मंडप में बैठा वह सोच रहा था, कहाँ उसका कुरूप चेहरा और कहाँ यह बेहद खूबसूरत लड़की. लेकिन अब हो भी क्या सकता था, बात इतना आगे बढ़ चुकी थी
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Monday, August 26, 2019
Thursday, August 22, 2019
तबादला - एक अधूरी कहानी
थोड़ी उत्सुकता तो उसको भी थी क्योंकि वहां का लगभग हर कर्मचारी उसके बारे में बता चुका था, सिर्फ वही नहीं आ रहा था. दो दिन पहले ही उसका तबादला यहाँ हुआ था, नया शहर और एकदम नए लोग. अब कोई भी नयी जगह हो तो शुरुआत में मुश्किल तो होती ही है, अपनी पुरानी जगह भी बहुत शिद्दत से याद आती है. अच्छे लोग, साथी कर्मचारी और पुराना वातावरण तो याद आता ही है, कुछ ऐसे लोग भी, जिन्हें आप सख्त नापसंद करते हों, वह भी ऐसे में यादों के कोने में अपनी उपस्थिति दर्ज करा देते हैं.
लेकिन उसे, मतलब मनोहर लाल वर्मा को नयी जगहों पर जाना और नए लोगों से मिलना बहुत पसंद है. उसकी पत्नी तो कहती भी है "तुम्हें तो टूरिज्म डिपार्टमेंट में होना चाहिए था, कहाँ से इस गलत डिपार्टमेंट में आ गए. जब भी मौका मिले, फटाक से तबादला करा लेना उस विभाग में". अलबत्ता ये बात दोनों ही जानते थे कि उसे इसी विभाग से सेवानिवृत्त होना है. खैर पत्नी की तो अब आदत पड़ गयी है लेकिन उसके तबादले से बच्चे अभी भी चिढ़ जाते हैं. अब ये भी बात नहीं है कि वह तबादला जानबूझ कर करवाता है, लेकिन उसकी कार्यप्रणाली ही ऐसी है कि लोग उसे ज्यादा दिन झेल नहीं पाते. वैसे भी आजकल ईमानदार अधिकारी कौन बर्दास्त कर पाता है, सबको तो ऐसा अधिकारी चाहिए जो खुद भी प्रसन्न रहे और अपने मातहतों को भी प्रसन्न रखे.
इस कार्यालय का पहला दिन तो बस लोगों से मिलते जुलते ही बीत गया. वैसे भी व्यक्ति के ख्याति की गति किसी भी वाहन से तेज होती है, क्योंकि उसकी ख्याति उसके पहुँचने से पहले ही पहुँच जाती है. उसके पोस्टिंग के चलते वहां के कर्मचारियों ने तो अपना सर पीट ही लिया था, लेकिन सबको यह सुकून भी था कि वह किसी भी जगह ज्यादा दिन नहीं टिकता है. मतलब बला चाहे जैसी भी हो, जल्द ही कट जायेगी. वैसे भी दुःख चाहे जितना भी बड़ा हो, अगर यह पता चल जाए कि वह कुछ दिन का ही मेहमान है, तो उसे बर्दास्त करना बहुत आसान हो जाता है. मानव स्वभाव ही कुछ ऐसा है कि उसे दुःख तो ऐसा चाहिए जिसकी मियाद कम हो और सुख के मामले में वह मियाद को बीच में लाना ही नहीं चाहता, मतलब बेमियादी सुख.
रात में पत्नी ने फोन किया "कैसा लग रहा है, ऑफिस तो ठीक ही होगा, बस लोग दुखी होंगे, है ना?
उसकी हंसी फूट गयी, उसको तो उसकी पत्नी उससे ज्यादा समझती है. उसने इकरार में सर हिलाया तो अगला सवाल आया "हम लोगों को कब तक निकलना है, बच्चों के स्कूल में टी सी के लिए अप्लाई कर दिया है. सामान समेटने तो आओगे या पिछली बार की तरह मुझे ही सब करना पड़ेगा".
कुछ सवाल ऐसे होते हैं जिनके जवाब वक़्त ही देता है. अब पिछली बार उसे कहाँ पता था कि वह सामान बंधवाने भी नहीं जा पायेगा, बमुश्किल दो दिन कि छुट्टी मिली थी और जाकर सामान सहित वापस आ गया था. खैर उसने दिलासा दिया "तुम तैयारी रखो, मैंने पैकर वाले को बोल दिया है. जैसे ही छुट्टी मिलती है, आ जाऊँगा. वैसे यह जगह बहुत दिलचस्प है, इसे आगरा के समकक्ष रख सकती हो".
आखिरी वाक्य पर पत्नी चौंकी "आगरा के समकक्ष, अरे वह तो औरंगाबाद है जहाँ बीबी का मकबरा है, बिलकुल ताजमहल की रेप्लिका. बुरहानपुर में ऐसा क्या है?
"तुम आना तो खुद ही देख लेना, वैसे जानकारी के लिए बता दूँ कि मुमताज बेगम की मौत यहीं पर हुई थी और उनको यहाँ पर लगभग छह माह तक दफनाया भी गया था. खैर जैसे ही छुट्टी मिलती है, बताता हूँ", और उसने फोन काट दिया.
परसों रविवार है और उस दिन मुमताज बेगम की पुरानी कब्र को देखने वह जरूर जाएगा. भोपाल से बुरहानपुर की दूरी तो बहुत ज्यादा नहीं थी लेकिन सड़क मार्ग थोड़ा गड़बड़ था. वैसे ट्रेनों की संख्या ठीकठाक थी और उससे पहुँचने में समय भी काफी कम लगता था. इसलिए उसने भोपाल से जाते समय ट्रेन ही पसंद किया था. बस एक फ़र्क़ था भोपाल और बुरहानपुर में, जहाँ भोपाल में पेड़ पौधे, हरियाली और अच्छी सड़कें थीं, वहीँ बुरहानपुर में काफी गर्मी थी और इसकी एक वजह जो उसे महसूस हो रही थी, वह थी पेड़ों की कमी. कसबे की सड़कें शाम होते होते पिघल सी जाती थीं और कई बार उसे लगा जैसे उसके जूते सड़क से चिपक कर रह जाएंगे। कूलर की हवा दिन में ऑफिस में तो राहत देती लेकिन शाम को ऑफिस से निकलते ही लू के थपेड़े हालत खराब कर देते थे.
