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Tuesday, October 17, 2017

कार की स्पीड बहुत ज्यादा थी, इतनी बेताबी तो उसे इधर कई महीनों में नहीं हुई थी जितनी आज थी| कई महीने बाद आज गांव जा रहा था और त्यौहार नज़दीक था तो बहुत सारी चीजें भी उसने खरीद रखी थीं| परिवार कल ही गांव चला गया था, दरअसल इस बार पिताजी ने इस तरह से बुलाया था कि वह ना नहीं कर पाया|
"अब तो चला चली का बेला आ गया है, इस बार घर के पास भी हो और छुट्टी भी है| अगर हो सके तो इस बार का त्यौहार हमारे साथ ही मना लो", पिताजी के शब्दों ने जैसे उसे अंदर तक भेद दिया था|
"अरे पिताजी, आप ऐसी बात क्यों कहते हैं, हम तो आपके साथ ही त्यौहार मनाएंगे इस बार| और चली चला की बात मत कीजिये, अभी तो आपको नाती की शादी भी देखनी है", उसने जैसे अपने आप को दिलासा देते हुए कहा|
लगभग बीस साल तो हो ही गए थे उसे अपने गांव से गए, शुरू में नौकरी पास में ही थी तो शादी के पहले तो वह गांव से ही आता जाता था| फिर शादी हुई और उसके कुछ महीने बाद माँ ने ही उसे जबरदस्ती शहर की राह पकड़ा दी "अरे मेरी बहू शहर से है और उसे यहाँ दिक्कत होती है| वह कहती नहीं है लेकिन मुझे तो दिखता है सब, तू अब शहर में ही एक कमरा लेकर रह| लेकिन यहाँ भी आता जाते रहना, बाबूजी तुमको देखते हैं तो उनकी उम्र बढ़ जाती है", माँ ने समझाते हुए कहा था|
कुछ दिन के ना नुकुर के बाद वह शहर चला गया, पत्नी भी बहुत तैयार नहीं थी माँ पिताजी को अकेले छोड़ने के लिए| लेकिन माँ ने कहा कि तुम लोग हर हफ्ते आते रहना तो वह मान गयी| लेकिन शहर जाने के कुछ ही महीने के अंदर उसका तबादला बहुत दूर हो गया और फिर साल में एकाध बार ही आना होता था| माँ पिताजी बीच बीच में आते रहते थे लेकिन उनका मन तो गांव में ही रमा रहता इसलिए जल्द ही वापस चले जाते| दोनों बच्चों के समय तो माँ खूब समय साथ रही और ऐसा लगा कि अब शायद ही वापस जाए| लेकिन पिताजी को होने वाली असुविधा के चलते वह भी गांव चली गयी|
अब सड़क थोड़ी खराब हो चली थी तो उसकी स्पीड भी कम हो गयी, गांव अब कुछ ही दूर रह गया था| अचानक उसने तेजी से ब्रेक लगाया, सामने एक बुजुर्ग साइकिल लेकर सड़क पर गिर पड़े थे| ब्रेक लगाते ही कार धुंए का गुबार उड़ाते रुक गयी, वह कार से बाहर निकला और बुजुर्ग को उठाने के लिए झुका| जैसे ही उसकी नजर उनपर पड़ी, वह दंग रह गया, यह तो सजीवन काका हैं| हाथ का सहारा देकर उसने उनको सड़क के किनारे बैठाया और फिर उनकी साइकिल किनारे खड़ी कर दी|
"अरे काका, आप इस तरह साइकिल से क्यों घूम रहे हैं, मैं पानी लाता हूँ", कहते हुए उसने कार से पानी और छोटी कोल्ड ड्रिंक की बोतल निकाली और काका को देने लगा| काका ने उसे मिचमिचाती आँखों से देखा और पहचान नहीं पाने के चलते पूछ बैठे "कौन हो बबुआ, हम पहचाने नहीं, अब कम दिखता है?
"काका मैं लखन, आपके घर तो कितनी बार खाया पिया है| लीजिये पहले पानी पीजिये, फिर मैं आपको घर तक ले चलता हूँ"|
"अरे लखना, कितना बड़ा हो गया है रे| इधर कभी मिला भी तो नहीं तो कैसे पहचानते", काका के चेहरे पर चमक आ गयी जो उसको उस धुंधलाती रौशनी में भी दिख गयी|
काका ने पानी के बोतल से कुछ घूंट पानी पिया और अपने कुर्ते से मुंह पोंछते हुए बोले "तू आज ही आ रहा है या पहले से आया है, मैं तुम्हारे घर जाने वाला था एक दो दिन में| अब तो तेरे बाऊ भी बहुत कमजोर हो गए हैं"|
काका के इतना बोलते ही उसे पिताजी की याद आ गयी और वह जल्दी से घर पहुँचने के लिए बेताब होने लगा| "चलो काका तुमको घर छोड़ दूँ फिर अपने घर जाऊँ", कहकर उसने काका को कार की तरफ ले चलना चाहा|
"लेकिन हमारी साइकिल कौन लाएगा, हम आराम से चला लेते हैं इसको| वो तो तुम्हारी गाड़ी देखे तो घबरा गए हम", काका ने थोड़ी चिंता से कहा|
इस बार दीवाली के दो दिन पहले गांव आ गए थे तो कुम्हारटोला की तरफ निकल गए शम्भू| याद भी नहीं था कि कितने साल बाद इस तरफ आये थे, एक तो गांव ही आना कम हो गया है और उसपर त्यौहार तो अब शहर में मनता है| अब बीवी बच्चे शहर में हैं तो त्यौहार तो वहीँ मनेगा, यही सच है|
उनको थोड़ा थोड़ा याद था रग्घू कुम्हार का घर , बचपन में कई बार यहाँ आकर पुरवा, सुराही और मटका ले गए थे| अंदाज से टोला में घुसने के बाद वह रग्घू के घर की तरफ चले, काफी बदलाव आ गया था वहां भी| कच्चे घर तो शायद ही दिखते थे, सब तरफ बस एक या दो कमरे के बिना प्लास्टर के घर और घरों के बाहर सस्ती प्लास्टिक वाली टूटी कुर्सी| चारो तरफ नजर घुमाने के बाद भी उनको कहीं चाक नजर नहीं आया और उसी को खोजते हुए वह रग्घू के घर पहुँच गए| दरअसल उसे घर पर पिताजी ने बता दिया था कि सिर्फ रग्घू ही अब दिए वगैरह बनाता है|

