कार की स्पीड बहुत ज्यादा थी, इतनी बेताबी तो उसे इधर कई महीनों में नहीं हुई थी जितनी आज थी| कई महीने बाद आज गांव जा रहा था और त्यौहार नज़दीक था तो बहुत सारी चीजें भी उसने खरीद रखी थीं| परिवार कल ही गांव चला गया था, दरअसल इस बार पिताजी ने इस तरह से बुलाया था कि वह ना नहीं कर पाया|
"अब तो चला चली का बेला आ गया है, इस बार घर के पास भी हो और छुट्टी भी है| अगर हो सके तो इस बार का त्यौहार हमारे साथ ही मना लो", पिताजी के शब्दों ने जैसे उसे अंदर तक भेद दिया था|
"अरे पिताजी, आप ऐसी बात क्यों कहते हैं, हम तो आपके साथ ही त्यौहार मनाएंगे इस बार| और चली चला की बात मत कीजिये, अभी तो आपको नाती की शादी भी देखनी है", उसने जैसे अपने आप को दिलासा देते हुए कहा|
लगभग बीस साल तो हो ही गए थे उसे अपने गांव से गए, शुरू में नौकरी पास में ही थी तो शादी के पहले तो वह गांव से ही आता जाता था| फिर शादी हुई और उसके कुछ महीने बाद माँ ने ही उसे जबरदस्ती शहर की राह पकड़ा दी "अरे मेरी बहू शहर से है और उसे यहाँ दिक्कत होती है| वह कहती नहीं है लेकिन मुझे तो दिखता है सब, तू अब शहर में ही एक कमरा लेकर रह| लेकिन यहाँ भी आता जाते रहना, बाबूजी तुमको देखते हैं तो उनकी उम्र बढ़ जाती है", माँ ने समझाते हुए कहा था|
कुछ दिन के ना नुकुर के बाद वह शहर चला गया, पत्नी भी बहुत तैयार नहीं थी माँ पिताजी को अकेले छोड़ने के लिए| लेकिन माँ ने कहा कि तुम लोग हर हफ्ते आते रहना तो वह मान गयी| लेकिन शहर जाने के कुछ ही महीने के अंदर उसका तबादला बहुत दूर हो गया और फिर साल में एकाध बार ही आना होता था| माँ पिताजी बीच बीच में आते रहते थे लेकिन उनका मन तो गांव में ही रमा रहता इसलिए जल्द ही वापस चले जाते| दोनों बच्चों के समय तो माँ खूब समय साथ रही और ऐसा लगा कि अब शायद ही वापस जाए| लेकिन पिताजी को होने वाली असुविधा के चलते वह भी गांव चली गयी|
अब सड़क थोड़ी खराब हो चली थी तो उसकी स्पीड भी कम हो गयी, गांव अब कुछ ही दूर रह गया था| अचानक उसने तेजी से ब्रेक लगाया, सामने एक बुजुर्ग साइकिल लेकर सड़क पर गिर पड़े थे| ब्रेक लगाते ही कार धुंए का गुबार उड़ाते रुक गयी, वह कार से बाहर निकला और बुजुर्ग को उठाने के लिए झुका| जैसे ही उसकी नजर उनपर पड़ी, वह दंग रह गया, यह तो सजीवन काका हैं| हाथ का सहारा देकर उसने उनको सड़क के किनारे बैठाया और फिर उनकी साइकिल किनारे खड़ी कर दी|
"अरे काका, आप इस तरह साइकिल से क्यों घूम रहे हैं, मैं पानी लाता हूँ", कहते हुए उसने कार से पानी और छोटी कोल्ड ड्रिंक की बोतल निकाली और काका को देने लगा| काका ने उसे मिचमिचाती आँखों से देखा और पहचान नहीं पाने के चलते पूछ बैठे "कौन हो बबुआ, हम पहचाने नहीं, अब कम दिखता है?
