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Wednesday, January 28, 2015

घर वापसी--

दद्दा बहुत परेशान थे , इस उम्र में आकर अब ये सब करना पड़ेगा| लेकिन बेटा तो सुनने को तैयार ही नहीं था , उसको तो बस एक ही धुन सवार थी और किसी भी तरह से इस कार्यक्रम को सफल बनाना था उसको| राजनीति में धीरे धीरे उसकी पकड़ मजबूत हो रही थी और ये कार्यक्रम तो , उसे यक़ीन था , जैसे उसकी किस्मत का दरवाजा ही खोल देगा|
जिन लोगों की कभी हिम्मत नहीं पड़ती थी कि दरवाजे पर भी आएं , बैठना तो दूर की बात थी , वो लोग अब यहाँ आएंगे और उनको बैठाना पड़ेगा| एक तो वैसे ही विधर्मी लोग ऊपर से उनका सत्कार करना , बड़ी उथल पुथल मची हुई थी दद्दा के के मन में| कितनी बार समझाया बेटे को लेकिन उसने तो सुन के भी अनसुना कर दिया|
दरअसल राजनीती में एक नयी हवा चली हुई थी इस समय , कभी दूसरे धर्मों में चले गए लोगों की पुराने धर्म में वापसी की| और बेटा इस मौके को हाँथ से जाने नहीं देना चाहता था| अपने गांव और अगल बगल के गांव में ऐसी बस्तियाँ थीं जिसमे तमाम ऐसे लोग रहते थे| वो कई हफ़्तों से इन बस्तियों के चक्कर लगा रहा था, उन्हें हर तरीके से समझा रहा था| आग्रह, धमकी और साथ ही साथ धन का प्रलोभन भी सबको दे रहा था| काफी जद्दोजहद के बाद उनमे से कुछ लोग तैयार हो गए और बाक़ी भी शायद देखना चाहते थे कि क्या होता है इन लोगों के साथ| बेटे को तो अब सिर्फ इंतज़ार था कार्यक्रम के सफलता पूर्वक संपन्न होने का|
" अरे बाबू , बहुत बढियां मौका हाँथ लगा है इस बार , अगर ढंग से निपट गया तो समझो अपना तो सिक्का जम जायेगा "| और भी न जाने क्या क्या बोले जा रहा था वो लेकिन दद्दा तो जैसे संज्ञाशून्य हो गए थे|
मंच बन के तैयार था और बाहर से आने वालों का सिलसिला शुरू हो गया था| पार्टी के जिला प्रमुख को इसकी अध्यक्षता करनी थी और प्रेस वाले भी आने लगे| मंच के सामने वाली कुर्सियों में लोग बैठने लगे और बेटा सबका ध्यान रख रहा था| मुख्य अतिथि के आने तक भीड़ काफी इकट्ठी हो गयी| थोड़ी देर के भाषण के बाद उन्होंने एक कोने में बैठे हुए लोगों को बुलाया और बगल में बने हुए यज्ञस्थल पर ले गए| कुछ देर के हवन के बाद उनको एक एक करके कुछ पिलाया जाने लगा और मंच पर से घोषणा होने लगी " इन लोगों की घर वापसी हो गयी है और आगे भी हम लोग इसी तरह से भटके हुए लोगों की घर वापसी करते रहेंगे "| तालियों की गड़गड़ाहट से पूरा क्षेत्र गूंज रहा था और फिर उन लोगों को मंच पर लाया गया|
जल पान बँटने लगा और बेटा उन सभी लोगों को अपने हाँथ से जलपान करा रहा था| दद्दा एक किनारे खड़े होकर ये सब देख रहे थे और सोच रहे थे कि कल सारे दरवाजे की सफाई करवानी पड़ेगी| पत्रकारों ने मुख्य अतिथि और उन लोगों से कुछ सवाल किये और अपनी गाड़ी में सवार होकर निकल गए| उनके पीछे पीछे मुख्य अतिथि भी बेटे को तमाम बधाईयां देते हुए निकले और बाक़ी गाड़ियों का काफिला भी चल पड़ा|
धूल छंट गयी थी और बेटा अपने कार्यक्रम की सफलता पर काफी प्रसन्न था| " देखा बाबू , जिला प्रमुख कितने खुश थे , अब अपना हाँथ कोई नहीं पकड़ सकता "| वो एक कुर्सी पर बैठ गया और भविष्य की कल्पनाओं में खो गया|
" लेकिन क्या ये लोग अब से अपने ही साथ उठेंगे बैठेंगे बेटा ", दद्दू अभी भी उलझन में थे| वो तंय नहीं कर पा रहे थे कि जो लोग कल तक किसी और मज़हब के थे वो आज से अपने धर्म के कैसे हो गए , क्या इतना आसान होता है ये सब| बेटा शायद थकान से सो गया था और उसने जवाब नहीं दिया|
भीड़ छंट जाने के बाद वापसी किये लोग किनारे खड़े थे| अब कोई उन्हें पूछने वाला नहीं बचा था , उनके कदम उन्हें अपने पुराने घर की ओर ले चले| लेकिन अब उनकी अपनी बस्ती में ही उन्हें अलग निगाहों से देखा जा रहा था|
अगले दिन दद्दू सारे दरवाजे की सफाई करवा रहे थे, बेटा जिला प्रमुख के घर बैठा हुआ भविष्य की योजनाओं पर बात कर रहा था| और उस बस्ती में घर वापसी किये लोग समझ नहीं पा रहे थे कि घर वापसी हुई है या अपने ही घर से निकाल दिये गए हैं|


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