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Saturday, August 30, 2014

वक़्त--

इंसानों की आवाज अब यहाँ नहीं आती थी | भयानक सन्नाटा फ़ैल गया था , कहीं कोई हलचल नहीं |
कभी ये जगह बहुत आबाद थी | चारो तरफ फैली हरियाली , उनके बीच ढेर सारे मकान और हर तरफ जीवन के निशान | यहाँ रहने वाले अपने जीवन से संतुष्ट और उन्हें मिलता था प्रकृति का भरपूर सानिध्य |
अचानक सीमा पार से गतिविधियाँ बढ़ गयीं , चिड़ियों के चहचहाने की जगह गोलियों की तड़तड़ाहट ने ले ली | जीवन के संगीत पर मौत का रुदन भारी पड़ गया | देखते ही देखते पूरा इलाका श्मशान में तब्दील हो गया | अब उजड़े हुए मकान , गुजरे हुए वक़्त की तरह बेजान पड़े थे , इस आशा में कि शायद फिर कभी हरियाली और जीवन का साथ हो यहाँ |

दक्षिण अफ्रीका डायरी- भाग २ --

२३ अगस्त २०१३ को रात २ बजे जहाज ने मुंबई हवाईअड्डे को अलविदा कहा और हमारी दक्षिण अफ्रीका यात्रा प्राम्भ हो गयी | उस पूरी यात्रा में , नए देश में जाने का रोमांच , घबराहट या उत्सुकता जो भी कह लें , नींद आँखों से कोसों दूर थी | सुबह ७.३० पर जोहानसबर्ग हवाईअड्डे पर उतर कर कुछ अलग सा महसूस हुआ | गर्म देश से आने के बाद एकदम ठन्डे क्षेत्र में पहुँच गए थे | हमारी शाखा के एक अधिकारी मौजूद थे ले जाने के लिए | होटल पहुंचे और कमरे में बैठने पर थोड़ी राहत मिली | फिर थोड़ा बाहर घूमे , अपने शाखा के लोगों के साथ भोजन और फिर शहर को देखा |
सोमवार को अपनी शाखा में पहला दिन था , भारत की शाखाओं से काफी अलग | खूबसूरत ऑफिस , जो यहाँ के सबसे बेहतरीन माल में स्थित है और पूर्ण शांति | धीरे धीरे यहाँ के वातावरण से अभ्यस्त होने लगे हम लोग | सबसे बड़ी समस्या जो पहले नज़र आई वो थी आवागमन की | आवागमन के सामान्य साधन जैसे बस , टैक्सी इत्यादि थे तो लेकिन उनको इस्तेमाल करने की मनाही थी | सुरक्षा की दृष्टि से भी और घर से ऑफिस के बीच सीधा साधन भी सुलभ नहीं था | खैर कार ले ली , और धीरे धीरे यहाँ के यातायात नियमों से वाकिफ़ होने लगे | पहली चीज जो नज़र आई वो थी लोगों में ट्रैफिक नियमों के प्रति जबरदस्त अनुशासन | लाल बत्ती कोई पार नहीं करता चाहे दिन हो या रात हो | हर दो गाड़ियों के बीच में दूरी बनाकर चलना और सबसे आश्चर्यजनक बात थी , हॉर्न का बिलकुल ही प्रयोग नहीं | मैं पहले से ही ध्वनि प्रदुषण के लिए सजग रहा हूँ इसलिए मुझे कोई दिक्कत नहीं आई लेकिन अब तो लगभग भूल ही गया हूँ हॉर्न के बारे में | शानदार सड़कें और प्रदूषणमुक्त वातावरण , बीमार आदमी भी चंगा हो जाये यहाँ आकर |
दूरभाष पर बात करना भी शुरुआत में दुरूह कार्य था , क्योंकि सबसे पहले तो कुशलछेम पूछिये , फिर अपनी बताईये और उसके बाद उस क्लिष्ट अंग्रेजी को समझिए | महीनो लग गए किसी से खुल कर बात करने में , सम्प्रेषण की दिक्कत तो खैर आज तक है लेकिन अब कम से कम समझ और समझा लेते हैं लोगों को |
स्कूल में विशू के प्रवेश को लेकर भाग दौड़ शुरू हुई | लखनऊ में रहते हुए ही मैंने यहाँ के एक स्कूल में प्रवेश के लिए आवेदन कर दिया था लेकिन उन्होंने प्रतिक्षासूची में डाल रखा था | फिर दूसरे स्कूलों का चक्कर शुरू हुआ और अंत में ईडन कॉलेज में विशू को प्रवेश मिल गया | इतना ध्यान रखने वाला प्राचार्य मैंने नहीं देखा | किस चीज में सुधार की जरुरत है , इसका निर्णय पहले हफ़्ते में ही कर दिया उन्होंने और विशू को तमाम कार्य जैसे अंग्रेजी पुस्तकें पढ़ना , निबंध लिखना इत्यादि शुरू करा दिया | धीरे धीरे विशू ने अपने आप को स्कूल के माहौल में ढाल लिया |
एक महीना बीतते बीतते थोड़ा बहुत देखना शुरू कर दिया था इस देश को | सबसे पहले नेल्सन मंडेला स्क्वायर में लगी हुए उनकी विशालकाय प्रतिमा देखी | फिर अगल बगल के पार्क इत्यादि देखा | अब यहाँ के सड़कों पर जी पी एस लगाकर चलने की आदत पड़ने लगी थी और हम लोग अपने से कुछ जगहों पर जाने लगे थे | क्रमशः ...

