर थी | रात फिर सुबह की तरफ ख़रामा ख़रामा बढ़ रही थी |

Tuesday, November 25, 2014

फ़र्क़

" पापा , देखिये कितनी अच्छी ड्रेस लाये हैं हम लोग "|
" अभी पिछले महीने ही तो लिया था तुम लोगों ने , पैसे इस तरह बर्बाद नहीं करते "|
" तुम भी न , उनकी नानी आने वालीं हैं "|

एकलव्य--

' सर , मोहित का सेलेक्शन हो गया सिविल सर्विसेज में , आपको तो फोन किया ही होगा | सब आप के ही गाइडेंस का नतीजा है "|
" एक्सीलेंट , ऐसे ही आगे बढ़ते रहो तुम सब ", कहकर सर ने फोन काट दिया |
अगले दिन के अखबार में उसका साक्षात्कार छपा था , सर का नाम उसमे भी नहीं था |

फिक्र--

" सुनो , वो फ्लैट के लिए जो डिपाजिट भरना था , भर दिया कि नहीं " |
" हाँ , भर दिया है , दाम बहुत बढ़ रहे हैं आजकल फ्लैटों के "|
" चलो , अब दूसरे बेटे के नाम पर भी फ्लैट हो जायेगा "|
" और हाँ पापा की पेंसन के पैसे निकाले , उनकी तबियत का भरोसा नहीं है "|

Saturday, November 15, 2014

बाल दिवस पर--

क्यों हो गए हम इतने बड़े , 
क्यों भूल गए हम वो छोटी छोटी शैतानियाँ ,
क्यों नहीं सुनाता अब कोई परियों की कहानियां ,
आज फिर दिल मचल रहा है ,
कि खेलें आइस पाईस ,
खेलें बम तड़ी , नचाएँ अपने हाथों पर लट्टू ,
काश आ जाएँ वो दिन फिर से वापस ,
बन जाएँ फिर से हम बच्चे ,
खेल खेल में खूब लड़ें ,
क्यों हो गए हम इतने बड़े !!