अगले दिन सुबह रोज से कुछ मिनट पहले ही मनोहर अपने कार्यालय में था. कुछ ही देर में लोगों का आना प्रारम्भ हो गया और एक नया चेहरा उसकी नजर में आया. यक़ीनन यह वही होगा, उसने सोचा और अपनी कुर्सी पर बैठे बैठे उसका इंतजार करने लगा.
"मैं अंदर आ जाऊँ सर", उसकी आवाज ने उसे सोच की दुनिया से बाहर निकाल लिया।
"आईये, कैसे हैं आप? उसने मुस्कुराते हुए कहा तो वह भी मुस्कुरा पड़ा.
"मैं शिवचरन, यहाँ पर अकाउंटेंट हूँ. आपके बारे में बहुत सुना है सर", गंभीर आवाज में शिवचरन ने कहा.
"अरे बैठिये शिवचरन जी, मैंने भी आपके बारे में बहुत सुना है. उम्मीद है कि हम दोनों की अच्छी निभेगी, आपके और मेरे विचारों में बहुत साम्य है".
शिवचरन मुस्कुरा दिए, बहुत कम अफसर ऐसे मिले थे जिन्होंने उसे पसंद किया था. दरअसल गलत कार्यों से दूर रहने की प्रवृत्ति के चलते उनको विभाग में अक्सर किनारे कर दिया जाता था. और उनको कुछ लोग तो दबी जबान में बेवकूफ भी कहते थे जो बहती गंगा में हाथ नहीं धोता है. अब ऐसे में अगर अफसर बोले कि हमारी अच्छी निभेगी तो शिवचरण का खुश होना स्वाभाविक था.
लेकिन उसे, मतलब मनोहर लाल वर्मा को नयी जगहों पर जाना और नए लोगों से मिलना बहुत पसंद है. उसकी पत्नी तो कहती भी है "तुम्हें तो टूरिज्म डिपार्टमेंट में होना चाहिए था, कहाँ से इस गलत डिपार्टमेंट में आ गए. जब भी मौका मिले, फटाक से तबादला करा लेना उस विभाग में". अलबत्ता ये बात दोनों ही जानते थे कि उसे इसी विभाग से सेवानिवृत्त होना है. खैर पत्नी की तो अब आदत पड़ गयी है लेकिन उसके तबादले से बच्चे अभी भी चिढ़ जाते हैं. अब ये भी बात नहीं है कि वह तबादला जानबूझ कर करवाता है, लेकिन उसकी कार्यप्रणाली ही ऐसी है कि लोग उसे ज्यादा दिन झेल नहीं पाते. वैसे भी आजकल ईमानदार अधिकारी कौन बर्दास्त कर पाता है, सबको तो ऐसा अधिकारी चाहिए जो खुद भी प्रसन्न रहे और अपने मातहतों को भी प्रसन्न रखे.
इस कार्यालय का पहला दिन तो बस लोगों से मिलते जुलते ही बीत गया. वैसे भी व्यक्ति के ख्याति की गति किसी भी वाहन से तेज होती है, क्योंकि उसकी ख्याति उसके पहुँचने से पहले ही पहुँच जाती है. उसके पोस्टिंग के चलते वहां के कर्मचारियों ने तो अपना सर पीट ही लिया था, लेकिन सबको यह सुकून भी था कि वह किसी भी जगह ज्यादा दिन नहीं टिकता है. मतलब बला चाहे जैसी भी हो, जल्द ही कट जायेगी. वैसे भी दुःख चाहे जितना भी बड़ा हो, अगर यह पता चल जाए कि वह कुछ दिन का ही मेहमान है, तो उसे बर्दास्त करना बहुत आसान हो जाता है. मानव स्वभाव ही कुछ ऐसा है कि उसे दुःख तो ऐसा चाहिए जिसकी मियाद कम हो और सुख के मामले में वह मियाद को बीच में लाना ही नहीं चाहता, मतलब बेमियादी सुख.
रात में पत्नी ने फोन किया "कैसा लग रहा है, ऑफिस तो ठीक ही होगा, बस लोग दुखी होंगे, है ना?
उसकी हंसी फूट गयी, उसको तो उसकी पत्नी उससे ज्यादा समझती है. उसने इकरार में सर हिलाया तो अगला सवाल आया "हम लोगों को कब तक निकलना है, बच्चों के स्कूल में टी सी के लिए अप्लाई कर दिया है. सामान समेटने तो आओगे या पिछली बार की तरह मुझे ही सब करना पड़ेगा".
कुछ सवाल ऐसे होते हैं जिनके जवाब वक़्त ही देता है. अब पिछली बार उसे कहाँ पता था कि वह सामान बंधवाने भी नहीं जा पायेगा, बमुश्किल दो दिन कि छुट्टी मिली थी और जाकर सामान सहित वापस आ गया था. खैर उसने दिलासा दिया "तुम तैयारी रखो, मैंने पैकर वाले को बोल दिया है. जैसे ही छुट्टी मिलती है, आ जाऊँगा. वैसे यह जगह बहुत दिलचस्प है, इसे आगरा के समकक्ष रख सकती हो".
आखिरी वाक्य पर पत्नी चौंकी "आगरा के समकक्ष, अरे वह तो औरंगाबाद है जहाँ बीबी का मकबरा है, बिलकुल ताजमहल की रेप्लिका. बुरहानपुर में ऐसा क्या है?
