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Saturday, December 17, 2016

असली ख़ुशी--लघुकथा

हर बार की तरह इस बार भी तैयारी हो गयी थी, बच्चों के लिए कापी, पेंसिल, रबर और कुछ अन्य सामान के साथ कुछ मिष्ठान्न भी ले लिए गया था| दोपहर होते होते गांव के स्कूल पहुंचकर उसने जैसे ही सारा सामान निकाल कर रखा, बच्चों की निगाह चमक गयी| कुछ बच्चे तो ख़ुशी से चिल्लाने भी लगे और उठ कर उसके पास आ गए|
"बहुत अच्छा किया आपने जो आ गए, बच्चे तो इंतज़ार ही करते रहते हैं", हेड मास्टर ने मुस्कुराते हुए कहा|
"अरे आना ही था, आखिर आज का दिन स्पेशल जो होता है", कहते हुए उसके चेहरे पर भी चमक आ गयी|
एक बार फिर उसने पूरे स्कूल में देखा, किसी बच्चे ने फुल स्वेटर तो किसी ने हाफ स्वेटर पहना हुआ था| कुछ ही ऐसे थे जो जूते पहने हुए थे और अधिकांश की ड्रेस बहुत गन्दी थी| अचानक उसे अपने द्वारा लायी हुई चीजें अनावश्यक लगने लगीं| इतनी ठण्ड में भी जमीन पर टाट बिछाकर बैठे हुए बच्चों की सारी ऊर्जा तो शायद खुद को ठण्ड से बचाने में ही जाया हो जाती होगी|
अब बच्चों को एक एक कर के सामान बँटना शुरू हुआ, जो भी ले लेता, ख़ुशी से उछलते हुए जाकर टाट पर बैठ जाता| लेकिन अब उसकी ख़ुशी कुछ कम होती जा रही थी| सामान के बाद सब बच्चों को जब मिठाई दी गयी तो उसे कुछ संतुष्टि महसूस हुई| सब सामान देने के बाद उसने एक बार हेड मास्टर से पूछा "अगर आपको लगता है कि इसकी जगह कुछ और दिया जाए बच्चों को तो बता दीजिये, अगली बार से वही करेंगे"|
हेड मास्टर ने थोड़े संकोच से कहा "अब आप जो भी लाते हैं, वह बहुत है, लेकिन अगर इन बच्चों के लिए टेबल और कुर्सी का इंतज़ाम हो जाए तो ठण्ड में इनको आराम हो जायेगा"|
"ठीक है मास्टर जी, करते हैं इंतज़ाम", कहते हुए उसे लगा जैसे उसके मन की बात कह दी हो मास्टरजी ने| चलते समय उसके मन में आया कि अब इस बार जन्मदिन का इंतजार नहीं करके वह पहले ही आएगा और उसके चेहरे पर एक रौशनी फ़ैल गयी|  

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