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Friday, March 31, 2017

अनकहे सवाल-- लघुकथा

सुबह से ही उसका दिल बुरी तरह धड़क रहा था, कितने ही प्रकार की आशंका उसके मन में उमड़ घुमड़ रही थी| रह रह कर उसके दिमाग में उसके मित्र की बात आ रही थी "सिर्फ सही लिख देने से ही नहीं हो जाता सब कुछ, और भी बहुत कुछ करना पड़ता है इसके लिए| वैसे तुम कहो तो कुछ बात करूँ मैं, रेट तो सबको पता है और सही आदमी को मैं जानता हूँ"|
उसने सर हिलाकर इनकार कर दिया, कहना और भी बहुत कुछ चाह रहा था लेकिन उसने अपने अंदर ही जज्ब कर लिया| क्या इतनी जी तोड़ मेहनत उसने इसीलिए की थी कि अंत में यह भी करना पड़े, पैसे तो वैसे भी नहीं थे उसके पास|
दोपहर जैसे जैसे नजदीक आ रही थी, उसका घर में रहना कठिन होने लगा| एक तो माँ की नजर हमेशा कुछ सवाल करती रहती थी, हालाँकि कहती कुछ भी नहीं थी वह| दूसरे कहीं भाभी से आमना सामना हो गया तो कुछ न कुछ सुनना ही पड़ जाता था| उसने वही पुरानी वाली जीन्स पहनी और फोन लेकर चुपचाप निकल गया, पता नहीं क्यों उसको लगने लगा था कि जब भी वह इस जीन्स को पहनता था, कुछ बेहतर होने की सम्भावना लगती थी|
अपनी पुरानी चाय की दूकान वाले अड्डे पर आकर वह बैठ गया और कब उसके पास चाय आ गयी और वह पी भी गया, उसे पता नहीं चला| चाय वाले ने उसको टोका "क्या बात है भैया, आज कुछ बोल नहीं रहे" तो उसने अपने आप को यथासंभव सामान्य करते हुए मुस्कुराने की नाकाम कोशिश की|
"कुछ नहीं चाचा, आज रिजल्ट है ना, उसी के चलते थोड़ा सोच रहा था", और उसने एक बार अपने फोन में समय देखा| अब तक तो रिजल्ट आ गया होगा, सोचकर उसका दिल बैठने लगा| अगर उसका नाम होता तो जरूर फोन आता, आज भी वह खुद रिजल्ट देखने की हिम्मत नहीं जुटा पाता था| तभी फोन बजा, स्क्रीन पर दोस्त का ही नाम था, उसने तुरंत उठाया और बात करने लगा|
कुछ ही मिनटों बाद वह सर झुकाये वापस जा रहा था, माँ की आँखों के सवालों का जवाब आज भी उसके पास नहीं था|