"तुम आना तो खुद ही देख लेना, वैसे जानकारी के लिए बता दूँ कि मुमताज बेगम की मौत यहीं पर हुई थी और उनको यहाँ पर लगभग छह माह तक दफनाया भी गया था. खैर जैसे ही छुट्टी मिलती है, बताता हूँ", और उसने फोन काट दिया.
परसों रविवार है और उस दिन मुमताज बेगम की पुरानी कब्र को देखने वह जरूर जाएगा. भोपाल से बुरहानपुर की दूरी तो बहुत ज्यादा नहीं थी लेकिन सड़क मार्ग थोड़ा गड़बड़ था. वैसे ट्रेनों की संख्या ठीकठाक थी और उससे पहुँचने में समय भी काफी कम लगता था. इसलिए उसने भोपाल से जाते समय ट्रेन ही पसंद किया था. बस एक फ़र्क़ था भोपाल और बुरहानपुर में, जहाँ भोपाल में पेड़ पौधे, हरियाली और अच्छी सड़कें थीं, वहीँ बुरहानपुर में काफी गर्मी थी और इसकी एक वजह जो उसे महसूस हो रही थी, वह थी पेड़ों की कमी. कसबे की सड़कें शाम होते होते पिघल सी जाती थीं और कई बार उसे लगा जैसे उसके जूते सड़क से चिपक कर रह जाएंगे। कूलर की हवा दिन में ऑफिस में तो राहत देती लेकिन शाम को ऑफिस से निकलते ही लू के थपेड़े हालत खराब कर देते थे.
अगले दिन सुबह रोज से कुछ मिनट पहले ही मनोहर अपने कार्यालय में था. कुछ ही देर में लोगों का आना प्रारम्भ हो गया और एक नया चेहरा उसकी नजर में आया. यक़ीनन यह वही होगा, उसने सोचा और अपनी कुर्सी पर बैठे बैठे उसका इंतजार करने लगा.
"मैं अंदर आ जाऊँ सर", उसकी आवाज ने उसे सोच की दुनिया से बाहर निकाल लिया।
"आईये, कैसे हैं आप? उसने मुस्कुराते हुए कहा तो वह भी मुस्कुरा पड़ा.
"मैं शिवचरन, यहाँ पर अकाउंटेंट हूँ. आपके बारे में बहुत सुना है सर", गंभीर आवाज में शिवचरन ने कहा.
"अरे बैठिये शिवचरन जी, मैंने भी आपके बारे में बहुत सुना है. उम्मीद है कि हम दोनों की अच्छी निभेगी, आपके और मेरे विचारों में बहुत साम्य है".
शिवचरन मुस्कुरा दिए, बहुत कम अफसर ऐसे मिले थे जिन्होंने उसे पसंद किया था. दरअसल गलत कार्यों से दूर रहने की प्रवृत्ति के चलते उनको विभाग में अक्सर किनारे कर दिया जाता था. और उनको कुछ लोग तो दबी जबान में बेवकूफ भी कहते थे जो बहती गंगा में हाथ नहीं धोता है. अब ऐसे में अगर अफसर बोले कि हमारी अच्छी निभेगी तो शिवचरण का खुश होना स्वाभाविक था.
Monday, August 5, 2019
हवस - लघुकथा
पिछले दो घंटे से उसका परिवार इस टाइगर रिज़र्व में घूम रहा था. मौसम भी बेहद शानदार था इसलिए सब खुश थे. अभी तक काफी जानवर दिखाई पड़ गए थे लेकिन शेर से सामना नहीं हुआ था. गाइड लगातार बता रहा था कि वह ऐसी जगह ले चलेगा जहाँ कई शेर देखने को मिलेंगे, पहले बाकी जानवर देख लिए जाएँ. उसने भी सहमति दे दी और उनकी जीप धीरे धीरे जंगल में घूम रही थी.
"अरे यहाँ सिग्नल कमजोर है, आवाज कट रही है. मैंने एक मैसेज किया है, उसे पढ़कर लेक के किनारे वाले फ्लैट की रजिस्ट्री की तैयारी कर लो. मैं परसों तक आ जाऊंगा, मैसेज का जवाब जरूर भेज देना", उसने लगभग चिल्लाते हुए फोन पर बोला. गाइड लगातार उसे शांत रहने का इशारा कर रहा था "सर, यहाँ शोर मत मचाइए, जानवर डिस्टर्ब हो जाते हैं".
एक बार उसके दिल में आया कि वह गाइड को डपट दे, जानवर डिस्टर्ब हो जाते हैं. उसको क्या पता कि उसके इस फ्लैट की रजिस्ट्री कितने दिन से अटकी पड़ी थी, घूमने का मजा किरकिरा हो जाता अगर यह गड़बड़ा जाता. लेकिन उसने पत्नी को अपनी तरफ घूरते पाया तो खामोश रह गया.
"आज रजिस्ट्री का फाइनल हो जाएगा, कितने दिन से फंसा था मामला. आखिरकार सभी बच्चों के नाम एक एक फ्लैट हो गए", उसने खुशी से उछालते हुए पत्नी से कहा. पत्नी ने भी मुस्कुराकर उसका हाथ दबा दिया.
"वो देखिये, दो शेर एक साथ, मैंने कहा था ना", गाइड ने एक तरफ इशारा करते हुए धीरे से कहा.
सब लोग उस तरफ देखने लगे, एक भैंसे के शरीर का कुछ हिस्सा बगल में पड़ा था और शेर आराम से लेटे हुए थे. बेटे ने थोड़ी देर बाद आश्चर्य से पूछा "गाइड अंकल, ये शेर आराम से लेटे हुए हैं, कुछ दूर खड़े हिरन को मार क्यों नहीं रहे?