Thursday, August 28, 2014

--आज़म खान की भैंसों की बातचीत--

" बाहर कितनी गर्मी थी न , और गन्दगी भी बहुत थी " | 
" लेकिन बड़ा सुकून है यहाँ " , मुस्कुराते हुए एक ने कहा | 
" हाँ , वो तो है , लेकिन कुछ दिन पहले तो अपनी भी हालत ख़राब थी " , दूसरी ने कहा | 
" किस्मत इसी को कहते हैं न " और सभी हँस पड़ीं |
थोड़ी देर बाद कुछ आदमी आये और इज़्ज़त से सबको बाहर ले गए | पानी के फव्वारे में सब स्नान करने लगीं |
एक तरफ खाने पीने के लिए तरह तरह के खाद्य पदार्थ थे , इत्र की खुशबु फैली हुई थी | खाने पीने के बाद सब आराम फरमाने लगीं |
सारे आदमी निगरानी में लगे हुए थे कि इन्हे कोई दिक्कत न होने पाये |
--आज़म खान की भैंसों की बातचीत--

दक्षिण अफ्रीका डायरी--

कल दक्षिण अफ्रीका प्रवास का एक वर्ष पूर्ण हुआ | कैसे बीत गया , पता ही नहीं चला | शायद अच्छे दिन ऐसे ही उड़ जाते हैं और पीछे मुड़ कर देखने नहीं देते | पिछले वर्ष जब आया था तो भयभीत था , सभी परिचितों ने और बैंक के भी लोगों ने काफी डरा दिया था कि बहुत खतरनाक जगह है , एकदम सुरक्षित नहीं है और सामाजिक जीवन तो ख़त्म ही हो जाने वाला है | लेकिन इस एक वर्ष ने इन सभी धारणाओं को न केवल निर्मूल साबित कर दिया , अपितु ये भी दिखा दिया कि यह देश बहुत जीवंत , सुरक्षित और खूबसूरत है |
कहीं भी निकल जाइए , सब तरफ हरियाली ही हरियाली | जोहानसबर्ग तो शायद दुनिया के प्रथम तीन सबसे हरे भरे शहरों में शुमार होता है | सामाजिक जीवन भी बेहतरीन है , हर हफ्ते शनिवार और रविवार को लोग जम के मौज मनाते हैं | इन दो दिनों में कही दूर निकल जाना और पिकनिक या पार्टी करना इनकी दिनचर्या में शामिल है |
थोड़ी असुरक्षा है यहाँ , लेकिन वो विश्व के किस भाग में नहीं है | बस थोड़ा सतर्क रहने कि जरुरत होती है यहाँ , देर रात्रि विचरण यहाँ थोड़ा असुरक्षित है , लेकिन नाईट लाइफ भी बढ़िया है यहाँ | सड़के शानदार , विद्युत व्यवस्था बहुत उम्दा और चारो ओर साफ और सुन्दर | लोग काफी सुसंस्कृत और मददगार | यहाँ से डरबन तक सब देख लिया , गाँधीजी का टॉलस्टॉय फार्म , पीटरमेरिटबर्ग स्टेशन जहाँ उनको ट्रेन के डब्बे से निकला गया था , और नेल्सन मंडेला का घर एवम कार्यस्थल | अब केपटाउन देखना है , यहाँ का सबसे खूबसूरत शहर |
अब थोड़ा अपने निवास स्थान के बारे में , जिस सोसाइटी में हम रहते हैं वहां कोई भी हिंदुस्तानी परिवार नहीं है | इससे यहाँ के लोगों के रहन सहन एवम संस्कृति के बारे में काफी जानने को मिला | एक पड़ोसी महिला है जो बुजुर्ग हैं और घर के बुजुर्ग की तरह ध्यान रखती हैं , इतना ध्यान की कभी कभी उकताहट भी होने लगती है , लेकिन फिर भी अच्छा लगता है | विशू जिस स्कूल में पढ़ते हैं , वहां कोई स्कूल बस नहीं जाती | यहीं एक और पड़ोसी हैं जिनके दो बच्चे हैं जो उसी स्कूल में पढ़ते हैं | शुरुआत में तो वो ही स्कूल ले जाते थे और ले भी आते थे लेकिन मेरे बहुत कहने सुनने के बाद हफ्ते में दो दिन मुझे इज़ाज़त दी कि मैं बच्चों को स्कूल छोड़ूँ | ले आने के लिए अधिकांशतया वो ही ले आते हैं | दिल जीत लिया है उन्होंने हमारा , कभी कभी तो उनके बच्चे नहीं भी जा रहे होते हैं तो भी विशू को अकेले ही ले जाते हैं | बहुत ही बेहतरीन इंसान , बिरले ही मिलते हैं ऐसे लोग |
यहाँ की एक प्रथा हैं कि आप किसी से भी मुखातिब होते हैं तो वो आपकी कुशलछेम जरूर पूछता है और आपसे भी उम्मीद की जाती हैं कि आप भी पूछें | शुरुवात में दिक्कत हुई लेकिन अब आदत पड़ गयी हैं , कोई भी हो , गार्ड , ड्राइवर , स्वीपर या ग्राहक , सबका कुशलछेम पूछना ही हैं | बिलकुल शांति पसंद लोग, लेकिन उतने ही संगीत और नृत्य प्रेमी |
कुल मिलाकर बड़ा सुखद अनुभव हैं यहाँ का और जो लोग भी अफ्रीका देखना चाहते हों वो यहाँ जरूर आएं | कुछ और बातें फिर कभी , लेकिन अपना देश तो शिद्दत से याद आता है |

