जब से अहमद मियां बनारस शहर से लौट कर आये थे, उनके मन में बहुत सी बातें चल रही थीं. दर असल उनका साड़ी बुनाई का पुस्तैनी काम था तो कभी कभी शहर जाना हो ही जाता था. इसी सिलसिले में जब वह पिछले महीने साड़ी लेकर शहर गए थे तो उनको अपने पुराने अजीज मित्र रोशन के बारे में पता चला जो बनारस में ही रहते थे और वहीं पर किसी सरकारी विभाग में काम करते थे. बचपन का काफी लम्हा साथ साथ गुजरा था और दोनों मित्रों की आर्थिक दशा कमोबेश एक जैसी ही थी, आर्थिक परेशानियां सुरसा के मुंह की तरह बड़ी थीं और किसी तरह से जीवन कट रहा था. अब इसी आर्थिक परिस्थितियों की वजह से अहमद मियां जल्द ही स्कूल छोड़ कर अपने पुस्तैनी धंधे में लग गए. लेकिन रोशन ने किसी तरह संघर्ष करते हुए पढ़ाई जारी रखी और आज उसी का नतीजा था कि वह सरकारी नौकरी में थे.
स्टूल पर बैठे बैठे ही उन्होंने बीड़ी ख़त्म की और उठ कर बाहर वाले अँधेरे कमरे में चले गए. एक छोटा सा कमरा जिसमें चार मशीने लगी हुई थीं और उस कमरे में उनके साथ उनके तीन बेटे भी साड़ी बुनाई में लगे रहते थे. कमरे में घुसते ही उनको खांसी का दौर आया और खांसते खांसते वह दुहरे हो गए. बेटे अपनी अपनी मशीनों पर बैठकर खट खट करते हुए बुनाई कर रहे थे और कमरे में शोर और धुएं का सम्मिलित साम्राज्य था. घर बहुत छोटा था, इस कमरे के अलावा दो और कमरे थे उनके घर में, एक कमरा ठीक था लेकिन दूसरा कमरा तो बस इतना ही बड़ा था जिसमें एक खाट पड़ सके. बड़ी वाली लड़की की शादी तो उन्होंने किसी तरह कर दी थी लेकिन अभी उसके बाद शादी के लिए दो और लड़कियां बची थीं और ये तीनों लड़के भी.
रोशन के घर को देखकर उनको बहुत सुकून मिला, साफ़ सुथरा दो कमरे का घर. लेकिन उसमें रहने वाले सिर्फ चार ही थे, रोशन, उसकी पत्नी विभा और दो बच्चे, बच्चे भी स्कूल जाने वाले और स्वस्थ तंदरुस्त. जबकि उनके बच्चे न तो प्राइमरी स्कूल के बाद मिडिल स्कूल ही गए और न ही शारारिक रूप से उतने स्वस्थ थे. उनके मोहल्ले में सिर्फ उनके ही घर पर ही नहीं, बल्कि अगल बगल के घरों में भी यही हाल था, न तो साफ़ सफाई थी और न ही खुले हवादार घर. छोटे छोटे दड़बे नुमा घर और उसमें रहने वालों की बहुतायत. बातों बातों में ही जब रोशन ने उसके घर के बारे में पूछा तो उसके बच्चों के बारे में जानकार उसे बहुत आश्चर्य हुआ और उसने कहा भी " अरे, इतने बच्चे कैसे पाल सकते हो आज के जमाने में"?