गाइड ने उसकी तरफ देखते हुए जवाब दिया "बेटे, ये जानवर बस उतना ही खाते हैं जितने से उनकी भूख मिट जाए, उनको ज्यादा की हवस नहीं होती".
"अरे यहाँ सिग्नल कमजोर है, आवाज कट रही है. मैंने एक मैसेज किया है, उसे पढ़कर लेक के किनारे वाले फ्लैट की रजिस्ट्री की तैयारी कर लो. मैं परसों तक आ जाऊंगा, मैसेज का जवाब जरूर भेज देना", उसने लगभग चिल्लाते हुए फोन पर बोला. गाइड लगातार उसे शांत रहने का इशारा कर रहा था "सर, यहाँ शोर मत मचाइए, जानवर डिस्टर्ब हो जाते हैं".
एक बार उसके दिल में आया कि वह गाइड को डपट दे, जानवर डिस्टर्ब हो जाते हैं. उसको क्या पता कि उसके इस फ्लैट की रजिस्ट्री कितने दिन से अटकी पड़ी थी, घूमने का मजा किरकिरा हो जाता अगर यह गड़बड़ा जाता. लेकिन उसने पत्नी को अपनी तरफ घूरते पाया तो खामोश रह गया.
"आज रजिस्ट्री का फाइनल हो जाएगा, कितने दिन से फंसा था मामला. आखिरकार सभी बच्चों के नाम एक एक फ्लैट हो गए", उसने खुशी से उछालते हुए पत्नी से कहा. पत्नी ने भी मुस्कुराकर उसका हाथ दबा दिया.
"वो देखिये, दो शेर एक साथ, मैंने कहा था ना", गाइड ने एक तरफ इशारा करते हुए धीरे से कहा.
सब लोग उस तरफ देखने लगे, एक भैंसे के शरीर का कुछ हिस्सा बगल में पड़ा था और शेर आराम से लेटे हुए थे. बेटे ने थोड़ी देर बाद आश्चर्य से पूछा "गाइड अंकल, ये शेर आराम से लेटे हुए हैं, कुछ दूर खड़े हिरन को मार क्यों नहीं रहे?
गाइड ने उसकी तरफ देखते हुए जवाब दिया "बेटे, ये जानवर बस उतना ही खाते हैं जितने से उनकी भूख मिट जाए, उनको ज्यादा की हवस नहीं होती".
Tuesday, July 30, 2019
अपनी पहचान- लघुकथा
बादल तो कई घंटों से छाये हुए थे लेकिन बूंदें बरसने का नाम ही नहीं ले रही थीं. पूरा महीना बीतने को आया, इस बार धान का बेहन तक नहीं पड़ पाया है, राजन खेत के मेड़ पर बैठा यही सब सोच रहा था. घर में जाने पर घरवाली का चिंतित चेहरा देखकर उसको सहन नहीं होता था. दरअसल वह कुछ कहती नहीं थी, बस ख़ामोशी से उसका मुंह देखती. और उसका कुछ नहीं बोलना ही उसे अंदर तक सालता था. पिछले साल तो फिर भी जुलाई के आखिर में बारिश हो गयी थी और उसने धान का बेहन डाल दिया था.
"तुम भी आ जाओ शहर, गांव में कुछ नहीं रक्खा है. कम से कम यहाँ दिन भर की मेहनत के बाद रोटी तो नसीब हो जाती है, रहने के लिए भले नर्क जैसी जगह है", पिछले हफ्ते भी उसके दोस्त हरी ने फोन पर कहा था. उसने मना कर दिया था, यहाँ उसकी पहचान तो है, वहां कौन पहचानेगा. घरवाली से भी जब उसने बात की तो उसने भी हामी नहीं भरी. वह भी एक किसान की बेटी थी और अब तक के जीवन में उसने खेती बाड़ी के अलावा कुछ नहीं देखा था.
"थोड़ी दिक्कत तो है लेकिन चला लेंगे गृहस्ती किसी तरह. मेरे मामा भी शहर रहते हैं, मैं एक बार कुछ दिनों के लिए वहां गयी थी लेकिन उस बदबू और घुटन में मैं जी नहीं पाउंगी", घरवाली ने धीरे से कहा था.
एक ही तो गाय है घर में और दो लोग, चला लेंगे किसी तरह से, सोचते हुए वह उठा. कुछ कदम ही चला होगा कि बरसात शुरू हो गयी और घर तक पहुँचते पहुँचते जम के बारिश हो रही थी. दरवाजे पर एक तरह उसकी गाय तो दूसरी तरफ घरवाली बरसात में भींग रहे थे, मानो पिछले कई महीने के सूखे को शरीर से निकाल फेंकना चाहते हों. उसने धीरे से घरवाली का हाथ पकड़ा और दोनों देर तक उस बरसात में भीगते रहे.
"तुम भी आ जाओ शहर, गांव में कुछ नहीं रक्खा है. कम से कम यहाँ दिन भर की मेहनत के बाद रोटी तो नसीब हो जाती है, रहने के लिए भले नर्क जैसी जगह है", पिछले हफ्ते भी उसके दोस्त हरी ने फोन पर कहा था. उसने मना कर दिया था, यहाँ उसकी पहचान तो है, वहां कौन पहचानेगा. घरवाली से भी जब उसने बात की तो उसने भी हामी नहीं भरी. वह भी एक किसान की बेटी थी और अब तक के जीवन में उसने खेती बाड़ी के अलावा कुछ नहीं देखा था.
"थोड़ी दिक्कत तो है लेकिन चला लेंगे गृहस्ती किसी तरह. मेरे मामा भी शहर रहते हैं, मैं एक बार कुछ दिनों के लिए वहां गयी थी लेकिन उस बदबू और घुटन में मैं जी नहीं पाउंगी", घरवाली ने धीरे से कहा था.
