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Tuesday, July 30, 2019

अपनी पहचान- लघुकथा

बादल तो कई घंटों से छाये हुए थे लेकिन बूंदें बरसने का नाम ही नहीं ले रही थीं. पूरा महीना बीतने को आया, इस बार धान का बेहन तक नहीं पड़ पाया है, राजन खेत के मेड़ पर बैठा यही सब सोच रहा था. घर में जाने पर घरवाली का चिंतित चेहरा देखकर उसको सहन नहीं होता था. दरअसल वह कुछ कहती नहीं थी, बस ख़ामोशी से उसका मुंह देखती. और उसका कुछ नहीं बोलना ही उसे अंदर तक सालता था. पिछले साल तो फिर भी जुलाई के आखिर में बारिश हो गयी थी और उसने धान का बेहन डाल दिया था.
"तुम भी आ जाओ शहर, गांव में कुछ नहीं रक्खा है. कम से कम यहाँ दिन भर की मेहनत के बाद रोटी तो नसीब हो जाती है, रहने के लिए भले नर्क जैसी जगह है", पिछले हफ्ते भी उसके दोस्त हरी ने फोन पर कहा था. उसने मना कर दिया था, यहाँ उसकी पहचान तो है, वहां कौन पहचानेगा. घरवाली से भी जब उसने बात की तो उसने भी हामी नहीं भरी. वह भी एक किसान की बेटी थी और अब तक के जीवन में उसने खेती बाड़ी के अलावा कुछ नहीं देखा था.
"थोड़ी दिक्कत तो है लेकिन चला लेंगे गृहस्ती किसी तरह. मेरे मामा भी शहर रहते हैं, मैं एक बार कुछ दिनों के लिए वहां गयी थी लेकिन उस बदबू और घुटन में मैं जी नहीं पाउंगी", घरवाली ने धीरे से कहा था.
एक ही तो गाय है घर में और दो लोग, चला लेंगे किसी तरह से, सोचते हुए वह उठा. कुछ कदम ही चला होगा कि बरसात शुरू हो गयी और घर तक पहुँचते पहुँचते जम के बारिश हो रही थी. दरवाजे पर एक तरह उसकी गाय तो दूसरी तरफ घरवाली बरसात में भींग रहे थे, मानो पिछले कई महीने के सूखे को शरीर से निकाल फेंकना चाहते हों. उसने धीरे से घरवाली का हाथ पकड़ा और दोनों देर तक उस बरसात में भीगते रहे.

Wednesday, July 17, 2019

बाढ़ का पानी- लघुकथा

सुबह से हो रही मूसलाधार बरसात रुकने का नाम ही नहीं ले रही थी, अब तो दोपहर होने वाली थी. पिछले कई दिनों से बादल छाते तो थे लेकिन बरसने में कंजूसी कर देते थे, मानो इसरार की कामना रखते हों. मौसम पिछले कुछ दिनों की तुलना में काफी अच्छा हो गया था, उमस ख़त्म हो गयी. उसके इलाके में पानी भरने लगा था और आज वह काम पर भी नहीं जा पाया. दुकान में उसका एक दोस्त भी काम करता था, जिसने उसकी नौकरी लगवाई थी, ने मालिक को उसके न आ पाने का बता दिया था.
कल रात की उमस में जब वह खाना खाकर पड़ोस के रहमान भाई के यहाँ टी वी देखने गया तो उसके जिले से आने वाली खबरों ने उसे दहला दिया था. रात में ही उसने फोन किया, उसका गाँव अभी तक तो बाढ़ के प्रकोप से बचा था. लेकिन बाढ़ का पानी कभी भी उसके गाँव में घुस सकता था. बाबूजी ने उसे आस्वस्त कर दिया कि पूरा गाँव तैयार है और जैसे ही पानी नजदीक पंहुचेगा, वह लोग निकल जाएंगे.
वह भीगता हुआ फिर से रहमान भाई के घर पंहुचा, उसकी थोड़ी देर पहले ही गाँव पर बात हुई थी, लोग गाँव छोड़कर जा रहे थे. पानी अब धीरे धीरे रहमान भाई के घर के पास बहने लगा था और उनके बच्चे उस पानी में उछल कूद मचा रहे थे. उसको देखते ही वह चिल्लाये "अंकल, देखिये बाढ़ का पानी इधर भी आ गया. खूब मजा आ रहा है".
उसके अंदर एक झुरझुरी सी उठी, उसे तीन साल पहले का मंजर याद आ गया. बाढ़ ने उसका घर तो ढहा ही दिया था, घर की इकलौती गाय भी बाढ़ की भेंट चढ़ गयी थी. और फिर उसे अपना गाँव और परिवार छोड़कर महानगर के इस बजबजाते जगह पर रहना पड़ रहा था. पिछले दो साल की कमाई से उसका गाँव का घर किसी तरह बस रहने लायक ही बन पाया था. दरवाजे के सामने ही खड़ा वह बच्चों को खेलते देख रहा था, तभी उसके मुंह से अस्फुट स्वर में आवाज आयी "बाढ़ के पानी में मजा नहीं आता, बिलकुल नहीं आता".