पिछले महीने ही तो अहमद मियां अपनी दूसरी बेटी सकीना का रिश्ता तंय किया था और तीन महीने बाद की शादी पक्की हुई थी. मुश्किल से अभी बालिग हुई थी वह और पढ़ने में भी उसकी बहुत दिलचस्पी थी. लेकिन एक तो बिरादरी में कोई अपनी लड़कियों को पढ़ाता नहीं, दूसरे कुछ ऊंच नीच न हो जाए, इस डर से उन्होंने प्राइमरी के बाद उसे आगे पढ़ने नहीं भेजा. उनको याद आया कि घर में कोई पुराना भी अखबार आता तो वह उसको बहुत चाव से पढ़ने लगती. अभी वह बेटी के बारे में सोच ही रहे थे कि उसकी आवाज़ उनके कानों में पड़ी "अब्बू, चाय पी लीजिये", और चाय रखकर वह जाने के लिए मुड़ी. अहमद मियां ने गौर से उसका चेहरा देखा जो पता नहीं कमरे की धुंधली रौशनी के चलते या खान पान के चलते, पीला लग रहा था. उनको यकबयक रोशन की बेटी का चेहरा याद आ गया, कितना खिला खिला था और कितनी खुश थी. बेटी घर में चली गयी लेकिन अहमद मियां को जैसे कुछ अंदर से सालने लगा था, एक अपराधबोध सा होने लगा था.
रात में खाट पर लेटे हुए भी उनके दिमाग में बेटियों की ही बातें ही चल रही थीं, काश उनको पढ़ाया होता. फिर सोचते सोचते उन्होंने एक बार फिर बनारस जाने का प्रोग्राम बनाया ताकि कुछ साड़ियों की बिक्री भी कर लेंगे और एक बार फिर रोशन के बच्चों से भी मिल लेंगे. और सुबह जल्दी ही निकल जायेंगे ताकि बनारस में कुछ समय रोशन के साथ बिता पाएं, यही सब सोचते हुए अहमद मियां नींद में खो गए.
साड़ियों की बिक्री करते करते उनको दोपहर हो गयी. उनकी दुकान तंय थी, पिछले कई सालों से उसी दुकान में अपनी साड़ियां बेचते थे अहमद मियां. हां ये जरूर था कि आजकल बनारस आना जाना ज्यादा हो गया था, पहले तो अक्सर घर पर या आस पड़ोस में ही बेच देते थे, जो भी दाम मिल जाए. अपनी समझ से एक बढ़िया साड़ी उन्होंने रख ली थी रोशन के घर पर देने के लिए, दरअसल पिछली बार कुछ भी नहीं ले जा पाए थे. रोशन के घर पहुंचकर उन्होंने घंटी बजायी तो थोड़ी देर बाद उसकी पत्नी विभा ने दरवाजा खोला.
"अरे अहमद भैया, अंदर आ जाईये ना", कहते हुए उसने दरवाजा खोल दिया.
"रोशन भाई नहीं है क्या", अहमद मियां ने पूछा, उनको याद भी नहीं था कि रोशन तो दफ्तर में काम करता है.
"वो शाम को ही आएंगे, ऑफिस गए हैं", विभा ने बताया तो वह झेंप गए.
"अरे हम तो ठहरे गांव के मजदूर आदमी, भूल ही गए थे कि रोशन भाई ऑफिस जाते हैं", अहमद मियां ने सकुचाते हुए कहा और उसकी पत्नी को साड़ी वाला पॉलिथीन पकड़ाते हुए वापस जाने लगे.
"अरे आप आराम से बैठिये और चाय पीजिये, वह आ जायेंगे. ये भी आप का ही घर है, पिछली बार आपके जाने के बाद आपके बारे में बहुत सारी बात हुई थी", विभा के मनुहार को अहमद मियां टाल नहीं पाए और अंदर आकर सोफे पर बैठ गए.
विभा पानी लेकर आयी और उनसे पूछ बैठी "इसमें क्या है अहमद भैया?"
"हमने अपने हाथों से बनायीं है यह साड़ी, देखो ठीक है कि नहीं", कहते हुए उनके चेहरे पर चमक आ गयी.
"आपने खुद बनायी है हमारे लिए, तब तो बहुत ही अच्छी होगी", कहते हुए विभा ने साड़ी बाहर निकाल लिया. साड़ी तो कमाल की सुंदर थी और उसपर हाथ फेरते हुए विभा को जैसे अपनापन सा महसूस हो रहा था.
"सच में बहुत ही सुंदर है यह साड़ी, मैंने ऐसी साड़ी शायद ही कभी पहनी हो. अगर आप बुरा न मानें तो मैं एक बात कहूँ?, विभा ने मुस्कुराते हुए कहा.