अपना चेहरा- लघुकथा

"सरकार, आज अगर एक बार देख लिया जाए तो हमका तसल्ली होइ जात", लच्छू की आवाज़ बहुत घबराई लग रही थी| उसने एक बार सर ऊपर उठाया और लच्छू को गौर से देखा, दोनों हाथ जोड़े हुए उसका चेहरा बेहद कातर लग रहा था|
"किसको देखना था लच्छू?, लच्छू कई बार किसी के लिए कह रहा था, इतना तो याद आया लेकिन किसके लिए कहा था, याद नहीं आया| कितनी बार तो टाल चुके हैं इसको, फिर भी!
"सरकार, पतोहू कई दिन से बीमार है और लड़का बाहर काम करत है, एक बार आप देख लेते तो ठीक हो जात", लच्छू की आवाज़ में अब थोड़ी उम्मीद जग गयी|
एकदम से उनके अंदर आग लग गयी, अब उनको लच्छू जैसे के घरवालों को देखना पड़ेगा, वह भी बिना पैसे| उनका चेहरा सख्त पड़ने लगा और वह जलती आँखों से लच्छू को फटकार कर भगाने वाले थे कि उनकी निगाह लच्छू की निगाह से मिली| एकदम से उनको लच्छू का चेहरा अपने जैसा लगने लगा और कल का वाक़या उनके जेहन में नाचने लगा|
"अरे सर, हम लोग हर काम नियम से करते हैं और बाकायदा टैक्स चुकाते हैं", इनकम टैक्स अधिकारी के सामने बैठे वह उसको लगभग गिड़गिड़ाने हुए समझाने का प्रयास कर रहे थे|
और वह झटके से उठ खड़े हुए "चलो लच्छू, देख लेते हैं| और दवा यही से ले लेना, मैं बोल दूंगा", कहते हुए उन्होंने लच्छू का कन्धा थपथपाया और बाहर निकल गए|