Monday, July 1, 2019

एक पत्र परमात्मा के नाम

डिअर भगवान, अल्लाह या जीसस
आज बहुत सोचने विचारने के बाद मैं यह पत्र आप सब को लिख रहा हूँ. दरअसल मैं बहुत उलझन में पड़ गया हूँ कि आखिरकार आप सब एक हैं या अलग अलग हैं. क्यूंकि एक धर्म का कोई भी इंसान दूसरे धर्म के परमात्मा को मानने को तैयार ही नहीं होता, सब यही कहते हैं कि उनका वाला ही सही है. अब ऐसे में मेरा बचपन में पढ़ा हुआ वह पाठ कि ऊपर वाला सिर्फ एक ही है, गड़बड़ा जाता है. खैर इसके बावजूद मैं फिलहाल अपने धर्म के परमपिता को ही मान कर आगे बढ़ता हूँ.
अब आप सोच रहे होंगे कि मैं यह सब क्यों लिख रहा हूँ और एक चिट्ठी में भला क्यूँ लिख रहा हूँ. दरअसल मैंने जब भी इस सन्दर्भ में किसी से बात करने की कोशिश की तो उसने इसका संतोषजनक जवाब नहीं दिया. सब लोग बस एक ही बात कहकर निकल जाते हैं कि उनका वाला परमपिता ही इस दुनिया का भला करता है और बाकी सब धर्मों में बस यूँ ही लिखा गया है. खैर मुझे इससे भी बहुत दिक्कत नहीं होती लेकिन जब दुनिया में चारो तरफ तकलीफ और परेशानियों में जूझते लोगों को देखता हूँ तो मेरा मन होता है कि मैं आपसे मिलकर पूछूं कि आखिरकार ऐसा क्यूँ है.
इस पत्र लिखने के पीछे एक और वजह है, और वह है मेरा एक दोस्त जो इन सब चीजों, मतलब भगवान, अल्लाह या जीसस की उपस्थिति को ही बेबुनियाद मानता है. वह इन सब चीजों को पाखंड मानता है और कहता है अगर तुम्हारे भगवान या अल्लाह या जीसस हैं और यह सब घटित होते हुए देख रहे हैं तो फिर उनके रहने या न रहने से क्या फ़र्क़ पड़ता है. अब कुछ दिन ही पहले मुजफ्फरपुर में घटित हुए घटना, जिसमें २०० से ज्यादा बच्चे कालकलवित हो गए, के बारे में उसने मुझसे पूछा कि क्या यह तुम्हारे परमात्मा के रहते उचित था. साथ ही साथ जब उसने मुझसे पूछा कि क्या इसमें से एक भी बच्चा किसी धनी, समर्थ या ताक़तवर परिवार का था तो मुझे कुछ जवाब देते नहीं सूझा. उसने कहा कि अगर कोई तुम्हारा परमपिता है तो वह सिर्फ समर्थ या ताक़तवर (जिन्हें मैं चोर, भ्रष्ट या लुटेरा कहता हूँ), के लिए ही है.
उसने मुझसे पूछा कि बचपन से हम तुम पढ़ते आये हैं कि बुरे काम का अंजाम बुरा होता है, गलत तरीके से कमाया गया धन काम नहीं आता या हमेशा सच्चाई की राह पर चलना चाहिए. लेकिन आज तुम यह बताओ कि क्या वास्तव में बुरे काम का अंजाम बुरा होता है. देश के जितने भी नेता या ब्यूरोक्रेट हैं, उनमें से लगभग ९५ प्रतिशत चोर, भ्रष्ट और पैसे के लिए किसी की जान भी ले