"अरे बेझिझक कहो, मैं क्यों बुरा मानूंगा", अहमद मियां ने खुश होते हुए कहा. आज पहली बार किसी ने उनकी बनायी साड़ी की दिल से तारीफ़ की थी.
"अगर आप इसकी कीमत बता दें तो मैं कुछ और ऐसी साड़ियां लेना चाहूंगी", विभा ने उनकी तरफ देखते हुए कहा.
अहमद मियां को आभास तो हो गया था कि विभा को साड़ी बेहद पसंद आयी है, इसलिए इस सवाल पर उनको आश्चर्य नहीं हुआ. लेकिन कीमत के बारे में तो उन्होंने सोचा ही नहीं था, आखिर भाभी के लिए तोहफा था, वह सोच में डूब गए.
विभा ने उनके असमंजस को ताड़ लिया और बोली "देखिये अहमद भैया, आप इतनी मेहनत से बनाते हैं और इसको बनाने में खर्च भी बहुत लगता है. अगर हम बाजार से ऐसी साड़ी लेना चाहें भी तो शायद मुझे इतनी सुंदर साड़ी नहीं मिलेगी और अगर मिल भी गयी तो अनाप सनाप दाम में मिलेगी. इसलिए आप बेहिचक मुझे बता दें कि आप इसे कितने में बेचते हैं और वह कीमत मुझसे ले लें".
"आप मुझे बता दो कि कितनी साड़ियां चाहिए, मैं उनको अगले कुछ हफ्ते में तैयार कर दूंगा और ले आऊंगा. बाकी कीमत की बात मैं आपसे नहीं कर पाउँगा भाभी", अहमद मियां ने हाथ जोड़ते हुए कहा.
विभा समझ गयी कि अमहद मियां उसको कीमत नहीं बता पाएँगे. उसने बात को दूसरे तरफ मोड़ते हुए कहा "आप पिछली बार बता रहे थे कि आप के बेटी की शादी है कुछ महीने बाद. आप जब अगली बार जब भी आईयेगा तो उसे भी साथ लेकर आईयेगा और हो सके तो भाभीजी को भी. अब उनसे मिलने की बड़ी इच्छा हो रही है".
"जरूर लाऊंगा उनको आप के घर, वो सब भी बहुत खुश होंगी", अहमद मियां ने भी मुस्कुराते हुए कहा.
"मैं चाय लाती हूँ", कहकर विभा अंदर चली गयी. अहमद मियां भी टाँग सीधी करने लगे, थोड़ी देर में चाय आयी और वह आराम से चाय पीने लगे. विभा भी कुछ नाश्ते वगैरह के इंतज़ाम में लग गयी.
इस बीच दोनों बच्चे भी बारी बारी से कालेज से आये और अहमद मियां को नमस्कार करके अंदर चले गए. कुछ देर में उन्होंने बिटिया को पुकारा "बिटिया, थोड़ी देर के लिए हमारे पास आओ जरा".
विभा ने बेटी राशि को बोला कि अहमद मियां बुला रहे हैं और वह आकर उनके पास बैठ गयी. बहुत प्यार से उसकी तरफ देखते हुए अहमद मियां ने पूछा "किस क्लास में पढ़ती हो बिटिया?
"अंकल, मैं तो बारहवीं में हूँ, साइंस लिया है".
"अच्छा, तुम्हारा मन तो खूब लगता होगा पढ़ाई में", अहमद मियां ने उसे पुचकारते हुए कहा.
"हाँ अंकल, खूब मन लगता है पढ़ने में और मजा भी आता है. वैसे आपकी बेटी सकीना किस क्लास में पढ़ती है?, उसने पूछा.
अहमद मियां एकदम से बुझ से गए, काश उनकी बेटी भी पढ़ रही होती. अब तो उनको लगने लगा था कि उसको भी पढ़ाना चाहिए था. उन्होंने भरे मन से राशि की तरफ देखा और बोले "वह नहीं पढ़ती है".
