इनक्यूबेटर के बाहर बैठी हुई रीती गौर से अपने बच्चे को देख रही थी, कभी कभी उसकी सांस तेज चलती तो कभी लगता जैसे रुक गयी हो. और बच्चे की उठती गिरती सांस के साथ साथ ही उसकी सांस भी कभी तेजी से चलने लगती तो कभी रुकने लगती. आज तीसरा दिन था और अभी और कितने दिन लगने वाले थे, डॉक्टर भी बता पाने में असमर्थ थी. घर पर सबने कहा कि कुछ देर जाकर आराम कर ले लेकिन वह हिलने को भी तैयार नहीं थी. कहीं न कहीं वह अपने आप को भी इसके लिए जिम्मेदार मान रही थी और कुछ न कहते हुए बस बच्चे के स्वस्थ होने का इंतज़ार कर रही थी.
उसके दिमाग में तीन दिन पहले की बात घूम रही थी, "आपकी डेट तो चार दिन पहले ही थी, इतना देर क्यों किया आपने?" डॉक्टर के चेहरे पर आश्चर्य के साथ साथ गुस्से के भी भाव थे. यह उसकी दूसरी डिलीवरी थी और इस सिलसिले में वह इतनी बार मिली थी कि डॉक्टर से अच्छी जान पहचान हो गयी थी.
"पहला बच्चा भी सिजेरियन था और इसको भी इसी तरह पैदा करना था, फिर भी आप लोग इतनी लापरवाही करते हैं, नर्स, जल्दी से ओ टी में ले चलो इनको", नाराजगी जाहिर करते हुए डॉक्टर बोली और कुर्सी से उठ खड़ी हुई. जल्दी जल्दी नर्स ने उसे स्ट्रेचर पर लिटाया और अंदर ले गयी. उसे डर तो पहले से ही लग रहा था, बच्चे का मूवमेंट कल से काफी कम था लेकिन उसे पता था कि आज के पहले घरवाले उसको डिलीवरी के लिए नहीं ले जाएंगे.
काफी पढ़ा लिखा परिवार था उसका, पति का भी अच्छा व्यवसाय था. खुद वह भी ग्रेजुएट थी, लेकिन घर में सास ससुर की काफी चलती थी और हर काम शुभ मुहूर्त और दिन को देखकर ही किया जाता था. कभी कभी वह इसके लिए पति को टोकती भी थी कि वह सास ससुर को समझाए, लेकिन पति भी कुछ तो अपने दब्बूपन और कुछ खुद इन चीजों पर विश्वास के चलते उलटे उसे ही समझा देता था.
"आज जो अपनी दुकान इतनी अच्छी चल रही है उसके लिए भी पापा ने शुभ मुहूर्त निकलवाया था. अपने चाचा को देखो, बिना मुहूर्त के दुकान खुलवाई और क्या हाल हुआ उनका?, पति के इन तर्कों का वह विरोध तो करना चाहती थी लेकिन फिर टाल जाती थी. अब पता तो उसको भी था कि मुहूर्त से ज्यादा महत्त्व ससुर जी के लगाए हुए रुपयों के थे जिसके चलते उनकी किसी बात को टालना पति के बस के बाहर था. वैसे भी चाचा ने दुकान में घटिया माल रखा था और दाम भी थोड़ा ज्यादा लेते थे तो दुकान का यह हाल होना ही था, लेकिन उसकी बात को सुनने वाला कौन था.
पिछले बच्चे के समय ही उसने विरोध किया था, जब नामकरण के लिए बाबाजी को बुलाया गया था.
"घर में बच्चे के दादा दादी हैं तो बच्चे का नाम कोई बाहरी क्यों रखेगा?, उसने अपनी बात पति के आगे रखी थी.
"अरे बाबाजी भी हमारे बुजुर्ग ही हैं, हर शुभ काम में उनसे राय लिया ही जाता है", पति ने उसे समझा दिया था.