लेने वाले हैं. लेकिन तकलीफ में कौन है, कौन दवा की कमी से मरता है, कौन इनका विरोध करके बच पाता है, कौन है जो सही तरीके से पैसे कमाकर इतना बड़ा इंसान बनता है कि वह अपनी आने वाली कई पुश्तों के लिए भी धन संपत्ति बना जाए. वह मुझसे पूछता है कि किन्हीं दस नेताओं के नाम गिना दो जो सत्ता सुख लिए हुए हैं और कम उम्र में मौत के मुंह में चले जाते हैं. देश का शायद ही कोई नेता या अफसर ८० साल की उम्र जीने से पहले मरता है. और इसी देश में मजदूर और गरीब हैं जो अपनी युवावस्था में ही बुजुर्ग दिखते हैं और रिटायरमेंट की उम्र के बहुत पहले ही किसी न किसी रोग या महामारी के चपेट में आकर गुजर जाते हैं. किसी भी सरकारी या अर्धसरकारी विभाग में बड़े अफसरों की माली हालत देख लो, उनके बच्चों को देख लो, सब एकदम व्यवस्थित जिंदगी जी रहे हैं. अगर बुरे तरीके से कमाए हुए पैसों से बरक्कत नहीं होती या इनके बच्चे खराब निकलते तो शायद उन कहावतों में कोई अर्थ होता. अक्सर आई ए एस अफसर का लड़का आई ए एस ही बनता है और पिता ने जो लूट की होती हैं उससे वह कई गुना लूट मचाता है. कहीं कोई दिक्कत नहीं, सब मजे में जीवन गुजारते हैं और एक दिन बेहद धूम धड़ाके के साथ दुनिया को अलविदा कह जाते हैं. इक्का दुक्का लोग भ्रष्टाचार में पकडे जाते हैं और उनमें से भी अधिकांश बरी हो जाते हैं. एकाधा नेता या अफसर जेल की सलाखों के पीछे जाता है लेकिन एकाधा तो अपवाद होते हैं, नियम तो अधिकांश लोगों से होता है.
वह फिर कहता है कि अब मुझे तो इस जन्म में किसी बुरे को उसके कर्म का फल खाते नहीं देखा. जो जितना बुरा होता है वह उतनी ही बढ़िया जिंदगी बसर करता है. इनके गलत काम का विरोध करने वाले अलबत्ता बेमौत मारे जाते हैं. हाँ यह जरूर है कि जो व्यक्ति ईमानदारी की राह पर चलता है उसे वह सारी तकलीफें झेलनी पड़ती हैं, जो शायद बुरे या भ्रष्ट इंसान को झेलने चाहिए (यही तो हमने पढ़ा है और कितना गलत पढ़ा है). परमपिता को गरीबों, असहायों की रक्षा करनी चाहिए लेकिन वह इसके उलट ही कर रहा है और कमोबेश सारे पापी, भ्रष्ट और कुकर्मी सुरक्षित रहते हैं (कुछेक अपवाद हैं लेकिन वह अपवाद ही हैं).
खैर मेरे दोस्त की कुछ बातों को मैं आप तक पहुँचाने का प्रयत्न कर रहा हूँ, सवाल तो उसके बहुत सारे हैं लेकिन न तो इतना समय है कि पूछ सकूँ और न इसका कोई मतलब है. अगर संभव हो तो इन्हीं बातों का जवाब एक खत द्वारा भिजवा देना, शायद उसके साथ साथ मैं भी कुछ समझ सकूँ.
इसी धरती का एक इंसान 