राशि को जैसे शॉक लग गया, उसके लिए यह कल्पना करना भी मुश्किल था कि कोई बच्चा पढ़ाई नहीं करता है. उसने अविश्वास से अहमद की तरफ देखा गोया पूछ रही हो कि क्या वो सच कह रहा है. फिर उसने पूछ ही लिया "क्यों नहीं पढ़ती है सकीना, स्कूल तो होंगे ही आपके गांव में?
अहमद मियां को जवाब नहीं सूझ रहा था और यह भी लग रहा था कि आखिर उसे ये सब कैसे बताएं. कुछ देर तक वह सर को झुकाये बैठे रहे मनो वह अपना अपराध कुबूल कर रहे हों. कहीं न कहीं उनके अंदर ये अपराधबोध पैदा तो हो ही चुका था, बस इसका समाधान उन्हें नहीं सूझ रहा था. कुछ तो जवाब देना ही था सोचकर उन्होंने बोलने के लिए सर उठाया तभी विभा ट्रे में नाश्ता लेकर आ गयी. उसने दोनों को गंभीर मुद्रा में देखा तो पूछ बैठी "अरे क्या बात चल रही थी चाचा भतीजी में, कुछ ज्यादा ही गंभीर मसला लगता है?
अहमद मियां ने लम्बी सांस ली और बोल पड़े "दरअसल बिटिया सकीना के पढ़ाई के बारे में पूछ रही थी. अब आपसे क्या छुपाना, हमारे यहाँ गांव में लोग लड़कियों को पढ़ाना नहीं चाहते हैं, इसीलिए हम भी सकीना को पढ़ा नहीं पाए. वैसे वह बहुत होशियार है और पढ़ने की ललक भी है उसमें?
विभा के समझ में नहीं आया कि अब वो क्या बोले, राशि की मनोस्थिति भी वह समझ रही थी. खैर बात को बदलने के लिहाज से वह बोली "अहमद भैया आप नाश्ता कीजिये, अगली बार जब आप सकीना और भाभीजी के साथ आईयेगा तब हम लोग ढेर सारी बातें करेंगे".
अहमद भाई नाश्ते के प्लेट से कुछ लेकर खाने लगे और राशि भी उठकर चली गयी. थोड़ी देर के बाद अहमद भाई ने शुक्रिया कहकर विदा ली और विभा के द्वारा दिए गए मिठाई के डिब्बे को लेकर अपने गांव चल पड़े. पूरे रास्ते उनके मन में बस यही एक बात आती रही कि काश सकीना को आगे पढ़ाया होता, काश अपने लोगों की परवाह नहीं की होती. लेकिन अब तो समय काफी निकल चुका था और सकीना का निकाह भी तंय हो चुका था, इसलिए उनको कोई सूरत नजर नहीं आ रही थी.
उधर अहमद मियां के जाने के बाद विभा और राशि में भी सकीना के पढ़ाई और उनके सद्व्यवहार के बारे में काफी देर तक बात होती रही. दोनों ही यह चाह रहे थे कि काश वे लोग अहमद भाई की कुछ मदद कर पाते, उनकी बेटी सकीना की पढ़ाई के लिए कुछ कर पाते. उधर अहमद मियां अपने गांव पहुंचे, इधर रोशन अपने घर.
"आज अहमद भैया आये थे और देखिये कितनी खूबसूरत साड़ी लाये हैं मेरे लिए", विभा ने आते ही साड़ी रोशन के सामने रख दिया. अब साड़ी तो बढ़िया थी ही इसलिए रोशन भी तारीफ़ किये बिना नहीं रह पाया.
"कितने की है ये साड़ी, महंगी लगती है", रोशन ने पूछा.
"यही तो दिक्कत है कि उन्होंने कीमत नहीं बताई और मैं भी ज्यादा जोर नहीं दे पायी कि कहीं उनको बुरा न लग जाए", विभा ने लम्बी सांस लेते हुए कहा.
रोशन को भी समझ में आ गया कि कीमत पूछने पर शायद अहमद को कमतरी महसूस होती इसलिए विभा ने जोर नहीं देकर अच्छा ही किया.