Wednesday, October 11, 2017

शुभ मुहूर्त--कहानी

इनक्यूबेटर के बाहर बैठी हुई रीती गौर से अपने बच्चे को देख रही थी, कभी कभी उसकी सांस तेज चलती तो कभी लगता जैसे रुक गयी हो. और बच्चे की उठती गिरती सांस के साथ साथ ही उसकी सांस भी कभी तेजी से चलने लगती तो कभी रुकने लगती. आज तीसरा दिन था और अभी और कितने दिन लगने वाले थे, डॉक्टर भी बता पाने में असमर्थ थी. घर पर सबने कहा कि कुछ देर जाकर आराम कर ले लेकिन वह हिलने को भी तैयार नहीं थी. कहीं न कहीं वह अपने आप को भी इसके लिए जिम्मेदार मान रही थी और कुछ न कहते हुए बस बच्चे के स्वस्थ होने का इंतज़ार कर रही थी.
उसके दिमाग में तीन दिन पहले की बात घूम रही थी, "आपकी डेट तो चार दिन पहले ही थी, इतना देर क्यों किया आपने?" डॉक्टर के चेहरे पर आश्चर्य के साथ साथ गुस्से के भी भाव थे. यह उसकी दूसरी डिलीवरी थी और इस सिलसिले में वह इतनी बार मिली थी कि डॉक्टर से अच्छी जान पहचान हो गयी थी.
"पहला बच्चा भी सिजेरियन था और इसको भी इसी तरह पैदा करना था, फिर भी आप लोग इतनी लापरवाही करते हैं, नर्स, जल्दी से ओ टी में ले चलो इनको", नाराजगी जाहिर करते हुए डॉक्टर बोली और कुर्सी से उठ खड़ी हुई. जल्दी जल्दी नर्स ने उसे स्ट्रेचर पर लिटाया और अंदर ले गयी. उसे डर तो पहले से ही लग रहा था, बच्चे का मूवमेंट कल से काफी कम था लेकिन उसे पता था कि आज के पहले घरवाले उसको डिलीवरी के लिए नहीं ले जाएंगे.
काफी पढ़ा लिखा परिवार था उसका, पति का भी अच्छा व्यवसाय था. खुद वह भी ग्रेजुएट थी, लेकिन घर में सास ससुर की काफी चलती थी और हर काम शुभ मुहूर्त और दिन को देखकर ही किया जाता था. कभी कभी वह इसके लिए पति को टोकती भी थी कि वह सास ससुर को समझाए, लेकिन पति भी कुछ तो अपने दब्बूपन और कुछ खुद इन चीजों पर विश्वास के चलते उलटे उसे ही समझा देता था.
"आज जो अपनी दुकान इतनी अच्छी चल रही है उसके लिए भी पापा ने शुभ मुहूर्त निकलवाया था. अपने चाचा को देखो, बिना मुहूर्त के दुकान खुलवाई और क्या हाल हुआ उनका?, पति के इन तर्कों का वह विरोध तो करना चाहती थी लेकिन फिर टाल जाती थी. अब पता तो उसको भी था कि मुहूर्त से ज्यादा महत्त्व ससुर जी के लगाए हुए रुपयों के थे जिसके चलते उनकी किसी बात को टालना पति के बस के बाहर था. वैसे भी चाचा ने दुकान में घटिया माल रखा था और दाम भी थोड़ा ज्यादा लेते थे तो दुकान का यह हाल होना ही था, लेकिन उसकी बात को सुनने वाला कौन था.
पिछले बच्चे के समय ही उसने विरोध किया था, जब नामकरण के लिए बाबाजी को बुलाया गया था.
"घर में बच्चे के दादा दादी हैं तो बच्चे का नाम कोई बाहरी क्यों रखेगा?, उसने अपनी बात पति के आगे रखी थी.
"अरे बाबाजी भी हमारे बुजुर्ग ही हैं, हर शुभ काम में उनसे राय लिया ही जाता है", पति ने उसे समझा दिया था.
वह सहमत तो नहीं थी लेकिन उसने भी अपना विरोध दर्शाने के लिए बच्चे का घर में पुकारने का नाम अपनी मर्जी से रख लिया और फिर धीरे धीरे सभी लोग बच्चे को उसी नाम से बुलाने लगे. लेकिन कभी भी उसने अपने सास ससुर से सीधे इन चीजों के बारे में बात करना उचित नहीं समझा, कहीं न कहीं उसे डर भी था कि कहीं बात का बतंगड़ न बन जाए.
इस डिलीवरी के समय बाबाजी का तो कोई चक्कर नहीं था जो कि शायद लगातार बाबाओं के छप रहे किस्सों का असर था. लेकिन दिन बढ़िया ही हो इसी चक्कर में डिलीवरी तीन दिन आगे टाल दी गयी.
"अरे खंरवास में भी कोई शुभ काम होता है, तीन दिन बाद शुभ दिन शुरू हो रहे हैं, तब हो जायेगा. आखिर करवाना तो डॉक्टर को ही है", सास की बात को टाल पाना पति के बस में नहीं था.
"अब तीन दिन की ही तो बात है, देख लेते हैं. वार्ना कहीं कुछ उल्टा सीधा हो गया तो मुश्किल हो जाएगी", पति ने समझाते हुए कहा था.
उल्टा सीधा तो क्या होना था लेकिन इस बार बेटा ही हो, इसके लिए हर संभव उपाय किये जा रहे थे. भ्रूण परिक्षण बंद होने के चलते ससुर जी पहले से पता तो लगवा नहीं सकते थे. और पहली बेटी थी तो इस बार कुलदीपक ही पैदा होना चाहिए, अंदर से पति के मन में भी यही बात थी. सास तो दिन रात "पोते का मुंह देखकर ही संसार से जाना है" की रट लगाए रहती थी. और उसे भी इसमें कोई दिक्कत नहीं दिखती थी, आखिए एक बेटी थी ही और एक बेटा हो जाए तो शायद बेटे के लिए फिर से इस तकलीफ से नहीं गुजरना पड़े.
पिछले महीने भी डॉक्टर ने बताया था कि बच्चा एकदम ठीक है और समय पर इसकी डिलीवरी करवा देंगी. वह भी घरवालों के साथ काफी खुश थी, आखिर अपने कोख से जन्म दे रही थी. जैसे जैसे समय नजदीक आता गया, उसकी घबराहट थोड़ी बढ़ती गयी, लेकिन किसी भी अनिष्ट की आशंका नहीं थी उसके मन में. लेकिन उस दिन ओ टी में जाते समय डॉक्टर की बात सुनकर उसका बी पी थोड़ा असामान्य होने लगा था. डिलीवरी के बाद जब उसको होश आया तो बगल में बच्चे को नहीं देखकर वह सिहर गयी.
"नर्स मेरा बच्चा कहाँ है?, उसने लड़खड़ाती आवाज़ में पूछा. उसका मन किसी अनजानी आशंका से घबरा गया.
नर्स ने उसकी तरफ देखा और उलाहना देते हुए बोली "बेटा हुआ है तुमको लेकिन किसी ने मिठाई भी नहीं खिलाई मुझे".
बेटा हुआ है, सुनकर उसकी आँखों में ख़ुशी कौंध गयी. लेकिन फिर मेरे पास क्यों नहीं है, सोचकर उसने दुबारा नर्स से पूछा "लेकिन है कहाँ मेरा बेटा?
"अच्छा तुमको तो पता ही नहीं है, बहुत कमजोर हुआ था और उसको जॉन्डिस भी हो गया था. अभी इन्क्यूबेटर में रखा है, तीन चार दिन में ठीक हो जायेगा", नर्स ने तसल्ली देते हुए कहा.
उसको एक झटका लगा, इतने छोटे बच्चे को जॉन्डिस हो गया है, उस ए सी वाले कमरे में भी उसके चेहरे पर पसीना आ गया.
"मेरे घर से किसी को बुला दो प्लीज", उसने नर्स से विनती की. नर्स ने भी थोड़ा नाक चढ़ाते हुए बाहर जाकर आवाज लगायी और उसकी सास अंदर आयी.
"बेटा हुआ है लेकिन थोड़ा बीमार है इसलिए उसको शीशा में बंद करके रखे हैं", सास के चेहरे पर पोते का गर्व तो था लेकिन उसकी बीमारी से थोड़ी चिंतित भी थी.
"मैं कब देखूंगी उसको", उसने तुरंत ही सास से कहा. सास ने कुछ जवाब नहीं दिया और बाहर निकल गयी.
अचानक उसे लगा जैसे कि बच्चे ने उसे पुकारा हो और वह वर्तमान में लौटी. उसने बच्चे को गौर से देखा, उसकी साँसे काफी धीमे धीमे चल रही थीं. वह घबराकर एकदम से उठी और डॉक्टर को बुलाने चल दी. अभी भी कमजोरी बहुत थी और दर्द भी लेकिन बच्चे के आगे उसे यह सब महसूस भी नहीं हो रहा था.
"डॉक्टर जरा देखिये मेरे बच्चे को, उसकी सांस बहुत धीरे चल रही है", लगभग रोआँसी सूरत बनाये हुए उसने कहा.
डॉक्टर ने आकर देखा और कुछ और इंजेक्शन के लिए नर्स को बोलकर उसका कन्धा थपथपाते हुए निकल गयी. नर्स ने इंजेक्शन की तयारी शुरू की और वह फिर से सोच में डूब गयी. "कितनी लापरवाह हो तुम, इतनी देर करने से बच्चा एकदम सूख गया था और उसको जॉन्डिस ने जकड़ लिया है. इन्क्यूबेटर में रखा है, कोशिश कर रहे हैं कि जल्द ही स्वस्थ हो जाए और तुम उसे लेकर घर चली जाओ", डॉक्टर ने उसको कसके झिड़का था जब वह उसके पास आयी थी. वह डॉक्टर को चाह कर भी नहीं बता पायी कि यह लापरवाही नहीं, बल्कि शुभ मुहूर्त का चक्कर था.
पति भी इसी बीच आया और बच्चे को देखते हुए उसके पास बैठ गया. उसने पति की तरफ ध्यान भी नहीं दिया, उससे वह बहुत खफा थी. और पति को भी यह बात पता थी इसलिए वह भी उससे नजरें चुरा रहा था.
"एकदम ठीक हो जायेगा बच्चू, तुम फ़िक्र मत करो", उसको दिलासा देकर वह चला गया.
अब वह थी, हस्पताल का सन्नाटा था और उसके मन में चल रही विचारों की आँधी थी| रह रह के उसके मन में आ रहा था कि उसे कड़ाई से इसका विरोध करना चाहिए था. इन्ही सब में डूबता उतराते उसे एक झपकी आई और आंख खुली तो नजर तुरंत सामने बच्चे पर गयी. एक बार तो लगा जैसे उसकी नज़रों का भ्रम है लेकिन दुबारा उसने गौर से देखा तो लगा जैसे बच्चे की सांस बंद है. उसने चिल्लाकर नर्स को बुलाया और वहीँ अचेत हो गयी.
जल्द ही उसे होश आ गया और उसने देखा कि डॉक्टर, नर्स और उसके ससुर सभी वहां बदहवास खड़े थे. डॉक्टर बार बार उसके बच्चे को हिला डुला रही थी और उसकी सांस देखने की कोशिश कर रही थी. वह पत्थर जैसे खड़ी सबको देख रही थी तभी डॉक्टर की घबराई आवाज़ उसके कानों में पड़ी "अफ़सोस है, बच्चे को नहीं बचा पाए हम लोग".
एकदम से वहां रोना पीटना शुरू हो गया लेकिन वह जैसे जड़ हो गयी. पति ने झकझोर कर उसे हिलाया और खुद सुबक सुबक कर रोने लगा. वह आगे बढ़ी और बच्चे के शरीर को अपने सीने से लगाते हुए बोली "इसके जाने का समय भी शुभ मुहूर्त में ही था" और फिर उसके रुदन से पूरा हस्पताल हिलने लगा.   

