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Thursday, January 29, 2015

ज़ज्बा--

" मेरे पिता मरे नहीं हैं , शहीद हुए हैं | मुझे गर्व है उनपर और उनकी बेटी होने पर "| आँखों से आंसुओं की बारिश हो रही थी लेकिन चेहरे पर वही दृढ़ता थी | याद आ रही थी कुछ ही दिनों पहले की बात जब पिता छुट्टी पर घर आये हुए थे और मैंने उनसे पूछा था " आपको इस दुनियां में सबसे ज्यादा कौन प्रिय है " और उनका जवाब था " अपनी माँ , भारत माँ "| फिर मेरे उतरे चेहरे को देखकर बोले " अरे तुम तो मेरी जान हो बेटे , लेकिन माँ तो सबसे प्यारी होती है , है ना " और मेरे चेहरे पर पर मुस्कराहट आ गयी |
जिस दिन वापस जाना था , मुझसे कहने लगे कि मैं तो भारत माँ की हिफाज़त के लिए जा रहा हूँ , तुम अपनी माँ की हिफाज़त करना | एक दिन फोन पर मुझसे कहने लगे कि अब ये शरीर अगर माँ के काम आ जाये तो दुखी मत होना | उन्हें इसका पूर्वाभाष हो गया था , शायद माँ की रक्षा करने वाले हर बहादुर सिपाही को इसका आभाष रहता है |
गोलिओं की आवाज आ रही थी , सेना अपने वीर जवान को आखिरी सलामी दे रही थी और मेरा भारत माँ की रक्षा करने का ज़ज्बा और मजबूत हो रहा था |

वजूद--

" आप का नाम क्या है ", बगल में आई नयी पड़ोसन ने पूछा |
वो सोच में पड़ गयी , क्या बताये | शादी के बाद जब से इस घर में आई है तब से तो किसी ने उसके नाम से नहीं पुकारा | शुरू में बहू , फिर मुन्ने की माँ और अब मिसेस शर्मा , यही सुनती आई है वो | शायद तीस साल बहुत होते हैं किसी को खुद का वजूद भूलने के लिए |
वो अपना वजूद ढूँढ रही थी , पड़ोसन चली गयी थी |