"खैर तोहफा तो काफी अच्छा दिया है उन्होंने, बदले में हमें भी तो कुछ देना चाहिए, कुछ दिया क्या तुमने?
"नहीं, आज तो मैंने नहीं दिया. लेकिन अगली बार उनको बेटी और भाभी के साथ आने के लिए बोला है, उस समय सबके लिए दे देंगे", विभा ने कहा.
"ये भी ठीक किया तुमने, वैसे उसका गांव ज्यादा दूर नहीं है यहाँ से, हमारे गांव से पास में ही है", रोशन ने पानी पीते हुए कहा.
"पापा, आज अहमद अंकल आये थे, उनकी बेटी सकीना पढ़ाई नहीं कर रही है, बड़ा अजीब लगा मुझे", राशि ने रोशन के पास बैठते हुए कहा तो रोशन को भी झटका लगा.
"अच्छा, यह अहमद ने बताया.वैसे उनकी कौम में लड़कियों को ज्यादा पढ़ाना आसान नहीं होता, बहुत सी पाबंदियां हैं उनमें", रोशन ने राशि की तरफ देखते हुए कहा.
थोड़ी देर के लिए वहां सन्नाटा छाया रहा फिर राशि ने ही सन्नाटा तोड़ा "हमें कुछ करना चाहिए पापा, आखिर वो आपके दोस्त हैं".
"ठीक है, कुछ सोचते हैं इसके लिए. एक कप चाय तो पिलाओ विभा".
उधर अहमद मियां जब अपने घर पहुंचे तो खोये खोये से थे. सकीना ने उनके हाथ से मिठाई का डब्बा लिया और पूछा "इस बार आप मिठाई कहाँ से खरीद लाये?
अहमद ने मुस्कुराते हुए कहा "अपने दोस्त रोशन के यहाँ गया था, उसकी बेगम ने खूब बढ़िया नाश्ता भी कराया और तुम्हारे लिए यह मिठाई भी भेजी है. उनकी बच्ची भी बहुत प्यारी है, हमसे खूब बात की उसने".
सकीना मिठाई का डब्बा लेकर अंदर चली गयी, अहमद ने कपड़े बदले, एक बीड़ी पी और फिर चाय पीने बैठ गए. चाय पीते पीते उन्होंने पत्नी शबनम की तरफ नजर डाली और बोले "आज भाभी ने तुमको और सकीना को बनारस लाने का कई बार इसरार किया, एक बार चलना ही पड़ेगा. अगले हफ्ते जब बनारस जाने का प्रोग्राम बनेगा तो तुम दोनों भी साथ चलना".
शबनम सोच में डूब गयी, अपने रिश्तेदारियों के अलावा वह आज तक कहीं गयी नहीं थी. शहर जाने के नाम पर वैसे भी थोड़ी घबराहट होनी ही थी, ऊपर से पहली बार मिलने जाना था.
"आप और सकीना ही हो लीजियेगा, मुझे ठीक नहीं लगता ऐसे जाना", शबनम ने बचने की कोशिश की.
"अरे नहीं, तुम भी चलो, भाभी से मिलकर खुश हो जाओगी. इस बार रविवार को चलेंगे जिससे रोशन भी घर पर ही हो", अहमद भाई ने चाय ख़त्म की और साड़ी की बुनाई वाले कमरे की तरफ बढ़ गए.
शबनम सारी रात लगभग जागती ही रही, ऐसा मौका पहले कभी नहीं आया था. लेकिन उसके मन में भी बनारस जाने और रोशन भाई और भाभीजी से मिलने की इच्छा जोर मारने लगी थी. खैर रात बस आँखों ही आँखों में बीती और सुबह होते ही उसने फैसला कर लिया कि बनारस चलते हैं. उनको सबसे ज्यादा उत्सुकता सकीना को लेकर थी, उसे कैसा लगेगा, वह खुश तो होगी ना.