Tuesday, March 14, 2017

चुन्नूलाल की होली-- लघुकथा

और फिर चुन्नूलाल निकल पड़े जेब में रंग की पुड़िया लेकर, आज तो मौका भी था होली का तो फिर क्या सोचना| पिछले एक साल से जब जब उसको देखते, उनके दिल में रंग ही रंग उमड़ने लगते| लेकिन सामने पड़ते ही हिम्मत जवाब दे देती, कहाँ  वह बला की खूबसूरत और कहाँ चेचक के दाग वाला उनका चितकबरा मुँह| कभी कभी तो उसको देखने के बाद पूरा पूरा दिन अपनी शक्ल ही आईने में नहीं देखते थे|
एक बार तो बस में सामने ही बैठी दिख गयी थी तो उस दिन अपना स्टॉप उनको याद ही नहीं रहा| बस से उतर कर वापसी की बस पकड़ी और ऑफिस पहुंचे और तमाम बहाने बनाने के बाद भी काफी जलालत झेली थी उन्होंने| खैर अब ऐसे हाल में कहाँ फ़र्क़ पड़ना था तो नहीं पड़ा और चुन्नूलाल मौके ढूंढते रहे| लेकिन तमाम कोशिशों के बाद भी चुन्नूलाल पिछले कई महीनों में उससे बात करने का कोई मौका नहीं पा सके थे| लेकिन वह इस बात से भी बेखबर थे कि उनके इस दीवानगी की भनक उसको लग चुकी थी| और इसी वजह से अब उनको कोई भी मौका नहीं मिल पा रहा था उसके आस पास भी पहुँचने का|
आज चुन्नूलाल जैसे ही उसके दरवाजे के सामने पहुंचे, उसने देख लिया| इधर चूनूलाल जेब से रंग की पुड़िया निकाल कर उसके सामने पहुंचे, उधर उसके दोस्तों ने चूनूलाल को पकड़ कर उठाया और कीचड़ के ढेर में पटक दिया| किसी तरह कीचड़ से निकलकर चुन्नूलाल भागे, लेकिन पीछे से आती हंसी ऐसा लगता था जैसे उनके साथ साथ ही चल रही थी|     

Monday, March 6, 2017

गुलाल-- कहानी

और एकदम से लहुरी पंडित के हाथ से गुलाल की पुड़िया खुली और सुगनी के सर से लेकर चेहरे पर अब रंग ही रंग नजर आ रहा था| अचकचा तो वह भी गए और सुगनी भी, लेकिन अब तो रंग चढ़ चुका था और लहुरी के दिल में भी कुछ रंग आने लगे| कितने ही महीनों से सोच रहे थे लहुरी, गाहे बगाहे अहिरान के इस तरफ चले भी आते, लेकिन ना तो कभी हिम्मत पड़ी और ना कभी कुछ कह पाए|
याद तो उनको भी नहीं पड़ता था कि कब सुगनी उनके मन में उतर गयी| छोटपने में तो जब मर्जी वह अहिराने चले जाते थे और उनके दरवाजे पर भी सुगनी अपने माई के साथ आ जाती थी| कई पीढ़ी से यही चलन था कि लहुरी पंडित के घर की गइया को दुहने का काम अहिराने में सगुनी के घर वाले ही करते थे| अच्छी खासी खेती भी थी और कई गाय बैल भी दरवाजे पर शोभा बढ़ाते थे| धीरे धीरे समय के साथ बैल नहीं रहे लेकिन गायें तो अभी भी थीं और उनके दूध के लिए अहिराने वाले आते रहे| उम्र में भी ज्यादे फ़र्क़ नहीं था उनके और सगुनी के, इसलिए भी दोनों साथ साथ खेल भी लेते थे| कुछ ही सालों में उनको लगने लगा कि सगुनी के साथ बतियाना और खेलना उनको बहुत अच्छा लगता था| बस उनकी छोटपन से ही बदमासी की आदत थी और किसी को भी मार देते थे| शुरू शुरू में तो सगुनी रोते हुए उनकी शिकायत घर पर कर देती या अपनी माई से कहती लेकिन कुछ बड़े होने पर उन्होंने महसूस किया कि अब सुगनी उनसे मार खाकर भी किसी से शिकायत नहीं करती थी| उनको थोड़ा अजीब तो लगता था, लेकिन फिर तुरंत भुला भी देते थे|
एकदिन तो उन्होंने गुस्से में सुगनी का सर गइया के नाद से कस के लड़ा दिया| सुगनी चीखी और उसके सर से खून बह निकला, लहुरी की हालात ख़राब हो गयी कि आज तो बहुत डांट पड़ेगी| अभी वह यह सब सोच ही रहे थे कि सुगनी की माई सामने से आती दिखी| लहुरी के पैर वहीँ जम कर रह गए, कुछ समझ में नहीं आ रहा था कि कहाँ भागें| सुगनी की माई भी बहते खून को देखकर घबरा गयी लेकिन सुगनी ने कह दिया कि वह फिसलकर नाद पर गिर गयी थी| अगले कुछ दिन तक लहुरी सुगनी से आंख नहीं मिला पाए थे, कुछ तो अंदर से कचोटता था उनको|
धीरे धीरे उनको लगने लगा था कि सुगनी उनको बहुत अच्छी लगती है| उसके आस पास भी होते तो उनको दुनियां बहुत सुंदर लगने लगती| कई बार कुछ कहना चाहते लेकिन समझ नहीं पाते कि क्या कहें| हाँ, सुगनी ने जरूर कई बार उनको छेड़ा "का पंडित, आजकल बहुत सज धज के रहते हो, कौनो पसंद आ गयी है का?
लहुरी शर्मा जाते, कुछ कहने का सोचते लेकिन तब तक सुगनी आँखों के सामने से ओझल हो जाती| उनको पता भी नहीं चला कि कब वह लहुरी से पंडित हो गए सुगनी के लिए|
उधर उन दोनों के विचारों से अनजान सुगनी के घरवालों ने एक रिश्ता ढूँढ लिया उसके लिए| वैसे भी ना तो लहुरी की हिम्मत थी कि कुछ कहें और ना ही सुगनी ने सोचा था| बस कुछ महीनों के अंदर ही सुगनी के दरवाजे पर बारात आयी और वह अपने घर चली गयी| शादी के लिए वह लहुरी को कहने भी आयी थी लेकिन लहुरी जा नहीं पाए| "पंडित आओगे ना हमारी शादी में", कई बार पूछा सुगनी ने लेकिन लहुरी का सर हामी के लिए नहीं हिला| लहुरी का पूरा परिवार सुगनी की शादी में गया, सबने उनको भी कहा लेकिन सर दर्द का बहाना बना कर लेटे ही रहे लहुरी|
शादी बीत गयी, रात मे बजता गाजा बाजा उनको तकलीफ देता रहा, वह चाह कर भी अनसुना नहीं कर पाए. समय के साथ साथ टीस थोड़ी कम तो हुई लेकिन पूरी तरह से ख़त्म नहीं हुई. अब तो अहिरान की तरफ जाने से भी कतराने लगे लहुरी पंडित, कुछ काम भी पड़ता तो महटिया जाते| 