वह सहमत तो नहीं थी लेकिन उसने भी अपना विरोध दर्शाने के लिए बच्चे का घर में पुकारने का नाम अपनी मर्जी से रख लिया और फिर धीरे धीरे सभी लोग बच्चे को उसी नाम से बुलाने लगे. लेकिन कभी भी उसने अपने सास ससुर से सीधे इन चीजों के बारे में बात करना उचित नहीं समझा, कहीं न कहीं उसे डर भी था कि कहीं बात का बतंगड़ न बन जाए.
इस डिलीवरी के समय बाबाजी का तो कोई चक्कर नहीं था जो कि शायद लगातार बाबाओं के छप रहे किस्सों का असर था. लेकिन दिन बढ़िया ही हो इसी चक्कर में डिलीवरी तीन दिन आगे टाल दी गयी.
"अरे खंरवास में भी कोई शुभ काम होता है, तीन दिन बाद शुभ दिन शुरू हो रहे हैं, तब हो जायेगा. आखिर करवाना तो डॉक्टर को ही है", सास की बात को टाल पाना पति के बस में नहीं था.
"अब तीन दिन की ही तो बात है, देख लेते हैं. वार्ना कहीं कुछ उल्टा सीधा हो गया तो मुश्किल हो जाएगी", पति ने समझाते हुए कहा था.
उल्टा सीधा तो क्या होना था लेकिन इस बार बेटा ही हो, इसके लिए हर संभव उपाय किये जा रहे थे. भ्रूण परिक्षण बंद होने के चलते ससुर जी पहले से पता तो लगवा नहीं सकते थे. और पहली बेटी थी तो इस बार कुलदीपक ही पैदा होना चाहिए, अंदर से पति के मन में भी यही बात थी. सास तो दिन रात "पोते का मुंह देखकर ही संसार से जाना है" की रट लगाए रहती थी. और उसे भी इसमें कोई दिक्कत नहीं दिखती थी, आखिए एक बेटी थी ही और एक बेटा हो जाए तो शायद बेटे के लिए फिर से इस तकलीफ से नहीं गुजरना पड़े.
पिछले महीने भी डॉक्टर ने बताया था कि बच्चा एकदम ठीक है और समय पर इसकी डिलीवरी करवा देंगी. वह भी घरवालों के साथ काफी खुश थी, आखिर अपने कोख से जन्म दे रही थी. जैसे जैसे समय नजदीक आता गया, उसकी घबराहट थोड़ी बढ़ती गयी, लेकिन किसी भी अनिष्ट की आशंका नहीं थी उसके मन में. लेकिन उस दिन ओ टी में जाते समय डॉक्टर की बात सुनकर उसका बी पी थोड़ा असामान्य होने लगा था. डिलीवरी के बाद जब उसको होश आया तो बगल में बच्चे को नहीं देखकर वह सिहर गयी.
"नर्स मेरा बच्चा कहाँ है?, उसने लड़खड़ाती आवाज़ में पूछा. उसका मन किसी अनजानी आशंका से घबरा गया.
नर्स ने उसकी तरफ देखा और उलाहना देते हुए बोली "बेटा हुआ है तुमको लेकिन किसी ने मिठाई भी नहीं खिलाई मुझे".
बेटा हुआ है, सुनकर उसकी आँखों में ख़ुशी कौंध गयी. लेकिन फिर मेरे पास क्यों नहीं है, सोचकर उसने दुबारा नर्स से पूछा "लेकिन है कहाँ मेरा बेटा?
"अच्छा तुमको तो पता ही नहीं है, बहुत कमजोर हुआ था और उसको जॉन्डिस भी हो गया था. अभी इन्क्यूबेटर में रखा है, तीन चार दिन में ठीक हो जायेगा", नर्स ने तसल्ली देते हुए कहा.
उसको एक झटका लगा, इतने छोटे बच्चे को जॉन्डिस हो गया है, उस ए सी वाले कमरे में भी उसके चेहरे पर पसीना आ गया.