Wednesday, June 12, 2019

जिंदगी की तपिश- लघुकथा

ऑफिस से बाहर निकलते ही उसका सर चकरा गया, गजब की लू चल रही थी. अब तपिश चाहे जितनी भी हो, काम के लिए तो बाहर निकलना ही पड़ता है. फोन में समय देखा तो दोपहर के ३.३० बज रहे थे. इस शहर में वह कम ही आना चाहता है, दरअसल मुंबई जैसे शहर में नौकरी करने के बाद ऐसे छोटे शहरों और कस्बों में उसे कुछ खास फ़र्क़ नजर नहीं आता.
सुबह आते समय तो ठीक था, लेकिन अभी उसे जाने के नाम पर ही बुखार चढ़ने लगा. स्टेशन से इस ऑफिस की दूरी बमुश्किल ३० मिनट की ही थी. लेकिन न तो यहाँ कैब थी और न ही किसी ऑटो के दर्शन हो रहे थे. अब इस धूप में वापस स्टेशन रिक्शे से जाना पड़ेगा, ट्रेन का टाइम भी हो रहा था. बाहर एक रिक्शा खड़ा था लेकिन रिक्शावाला नदारद था. उसने अहाते से ही "रिक्शा, रिक्शा" आवाज लगायी लेकिन कोई दिखाई नहीं दिया. मजबूरन उसे बाहर निकलना पड़ा, लू का थपेड़ा उसके चेहरे को जला गया. जैसे ही वह रिक्शे के पास पहुंचा, एक बुजुर्ग गमछे से चेहरा पोंछते वहां पहुंचा.
"कहाँ जाना है बाबूजी?
उसने एक बार उस बुजुर्ग को देखा और उसकी हिम्मत जवाब जवाब देने लगी. एक तो इतनी भयानक गर्मी, ऊपर से यह बुजुर्ग, कैसे खींचेगा रिक्शा. उसने अगल बगल देखा, दूर एक हटठा   कट्ठा रिक्शा वाला नजर आ रहा था. बुजुर्ग रिक्शावाला भी समझ गया, उसने रिक्शे की छतरी खोलते हुए कहा "बाबूजी, बैठ जाइये, इस रिक्शे से पूरा परिवार खींचता हूँ".
वह धीरे से रिक्शे पर बैठ गया और बोला "स्टेशन ले लो". लू की तपिश अब उसे कम लग रही थी.

Monday, June 10, 2019

माहौल का फ़र्क़- लघुकथा

"अरे महमूद भाई, कहाँ हो. आज सोसाइटी की मीटिंग में नहीं जाना क्या", रजनीश ने घर में कदम रखते हुए आवाज लगायी.
"आ रहे हैं भाई साहब, आजकल पता नहीं क्या हो गया है, ऑफिस से आने के बाद खामोश से रहते हैं", भाभीजान ने पानी का ग्लास रखते हुए कहा.
"कुछ परेशानी होगी ऑफिस की, मैं पूछता हूँ उससे. वैसे भी आजकल काम बहुत बढ़ गया है और तनाव भी", रजनीश ने सोफे पर बैठते हुए कहा और पानी का ग्लास उठा लिया.
"चाचू, मेरी चॉकलेट कहाँ है", कहते हुए छोटी आयी और रजनीश की गोद में चढ़ने लगी. रजनीश ने जेब से चॉकलेट निकाली और छोटी को पकड़ा कर उसे गोद से तुरंत उतार दिया.
"और मेरी किस्सी", छोटी मचली.
अमूमन ऐसे में छोटी को कस कर गोद में भर लेने वाला और उसे कई किस्सी देने वाला रजनीश आज रुक गया. छोटी चॉकलेट लेकर चली गयी, उसने ध्यान नहीं दिया लेकिन भाभीजान की नज़रों ने यह ताड़ लिया.
वह कुछ कहना चाह रही थीं लेकिन रजनीश ने उनके आगे हाथ जोड़ लिए. आज सुबह एक बच्ची के साथ हुए हादसे ने उसे बुरी तरह दहला दिया था.
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"अरे महमूद भाई, कहाँ हो. आज सोसाइटी की मीटिंग में नहीं जाना क्या", रजनीश ने घर में कदम रखते हुए आवाज लगायी.
"आ रहे हैं भाई साहब, आजकल पता नहीं क्या हो गया है, ऑफिस से आने के बाद खामोश से रहते हैं", भाभीजान ने पानी का ग्लास रखते हुए कहा.
"कुछ परेशानी होगी ऑफिस की, मैं पूछता हूँ उससे. वैसे भी आजकल काम बहुत बढ़ गया है और तनाव भी", रजनीश ने सोफे पर बैठते हुए कहा और पानी का ग्लास उठा लिया.
"चाचू, मेरी चॉकलेट कहाँ है", कहते हुए छोटी आयी और रजनीश की गोद में चढ़ने लगी. रजनीश ने जेब से चॉकलेट निकाली और छोटी को पकड़ा कर उसे गोद से तुरंत उतार दिया.
"और मेरी किस्सी", छोटी मचली.
अमूमन ऐसे में छोटी को कस कर गोद में भर लेने वाला और उसे कई किस्सी देने वाला रजनीश आज रुक गया. छोटी चॉकलेट लेकर चली गयी, उसने ध्यान नहीं दिया लेकिन भाभीजान की नज़रों ने यह ताड़ लिया. वह कुछ कहना चाह रही थीं लेकिन रजनीश ने उनके आगे हाथ जोड़ लिए.
"आज से अपने अलावा किसी को भी छोटी को हाथ मत लगाने दीजियेगा, मुझे भी. इस माहौल में अब तो अपने आप से भी भरोसा उठ गया है भाभीजान", रजनीश की आवाज कांप रही थी.