एक ही तो गाय है घर में और दो लोग, चला लेंगे किसी तरह से, सोचते हुए वह उठा. कुछ कदम ही चला होगा कि बरसात शुरू हो गयी और घर तक पहुँचते पहुँचते जम के बारिश हो रही थी. दरवाजे पर एक तरह उसकी गाय तो दूसरी तरफ घरवाली बरसात में भींग रहे थे, मानो पिछले कई महीने के सूखे को शरीर से निकाल फेंकना चाहते हों. उसने धीरे से घरवाली का हाथ पकड़ा और दोनों देर तक उस बरसात में भीगते रहे.
Wednesday, July 17, 2019
बाढ़ का पानी- लघुकथा
सुबह से हो रही मूसलाधार बरसात रुकने का नाम ही नहीं ले रही थी, अब तो दोपहर होने वाली थी. पिछले कई दिनों से बादल छाते तो थे लेकिन बरसने में कंजूसी कर देते थे, मानो इसरार की कामना रखते हों. मौसम पिछले कुछ दिनों की तुलना में काफी अच्छा हो गया था, उमस ख़त्म हो गयी. उसके इलाके में पानी भरने लगा था और आज वह काम पर भी नहीं जा पाया. दुकान में उसका एक दोस्त भी काम करता था, जिसने उसकी नौकरी लगवाई थी, ने मालिक को उसके न आ पाने का बता दिया था.
कल रात की उमस में जब वह खाना खाकर पड़ोस के रहमान भाई के यहाँ टी वी देखने गया तो उसके जिले से आने वाली खबरों ने उसे दहला दिया था. रात में ही उसने फोन किया, उसका गाँव अभी तक तो बाढ़ के प्रकोप से बचा था. लेकिन बाढ़ का पानी कभी भी उसके गाँव में घुस सकता था. बाबूजी ने उसे आस्वस्त कर दिया कि पूरा गाँव तैयार है और जैसे ही पानी नजदीक पंहुचेगा, वह लोग निकल जाएंगे.
वह भीगता हुआ फिर से रहमान भाई के घर पंहुचा, उसकी थोड़ी देर पहले ही गाँव पर बात हुई थी, लोग गाँव छोड़कर जा रहे थे. पानी अब धीरे धीरे रहमान भाई के घर के पास बहने लगा था और उनके बच्चे उस पानी में उछल कूद मचा रहे थे. उसको देखते ही वह चिल्लाये "अंकल, देखिये बाढ़ का पानी इधर भी आ गया. खूब मजा आ रहा है".
उसके अंदर एक झुरझुरी सी उठी, उसे तीन साल पहले का मंजर याद आ गया. बाढ़ ने उसका घर तो ढहा ही दिया था, घर की इकलौती गाय भी बाढ़ की भेंट चढ़ गयी थी. और फिर उसे अपना गाँव और परिवार छोड़कर महानगर के इस बजबजाते जगह पर रहना पड़ रहा था. पिछले दो साल की कमाई से उसका गाँव का घर किसी तरह बस रहने लायक ही बन पाया था. दरवाजे के सामने ही खड़ा वह बच्चों को खेलते देख रहा था, तभी उसके मुंह से अस्फुट स्वर में आवाज आयी "बाढ़ के पानी में मजा नहीं आता, बिलकुल नहीं आता".
कल रात की उमस में जब वह खाना खाकर पड़ोस के रहमान भाई के यहाँ टी वी देखने गया तो उसके जिले से आने वाली खबरों ने उसे दहला दिया था. रात में ही उसने फोन किया, उसका गाँव अभी तक तो बाढ़ के प्रकोप से बचा था. लेकिन बाढ़ का पानी कभी भी उसके गाँव में घुस सकता था. बाबूजी ने उसे आस्वस्त कर दिया कि पूरा गाँव तैयार है और जैसे ही पानी नजदीक पंहुचेगा, वह लोग निकल जाएंगे.
वह भीगता हुआ फिर से रहमान भाई के घर पंहुचा, उसकी थोड़ी देर पहले ही गाँव पर बात हुई थी, लोग गाँव छोड़कर जा रहे थे. पानी अब धीरे धीरे रहमान भाई के घर के पास बहने लगा था और उनके बच्चे उस पानी में उछल कूद मचा रहे थे. उसको देखते ही वह चिल्लाये "अंकल, देखिये बाढ़ का पानी इधर भी आ गया. खूब मजा आ रहा है".
उसके अंदर एक झुरझुरी सी उठी, उसे तीन साल पहले का मंजर याद आ गया. बाढ़ ने उसका घर तो ढहा ही दिया था, घर की इकलौती गाय भी बाढ़ की भेंट चढ़ गयी थी. और फिर उसे अपना गाँव और परिवार छोड़कर महानगर के इस बजबजाते जगह पर रहना पड़ रहा था. पिछले दो साल की कमाई से उसका गाँव का घर किसी तरह बस रहने लायक ही बन पाया था. दरवाजे के सामने ही खड़ा वह बच्चों को खेलते देख रहा था, तभी उसके मुंह से अस्फुट स्वर में आवाज आयी "बाढ़ के पानी में मजा नहीं आता, बिलकुल नहीं आता".
Monday, July 1, 2019
एक पत्र परमात्मा के नाम
डिअर भगवान, अल्लाह या जीसस
आज बहुत सोचने विचारने के बाद मैं यह पत्र आप सब को लिख रहा हूँ. दरअसल मैं बहुत उलझन में पड़ गया हूँ कि आखिरकार आप सब एक हैं या अलग अलग हैं. क्यूंकि एक धर्म का कोई भी इंसान दूसरे धर्म के परमात्मा को मानने को तैयार ही नहीं होता, सब यही कहते हैं कि उनका वाला ही सही है. अब ऐसे में मेरा बचपन में पढ़ा हुआ वह पाठ कि ऊपर वाला सिर्फ एक ही है, गड़बड़ा जाता है. खैर इसके बावजूद मैं फिलहाल अपने धर्म के परमपिता को ही मान कर आगे बढ़ता हूँ.