Wednesday, January 28, 2015

घर वापसी--

दद्दा बहुत परेशान थे , इस उम्र में आकर अब ये सब करना पड़ेगा| लेकिन बेटा तो सुनने को तैयार ही नहीं था , उसको तो बस एक ही धुन सवार थी और किसी भी तरह से इस कार्यक्रम को सफल बनाना था उसको| राजनीति में धीरे धीरे उसकी पकड़ मजबूत हो रही थी और ये कार्यक्रम तो , उसे यक़ीन था , जैसे उसकी किस्मत का दरवाजा ही खोल देगा|
जिन लोगों की कभी हिम्मत नहीं पड़ती थी कि दरवाजे पर भी आएं , बैठना तो दूर की बात थी , वो लोग अब यहाँ आएंगे और उनको बैठाना पड़ेगा| एक तो वैसे ही विधर्मी लोग ऊपर से उनका सत्कार करना , बड़ी उथल पुथल मची हुई थी दद्दा के के मन में| कितनी बार समझाया बेटे को लेकिन उसने तो सुन के भी अनसुना कर दिया|
दरअसल राजनीती में एक नयी हवा चली हुई थी इस समय , कभी दूसरे धर्मों में चले गए लोगों की पुराने धर्म में वापसी की| और बेटा इस मौके को हाँथ से जाने नहीं देना चाहता था| अपने गांव और अगल बगल के गांव में ऐसी बस्तियाँ थीं जिसमे तमाम ऐसे लोग रहते थे| वो कई हफ़्तों से इन बस्तियों के चक्कर लगा रहा था, उन्हें हर तरीके से समझा रहा था| आग्रह, धमकी और साथ ही साथ धन का प्रलोभन भी सबको दे रहा था| काफी जद्दोजहद के बाद उनमे से कुछ लोग तैयार हो गए और बाक़ी भी शायद देखना चाहते थे कि क्या होता है इन लोगों के साथ| बेटे को तो अब सिर्फ इंतज़ार था कार्यक्रम के सफलता पूर्वक संपन्न होने का|
" अरे बाबू , बहुत बढियां मौका हाँथ लगा है इस बार , अगर ढंग से निपट गया तो समझो अपना तो सिक्का जम जायेगा "| और भी न जाने क्या क्या बोले जा रहा था वो लेकिन दद्दा तो जैसे संज्ञाशून्य हो गए थे|
मंच बन के तैयार था और बाहर से आने वालों का सिलसिला शुरू हो गया था| पार्टी के जिला प्रमुख को इसकी अध्यक्षता करनी थी और प्रेस वाले भी आने लगे| मंच के सामने वाली कुर्सियों में लोग बैठने लगे और बेटा सबका ध्यान रख रहा था| मुख्य अतिथि के आने तक भीड़ काफी इकट्ठी हो गयी| थोड़ी देर के भाषण के बाद उन्होंने एक कोने में बैठे हुए लोगों को बुलाया और बगल में बने हुए यज्ञस्थल पर ले गए| कुछ देर के हवन के बाद उनको एक एक करके कुछ पिलाया जाने लगा और मंच पर से घोषणा होने लगी " इन लोगों की घर वापसी हो गयी है और आगे भी हम लोग इसी तरह से भटके हुए लोगों की घर वापसी करते रहेंगे "| तालियों की गड़गड़ाहट से पूरा क्षेत्र गूंज रहा था और फिर उन लोगों को मंच पर लाया गया|
जल पान बँटने लगा और बेटा उन सभी लोगों को अपने हाँथ से जलपान करा रहा था| दद्दा एक किनारे खड़े होकर ये सब देख रहे थे और सोच रहे थे कि कल सारे दरवाजे की सफाई करवानी पड़ेगी| पत्रकारों ने मुख्य अतिथि और उन लोगों से कुछ सवाल किये और अपनी गाड़ी में सवार होकर निकल गए| उनके पीछे पीछे मुख्य अतिथि भी बेटे को तमाम बधाईयां देते हुए निकले और बाक़ी गाड़ियों का काफिला भी चल पड़ा|
धूल छंट गयी थी और बेटा अपने कार्यक्रम की सफलता पर काफी प्रसन्न था| " देखा बाबू , जिला प्रमुख कितने खुश थे , अब अपना हाँथ कोई नहीं पकड़ सकता "| वो एक कुर्सी पर बैठ गया और भविष्य की कल्पनाओं में खो गया|
" लेकिन क्या ये लोग अब से अपने ही साथ उठेंगे बैठेंगे बेटा ", दद्दू अभी भी उलझन में थे| वो तंय नहीं कर पा रहे थे कि जो लोग कल तक किसी और मज़हब के थे वो आज से अपने धर्म के कैसे हो गए , क्या इतना आसान होता है ये सब| बेटा शायद थकान से सो गया था और उसने जवाब नहीं दिया|
भीड़ छंट जाने के बाद वापसी किये लोग किनारे खड़े थे| अब कोई उन्हें पूछने वाला नहीं बचा था , उनके कदम उन्हें अपने पुराने घर की ओर ले चले| लेकिन अब उनकी अपनी बस्ती में ही उन्हें अलग निगाहों से देखा जा रहा था|
अगले दिन दद्दू सारे दरवाजे की सफाई करवा रहे थे, बेटा जिला प्रमुख के घर बैठा हुआ भविष्य की योजनाओं पर बात कर रहा था| और उस बस्ती में घर वापसी किये लोग समझ नहीं पा रहे थे कि घर वापसी हुई है या अपने ही घर से निकाल दिये गए हैं|