Sunday, June 9, 2019

अलग अलग कारण- लघुकथा

सुबह का अखबार जैसे खून से सना हुआ था, इतनी वीभत्स खबर छपी थी जिसकी कल्पना करके ही दिमाग सुन्न हो जा रहा था. सामने चाय की प्याली रखी हुई थी लेकिन उसे पीने की इच्छा मर चुकी थी. उसने अपना सर पकड़ा और बिस्तर पर ही निढाल हो गयी.
"क्या हो गया है इस समाज को, अब और कितना नीचे गिरेंगे हम लोग?, उसके मुंह से बुदबुदाहट की शक्ल में आवाज निकली. 
कुछ देर बाद कामवाली बाई आयी और उसने देखा कि चाय वैसे ही रखी है तो उसने टोका "मैडम, तबियत ठीक नहीं है क्या? मैं दूसरी चाय बना लाती हूँ और कोई दवा भी ला दूँ क्या?
उसने सर से हाथ हटाया और बाई को देखने लगी. कम उम्र की बाई सुबह सबसे पहले उसके घर ही आती थी और लगभग दोपहर में जाती थी. वापस शाम को आकर फिर रात में ही जाती थी, इसलिए वह उसे उसकी मेहनत से ज्यादा ही पैसा दे देती थी. 
"नहीं मैं ठीक हूँ, तू अभी चाय रहने दे, मन नहीं है", उसने उठते हुए कहा.
बाई ने चाय की ट्रे उठायी और जाते जाते बोली "मैडम, आज शाम को नहीं आउंगी, बिटिया का जन्मदिन है".
उसके चेहरे पर मुस्कराहट फ़ैल गयी, बहुत प्यारी बेटी थी बाई की. कभी कभी बाई उसको ले आती थी तो उसके साथ खेलकर उसे काफी अच्छा लगता था. घरपर वह अकेली ही रहती थी, बच्चे विदेश में थे और पति बहुत पहले ही साथ छोड़ गए थे.
"अच्छा यह बता, आज कहाँ लेकर जायेगी उसे", उसने बाई से पूछा.
बाई के चेहरे पर भी मुस्कराहट आ गयी "कहीं नहीं मैडम, उसे पार्क ले जाउंगी और फिर कुछ बाहर ही खिला दूंगी. ज्यादा रात में डर सा लगता है उस तरफ, इसलिए जल्दी ही घर लौट आउंगी".
उसका दिमाग फिर से उस खबर की तरफ चला गया, वह बच्ची भी तो इसकी बेटी की ही उम्र की थी. 
"तू एक काम कर, आज बेटी को लेकर यहीं आ जा, उसका जन्मदिन हम साथ साथ मनाएंगे. वैसे भी तू अकेली है आजकल, यहीं रुक जाना", उसने कहा तो बाई थोड़ा चौंकी, पहले वह कभी मैडम के यहाँ रात में बेटी के साथ नहीं रुकी थी.
"एक और बात, आगे से तू अपनी बेटी को दिन में यहीं छोड़कर जाया कर, मेरे साथ रहेगी तो मेरा भी मन लगा रहेगा", उसने बाई से कहा. बाई अंदर से बहुत खुश हुई और वह भी, बस दोनों के कारण अलग अलग थे.