अब आप सोच रहे होंगे कि मैं यह सब क्यों लिख रहा हूँ और एक चिट्ठी में भला क्यूँ लिख रहा हूँ. दरअसल मैंने जब भी इस सन्दर्भ में किसी से बात करने की कोशिश की तो उसने इसका संतोषजनक जवाब नहीं दिया. सब लोग बस एक ही बात कहकर निकल जाते हैं कि उनका वाला परमपिता ही इस दुनिया का भला करता है और बाकी सब धर्मों में बस यूँ ही लिखा गया है. खैर मुझे इससे भी बहुत दिक्कत नहीं होती लेकिन जब दुनिया में चारो तरफ तकलीफ और परेशानियों में जूझते लोगों को देखता हूँ तो मेरा मन होता है कि मैं आपसे मिलकर पूछूं कि आखिरकार ऐसा क्यूँ है.
इस पत्र लिखने के पीछे एक और वजह है, और वह है मेरा एक दोस्त जो इन सब चीजों, मतलब भगवान, अल्लाह या जीसस की उपस्थिति को ही बेबुनियाद मानता है. वह इन सब चीजों को पाखंड मानता है और कहता है अगर तुम्हारे भगवान या अल्लाह या जीसस हैं और यह सब घटित होते हुए देख रहे हैं तो फिर उनके रहने या न रहने से क्या फ़र्क़ पड़ता है. अब कुछ दिन ही पहले मुजफ्फरपुर में घटित हुए घटना, जिसमें २०० से ज्यादा बच्चे कालकलवित हो गए, के बारे में उसने मुझसे पूछा कि क्या यह तुम्हारे परमात्मा के रहते उचित था. साथ ही साथ जब उसने मुझसे पूछा कि क्या इसमें से एक भी बच्चा किसी धनी, समर्थ या ताक़तवर परिवार का था तो मुझे कुछ जवाब देते नहीं सूझा. उसने कहा कि अगर कोई तुम्हारा परमपिता है तो वह सिर्फ समर्थ या ताक़तवर (जिन्हें मैं चोर, भ्रष्ट या लुटेरा कहता हूँ), के लिए ही है.
उसने मुझसे पूछा कि बचपन से हम तुम पढ़ते आये हैं कि बुरे काम का अंजाम बुरा होता है, गलत तरीके से कमाया गया धन काम नहीं आता या हमेशा सच्चाई की राह पर चलना चाहिए. लेकिन आज तुम यह बताओ कि क्या वास्तव में बुरे काम का अंजाम बुरा होता है. देश के जितने भी नेता या ब्यूरोक्रेट हैं, उनमें से लगभग ९५ प्रतिशत चोर, भ्रष्ट और पैसे के लिए किसी की जान भी ले लेने वाले हैं. लेकिन तकलीफ में कौन है, कौन दवा की कमी से मरता है, कौन इनका विरोध करके बच पाता है, कौन है जो सही तरीके से पैसे कमाकर इतना बड़ा इंसान बनता है कि वह अपनी आने वाली कई पुश्तों के लिए भी धन संपत्ति बना जाए. वह मुझसे पूछता है कि किन्हीं दस नेताओं के नाम गिना दो जो सत्ता सुख लिए हुए हैं और कम उम्र में मौत के मुंह में चले जाते हैं. देश का शायद ही कोई नेता या अफसर ८० साल की उम्र जीने से पहले मरता है. और इसी देश में मजदूर और गरीब हैं जो अपनी युवावस्था में ही बुजुर्ग दिखते हैं और रिटायरमेंट की उम्र के बहुत पहले ही किसी न किसी रोग या महामारी के चपेट में आकर गुजर जाते हैं. किसी भी सरकारी या अर्धसरकारी विभाग में बड़े अफसरों की माली हालत देख लो, उनके बच्चों को देख लो, सब एकदम व्यवस्थित जिंदगी जी रहे हैं. अगर बुरे तरीके से कमाए हुए पैसों से बरक्कत नहीं होती या इनके बच्चे खराब निकलते तो शायद उन कहावतों में कोई अर्थ होता. अक्सर आई ए एस अफसर का लड़का आई ए एस ही बनता है और पिता ने जो लूट की होती हैं उससे वह कई गुना लूट मचाता है. कहीं कोई दिक्कत नहीं, सब मजे में जीवन गुजारते हैं और एक दिन बेहद धूम धड़ाके के साथ दुनिया को अलविदा कह जाते हैं. इक्का दुक्का लोग भ्रष्टाचार में पकडे जाते हैं और उनमें से भी अधिकांश बरी हो जाते हैं. एकाधा नेता या अफसर जेल की सलाखों के पीछे जाता है लेकिन एकाधा तो अपवाद होते हैं, नियम तो अधिकांश लोगों से होता है.
वह फिर कहता है कि अब मुझे तो इस जन्म में किसी बुरे को उसके कर्म का फल खाते नहीं देखा. जो जितना बुरा होता है वह उतनी ही बढ़िया जिंदगी बसर करता है. इनके गलत काम का विरोध करने वाले अलबत्ता बेमौत मारे जाते हैं. हाँ यह जरूर है कि जो व्यक्ति ईमानदारी की राह पर चलता है उसे वह सारी तकलीफें झेलनी पड़ती हैं, जो शायद बुरे या भ्रष्ट इंसान को झेलने चाहिए (यही तो हमने पढ़ा है और कितना गलत पढ़ा है). परमपिता को गरीबों, असहायों की रक्षा करनी चाहिए लेकिन वह इसके उलट ही कर रहा है और कमोबेश सारे पापी, भ्रष्ट और कुकर्मी सुरक्षित रहते हैं (कुछेक अपवाद हैं लेकिन वह अपवाद ही हैं).