"मेरे घर से किसी को बुला दो प्लीज", उसने नर्स से विनती की. नर्स ने भी थोड़ा नाक चढ़ाते हुए बाहर जाकर आवाज लगायी और उसकी सास अंदर आयी.
"बेटा हुआ है लेकिन थोड़ा बीमार है इसलिए उसको शीशा में बंद करके रखे हैं", सास के चेहरे पर पोते का गर्व तो था लेकिन उसकी बीमारी से थोड़ी चिंतित भी थी.
"मैं कब देखूंगी उसको", उसने तुरंत ही सास से कहा. सास ने कुछ जवाब नहीं दिया और बाहर निकल गयी.
अचानक उसे लगा जैसे कि बच्चे ने उसे पुकारा हो और वह वर्तमान में लौटी. उसने बच्चे को गौर से देखा, उसकी साँसे काफी धीमे धीमे चल रही थीं. वह घबराकर एकदम से उठी और डॉक्टर को बुलाने चल दी. अभी भी कमजोरी बहुत थी और दर्द भी लेकिन बच्चे के आगे उसे यह सब महसूस भी नहीं हो रहा था.
"डॉक्टर जरा देखिये मेरे बच्चे को, उसकी सांस बहुत धीरे चल रही है", लगभग रोआँसी सूरत बनाये हुए उसने कहा.
डॉक्टर ने आकर देखा और कुछ और इंजेक्शन के लिए नर्स को बोलकर उसका कन्धा थपथपाते हुए निकल गयी. नर्स ने इंजेक्शन की तयारी शुरू की और वह फिर से सोच में डूब गयी. "कितनी लापरवाह हो तुम, इतनी देर करने से बच्चा एकदम सूख गया था और उसको जॉन्डिस ने जकड़ लिया है. इन्क्यूबेटर में रखा है, कोशिश कर रहे हैं कि जल्द ही स्वस्थ हो जाए और तुम उसे लेकर घर चली जाओ", डॉक्टर ने उसको कसके झिड़का था जब वह उसके पास आयी थी. वह डॉक्टर को चाह कर भी नहीं बता पायी कि यह लापरवाही नहीं, बल्कि शुभ मुहूर्त का चक्कर था.
पति भी इसी बीच आया और बच्चे को देखते हुए उसके पास बैठ गया. उसने पति की तरफ ध्यान भी नहीं दिया, उससे वह बहुत खफा थी. और पति को भी यह बात पता थी इसलिए वह भी उससे नजरें चुरा रहा था.
"एकदम ठीक हो जायेगा बच्चू, तुम फ़िक्र मत करो", उसको दिलासा देकर वह चला गया.
अब वह थी, हस्पताल का सन्नाटा था और उसके मन में चल रही विचारों की आँधी थी| रह रह के उसके मन में आ रहा था कि उसे कड़ाई से इसका विरोध करना चाहिए था. इन्ही सब में डूबता उतराते उसे एक झपकी आई और आंख खुली तो नजर तुरंत सामने बच्चे पर गयी. एक बार तो लगा जैसे उसकी नज़रों का भ्रम है लेकिन दुबारा उसने गौर से देखा तो लगा जैसे बच्चे की सांस बंद है. उसने चिल्लाकर नर्स को बुलाया और वहीँ अचेत हो गयी.
जल्द ही उसे होश आ गया और उसने देखा कि डॉक्टर, नर्स और उसके ससुर सभी वहां बदहवास खड़े थे. डॉक्टर बार बार उसके बच्चे को हिला डुला रही थी और उसकी सांस देखने की कोशिश कर रही थी. वह पत्थर जैसे खड़ी सबको देख रही थी तभी डॉक्टर की घबराई आवाज़ उसके कानों में पड़ी "अफ़सोस है, बच्चे को नहीं बचा पाए हम लोग".