Saturday, August 23, 2014

टोटका--

यूँ तो पहले भी कई चित्र बनाये थे उसने , लेकिन ये काफी चुनौती भरा था | इस चित्र ने उसे उलझन में डाल दिया था | एक ऐसे परिवार का चित्र बनाना था जो गरीब प्रतीत हो , कई बच्चों वाला हो और जिसे देखकर मन में करुणा का भाव आ जाये |
जब चित्र पूरा हुआ तो उसने देखा कि बच्चों की संख्या ७ थी, यानि विषम संख्या | फिर वही उलझन , हमेशा सम संख्या ही रही थी उसकी चित्रकारी में | अब क्या करे वो , चित्र में कहीं भी जगह नहीं बची थी किसी और को बनाने की | दुबारा चित्र बनाने की बिलकुल इच्छा नहीं हो रही थी | 
अचानक उसके दिमाग में एक विचार कौंधा | थोड़ी देर बाद स्त्री के पेट में भी एक बच्चा दिख रहा था | उसका सम संख्या वाला टोटका कायम था |

Friday, August 22, 2014

चित्र --

" बच्चों , इस चित्र को देख कर आपको कुछ पंक्तियाँ लिखनी हैं | लेकिन ध्यान रहे , बिलकुल संक्षेप में "| कला के शिक्षक ने चित्र को श्यामपट्ट पर टाँग दिया और कुर्सी लगाकर बैठ गए | चित्र में एक माता पिता ढेर सारे बच्चों के साथ थे |
कुछ देर बाद बच्चों की कापियाँ उनके सामने थीं | हर बच्चे ने चित्र को अपने तरीके से परिभाषित करने की कोशिश की थी |
सर्वाधिक नंबर पाने वाले बच्चे की काँपी में सिर्फ ये लाइन लिखी थी " इतने सारे बच्चों के बारे में लिखने के लिए कई पेज लगेंगे , संक्षेप में कैसे लिखें " |

Tuesday, August 19, 2014

तमाचा--

" कितने गंदे लोग हैं, छी, सब तरफ गन्दगी ही गन्दगी, उधर किनारे चलते हैं", कहते हुए लड़का बड़े प्यार से हाथ पकड़ कर उसे किनारे ले गया और आँखों में आँखें डाल कर खो गए दोनों|
" साहब मूंगफली ले लो , टाइम पास "|
" ठीक है, दे दो ", और उसने फटाफट पैसे देकर रुखसत किया उसको|
बैटन बैटन में पता ही नहीं चला, कब मूंगफली ख़त्म हो गयी और अँधेरा हो गया| दोनों उठ कर चलने लगे|
लेकिन जैसे ही लड़की ने झुक कर छिलके उठाये, लड़के का हाथ अपने गाल पर चला गया|