"काका मैं लखन, आपके घर तो कितनी बार खाया पिया है| लीजिये पहले पानी पीजिये, फिर मैं आपको घर तक ले चलता हूँ"|
"अरे लखना, कितना बड़ा हो गया है रे| इधर कभी मिला भी तो नहीं तो कैसे पहचानते", काका के चेहरे पर चमक आ गयी जो उसको उस धुंधलाती रौशनी में भी दिख गयी|
काका ने पानी के बोतल से कुछ घूंट पानी पिया और अपने कुर्ते से मुंह पोंछते हुए बोले "तू आज ही आ रहा है या पहले से आया है, मैं तुम्हारे घर जाने वाला था एक दो दिन में| अब तो तेरे बाऊ भी बहुत कमजोर हो गए हैं"|
काका के इतना बोलते ही उसे पिताजी की याद आ गयी और वह जल्दी से घर पहुँचने के लिए बेताब होने लगा| "चलो काका तुमको घर छोड़ दूँ फिर अपने घर जाऊँ", कहकर उसने काका को कार की तरफ ले चलना चाहा|
"लेकिन हमारी साइकिल कौन लाएगा, हम आराम से चला लेते हैं इसको| वो तो तुम्हारी गाड़ी देखे तो घबरा गए हम", काका ने थोड़ी चिंता से कहा|
"अब तो चला चली का बेला आ गया है, इस बार घर के पास भी हो और छुट्टी भी है| अगर हो सके तो इस बार का त्यौहार हमारे साथ ही मना लो", पिताजी के शब्दों ने जैसे उसे अंदर तक भेद दिया था|
"अरे पिताजी, आप ऐसी बात क्यों कहते हैं, हम तो आपके साथ ही त्यौहार मनाएंगे इस बार| और चली चला की बात मत कीजिये, अभी तो आपको नाती की शादी भी देखनी है", उसने जैसे अपने आप को दिलासा देते हुए कहा|
लगभग बीस साल तो हो ही गए थे उसे अपने गांव से गए, शुरू में नौकरी पास में ही थी तो शादी के पहले तो वह गांव से ही आता जाता था| फिर शादी हुई और उसके कुछ महीने बाद माँ ने ही उसे जबरदस्ती शहर की राह पकड़ा दी "अरे मेरी बहू शहर से है और उसे यहाँ दिक्कत होती है| वह कहती नहीं है लेकिन मुझे तो दिखता है सब, तू अब शहर में ही एक कमरा लेकर रह| लेकिन यहाँ भी आता जाते रहना, बाबूजी तुमको देखते हैं तो उनकी उम्र बढ़ जाती है", माँ ने समझाते हुए कहा था|
कुछ दिन के ना नुकुर के बाद वह शहर चला गया, पत्नी भी बहुत तैयार नहीं थी माँ पिताजी को अकेले छोड़ने के लिए| लेकिन माँ ने कहा कि तुम लोग हर हफ्ते आते रहना तो वह मान गयी| लेकिन शहर जाने के कुछ ही महीने के अंदर उसका तबादला बहुत दूर हो गया और फिर साल में एकाध बार ही आना होता था| माँ पिताजी बीच बीच में आते रहते थे लेकिन उनका मन तो गांव में ही रमा रहता इसलिए जल्द ही वापस चले जाते| दोनों बच्चों के समय तो माँ खूब समय साथ रही और ऐसा लगा कि अब शायद ही वापस जाए| लेकिन पिताजी को होने वाली असुविधा के चलते वह भी गांव चली गयी|
अब सड़क थोड़ी खराब हो चली थी तो उसकी स्पीड भी कम हो गयी, गांव अब कुछ ही दूर रह गया था| अचानक उसने तेजी से ब्रेक लगाया, सामने एक बुजुर्ग साइकिल लेकर सड़क पर गिर पड़े थे| ब्रेक लगाते ही कार धुंए का गुबार उड़ाते रुक गयी, वह कार से बाहर निकला और बुजुर्ग को उठाने के लिए झुका| जैसे ही उसकी नजर उनपर पड़ी, वह दंग रह गया, यह तो सजीवन काका हैं| हाथ का सहारा देकर उसने उनको सड़क के किनारे बैठाया और फिर उनकी साइकिल किनारे खड़ी कर दी|
"अरे काका, आप इस तरह साइकिल से क्यों घूम रहे हैं, मैं पानी लाता हूँ", कहते हुए उसने कार से पानी और छोटी कोल्ड ड्रिंक की बोतल निकाली और काका को देने लगा| काका ने उसे मिचमिचाती आँखों से देखा और पहचान नहीं पाने के चलते पूछ बैठे "कौन हो बबुआ, हम पहचाने नहीं, अब कम दिखता है?
"काका मैं लखन, आपके घर तो कितनी बार खाया पिया है| लीजिये पहले पानी पीजिये, फिर मैं आपको घर तक ले चलता हूँ"|
"अरे लखना, कितना बड़ा हो गया है रे| इधर कभी मिला भी तो नहीं तो कैसे पहचानते", काका के चेहरे पर चमक आ गयी जो उसको उस धुंधलाती रौशनी में भी दिख गयी|
काका ने पानी के बोतल से कुछ घूंट पानी पिया और अपने कुर्ते से मुंह पोंछते हुए बोले "तू आज ही आ रहा है या पहले से आया है, मैं तुम्हारे घर जाने वाला था एक दो दिन में| अब तो तेरे बाऊ भी बहुत कमजोर हो गए हैं"|
काका के इतना बोलते ही उसे पिताजी की याद आ गयी और वह जल्दी से घर पहुँचने के लिए बेताब होने लगा| "चलो काका तुमको घर छोड़ दूँ फिर अपने घर जाऊँ", कहकर उसने काका को कार की तरफ ले चलना चाहा|
"लेकिन हमारी साइकिल कौन लाएगा, हम आराम से चला लेते हैं इसको| वो तो तुम्हारी गाड़ी देखे तो घबरा गए हम", काका ने थोड़ी चिंता से कहा|
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