Tuesday, October 10, 2017

कटा हुआ सर-- कहानी

गायत्री बहुत परेशान थी, उसके लिए तो यह सोच भी पाना नामुमकिन था. सुबह उसने रचना को दामादजी से बात करते सुन लिया था और वह लगभग गिरते गिरते बची थी. उसके नहीं रहते कुछ भी होता तो उसे पता भी नहीं चलता और फ़र्क़ नहीं पड़ता लेकिन उसके रहते ही यह हो, उसका मन जैसे बैठा जा रहा था. वह तो रचना के बार बार बुलाने पर चली आयी थी उससे मिलने, वर्ना बेटी के घर जाना उसकी सोच के हिसाब से ठीक नहीं था. पूरा दिन वह बहुत तनाव में रही, अपनी जिंदगी, बेटे की जिंदगी का पिछला आठ साल और अब बेटी का ये निर्णय, सब उसके जेहन में पूरे दिन तक घूमता रहा.
शादी के कई साल बाद कितने मुश्किल से बेटा पैदा हुआ था. घर में उनकी सास ने तो कहना भी शुरू कर दिया था कि अब दूसरी शादी की तैयारी करनी पड़ेगी. कितने तनाव के दिन थे वह और उसपर कोई भी नहीं था जिससे अपना दुःख बाँट सके. डॉक्टर से लेकर ओझा और बाबा के भी चक्कर लगाने के बाद कहीं जाकर उसकी गोद हरी हुई थी. फिर दस साल बाद रचना हुई थी. बेटे ने भी शुरू शुरू में बच्चा नहीं चाहा लेकिन बाद में उसको भी कई साल लग गए पिता बनने में.
पिछले कुछ दिनों में उनको यहाँ की दिनचर्या पता चल गयी थी, रोज पहले रचना ऑफिस से आती थी, फिर दामाद रिशू आते थे. उन्होंने घड़ी देखी, उसके हिसाब से रचना के आने का समय हो चला था. वह अपने आप को भरसक संयत करने की कोशिश में सोफे पर अखबार लेकर बैठ गयीं. वैसे तो निगाह अखबार पर थी लेकिन दिमाग कहीं और ही था उसका. दरवाजा खुलने की आवाज आयी, रचना ने अंदर आकर अपना बैग टेबल पर रखा और गायत्री के पास जाकर बैठ गयी. रोज तो गायत्री उसको देखकर खिल जाती थी और अक्सर तो मेज पर पानी का गिलास और कुछ मिठाई वगैरह भी रखी रहती थी. लेकिन आज तो ऐसा लगा जैसे उसका चेहरा उतरा हुआ है, उसने घबराकर गायत्री का माथा छुआ, लेकिन वह गरम नहीं था.
"तबियत ठीक नहीं है क्या माँ, बुखार तो नहीं लगता है", रचना ने चिंतित होकर पूछा.
"नहीं रे ठीक हूँ", उसने कह तो दिया लेकिन उसके बोलने के ढंग ने उसकी चुगली कर दी.
"रोज तो तू इतना ख़ुशी ख़ुशी मेरा इंतज़ार करती है, आज क्या हो गया. लगता है अपने नाती की बहुत याद आ रही है", रचना ने कारण समझने का प्रयास करते हुए कहा.
उसने एक बार अपने फीके चेहरे से उसकी तरफ देखा और फिर उसका हाथ अपने हाथों में लेते हुए बोली "याद तो उसकी रोज ही आती है, पता नहीं कैसे अकेले रहता होगा. लेकिन अभी उसकी चिंता नहीं है मुझे", उसने बात को टालने की गरज से कहा.
रचना ने उसका चेहरा अपने हाथ में ले लिया और चिंतित होते हुए बोली "फिर क्या बात है माँ, बताएगी नहीं मुझको?
 "अच्छा, एक बात बता, तू मेरा कहना मानेगी, सच सच बता".
"ओह, अब समझी, वापस भैया के पास जाना है इसलिए ये सब कह रही है. अभी अभी तो आयी है, कुछ दिन तो साथ रह ले ना, प्लीज़", रचना ने माँ की गोद में लेटते हुए कहा. आज भी माँ की गोद में उसे जो सुकून मिलता था, वह कहीं और नहीं मिलता.
गायत्री ने झुक कर बेटी का चेहरा चूम लिया, लेकिन आंसू का एक कतरा भी साथ साथ रचना के चेहरे पर टपक गया. अब उसे थोड़ी चिंता हुई और वह उठकर माँ का चेहरा अपने हाथ में लेकर सहलाते हुए बोली "क्या हुआ माँ, अच्छा बता क्या कह रही थी. अब भला तेरी बात नहीं मानूंगी तो और किसकी मानूंगी".
गायत्री ने उसको गहरी नजर से देखा और सोच में पड़ गयी कि कैसे कहे. लेकिन बेटी के सवालिया निगाह को देखकर उसने सोचा कि अब कह ही देना चाहिए.
"अच्छा तू मेरी कसम खा कि मेरी बात टालेगी नहीं", गायत्री ने अपने आप को और आस्वस्त करने के लिहाज से कहा.
"बोला तो नहीं टालूँगी, तू पहले बता तो मुझे", अब रचना की उत्सुकता और चिंता दोनों बहुत बढ़ गयी थी.
"तुझे पता है ना कि तेरा भाई और तू कितनी मुश्किल से पैदा हुए थे". गायत्री ने अपनी बात अधूरी छोड़ कर एक गहरी सांस ली और बेटी की आँखों में देखा.
बेटी को अभी भी कुछ समझ में नहीं आ रहा था, लेकिन उसने बात ख़त्म करने की गरज से कहा "हाँ मुझे सब पता है, कितनी बार तो तूने बताया था. तू अब बता भी कि बात क्या है", रचना ने माँ का चेहरा प्यार से सहलाया.
"और फिर कितने साल के इंतज़ार के बाद तेरे भाई के घर बाबू हुआ था, कितना परेशान थे सब लोग", माँ ने एक और बात समझाने के अंदाज से कही.
"अरे कहीं बाबू की तबियत तो नहीं खराब हुई, तू बताती क्यों नहीं?
"नहीं नहीं, बाबू एकदम ठीक है, उसको कुछ नहीं हुआ है", गायत्री ने तुरंत कहा. उसके चेहरे पर एकदम से घबराहट सी फ़ैल गयी बाबू के तबियत खराब होने के बारे में सोचकर.