एकदम से वहां रोना पीटना शुरू हो गया लेकिन वह जैसे जड़ हो गयी. पति ने झकझोर कर उसे हिलाया और खुद सुबक सुबक कर रोने लगा. वह आगे बढ़ी और बच्चे के शरीर को अपने सीने से लगाते हुए बोली "इसके जाने का समय भी शुभ मुहूर्त में ही था" और फिर उसके रुदन से पूरा हस्पताल हिलने लगा.
उसके दिमाग में तीन दिन पहले की बात घूम रही थी, "आपकी डेट तो चार दिन पहले ही थी, इतना देर क्यों किया आपने?" डॉक्टर के चेहरे पर आश्चर्य के साथ साथ गुस्से के भी भाव थे. यह उसकी दूसरी डिलीवरी थी और इस सिलसिले में वह इतनी बार मिली थी कि डॉक्टर से अच्छी जान पहचान हो गयी थी.
"पहला बच्चा भी सिजेरियन था और इसको भी इसी तरह पैदा करना था, फिर भी आप लोग इतनी लापरवाही करते हैं, नर्स, जल्दी से ओ टी में ले चलो इनको", नाराजगी जाहिर करते हुए डॉक्टर बोली और कुर्सी से उठ खड़ी हुई. जल्दी जल्दी नर्स ने उसे स्ट्रेचर पर लिटाया और अंदर ले गयी. उसे डर तो पहले से ही लग रहा था, बच्चे का मूवमेंट कल से काफी कम था लेकिन उसे पता था कि आज के पहले घरवाले उसको डिलीवरी के लिए नहीं ले जाएंगे.
काफी पढ़ा लिखा परिवार था उसका, पति का भी अच्छा व्यवसाय था. खुद वह भी ग्रेजुएट थी, लेकिन घर में सास ससुर की काफी चलती थी और हर काम शुभ मुहूर्त और दिन को देखकर ही किया जाता था. कभी कभी वह इसके लिए पति को टोकती भी थी कि वह सास ससुर को समझाए, लेकिन पति भी कुछ तो अपने दब्बूपन और कुछ खुद इन चीजों पर विश्वास के चलते उलटे उसे ही समझा देता था.
"आज जो अपनी दुकान इतनी अच्छी चल रही है उसके लिए भी पापा ने शुभ मुहूर्त निकलवाया था. अपने चाचा को देखो, बिना मुहूर्त के दुकान खुलवाई और क्या हाल हुआ उनका?, पति के इन तर्कों का वह विरोध तो करना चाहती थी लेकिन फिर टाल जाती थी. अब पता तो उसको भी था कि मुहूर्त से ज्यादा महत्त्व ससुर जी के लगाए हुए रुपयों के थे जिसके चलते उनकी किसी बात को टालना पति के बस के बाहर था. वैसे भी चाचा ने दुकान में घटिया माल रखा था और दाम भी थोड़ा ज्यादा लेते थे तो दुकान का यह हाल होना ही था, लेकिन उसकी बात को सुनने वाला कौन था.
पिछले बच्चे के समय ही उसने विरोध किया था, जब नामकरण के लिए बाबाजी को बुलाया गया था.
"घर में बच्चे के दादा दादी हैं तो बच्चे का नाम कोई बाहरी क्यों रखेगा?, उसने अपनी बात पति के आगे रखी थी.
"अरे बाबाजी भी हमारे बुजुर्ग ही हैं, हर शुभ काम में उनसे राय लिया ही जाता है", पति ने उसे समझा दिया था.
वह सहमत तो नहीं थी लेकिन उसने भी अपना विरोध दर्शाने के लिए बच्चे का घर में पुकारने का नाम अपनी मर्जी से रख लिया और फिर धीरे धीरे सभी लोग बच्चे को उसी नाम से बुलाने लगे. लेकिन कभी भी उसने अपने सास ससुर से सीधे इन चीजों के बारे में बात करना उचित नहीं समझा, कहीं न कहीं उसे डर भी था कि कहीं बात का बतंगड़ न बन जाए.