अगले हफ्ते अहमद मियां अपने काम में डूबे रहे, सकीना की शादी की तैयारी और बनारस में साड़ी बेचने की तैयारी, उनके दिन रात बराबर थे. शबनम भी बनारस जाने की तैयारी में लग गयी, अपनी पुरानी साड़ी को धोकर चमकाया और सकीना के लिए भी एक नया सूट ले लिया. वैसे भी सकीना के लिए नए कपड़े ख़रीदे ही जा रहे थे, साड़ी में बस दो महीने ही तो बचे थे.
अहमद मियां के जाने के अगले दिन शाम को जब रोशन घर आया तो राशि जैसे उसका ही इंतज़ार कर रही थी. उसने अपना बैग सोफे पर रखा और पैर लम्बा कर के बैठ गया, राशि ने एक ग्लास पानी पीने के लिए रख दिया.
"पापा, आपने कुछ सोचा अहमद अंकल और सकीना के लिए?
रोशन ने पानी के ग्लास से अपना गाला तर किया और सोचने लगा कि क्या जवाब दे. उसने अभी कुछ सोचा नहीं था, वास्तव में उसे समय ही नहीं मिल पाया था कि वह कुछ सोचे. उसका चेहरा देखकर राशि समझ गयी और उसने ही आगे कहा "शायद आपको समय नहीं मिल पाया होगा लेकिन मैंने कुछ सोचा है. एक तो सकीना की पढ़ाई जरुरी है और दूसरे उसकी शादी भी आगे बड़वानी पड़ेगी, अभी उसकी उम्र ही कितनी है. इस बार जब अहमद अंकल सकीना के साथ आएंगे तो हमें उनको इसके लिए किसी भी तरह से राजी करना होगा".
रोशन बस राशि को देखता ही रह गया, कब वह इतनी बड़ी और समझदार हो गयी. इसी बीच विभा भी चाय लेकर आ गयी थी और उसने भी राशि की बात सुन ली थी.
"राशि बिलकुल ठीक कह रही है रोशन, हमें अहमद भाईसाहब को समझाना ही पड़ेगा. और मैंने तो एक और बात भी सोची है, मैंने इसके लिए अहमद भाईसाहब से पूछा भी था लेकिन उन्होंने मना कर दिया था. हम उनसे साड़ी मंगवाकर अपने परिचितों को बेच सकते हैं और उनको अपने काम की वाजिब कीमत भी मिल जायेगी. बाजार में तो बिचौलिए ही सब मुनाफा लूट लेते हैं", विभा ने भी एक सांस में सब बोल दिया.
रोशन दंग रह गया, उसका अपना परिवार इतनी अच्छी सोच रखता है, इसका उसे इल्म भी नहीं था. उसने उठकर बेटी राशि को गले लगाकर चूम लिया और विभा को भी अपनी बाँहों में समेट लिया.
"अगर तुम लोग इतना सोच रहे हो तो हम बिलकुल ऐसा ही करेंगे, आने दो इसबार अहमद को, उसको सब समझाता हूँ".
दोनों तरफ तैयारियां चल रही थीं, अहमद के घर बनारस आने की और रोशन के घर अहमद मियां को समझाने की. उधर अहमद मियां इन चीजों से बेखबर साड़ियों की बुनाई में जी जान से लगे हुए थे और रोशन की बेगम के लिए भी एक और साड़ी बुनने की तैयारी भी कर रहे थे. इस दरम्यान लगभग 10 दिन बीत गए और अहमद ने बनारस चलने की तैयारी कर ली.
"अरे सकीना, अपनी अम्मा से पूछ तो कि कल बनारस चलने की तैयारी हो गयी है या नहीं. और तुमको भी चलना है इस बार, याद है ना?
सकीना जल्दी से घर के अंदर गयी और उसने अम्मा को अब्बू की बात बता दी. वैसे तो उसे भी मालूम ही था कि जल्दी ही बनारस चलना है, रोशन चाचा के घर. शबनम ने हाँ में सर हिलाया और खाना पकाने में लगी रही.
