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Tuesday, October 7, 2014

मौसम--

तुम तो जुदा हो गए थे ,
मौसमों की तरह ,
मैं ही भूल नहीं पाया तुम्हे ,
सावन , पतझड़ की तरह ,
लेकिन फिर से नईं कोंपलें निकल रहीं हैं ,
मन का कोना फिर हरा सा हो रहा है ,
काश सूरज न डूबे फिर कभी ,
काश चांदनी रहे हमेशा कायम ,
अब शायद सह न पाऊँ फिर से ,
बदलते हुए मौसमों की दस्तक़ !!

Monday, October 6, 2014

बर्तन--

" बड़ी अच्छी खुशबू आ रही है चच्चा , क्या पक रहा है " |
" कुछ नहीं , गोश्त पक रहा है | आज बकरीद है न , कोई दे गया था " |
 दलान में किनारे अलग रखे हुए कुछ बर्तन आज मुस्कुरा रहे थे |

कुर्बानी--

"क्या बात है, आपने कुर्बानी क्यों नहीं दी इस बार ? " 
"दरअसल क़ुरआन मजीद फिर से पढ़ ली थी मैंने |"

Friday, October 3, 2014

प्रार्थना--

आज की प्रार्थना में शामिल सभी वर्ग के बच्चों के लबों पर एक ही प्रार्थना थी " हमें सत्य और अहिंसा के मार्ग पर चलने की शक्ति देना बापू " | 
बापू के चेहरे पर असीम शांति झलकने लगी | उन्हें यक़ीन हो गया था कि ये बच्चे ही उनके सपनों का भारत बनाएंगे और अब समाज की बागडोर सही हाथों में है |

Thursday, October 2, 2014

झाड़ू--

" अम्बे है मेरी माँ , दुर्गे है मेरी माँ " गुनगुनाते हुए बटोही गली में झाड़ू लगा रहा था | अचानक सामने से एक भीड़ आई और वो किनारे हट गया |
" अरे मिल गया रे झाड़ू " चिल्लाते हुए लोगों का हुजूम , जिसमे कुछ खद्दरधारी भी थे , बटोही की ओर बढ़ा | जब तक वो कुछ समझे , झाड़ू छीन लिया गया था और फिर भीड़ ने बारी बारी से झाड़ू लगाते हुए फोटो खिंचाई | इसी छीना छपटी में बेचारे बटोही का झाड़ू भी टूट गया |
" सर , मेरी फोटो देखी आपने , आजके सांध्यकालीन अखबार में छपी है " , बताते हुए नेताजी बहुत प्रसन्न थे | उधर बटोही नगर निगम में झाड़ू टूट जाने की वजह से झाड़ खा रहा था और गांधीजी की प्रतिमा खामोश थी |