इस डिलीवरी के समय बाबाजी का तो कोई चक्कर नहीं था जो कि शायद लगातार बाबाओं के छप रहे किस्सों का असर था. लेकिन दिन बढ़िया ही हो इसी चक्कर में डिलीवरी तीन दिन आगे टाल दी गयी.
"अरे खंरवास में भी कोई शुभ काम होता है, तीन दिन बाद शुभ दिन शुरू हो रहे हैं, तब हो जायेगा. आखिर करवाना तो डॉक्टर को ही है", सास की बात को टाल पाना पति के बस में नहीं था.
"अब तीन दिन की ही तो बात है, देख लेते हैं. वार्ना कहीं कुछ उल्टा सीधा हो गया तो मुश्किल हो जाएगी", पति ने समझाते हुए कहा था.
उल्टा सीधा तो क्या होना था लेकिन इस बार बेटा ही हो, इसके लिए हर संभव उपाय किये जा रहे थे. भ्रूण परिक्षण बंद होने के चलते ससुर जी पहले से पता तो लगवा नहीं सकते थे. और पहली बेटी थी तो इस बार कुलदीपक ही पैदा होना चाहिए, अंदर से पति के मन में भी यही बात थी. सास तो दिन रात "पोते का मुंह देखकर ही संसार से जाना है" की रट लगाए रहती थी. और उसे भी इसमें कोई दिक्कत नहीं दिखती थी, आखिए एक बेटी थी ही और एक बेटा हो जाए तो शायद बेटे के लिए फिर से इस तकलीफ से नहीं गुजरना पड़े.
पिछले महीने भी डॉक्टर ने बताया था कि बच्चा एकदम ठीक है और समय पर इसकी डिलीवरी करवा देंगी. वह भी घरवालों के साथ काफी खुश थी, आखिर अपने कोख से जन्म दे रही थी. जैसे जैसे समय नजदीक आता गया, उसकी घबराहट थोड़ी बढ़ती गयी, लेकिन किसी भी अनिष्ट की आशंका नहीं थी उसके मन में. लेकिन उस दिन ओ टी में जाते समय डॉक्टर की बात सुनकर उसका बी पी थोड़ा असामान्य होने लगा था. डिलीवरी के बाद जब उसको होश आया तो बगल में बच्चे को नहीं देखकर वह सिहर गयी.
"नर्स मेरा बच्चा कहाँ है?, उसने लड़खड़ाती आवाज़ में पूछा. उसका मन किसी अनजानी आशंका से घबरा गया.
नर्स ने उसकी तरफ देखा और उलाहना देते हुए बोली "बेटा हुआ है तुमको लेकिन किसी ने मिठाई भी नहीं खिलाई मुझे".
बेटा हुआ है, सुनकर उसकी आँखों में ख़ुशी कौंध गयी. लेकिन फिर मेरे पास क्यों नहीं है, सोचकर उसने दुबारा नर्स से पूछा "लेकिन है कहाँ मेरा बेटा?
"अच्छा तुमको तो पता ही नहीं है, बहुत कमजोर हुआ था और उसको जॉन्डिस भी हो गया था. अभी इन्क्यूबेटर में रखा है, तीन चार दिन में ठीक हो जायेगा", नर्स ने तसल्ली देते हुए कहा.
उसको एक झटका लगा, इतने छोटे बच्चे को जॉन्डिस हो गया है, उस ए सी वाले कमरे में भी उसके चेहरे पर पसीना आ गया.
"मेरे घर से किसी को बुला दो प्लीज", उसने नर्स से विनती की. नर्स ने भी थोड़ा नाक चढ़ाते हुए बाहर जाकर आवाज लगायी और उसकी सास अंदर आयी.