"तब आखिर बात क्या है, तू फिर आज उदास क्यों है, कुछ बताएगी भी?
"ठीक है बताती हूँ, तू कहेगी तो मैं तेरे घर कई महीने रह जाउंगी लेकिन तू ऐसा मत कर", गायत्री अभी भी असली बात सीधे सीधे कह नहीं पा रही थी.
"तो मैंने कब कहा कि तू जल्दी चली जा, तूही तो कहती रहती है कि ज्यादा दिन नहीं रुकूंगी तेरे घर, अब बता भी कि बात क्या है".
"अच्छा यह बता, तुझे पता है, एक औरत के लिए सबसे ख़ुशी की बात क्या होती है", गायत्री ने पूछा.
रचना थोड़ी देर सोचती रही और फिर हँसते हुए बोली "हां, पता है, जब उसकी माँ उसके पास रहती है".
गायत्री भी मुस्कुरा पड़ी, उसे इस जवाब की उम्मीद नहीं थी. फिर उसने रचना का सर सहलाते हुए कहा "सही सही बता, तू जानती है ना".
"इसमें पूछने की क्या बात है, एक औरत ही क्या किसी को भी सबसे ज्यादा ख़ुशी अपनों में मिलती है", रचना ने कुछ सोचते हुए कहा.
गायत्री को लगा कि इसे कैसे समझाए, फिर उसने एक और सवाल पूछा "जानती है, जब बच्चा पहली बार पेट में आता है तो एक औरत के लिए कितना सुखदायी होता है".
रचना को अब कुछ अंदेशा हुआ, कहीं माँ को पता तो नहीं चल गया. लेकिन उसने तो किसी से भी बताया नहीं था. तो क्या राकेश ने बता दिया माँ को, लेकिन राकेश तो ऐसा नहीं करेगा? उसके चेहरे पर तमाम भाव आ जा रहे थे और गायत्री उसके चेहरे को पढ़ने की कोशिश कर रही थी.
'जानती है, जब एक औरत के पेट में और उसकी जिंदगी में किसी नए के आने की आहट होती है ना तो उससे ज्यादा सुकूनदायी उसके लिए कुछ भी नहीं होता. जब बच्चे का पहला एहसास होता है, जब बच्चा पेट में पहला लात चलाता है और जब वह अंदर घूमना शुरू करता है, तब उसकी माँ को जो सुख मिलता है, वह दुनियाँ का सबसे बड़ा सुख होता है".
रचना एकटक माँ को देखे जा रही थी, माँ के चेहरे को देखते हुए उसे एहसास हो रहा था जैसे यह सब बताते हुए माँ खुद उसे अपने पेट में महसूस कर रही हो. उसे एक पल के लिए लगा जैसे कि वह एक बड़ी भूल करने जा रही है, लेकिन फिर उसने सँभलते हुए कहा "ये तो सच ही होगा माँ, आखिर तुम्हारा अनुभव है".
"एक औरत के लिए उसका माँ बनना सबसे गर्व और ख़ुशी का पल होता है बेटी. और यह मुझसे बेहतर और कोई नहीं जानता है. कभी सोचा है तुमने कि जो लोग कई कई वर्ष संतान सुख के लिए तरसते हैं, उनके दिल पर क्या बीतती है! जब बच्चा नहीं होने पर लोगों के ताने सुनने पड़ते हैं तो कलेजा फट जाता हैं", गायत्री अपनी रौ में बोलती जा रही थी.
"इतना तो मैं भी जानती हूँ माँ कि बच्चे से ही एक औरत का जीवन सम्पूर्ण होता है. लेकिन यह सब तुम मुझसे क्यों कह रही हो?, रचना ने अनजान बनने का एक और प्रयास किया.
"अच्छा तो तू समझती है यह, फिर ऐसा क्यों सोच रही है, बोल", गायत्री ने रचना का हाथ अपने हाथ में इस तरह ले लिया, जैसे रचना आज भी एक छोटी सी बच्ची हो.
"मैं क्या सोच रही हूँ माँ", रचना के शब्द थोड़े लड़खड़ाने लगे. अब उसे पूरा आभास हो गया था कि माँ को पता है लेकिन एक आखिरी बार उसने नहीं समझने की कोशिश की.
"तुझे पैदा करने के लिए कितना साल इंतज़ार करना पड़ा था हमको, और तू अपनी अजन्मे बच्चे को इस दुनिया में आने से ही रोक रही है. तू ऐसा सोच भी कैसे सकती है, अरे एक बार भी नहीं सोचा किसी की जान लेने में", गायत्री की आँखों से आंसू टप टप करके गिरने लगे.
रचना अवाक् रह गयी, उसे नहीं पता था कि माँ इस तरह भी रिएक्ट कर सकती है. उसने गायत्री का चेहरा अपने हाथ में लिया और उसके आंसू पोंछने लगी.
कुछ देर तक माँ उससे सटी हुई बैठी रही फिर अपना चेहरा पोंछते हुए बोली "अच्छा बता, तू ऐसा नहीं करेगी ना".
वो सोचने लगी कि माँ को कैसे समझाए, लेकिन अब बात तो करनी ही पड़ेगी. उसने माँ की पनीली आँखों में ऑंखें डाल कर देखा.
"अच्छा तू ये बता कि तू मुझे खुश और तरक्की करता देखना चाहती है ना, सही सही बोल", रचना ने थोड़ा जोर देकर पूछा.
"तेरी और सबकी ख़ुशी के लिए ही तो कह रही हूँ, और तेरी तरक्की से मुझसे ज्यादा और कौन खुश होगा", गायत्री ने कहकर उसका चेहरा चूम लिया.
"तो फिर इतनी जल्दी बच्चा आ गया तो मेरे कैरियर का क्या होगा माँ? आज के गलाकाट युग में कितना मुश्किल होता है आगे बढ़ना और उसमे बच्चा आ गया तो मुश्किल में पड़ जाऊँगी मैं", उसने गायत्री को समझाना चाहा.
गायत्री ने उसे गौर से देखा और उदास लहजे में बोली "यह सब तो पहले सोचना था, लेकिन अब यह मत कर. आज भले तुमको सही लग रहा हो लेकिन कुछ साल बाद तुम्हीं को अपने इस निर्णय पर अफ़सोस होगा".