अगले दिन सुबह जल्दी ही तीनों एक बैग में साड़ियां और दूसरे बैग में कुछ और सामान रखकर बनारस चल दिए. अहमद ने सोचा कि पहले रोशन के घर चलकर बेगम और सकीना को छोड़ देंगे और फिर साड़ियों को लेकर बाजार निकल जाएंगे. रविवार का दिन था इसलिए रोशन भी घर पर ही था. जैसे ही डोरबेल कि आवाज आयी, राशि ने दरवाजा खोला. सामने अहमद अंकल को देखते ही उसने पापा को आवाज लगायी और अंकल को नमस्ते करके सबको अंदर ले आयी. रोशन ने भाभी को नमस्कार किया और अहमद के गले लग गया. सकीना ने भी नमस्ते किया और इतनी देर में विभा भी आ गयी. सभी लोग वहीं सोफे पर बैठ गए, वैसे शबनम को वहां बैठने में काफी अटपटा सा लग रहा था.
"बेटी सकीना, तुम राशि के साथ उसके कमरे में जाओ और आराम करो. हम सब यहाँ गप्पे मारेंगे", रोशन ने राशि को इशारा किया और दोनों बच्चियां अंदर चली गयीं.
"कितनी खूबसूरत बेटी है आपकी भाभीजी, बिलकुल आप पर गयी है. मेरी तो नजर ही नहीं हट रही थी उससे", विभा ने शबनम के हाथ को अपने हाथ में लेकर कहा तो वह शर्मा गयीं.
"बिटिया तो आपकी भी बहुत सुंदर है और कितने सलीके वाली भी है. हम तो गांव के हैं और हमारी बेटी भी, आप लोगों से मिलने की बड़ी इच्छा थी".
"मैं चाय बनाकर लाती हूँ और कुछ नाश्ता भी, आप लोग यहीं बैठिये", विभा उठकर किचन की तरफ जाने लगी.
"आपको ऐतराज न हो तो मैं भी चलूँ आपके साथ", शबनम ने कहा तो विभा उनको लेकर किचन में चली गयी.
"और भाई अहमद, कैसे हो आजकल. आज तो तुमने दिल खुश कर दिया, तुमको अंदाजा भी नहीं होगा कि हम लोगों को कितना अच्छा लग रहा है. खैर तुम्हारी साड़ियां कहाँ हैं, विभा बहुत तारीफ़ कर रही थी उनकी".
अहमद मियां भी अंदर से बेहद खुश थे, आखिर उनको भी पुराने दोस्त के घर परिवार सहित आने का मौका मिला था.
"मुझे भी बेहद ख़ुशी हो रही है रोशन भाई, अब दोनों परिवार भी आपस में मिल गए, इससे अच्छा और क्या हो सकता था. साड़ियां उस बैग में रखी हैं, चाय पीकर मैं उन्हें बाजार लेजाऊंगा और फिर कुछ घंटे बाद वापस आकर गांव निकल जाऊंगा"
"अच्छा एक काम करो, जब तक चाय नाश्ता आता है, तब तक मुझे उन साड़ियों को देख लेने दो", रोशन ने कहा तो अहमद ने बैग खोलकर ऊपर रख दिया.
"बड़ी खूबसूरत साड़ियां हैं, इनकी तो बहुत अच्छी कीमत मिल जाती होगी बाजार में", रोशन ने कहा तो अहमद ने एक लम्बी सांस भरी.
"अब तुमसे क्या छिपाना रोशन, अच्छी कीमत मिलती तो हमारे भी दिन फिर जाते. आढ़त पर बेचना हमारी मज़बूरी है और जो कीमत वह हमें देते हैं उससे बहुत ज्यादा कीमत में बाजार में बेचते हैं".
रोशन ने सहमति में सर हिलाया "अच्छा ये बताओ अहमद, अगर तुमको सीधे बेचने को मिल जाए तो अच्छा होगा कि नहीं".
"काश ऐसा होता, बहुत बेहतर हो जाता तब तो", अहमद सोच में डूब गया.
"तो एक काम करो, मुझे इन साड़ियों की सही कीमत बता दो जिसपर तुम इन्हें बेचना चाहते हो, हम कोशिश करेंगे कि इन्हें बिकवा सकें", रोशन ने अहमद को देखते हुए कहा.