Friday, May 31, 2019

अनाम रिश्ता- लघुकथा

भयानक गर्मी लगता था सब कुछ जला डालेगी और ऊपर से लू, दिन में बाहर निकलना लगभग असंभव सा हो गया था. हरी बाबू अपने कमरे में बैठे कूलर की हवा खा रहे थे और बीच बीच में खिड़की के परदे को हटाकर बाहर भी झांक ले रहे थे. पिछले महीने ही रिटायर हुए थे और पहले जहाँ बाबू थे वहां दिन भर लोगों से घिरे रहते थे. इसलिए उनका इस तरह खाली बैठना बेहद कष्टप्रद था, लेकिन कोई उपाय भी नहीं था. बेटे ने सख्त ताकीद कर रखी थी कि दोपहर में बाहर नहीं निकलना है, सुबह शाम चाहे जहाँ भी जाएँ. अब इसके पीछे बेटे की मंशा चाहे जो भी हो लेकिन उनको उसका मना करना अच्छा ही लगता था.
अंदर के कमरे में बहू आराम कर रही थी, अब धीरे धीरे उनकी आदत पड़ गयी थी कि दोपहर में बहू से वह कोई फरमाईश नहीं करें. अव्वल तो वह उठती नहीं थी और अगर उठ भी गयी तो जिस तरह से उनकी फरमाईश किसी न किसी बहाने से टाल देती थी कि उनको समझ में आ गया था. प्यास महसूस हुई तो वह उठे और ख़ामोशी से किचन में जाकर पानी ले आये. पानी टेबल पर रखकर उन्होंने एक बार फिर पर्दा हटाकर बाहर देखा, सड़क पर कर्फ्यू जैसा हाल था. हरी बाबू पर्दा वापस खींचते तभी उनको एक अधेड़ साइकिल से उनके घर की तरफ ही आता दिखाई दिया. उस पूरे इलाके में एक उनके घर के सामने ही मरियल सा गुलमोहर का पेड़ था. गाहे बगाहे कोई धूप का मारा उसके छाँव तले थोड़ा सुस्ताता और फिर आगे बढ़ जाता. छाँव बस इतनी ही होती थी कि कुछ पल के लिए राहत मिले, फिर लू के थपेड़े जता देते थे कि आगे बढ़ना चाहिए.
उस अधेड़ ने साइकिल खड़ी की और अपना गमछा उतार कर उससे चेहरे के बहते पसीने को पोंछने लगा. हरी बाबू की अनुभवी निगाहों ने उसकी वेश भूषा और मूछ दाढ़ी से अंदाजा लगा लिया कि वह एक मुस्लिम है. उनको अचानक याद आया कि रमजान चल रहा है और शायद यह व्यक्ति रोजे से होगा. अपनी नौकरी के दौरान अक्सर वह रमजान के महीने में अपने मुस्लिम साथियों का ध्यान रखते थे और यथासंभव उनके सामने भोजन या जल नहीं ग्रहण करते थे. उस अधेड़ ने गमछे से चेहरा पोंछने के बाद चारो तरफ निगाह दौड़ाई, शायद वह कोई बेहतर जगह तलाश रहा था.
हरी बाबू सोच में पड़ गए, एक तरफ तो उनका मन कहता कि वह उस व्यक्ति को कम से कम एक ग्लास पानी पिला दें. फिर रोजे का ख्याल आता तो मन मना करने लगता. वैसे उनके कुछ साथी रोजा नहीं भी रखते थे इसलिए उनकी इच्छा हुई कि वह आगे बढ़कर उस अधेड़ से पूछ ही लें. उन्होंने दरवाजा खोला, लपट पूरी भयावहता से उनके चेहरे और शरीर के खुले हिस्से से टकराई और वह लड़खड़ा गए. फिर हिम्मत करके वह आगे बढ़े और उस अधेड़ की तरफ मुखातिब हुए "इतनी गर्मी में कहाँ निकल पड़े, लू लग गयी तो लेने के देने पड़ जाएंगे. अगर ऐतराज न हो तो थोड़ा पानी पी लो".
अधेड़ ने उनकी तरफ देखा और पपड़ियाये होठों पर हाथ फेरा "रोजे से हूँ भाईजान, कुछ जरुरी काम से जाना था इसलिए निकल पड़ा. अब इतने दिन निकल गए तो कुछ दिनों के लिए रोजा क्यूँ तोडूं".
हरी बाबू ने उसका चेहरा देखा, दया सी आ गयी उनको. "अच्छा ठीक है पानी मत पीना लेकिन थोड़ी देर आराम कर लो. फिर निकल जाना, अंदर आ जाओ".
अधेड़ ने एक बार फिर उनको देखा, उन्होंने नज़रों से आश्वस्त किया तो अधेड़ उनके पीछे पीछे कमरे में आ गया. कमरे में कूलर की हवा के चलते बहुत राहत थी, उन्होंने अधेड़ को सोफे पर बैठाया और धीरे से पानी का भरा ग्लास उठाकर किचन में ले जाकर रख दिया. ग्लास रखते समय उनको प्यास की पुनः अनुभूति हुई लेकिन उन्होंने पानी नहीं पीना ही उचित समझा.