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Sunday, December 11, 2016

समझ--लघुकथा

"पापा, आज चलेंगे ना बाजार, यूनिफार्म का कोट लेना है, टीचर डांटती है", सुबह सुबह जैसे ही बिटिया ने हाथ पकड़कर कहा, वह चौंक गया| उसने बेटी को प्यार से देखा, उसके चेहरे पर मासूमियत जैसे भरी पड़ी थी| उसे कल शाम की बात याद आ गयी, पत्नी की फरमाईश से तंग आकर उसने उसे बुरी तरह झाड़ दिया था और वह रोती हुई अपने पिता के घर चली गयी थी| अभी वह परेशान ही था कि बेटी ने भी आकर अपने कोट के लिए कहा और फिर उसको भी उसने वैसे ही डांट दिया था| उसने सोच लिया था कि इस बार महीनों पत्नी से न तो बात करेगा और न ही लेने जायेगा| वैसे भी स्कूल बंद होने जा रहा था, बस बेटी को किसी तरह माँ के साथ नहीं रहने के लिए समझा देगा|
पैसे की तंगी तो चल ही रही थी, ऊपर से ये फरमाईशें| ऐसे में झल्लाहट आ जाती थी उसे और फिर वह अपना आपा खो देता था| लेकिन बेटी के प्यार भरे मनुहार ने उसे जैसे सब कुछ समझा दिया|
"चलो बेटा, तुम्हारा कोट भी ले लेंगे और मम्मी को भी लेते आएंगे", कहते हुए उसने बेटी को गोद में उठाया और घर से निकल गया|   

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