"बेटा हुआ है लेकिन थोड़ा बीमार है इसलिए उसको शीशा में बंद करके रखे हैं", सास के चेहरे पर पोते का गर्व तो था लेकिन उसकी बीमारी से थोड़ी चिंतित भी थी.
"मैं कब देखूंगी उसको", उसने तुरंत ही सास से कहा. सास ने कुछ जवाब नहीं दिया और बाहर निकल गयी.
अचानक उसे लगा जैसे कि बच्चे ने उसे पुकारा हो और वह वर्तमान में लौटी. उसने बच्चे को गौर से देखा, उसकी साँसे काफी धीमे धीमे चल रही थीं. वह घबराकर एकदम से उठी और डॉक्टर को बुलाने चल दी. अभी भी कमजोरी बहुत थी और दर्द भी लेकिन बच्चे के आगे उसे यह सब महसूस भी नहीं हो रहा था.
"डॉक्टर जरा देखिये मेरे बच्चे को, उसकी सांस बहुत धीरे चल रही है", लगभग रोआँसी सूरत बनाये हुए उसने कहा.
डॉक्टर ने आकर देखा और कुछ और इंजेक्शन के लिए नर्स को बोलकर उसका कन्धा थपथपाते हुए निकल गयी. नर्स ने इंजेक्शन की तयारी शुरू की और वह फिर से सोच में डूब गयी. "कितनी लापरवाह हो तुम, इतनी देर करने से बच्चा एकदम सूख गया था और उसको जॉन्डिस ने जकड़ लिया है. इन्क्यूबेटर में रखा है, कोशिश कर रहे हैं कि जल्द ही स्वस्थ हो जाए और तुम उसे लेकर घर चली जाओ", डॉक्टर ने उसको कसके झिड़का था जब वह उसके पास आयी थी. वह डॉक्टर को चाह कर भी नहीं बता पायी कि यह लापरवाही नहीं, बल्कि शुभ मुहूर्त का चक्कर था.
पति भी इसी बीच आया और बच्चे को देखते हुए उसके पास बैठ गया. उसने पति की तरफ ध्यान भी नहीं दिया, उससे वह बहुत खफा थी. और पति को भी यह बात पता थी इसलिए वह भी उससे नजरें चुरा रहा था.
"एकदम ठीक हो जायेगा बच्चू, तुम फ़िक्र मत करो", उसको दिलासा देकर वह चला गया.
अब वह थी, हस्पताल का सन्नाटा था और उसके मन में चल रही विचारों की आँधी थी| रह रह के उसके मन में आ रहा था कि उसे कड़ाई से इसका विरोध करना चाहिए था. इन्ही सब में डूबता उतराते उसे एक झपकी आई और आंख खुली तो नजर तुरंत सामने बच्चे पर गयी. एक बार तो लगा जैसे उसकी नज़रों का भ्रम है लेकिन दुबारा उसने गौर से देखा तो लगा जैसे बच्चे की सांस बंद है. उसने चिल्लाकर नर्स को बुलाया और वहीँ अचेत हो गयी.
जल्द ही उसे होश आ गया और उसने देखा कि डॉक्टर, नर्स और उसके ससुर सभी वहां बदहवास खड़े थे. डॉक्टर बार बार उसके बच्चे को हिला डुला रही थी और उसकी सांस देखने की कोशिश कर रही थी. वह पत्थर जैसे खड़ी सबको देख रही थी तभी डॉक्टर की घबराई आवाज़ उसके कानों में पड़ी "अफ़सोस है, बच्चे को नहीं बचा पाए हम लोग".
एकदम से वहां रोना पीटना शुरू हो गया लेकिन वह जैसे जड़ हो गयी. पति ने झकझोर कर उसे हिलाया और खुद सुबक सुबक कर रोने लगा. वह आगे बढ़ी और बच्चे के शरीर को अपने सीने से लगाते हुए बोली "इसके जाने का समय भी शुभ मुहूर्त में ही था" और फिर उसके रुदन से पूरा हस्पताल हिलने लगा.
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