खैर मेरे दोस्त की कुछ बातों को मैं आप तक पहुँचाने का प्रयत्न कर रहा हूँ, सवाल तो उसके बहुत सारे हैं लेकिन न तो इतना समय है कि पूछ सकूँ और न इसका कोई मतलब है. अगर संभव हो तो इन्हीं बातों का जवाब एक खत द्वारा भिजवा देना, शायद उसके साथ साथ मैं भी कुछ समझ सकूँ.
इसी धरती का एक इंसान
आज बहुत सोचने विचारने के बाद मैं यह पत्र आप सब को लिख रहा हूँ. दरअसल मैं बहुत उलझन में पड़ गया हूँ कि आखिरकार आप सब एक हैं या अलग अलग हैं. क्यूंकि एक धर्म का कोई भी इंसान दूसरे धर्म के परमात्मा को मानने को तैयार ही नहीं होता, सब यही कहते हैं कि उनका वाला ही सही है. अब ऐसे में मेरा बचपन में पढ़ा हुआ वह पाठ कि ऊपर वाला सिर्फ एक ही है, गड़बड़ा जाता है. खैर इसके बावजूद मैं फिलहाल अपने धर्म के परमपिता को ही मान कर आगे बढ़ता हूँ.
अब आप सोच रहे होंगे कि मैं यह सब क्यों लिख रहा हूँ और एक चिट्ठी में भला क्यूँ लिख रहा हूँ. दरअसल मैंने जब भी इस सन्दर्भ में किसी से बात करने की कोशिश की तो उसने इसका संतोषजनक जवाब नहीं दिया. सब लोग बस एक ही बात कहकर निकल जाते हैं कि उनका वाला परमपिता ही इस दुनिया का भला करता है और बाकी सब धर्मों में बस यूँ ही लिखा गया है. खैर मुझे इससे भी बहुत दिक्कत नहीं होती लेकिन जब दुनिया में चारो तरफ तकलीफ और परेशानियों में जूझते लोगों को देखता हूँ तो मेरा मन होता है कि मैं आपसे मिलकर पूछूं कि आखिरकार ऐसा क्यूँ है.
इस पत्र लिखने के पीछे एक और वजह है, और वह है मेरा एक दोस्त जो इन सब चीजों, मतलब भगवान, अल्लाह या जीसस की उपस्थिति को ही बेबुनियाद मानता है. वह इन सब चीजों को पाखंड मानता है और कहता है अगर तुम्हारे भगवान या अल्लाह या जीसस हैं और यह सब घटित होते हुए देख रहे हैं तो फिर उनके रहने या न रहने से क्या फ़र्क़ पड़ता है. अब कुछ दिन ही पहले मुजफ्फरपुर में घटित हुए घटना, जिसमें २०० से ज्यादा बच्चे कालकलवित हो गए, के बारे में उसने मुझसे पूछा कि क्या यह तुम्हारे परमात्मा के रहते उचित था. साथ ही साथ जब उसने मुझसे पूछा कि क्या इसमें से एक भी बच्चा किसी धनी, समर्थ या ताक़तवर परिवार का था तो मुझे कुछ जवाब देते नहीं सूझा. उसने कहा कि अगर कोई तुम्हारा परमपिता है तो वह सिर्फ समर्थ या ताक़तवर (जिन्हें मैं चोर, भ्रष्ट या लुटेरा कहता हूँ), के लिए ही है.
उसने मुझसे पूछा कि बचपन से हम तुम पढ़ते आये हैं कि बुरे काम का अंजाम बुरा होता है, गलत तरीके से कमाया गया धन काम नहीं आता या हमेशा सच्चाई की राह पर चलना चाहिए. लेकिन आज तुम यह बताओ कि क्या वास्तव में बुरे काम का अंजाम बुरा होता है. देश के जितने भी नेता या ब्यूरोक्रेट हैं, उनमें से लगभग ९५ प्रतिशत चोर, भ्रष्ट और पैसे के लिए किसी की जान भी ले लेने वाले हैं. लेकिन तकलीफ में कौन है, कौन दवा की कमी से मरता है, कौन इनका विरोध करके बच पाता है, कौन है जो सही तरीके से पैसे कमाकर इतना बड़ा इंसान बनता है कि वह अपनी आने वाली कई पुश्तों के लिए भी धन संपत्ति बना जाए. वह मुझसे पूछता है कि किन्हीं दस नेताओं के नाम गिना दो जो सत्ता सुख लिए हुए हैं और कम उम्र में मौत के मुंह में चले जाते हैं. देश का शायद ही कोई नेता या अफसर ८० साल की उम्र जीने से पहले मरता है. और इसी देश में मजदूर और गरीब हैं जो अपनी युवावस्था में ही बुजुर्ग दिखते हैं और रिटायरमेंट की उम्र के बहुत पहले ही किसी न किसी रोग या महामारी के चपेट में आकर गुजर जाते हैं. किसी भी सरकारी या अर्धसरकारी विभाग में बड़े अफसरों की माली हालत देख लो, उनके बच्चों को देख लो, सब एकदम व्यवस्थित जिंदगी जी रहे हैं. अगर बुरे तरीके से कमाए हुए पैसों से बरक्कत नहीं होती या इनके बच्चे खराब निकलते तो शायद उन कहावतों में कोई अर्थ होता. अक्सर आई ए एस अफसर का लड़का आई ए एस ही बनता है और पिता ने जो लूट की होती हैं उससे वह कई गुना लूट मचाता है. कहीं कोई दिक्कत नहीं, सब मजे में जीवन गुजारते हैं और एक दिन बेहद धूम धड़ाके के साथ दुनिया को अलविदा कह जाते हैं. इक्का दुक्का लोग भ्रष्टाचार में पकडे जाते हैं और उनमें से भी अधिकांश बरी हो जाते हैं. एकाधा नेता या अफसर जेल की सलाखों के पीछे जाता है लेकिन एकाधा तो अपवाद होते हैं, नियम तो अधिकांश लोगों से होता है.