"देखो माँ, अब तुम लोगों वाला ज़माना तो रहा नहीं कि पति कमाए और बाकी सब खाएं. और फिर मेरी भी कुछ तमन्नाएँ हैं, आखिर मैंने भी पढ़ाई इसीलिए तो की है कि मैं भी कुछ करूँ. अब ऐसे में बच्चे के चलते या तो मैं नौकरी छोडूं, या लम्बी छुट्टी लूँ, दोनों ही तरफ से मेरे कैरियर का नुक्सान ही होना है".
गायत्री ने तुरंत कहा "तू नौकरी मत छोड़, मैं हूँ न बच्चे के देख रेख के लिए. लेकिन एक बार अगर इसको गिराने का सोच लिया तो आगे पता नहीं क्या हो, मेरा अनुभव तो तू जानती ही है".
रचना को अब समझ में नहीं आ रहा था कि माँ को कैसे समझाए, इसलिए उसने फिलहाल बात को टालना ही उचित समझा. उसने गायत्री के हाथ को अपने हाथ में लेते हुए कहा "ठीक है माँ, तू जैसा कहती है वही करुँगी मैं, अब तो तू खुश है ना".
गायत्री को जैसे अपने कानों पर यकीन ही नहीं हुआ, उसने एक बार फिर पूछा "सच में तू मेरी बात मान लेगी?
"हां माँ, अब चल जल्दी से कुछ खाने को दे", कहते हुए उसने पेट पर हाथ फेरा जैसे बहुत भूख लगी हो. गायत्री की नजर भी पड़ी और वह यह सोचकर पूरी तौर से आस्वस्त हो गयी कि रचना ने पेट पर हाथ फेरकर उस अजन्मे बच्चे को पैदा करने का वादा कर दिया हो.
रात को बिस्तर पर जैसे ही रिशू आया, रचना ने उसको एकदम से पकड़ लिया. "क्या हुआ रचना, सब ठीक तो है?, उसने पूछा.
"सब ठीक नहीं है रिशू, माँ को पता चल गया कि मैं अबोर्सन करवाना चाहती हूँ और वह बेहद दुखी हो गयी थीं. उन्होंने मुझे तब तक नहीं छोड़ा जब तक मैंने उनसे यह झूठा वादा नहीं कर दिया कि मैं यह अबोर्सन नहीं करवाऊँगी", रचना ने एक सांस में ही कह दिया.
रिशू भी सोच में पड़ गया, वह भी रचना के निर्णय से सहमत था. इतनी जल्दी बच्चा दोनों नहीं चाहते थे लेकिन अब अबोर्सन के सिवा कोई चारा भी नहीं था.
"लेकिन करवाना तो पड़ेगा ही, कहीं तुम सचमुच तो बच्चे के लिए नहीं सोचने लगी", रिशू ने रचना को सहलाते हुए कहा.
"बेकार की बात मत करो, लेकिन अब माँ का क्या किया जाए. उनको समझाना संभव नहीं है और बाद में जब उनको पता चलेगा अबोर्सन के बारे में तो वह कितना दुखी होंगी, मैं अंदाजा लगा सकती हूँ. और सबसे बड़ी बात कि फिर मैं उनसे आंख कैसे मिलाऊँगी", रचना बेहद परेशान थी.
रिशू भी सोच में डूबा था, वैसे भी वह रचना की माँ से बहुत बात नहीं करता था, इसलिए उनको समझाने का तो सवाल ही नहीं पैदा होता था. अब इस समस्या का हल उसकी निगाह में कुछ दिख नहीं रहा था. उसने रचना को समझाने के हिसाब से कहा "चलो सो जाओ, कल सोचेंगे क्या करना है, कभी कभी समय भी समाधान सुझा देता है".
रचना बिस्तर पर निढाल हो गयी, उसके दिमाग में शाम को माँ से हुई सारी बातचीत घूम रही थी. आखिर माँ ने जो अपने जीवन में देखा और झेला है, उसके हिसाब से तो वह सही ही कह रही है. लेकिन जरुरी तो नहीं कि उसे आगे चलकर बच्चे के लिए दिक्कत ही हो. फिर अपना कैरियर भी तो देखना है, अगर उसने लम्बी छुट्टी ली तो पता नहीं कितने लोग उससे आगे निकल जायेंगे और फिर उसके बाद यही नौकरी बची रहेगी, इसकी भी क्या गारंटी है. नहीं, अभी उसे बच्चे के चक्कर में नहीं पड़ना है, माँ को फिलहाल झूठ बोलकर काम चलाना पड़ेगा, आगे देखेंगे.
अचानक रिशू के दिमाग में कुछ कौंधा और उसने रचना को अपनी तरफ घुमाते हुए कहा "इतना आसान तरीका है और हम झूठमूठ परेशान हो रहे हैं. अरे माँ को बोल देंगे कि मिसकैरेज हो गया और नहीं होगा तो डॉक्टर से भी कहलवा देंगे, बस छुट्टी".
रचना का चेहरा भी खिल गया, इतना आसान उपाय है और वह इतना परेशान थी. उसने रिशू को चूम लिया और मुस्कुराते हुए आंख मूदकर लेट गयी.
सुबह रचना की नींद एक सपने से खुली, उसका पूरा शरीर पसीने से तरबतर था. उसे पूरा तो नहीं याद था लेकिन उसने देखा कि वह अपने कंपनी की प्रेसिडेंट बन गयी है और उसी समारोह में एक बच्चा उसको एक गुलदस्ता भेंट कर रहा है जिसका सर गायब है. उसने घबराकर दूसरी तरफ देखा तो एक टेबल पर बच्चे का कटा सर पड़ा था जिसकी ऑंखें उसे ही लगातार देख रही थीं.
वह घबरा कर कमरे से भागी और जाकर माँ से लिपटकर रोने लगी. गायत्री भी हड़बड़ाकर उठ गयी और परेशान होकर उसको सहलाने लगी.
"क्या हुआ बेटी, तबियत तो ठीक है ना", गायत्री ने उसके सर पर हाथ फेरते हुए पूछा. कुछ पल बाद रचना ने सर हिलाकर उसे आस्वस्त किया कि वह ठीक है और फिर उसने अपनी सोच में उस बच्चे के कटे हुए सर को उसके धड़ से जोड़ दिया.
अब उसे वापस नींद आने लगी और वह अपनी माँ से लिपटकर उसकी गोद में एक बच्चे की तरह सो गयी.

