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Monday, March 6, 2017

गुलाल-- कहानी

और एकदम से लहुरी पंडित के हाथ से गुलाल की पुड़िया खुली और सुगनी के सर से लेकर चेहरे पर अब रंग ही रंग नजर आ रहा था| अचकचा तो वह भी गए और सुगनी भी, लेकिन अब तो रंग चढ़ चुका था और लहुरी के दिल में भी कुछ रंग आने लगे| कितने ही महीनों से सोच रहे थे लहुरी, गाहे बगाहे अहिरान के इस तरफ चले भी आते, लेकिन ना तो कभी हिम्मत पड़ी और ना कभी कुछ कह पाए|
याद तो उनको भी नहीं पड़ता था कि कब सुगनी उनके मन में उतर गयी| छोटपने में तो जब मर्जी वह अहिराने चले जाते थे और उनके दरवाजे पर भी सुगनी अपने माई के साथ आ जाती थी| कई पीढ़ी से यही चलन था कि लहुरी पंडित के घर की गइया को दुहने का काम अहिराने में सगुनी के घर वाले ही करते थे| अच्छी खासी खेती भी थी और कई गाय बैल भी दरवाजे पर शोभा बढ़ाते थे| धीरे धीरे समय के साथ बैल नहीं रहे लेकिन गायें तो अभी भी थीं और उनके दूध के लिए अहिराने वाले आते रहे| उम्र में भी ज्यादे फ़र्क़ नहीं था उनके और सगुनी के, इसलिए भी दोनों साथ साथ खेल भी लेते थे| कुछ ही सालों में उनको लगने लगा कि सगुनी के साथ बतियाना और खेलना उनको बहुत अच्छा लगता था| बस उनकी छोटपन से ही बदमासी की आदत थी और किसी को भी मार देते थे| शुरू शुरू में तो सगुनी रोते हुए उनकी शिकायत घर पर कर देती या अपनी माई से कहती लेकिन कुछ बड़े होने पर उन्होंने महसूस किया कि अब सुगनी उनसे मार खाकर भी किसी से शिकायत नहीं करती थी| उनको थोड़ा अजीब तो लगता था, लेकिन फिर तुरंत भुला भी देते थे|
एकदिन तो उन्होंने गुस्से में सुगनी का सर गइया के नाद से कस के लड़ा दिया| सुगनी चीखी और उसके सर से खून बह निकला, लहुरी की हालात ख़राब हो गयी कि आज तो बहुत डांट पड़ेगी| अभी वह यह सब सोच ही रहे थे कि सुगनी की माई सामने से आती दिखी| लहुरी के पैर वहीँ जम कर रह गए, कुछ समझ में नहीं आ रहा था कि कहाँ भागें| सुगनी की माई भी बहते खून को देखकर घबरा गयी लेकिन सुगनी ने कह दिया कि वह फिसलकर नाद पर गिर गयी थी| अगले कुछ दिन तक लहुरी सुगनी से आंख नहीं मिला पाए थे, कुछ तो अंदर से कचोटता था उनको|
धीरे धीरे उनको लगने लगा था कि सुगनी उनको बहुत अच्छी लगती है| उसके आस पास भी होते तो उनको दुनियां बहुत सुंदर लगने लगती| कई बार कुछ कहना चाहते लेकिन समझ नहीं पाते कि क्या कहें| हाँ, सुगनी ने जरूर कई बार उनको छेड़ा "का पंडित, आजकल बहुत सज धज के रहते हो, कौनो पसंद आ गयी है का?
लहुरी शर्मा जाते, कुछ कहने का सोचते लेकिन तब तक सुगनी आँखों के सामने से ओझल हो जाती| उनको पता भी नहीं चला कि कब वह लहुरी से पंडित हो गए सुगनी के लिए|
उधर उन दोनों के विचारों से अनजान सुगनी के घरवालों ने एक रिश्ता ढूँढ लिया उसके लिए| वैसे भी ना तो लहुरी की हिम्मत थी कि कुछ कहें और ना ही सुगनी ने सोचा था| बस कुछ महीनों के अंदर ही सुगनी के दरवाजे पर बारात आयी और वह अपने घर चली गयी| शादी के लिए वह लहुरी को कहने भी आयी थी लेकिन लहुरी जा नहीं पाए| "पंडित आओगे ना हमारी शादी में", कई बार पूछा सुगनी ने लेकिन लहुरी का सर हामी के लिए नहीं हिला| लहुरी का पूरा परिवार सुगनी की शादी में गया, सबने उनको भी कहा लेकिन सर दर्द का बहाना बना कर लेटे ही रहे लहुरी|
शादी बीत गयी, रात मे बजता गाजा बाजा उनको तकलीफ देता रहा, वह चाह कर भी अनसुना नहीं कर पाए. समय के साथ साथ टीस थोड़ी कम तो हुई लेकिन पूरी तरह से ख़त्म नहीं हुई. अब तो अहिरान की तरफ जाने से भी कतराने लगे लहुरी पंडित, कुछ काम भी पड़ता तो महटिया जाते| 

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