हार या जीत--लघुकथा

"ऊ कोने वाली ज़मीन हमारे नाम लिख दो नहीं तो बहुत पछताओगे", दुक्खू के कान में रज्जू के शब्द एक बार फिर गूंज रहे थे| सालों से उसकी नजर थी उस ज़मीन पर, लेकिन दुक्खू बेचने के लिए तैयार नहीं था|
"वही तो एक ठो ठीक ज़मीन है हमारे पास, उसको कैसे दे दें| और आपके पास ज़मीन की कौन सी कमी है", दुक्खू ने जवाब दिया था और आगे बढ़ गया|
रोड से सटे उस कोने वाली ज़मीन के चलते रज्जू का प्लाट टेढ़ा था, और उसने कई बार समझाने का प्रयास किया दुक्खू को| आखिरकार उसने धमकी भी दे डाली लेकिन दुक्खू ने कान नहीं दिया|
होलिका दहन के समय इस बार रज्जू ने खूब मेहनत की, सारे गाँव को बुलाया और दुक्खू के घर भी गया बुलाने| इधर सारा गाँव होलिकादहन के लिए इकठ्ठा हुआ और उधर दुक्खू के घर की तरफ कुछ साये लपके|
थोड़ी देर बाद ही एक जगह होलिका जल रही थी तो दूसरी तरफ दुक्खू अपने घर को जलता देख रहा था| रज्जू अपनी जीत पर उल्लास मना रहा था लेकिन दुक्खू ने अब अपने उसी कोने वाली ज़मीन पर अपना झोपड़ा बनाने का इरादा कर लिया|