Monday, October 9, 2017

परंपरा और गुलामी-- लघुकथा

"कल की फोटो देखी मैंने, बहुत सुंदर दिख रही थीं आप", उसने ऑफिस में अपनी कलीग से कहा|
"अरे कल वो व्रत था ना, उसमें तो सजना बनता था", मुस्कुराते हुए वह बोली|
"अच्छा, तो आप भी यह सब मानती हैं, मुझे लगा कि आप आजाद ख्याल की हैं", उसके लहजे में व्यंग्य था या सहानुभूति, वह समझ नहीं पायी|
"ऐसी बात नहीं है, मैं तो बस परंपरा निभाने के लिए ऐसा कर लेती हूँ| वैसे इसी बहाने थोड़ी शॉपिंग भी हो जाती है, पति से गिफ्ट भी मिल जाता है", थोड़ी सफाई सी देती हुए वह बोली|
"मतलब परंपरा की आड़ में सब कुछ ठीक है, तो फिर तो आप दिन भर भूखी प्यासी भी रही होंगी", उसने एक और तंज किया|
वह थोड़ा सकपकायी और कुछ सोच के बोली "अरे फास्टिंग करने से तो स्वास्थ्य सुधरता ही है, अब एक दिन इसी बहाने से ही सही| वैसे मैं इन सबसे उम्र बढ़ने में विश्वास नहीं करती"|
"ओह, खैर आप की तक़रीर मुझे अब तक याद है जब कोर्ट का फैसला तीन तलाक के बारे में आया था, कितनी उत्साहित और खुश थीं आप नारी स्वतंत्रता को लेकर",उसने एक और सवाल किया|
"वह तो ऐतिहासिक फैसला था, आखिर कोई कब तक औरतों को पांव की जूती बना कर रखेगा", उसके आवाज में अब थोड़ी हिम्मत आ गयी|
"मतलब दूसरे मज़हब की परंपरा और संस्कार हों तो गलत और आपके हों तो ठीक", उसने पूछा|
"और कुछ महिलाएं तो उनके यहाँ भी इसे परंपरा और धर्म की दुहाई देकर सही ठहरा रही थीं, वो सही था क्या", उसके प्रश्न लगातार चुभते जा रहे थे|
"देखिये, नारी को मानसिक गुलामी ने इतना जकड रखा है कि वह अपना सही और गलत सोच ही नहीं पाती| भला इसे कैसे सही ठहराया जा सकता है", उसकी आवाज फिर कमजोर सी पड़ती प्रतीत हुई|
"ओह, तो पति के उम्र के लिए भूखे प्यासे रहना मानसिक तरक्की की निशानी है? तब तो मेरी पत्नी बहुत पिछड़ी हुई है", उसके चेहरे पर मुस्कान छा गयी|
"अब यह अपनी अपनी सोच है, मैंने कहा ना कि उम्र बढ़ने में मेरा कोई विश्वास नहीं है"|
"अच्छा, कभी आपने अपने पति से कहा कि वह भी आपके लिए यूँ ही व्रत रखे, मतलब उम्र बढ़ने के लिए नहीं, बस ऐसे ही", उसने एक और सवाल किया|
वह अभी सोच ही रही थी कि उसने फिर कहा "या कभी आप के पति ने ही कहा हो कि वह आपके लिए व्रत रखेगा"|
वह सोच में पड़ गयी, ऐसा तो कभी नहीं हुआ| एक थकी निगाह से उसने सामने देखा और फींकी मुस्कराहट फेंकते हुए बोली "ऐसा तो कभी सोचा ही नहीं, ये पुरुष तो कभी महिलाओं के लिए व्रत नहीं रखते"|
"खैर आपको ठेस पहुंचाने का कोई इरादा नहीं था मुझे, उस दिन नारी स्वतंत्रता पर आपके विचार सुनकर मुझे अच्छा लगा था| लेकिन कल की आपकी छुट्टी और फोटो देखकर थोड़ा अफ़सोस हुआ इसलिए मैंने ऐसा कहा, माफ़ कीजियेगा", उसने हाथ जोड़ते हुए कहा और आगे बढ़ गया|
उसने अपना फोन उठाया और कल की डाली हुई सेल्फी और बाकी फोटो डिलीट करने लगी|

अपने अपने जज़्बात- लघुकथा

"हाय मम्मी, कैसी है, तबियत ठीक है ना तुम्हारी और दवा रोज ले रही हो ना", रोज के यही सवाल होते थे सिम्मी के और उसका रोज का जवाब।
"अब वीडियो काल किया है तो देख ही रही है मुझे, मैं एकदम ठीक हूँ। अच्छा अभी कितना बज रहा है वहाँ पर", उसने अपनी दीवाल घड़ी को देखते हुए पूछा।
"रोज तो बताती हूँ, बस साढ़े तीन घंटे आगे चलती है घड़ी यहाँ, अभी शाम के सिर्फ सात ही बजे हैं"।
"मुझे याद नहीं रहता, हमेशा उलझ जाती हूँ कि हमारी घड़ी आगे है या तुम्हारी। और मेहमान आए कि नहीं अभी, छोटू कैसा है", उसने भी सवाल किया, वह आज भी दामाद को मेहमान ही कहती है, भले पिछले दस साल से शहर मे रह रही है।
"सब लोग बढ़िया है, तुम मेहमान कहना कब छोड़ोगी, सुनते हैं तो हंसते हंसते लोट पोट हो जाते हैं", सिम्मी ने भी एक ठहाका लगाया।
वह भी मुस्कुरा दी, और पानी पीने लगी।
"अच्छा है हम व्रत नहीं रखते हैं, अब तो यहाँ जोबर्ग मे भी हिंदुस्तानी महिलाएं ये सब खूब करने लगी हैं। मुझे भी सब हर बार टोकती हैं", सिम्मी बोली।
उसको अब याद आया, कल तो व्रत है और कामवाली भी नहीं आएगी। कितना मार खाती है यह कामवाली अपने आदमी से लेकिन फिर भी उसी की लम्बी उम्र के लिए व्रत भी रखती है|
"जिसकी मरने की भी दुआ नहीं करती, उसके उम्र का क्या सोचना। अच्छा तुम बताओ सिम्मी, सच में कभी तुम्हारा मन नहीं करता यह सब करने का", उसने गहरी सांस लेते हुए पूछा|
एक ठहाका लगाया सिम्मी ने और मुस्कुराते हुए बोली "कमाल की बात करती हो मम्मी, मैं और यह सब| पापा का किस्सा न तो तुम भूल सकती हो और न मैं, किस हाल में छोड़ कर भाग गए थे हमको और क्या क्या नहीं कहा था तुम्हारे चरित्र के बारे में| और तुम तो हर पूजा और हर व्रत करती थी उनके लिए"|
"लेकिन हर आदमी एक जैसा तो नहीं होता ना, अब मेहमान को ही देख लो| मेरी तरफ से कोई पाबन्दी नहीं है इसकी, बाकी तुम खुद ही समझदार हो", उसने कुछ सोचते हुए कहा|
"छोडो इन बातों को, वैसे कल तो मैं चिकेन बना रही हूँ, तुम क्या खाओगी", सिम्मी ने पूछा|
"अरे कामवाली कल नहीं आएगी, उसने व्रत रखा हुआ है| लगता है ऐसे ही कुछ खा कर दिन बिताना होगा", उसने मुस्कुराते हुए कहा|
"देखना कहीं बिना खाये ही मत रह जाना वर्ना किसी की उम्र बढ़ जाएगी", सिम्मी ने भी कस के ठहाका लगाया|
मुस्कुराते हुए उसने कहा "मेहमान को मेरा आशीर्वाद कहना और छोटू को प्यार देना| अब एक बार यहाँ कुछ दिनों के लिए आने का भी सोचो"|
"जरूर मम्मी, अपना ध्यान रखना", कहते हुए सिम्मी ने फोन रख दिया| वह भी सर के नीचे हाथ रख कर आंखे मूंदे बिस्तर पर लेट गयी|