Tuesday, January 27, 2015

दांव पेंच--

" क्या हुआ सलीम साहब , चेहरा इतना उतरा हुआ क्यूँ है ? कहीं फिर इस बार टिकट का मसला तो नहीं फंस गया "|
" नहीं , कुछ नहीं , बस यूँ ही तबीयत कुछ नासाज़ लग रही है "| टाल तो दिया उन्होंने लेकिन अंदर ही अंदर कुछ खाए जा रहा था | पिछली बार भी यही हुआ था , आखिरी समय तक आश्वासन मिलता रहा था कि सीट आपकी पक्की है , इस बार भी उम्मीद नहीं दिख रही |
अगले दिन उन्होंने अख़बारों में खबर छपवा दी " सलीम साहब ने अपनी पार्टी का टिकट ठुकराया "| शाम तक उनको दूसरी पार्टी ने अपना उम्मीदवार घोषित कर दिया |

Monday, January 26, 2015

सलामी--

" साहब रुको, एक मिनट , आपका कुछ गिर गया है ", पीछे से आवाज आ रही थी लेकिन उसने पलट कर भी नहीं देखा | ये सब कुछ मांगने के बहाने हैं या कभी कभी बेवकूफ भी बना देते हैं लोग , सोचते हुए वो आगे वाली बस में चढ़ गया | 
बस चल पड़ी और कंडक्टर को टिकट के पैसे देने के लिए जब उसने हाँथ कोट की जेब में डाला तो उसे जेब हलकी लगी | पर्स तो था लेकिन वो पैकेट नहीं था जिसमे उसने अपना पासपोर्ट , लाइसेंस और कुछ जरुरी कागज़ात रखा हुआ था | उसने तुरंत बस रुकवाई और उतर के पीछे भागा |
घबराया हुआ बस स्टैंड पहुँच कर उसने इधर उधर देखना शुरू किया था कि किसी ने उसे आवाज दी | बगल की दुकान वाला उसे बुला रहा था | उसने उसके चेहरे का मिलान किया और फिर वो पैकेट उसे पकड़ा दिया |
" बहुत बहुत धन्यवाद आपका , मैं शर्मिंदा हूँ कि उस समय आपकी बात पर ध्यान नहीं दिया मैंने , कुछ ले लीजिये आप "| जैसे ही उसने जेब में हाँथ डाला , दुकानदार बोला " धन्यवाद और पैसा आप मुझे मत दो , वो तो एक रिक्शा वाला था जो आपके पीछे दौड़ रहा था ये देने के लिए | मुझे दे गया था कि जिसका है वो यहाँ जरूर यहाँ आएगा तो लौटा देना और बोल देना कि सारे लोग बेईमान नहीं होते "| 
दूर कहीं गाना बज रहा था " सारे जहाँ से अच्छा , हिन्दोस्तां हमारा " और उसके हाँथ अपने आप उस अन्जान रिक्शे वाले को सलामी के लिए उठ गए |

सोच--

" सुने हैं भईया , कौनो बड़का महाराजा आवा है अपने देश में ", हरखू पूछ रहा था |
" अरे हमको तो नाहीं पता , तोके कइसे पता चलल भाई "|
" केहू हमरा के बतावत रहा कि सब सड़क पर से थूक साफ़ भयल हौ , एही से हम सोचलीं "|

Friday, January 23, 2015

दान--

ठण्ड भयानक पड़ने लगी थी और विभिन्न समाजसेवी संस्थाएं रोज लोगों से अपील कर रही थीं कि सड़क के किनारे रह रहे लोगों को गर्म वस्त्र दान करें | सड़क पर तमाम न्यूज़ चैनल की गाड़ियां घूम रही थीं और इन कार्यक्रमों को दिखा रही थीं |
उस मोहल्ले के आखीर में भी एक भिखारी सड़क पर पड़ा हुआ था | कुछ लोगों ने उसे ऊनी कम्बल इत्यादि दान किये और ये भी उन चैनल्स ने कैमरों में कैद किया लेकिन उसकी हल्की बुदबुदाहट पर किसी ने ध्यान नहीं दिया |
सुबह वो भिखारी मरा पड़ा था | लोग खाने के लिए देना भूल गए थे |