इस बार दीवाली के दो दिन पहले गांव आ गए थे तो कुम्हारटोला की तरफ निकल गए शम्भू| याद भी नहीं था कि कितने साल बाद इस तरफ आये थे, एक तो गांव ही आना कम हो गया है और उसपर त्यौहार तो अब शहर में मनता है| अब बीवी बच्चे शहर में हैं तो त्यौहार तो वहीँ मनेगा, यही सच है|
उनको थोड़ा थोड़ा याद था रग्घू कुम्हार का घर , बचपन में कई बार यहाँ आकर पुरवा, सुराही और मटका ले गए थे| अंदाज से टोला में घुसने के बाद वह रग्घू के घर की तरफ चले, काफी बदलाव आ गया था वहां भी| कच्चे घर तो शायद ही दिखते थे, सब तरफ बस एक या दो कमरे के बिना प्लास्टर के घर और घरों के बाहर सस्ती प्लास्टिक वाली टूटी कुर्सी| चारो तरफ नजर घुमाने के बाद भी उनको कहीं चाक नजर नहीं आया और उसी को खोजते हुए वह रग्घू के घर पहुँच गए| दरअसल उसे घर पर पिताजी ने बता दिया था कि सिर्फ रग्घू ही अब दिए वगैरह बनाता है|
उनको थोड़ा थोड़ा याद था रग्घू कुम्हार का घर , बचपन में कई बार यहाँ आकर पुरवा, सुराही और मटका ले गए थे| अंदाज से टोला में घुसने के बाद वह रग्घू के घर की तरफ चले, काफी बदलाव आ गया था वहां भी| कच्चे घर तो शायद ही दिखते थे, सब तरफ बस एक या दो कमरे के बिना प्लास्टर के घर और घरों के बाहर सस्ती प्लास्टिक वाली टूटी कुर्सी| चारो तरफ नजर घुमाने के बाद भी उनको कहीं चाक नजर नहीं आया और उसी को खोजते हुए वह रग्घू के घर पहुँच गए| दरअसल उसे घर पर पिताजी ने बता दिया था कि सिर्फ रग्घू ही अब दिए वगैरह बनाता है|
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