Friday, October 6, 2017

प्रश्नचिन्ह-- लघुकथा

एक बार फिर उसकी आंख खुल गयी, जून महीने की बेहद जला देने वाली गर्मी की दोपहर में कमरे में लेटे हुए वह तपिश से लड़ने का असफल प्रयास कर रही थी| इसी क्रम में कभी झपकी आ जाती थी और कभी नहीं, तभी यह दूसरी बार हुआ कि बाहर से आते छोटे बच्चे के रोने की आवाज़ सुनकर उसकी आंख खुली| इतनी भयानक गर्मी में कौन बच्चा बाहर रो रहा है देखने के लिए उसने कमरे का दरवाज़ा धीरे से खोला| गर्म हवा के थपेड़े लगता था जैसे उसके इंतज़ार में ही बाहर थे और एकदम से उसे अपना चेहरा जलता महसूस हुआ| एक बार तो उसकी इच्छा हुई कि दरवाज़ा बंद करके वापस कमरे में चली जाये लेकिन तभी बच्चे के रोने की आवाज़ एक बार फिर सुनाई पड़ी|
बरामदे को पार करते हुए उसने मेन गेट खोला और बाहर झाँका, बाहर के एकलौते पेड़ की कमजोर छाया में दो
बच्चियां एक छोटे से लड़के के साथ बैठी थीं| बड़ी बच्ची शायद आठ साल की और उससे छोटी लगभग छह साल की थी और बड़ी के गोद में एक बहुत छोटा बच्चा लेटा हुआ था जो शायद तीन चार महीने का ही था| एक पल को उसके होश उड़ गए, वह कमरे में भी इस गर्मी को झेल पाने में असमर्थ थी और ये बच्चियां इतने छोटे से बच्चे को लेकर इस पेड़ के नीचे बैठी हैं| लपक कर वह उनके पास पहुंची और पूछा "तुम लोग यहाँ क्यों बैठी हो और यह छोटा बच्चा किसका है"|
उसकी आवाज़ सुनकर छोटा बच्चा चुप हो गया और बड़ी लड़की ने कहा "यह हमारा भाई है"|
"लेकिन तुम लोग इसको यहां क्यों लेकर बैठी हो, इतनी गर्मी है और लू भी चल रही है”, उसने फिर पूछा|
"मम्मी हमको यहाँ बैठाकर गयी हैं, आएँगी तो हम लोग चले जायेंगे", बड़ी बच्ची ने बच्चे को झुलाते हुए कहा|
उसे समझ नहीं आया कि क्या करे, फिर उसने उनको कहा "तुम लोग अंदर चलो, छाये में बैठो";, और उनको लेकर वह गेट के अंदर बरामदे में आ गयी| बच्चा उसे भूखा लगा तो अंदर से लाकर आधा ग्लास दूध ले आयी और बड़ी बच्ची को पकड़ा दिया| दूध पीने के बाद उसने दो ग्लास पानी भी दिया और छोटा बच्चा उसे भी गटागट पी गया| फिर वह उन दोनों के लिए भी कुछ खाने का ले आयी और खाना देने के बाद उसने पूछा "तुम्हारी मम्मी क्या करती है?
"कूड़ा बीनती है";, बड़ी बच्ची ने बताया|
"और पापा?
खाना खाते हुए बच्ची बोली "पापा कहीं चले गए हैं, हमको मालूम नहीं है"|
वह इन बच्चो के बारे में सोचते हुए कुछ समय तक वहीँ बैठी रही, इतने में बड़ी बच्ची बोली कि मम्मी आ गयी और गेट खोलकर बाहर निकली| फिर उसके पीछे पीछे उसकी मम्मी भी आयी और सबको चलने के लिए कहने लगी|
उसने उसकी तरफ देखते हुए पूछा "इतनी गर्मी में इस छोटे बच्चे को ऐसे ही बाहर छोड़कर चली गयी थी?
उस औरत ने उसकी तरफ देखते हुए कहा "तो क्या करें, काम तो करना पड़ता है ना नहीं तो इनको रोटी कैसे
खिलाऊंगी"|
उसने सोचा कि इसको थोड़ा समझा दिया जाए तो बोली "इतने बच्चे क्यों पैदा करती हो जब संभाल नहीं सकती इनको?
उस औरत ने उसकी तरफ देखा और कहा "अब इ लड़कियां बड़ी हो गयी हैं, इनको छोड़ देंगे, ये भी कूड़ा बीनेंगी और अपना खाएंगी पियेंगी"|
उसे एकदम से धक्का लगा, इतनी छोटी लड़कियों को छोड़ देगी| "अरे इतनी छोटी लड़कियों को तुम कैसे छोड़ दोगी, उनको कुछ हो गया तो?
उस औरत ने उसकी तरफ देखा और बोली "इतना ही फिकर है तो तुम ही रख लो इनको| हम भी इतने ही बड़े थे जब इस काम में लग गए थे", और फिर उसने छोटा बच्चा अपनी गोद में लिया और गेट के बाहर निकल गयी| उसके पीछे पीछे दोनों लड़कियां भी उसके लिए एक बड़ा सा प्रश्नचिन्ह छोड़ती हुई चली गयी|