अहमद ने कुछ पल सोचा, शायद अनुमान लगा रहा था कि क्या ऐसा हो सकता है.
"लेकिन तुम कहाँ बेचोगे, तुम तो नौकरी करते हो, कोई दूकान थोड़े चलाते हो", अहमद ने सवाल किया.
"तुम इसकी चिंता छोड़ दो, मैं और विभा अपने सर्किल में इन्हें बेचने की कोशिश करेंगे. वैसे भी जो साड़ी तुम पिछली बार लाये थे, वह बहुत से लोगों को पसंद आ गयी है".
अहमद को भरोसा नहीं हो रहा था लेकिन उसने सोचा कि देख लेने में क्या हर्ज है.
"ठीक है, मैं साड़ियों की कीमत बता देता हूँ. तुम कोशिश करके देख लो, वर्ना अगले हफ्ते आढ़त में दे दूंगा", अहमद ने एक एक करके साड़ियों की कीमत रोशन को बता दी.
उधर नाश्ता बन गया था और दोनों महिलायें नाश्ता लेकर आ गयीं. रोशन और अहमद ने अपने अपने प्लेट में नाश्ता लिया और खाने लगे.
"वाह, मजा आ गया भाभीजी, बहुत स्वदिष्ट नाश्ता बनाया है आपने", अहमद ने मुस्कुराते हुए कहा तो रोशन ने भी सर हिलाया.
"दोनों ने मिलकर बनाया है इसीलिए इतना स्वादिष्ट बना है", विभा ने हँसते हुए कहा तो सब मुस्कुरा उठे.
"बच्चे भी खा रहे हैं ना?, रोशन के सवाल पर विभा ने हामी में सर हिलाया.
नाश्ते के बाद चाय पीते हुए रोशन ने कहा "अहमद, एक चीज कहना चाहता था, लेकिन तुम इसमें बुरा मत मानना".
"अरे मैं भला क्यों बुरा मानने लगा, तुम तो मेरे भले के लिए ही कहोगे", अहमद ने जवाब दिया और रोशन की तरफ देखने लगा.
"नहीं ये तुम्हारी अपनी जाती जिंदगी का सवाल है इसलिए मैंने बोला. अच्छा सकीना की शादी इतनी जल्दी करना जरुरी है क्या, अभी उसकी उम्र ही क्या है. थोड़ा और बड़ी हो जाने दो फिर सोचना", रोशन के सवाल पर थोड़ी देर के लिए सन्नाटा छा गया. शबनम ने अहमद की तरफ देखा कि वह क्या जवाब देगा, अहमद सोच में पड़ गया. थोड़ी देर बाद अहमद ने हलके स्वर में जवाब दिया "देखो रोशन, तुम्हारी और मेरी परिस्थिति और हैसियत में ज़मीन आसमान का अंतर है. तुम शहर में रहते हो और अपनी बच्ची को जितना चाहे पढ़ा सकते हो. लेकिन हमारे यहाँ तो बच्चियों को पढ़ाना कहाँ आसान है, उन्हें तो बस प्राइमरी तक पढ़ाकर शादी कर दी जाती है. अब सकीना पढ़ाई भी तो नहीं कर रही है तो शादी करने के अलावा और कोई रास्ता भी नहीं है हमारे पास".
एक एक बात सही थी अहमद के हिसाब से लेकिन रोशन के लिए ये सब उचित नहीं था. वह अपनी जगह से उठा और अहमद के बगल में जाकर बैठ गया. कुछ देर तक वह अहमद के हाथ को अपने हाथ से सहलाता रहा फिर शबनम भाभी की तरफ मुखातिब होकर बोला "आखिर सकीना पढ़ क्यों नहीं सकती, तुम ही तो कहते थे कि उसकी पढ़ाई में बहुत रूचि है. और अगर बात स्कूल की है या माहौल की है तो तुम उसे हमारे यहाँ रखकर पढ़ा सकते हो. यक़ीन मानो, इसमें शायद सबसे ज्यादा ख़ुशी विभा और राशि को ही होगी".
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