वह फिर कहता है कि अब मुझे तो इस जन्म में किसी बुरे को उसके कर्म का फल खाते नहीं देखा. जो जितना बुरा होता है वह उतनी ही बढ़िया जिंदगी बसर करता है. इनके गलत काम का विरोध करने वाले अलबत्ता बेमौत मारे जाते हैं. हाँ यह जरूर है कि जो व्यक्ति ईमानदारी की राह पर चलता है उसे वह सारी तकलीफें झेलनी पड़ती हैं, जो शायद बुरे या भ्रष्ट इंसान को झेलने चाहिए (यही तो हमने पढ़ा है और कितना गलत पढ़ा है). परमपिता को गरीबों, असहायों की रक्षा करनी चाहिए लेकिन वह इसके उलट ही कर रहा है और कमोबेश सारे पापी, भ्रष्ट और कुकर्मी सुरक्षित रहते हैं (कुछेक अपवाद हैं लेकिन वह अपवाद ही हैं).
खैर मेरे दोस्त की कुछ बातों को मैं आप तक पहुँचाने का प्रयत्न कर रहा हूँ, सवाल तो उसके बहुत सारे हैं लेकिन न तो इतना समय है कि पूछ सकूँ और न इसका कोई मतलब है. अगर संभव हो तो इन्हीं बातों का जवाब एक खत द्वारा भिजवा देना, शायद उसके साथ साथ मैं भी कुछ समझ सकूँ.
इसी धरती का एक इंसान
Wednesday, June 12, 2019
जिंदगी की तपिश- लघुकथा
ऑफिस से बाहर निकलते ही उसका सर चकरा गया, गजब की लू चल रही थी. अब तपिश चाहे जितनी भी हो, काम के लिए तो बाहर निकलना ही पड़ता है. फोन में समय देखा तो दोपहर के ३.३० बज रहे थे. इस शहर में वह कम ही आना चाहता है, दरअसल मुंबई जैसे शहर में नौकरी करने के बाद ऐसे छोटे शहरों और कस्बों में उसे कुछ खास फ़र्क़ नजर नहीं आता.
सुबह आते समय तो ठीक था, लेकिन अभी उसे जाने के नाम पर ही बुखार चढ़ने लगा. स्टेशन से इस ऑफिस की दूरी बमुश्किल ३० मिनट की ही थी. लेकिन न तो यहाँ कैब थी और न ही किसी ऑटो के दर्शन हो रहे थे. अब इस धूप में वापस स्टेशन रिक्शे से जाना पड़ेगा, ट्रेन का टाइम भी हो रहा था. बाहर एक रिक्शा खड़ा था लेकिन रिक्शावाला नदारद था. उसने अहाते से ही "रिक्शा, रिक्शा" आवाज लगायी लेकिन कोई दिखाई नहीं दिया. मजबूरन उसे बाहर निकलना पड़ा, लू का थपेड़ा उसके चेहरे को जला गया. जैसे ही वह रिक्शे के पास पहुंचा, एक बुजुर्ग गमछे से चेहरा पोंछते वहां पहुंचा.
"कहाँ जाना है बाबूजी?
उसने एक बार उस बुजुर्ग को देखा और उसकी हिम्मत जवाब जवाब देने लगी. एक तो इतनी भयानक गर्मी, ऊपर से यह बुजुर्ग, कैसे खींचेगा रिक्शा. उसने अगल बगल देखा, दूर एक हटठा कट्ठा रिक्शा वाला नजर आ रहा था. बुजुर्ग रिक्शावाला भी समझ गया, उसने रिक्शे की छतरी खोलते हुए कहा "बाबूजी, बैठ जाइये, इस रिक्शे से पूरा परिवार खींचता हूँ".
वह धीरे से रिक्शे पर बैठ गया और बोला "स्टेशन ले लो". लू की तपिश अब उसे कम लग रही थी.
सुबह आते समय तो ठीक था, लेकिन अभी उसे जाने के नाम पर ही बुखार चढ़ने लगा. स्टेशन से इस ऑफिस की दूरी बमुश्किल ३० मिनट की ही थी. लेकिन न तो यहाँ कैब थी और न ही किसी ऑटो के दर्शन हो रहे थे. अब इस धूप में वापस स्टेशन रिक्शे से जाना पड़ेगा, ट्रेन का टाइम भी हो रहा था. बाहर एक रिक्शा खड़ा था लेकिन रिक्शावाला नदारद था. उसने अहाते से ही "रिक्शा, रिक्शा" आवाज लगायी लेकिन कोई दिखाई नहीं दिया. मजबूरन उसे बाहर निकलना पड़ा, लू का थपेड़ा उसके चेहरे को जला गया. जैसे ही वह रिक्शे के पास पहुंचा, एक बुजुर्ग गमछे से चेहरा पोंछते वहां पहुंचा.
"कहाँ जाना है बाबूजी?
उसने एक बार उस बुजुर्ग को देखा और उसकी हिम्मत जवाब जवाब देने लगी. एक तो इतनी भयानक गर्मी, ऊपर से यह बुजुर्ग, कैसे खींचेगा रिक्शा. उसने अगल बगल देखा, दूर एक हटठा कट्ठा रिक्शा वाला नजर आ रहा था. बुजुर्ग रिक्शावाला भी समझ गया, उसने रिक्शे की छतरी खोलते हुए कहा "बाबूजी, बैठ जाइये, इस रिक्शे से पूरा परिवार खींचता हूँ".
वह धीरे से रिक्शे पर बैठ गया और बोला "स्टेशन ले लो". लू की तपिश अब उसे कम लग रही थी.
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