Wednesday, October 1, 2014

ऊँट की सवारी--

ऊँट को राजस्थान का जहाज कहा जाता है लेकिन हमारी यादें इससे किसी और रूप में जुड़ी हुई हैं | गर्मियों की छुट्टियाँ तो हर साल गाँव में ही बीतती थीं | बिजली तो थी ही नहीं सड़कों का भी बुरा हाल था | अव्वल तो सड़कें थी हीं नहीं और थीं भी तो कच्ची और टूटी फूटी | यातायात के साधन बहुत सीमित थे , इक्का दुक्का बसें चलती थीं | अधिकतर हम लोग पैदल , साइकिल या बैलगाड़ी की सवारी करते थे | एक और वाहन हुआ करता था जिसे सगड़ी कहते थे | ये एक तीन पहिया वाहन होता था जिस पर बड़े बुजुर्ग सवारी करते थे |
हमारे घरों में दुधारू पशु खूब होते थे और उनको चराने ले जाना अपने आप में बड़ा रोमांचक अनुभव हुआ करता था | पता नहीं कितने लोगों ने भैंस की सवारी की है , लेकिन बहुत मजा आता था | खेतों में चरी और बरसीम उगाई जाती थी ताकि पशुओं को हरा चारा मिल सके | लेकिन एक और बहुत आवश्यक चीज होती थी पशुओं के लिए " खली " , जो उनको खिलाई जाती थी ताकि वे खूब दूध दें | ये खली अक्सर शहर से आती थी और इसको लाने का वाहन था ऊँट | लगभग हर हफ्ते ऊँट हमारे घर आया करता था और जितने देर वो रहता था , हमारी उत्सुकता बनी रहती थी | हम लोग उसी के चारो ओर घूमते रहते थे क्योंकि उसका उठना और बैठना जितना दिलचस्प होता था उतना ही मजेदार होता था उसको चलते देखना |
कई बार इच्छा होती की हम भी ऊँटवान की तरह उसकी सवारी करें लेकिन  हिम्मत नहीं पड़ती थी | आखिरकार हिम्मत जुटाकर एक बार उसपर सवारी करने की इच्छा जताई | ऊँटवान ने कहा की ठीक है चलो घुमा देतें हैं | उसने ऊँट के ऊपर बैठा दिया और कहा कि कस कर पकड़ लो क्योंकि ऊँट बहुत हिलता है | खैर खूब कस कर पकड़ कर बैठे थे हम , ऊँट ने पहले एक पैर उठाया , हमें लगा की अब गिरे , तब गिरे , फिर उसने दूसरा पैर भी उठाया तो लगा की पीछे की तरफ लुढ़के , फिर उसने बाकी दोनों पैर भी उठाये और खड़ा हो गया | बस इतने में ही हालत ख़राब हो गयी थी और जब उसने चलना शुरू किया तो लगा कि पूरी दुनिया घूम रही है | थोड़ी देर बाद हम उतर गए लेकिन सर घूमता रहा | उसके बाद आगे भी वो ऊँटवाला आता रहा और हम लोग उसको देख कर रोमांचित होते रहे | 

बापू को याद करते हुए--

इस देश में गांधीजी से जुड़े सभी स्थलों को देखने की इच्छा है और कभी किताबों में पढ़ा हुआ " फीनिक्स आश्रम " , जिसको महात्मा गांधी ने १९०४ में स्थापित किया था , को भी देखने की तमन्ना थी | यह आश्रम सन १९८५ के दंगो में क्षतिग्रस्त हो गया था और इसका नाम बम्बई रख दिया था | बाद में २७ फरवरी २००० में इसे पुनः चालू किया गया | फीनिक्स सेट्लमेंट ट्रस्ट ने भारत सरकार कि मदद से यहाँ गांधीजी के घर को पुनः स्थापित किया और यहाँ क्लीनिक एवम एड्स सेंटर इत्यादि शुरू किया |
सके पहले भी दो बार डरबन गया लेकिन वहां नहीं जा पाया था , इसलिए इस बार सोच रखा था कि वहां जाएंगे | शाम को करीब ४ बजे फुर्सत मिलने के बाद मैंने ड्राइवर से कहा कि फीनिक्स चलना है , तो वो मुझे आश्चर्य से देखने लगा | मैंने पूछा कि क्या हुआ तो वो बोला कि शाम के समय , वो भी शुक्रवार को ( जब यहाँ वीकेंड शुरू हो जाता है ) , वहां जाना खतरनाक है | मुझे लगा वो शायद बहाना बना रहा है तो मैंने वहां के कुछ भारतीय लोगों से पूछा , तो उनका भी यही जवाब था |
कहीं कुछ चुभा कि गांधीजी , जो अहिंसा के पुजारी थे , के आश्रम में शाम के समय जाना खतरनाक है यहाँ | समय कम था क्योंकि वापसी का टिकट लिया हुआ था सो वापस आना पड़ा | लेकिन शीघ्र ही जाकर देखना है कि क्यों लोग उस जगह पर शाम को जाने में कतराते हैं | क्यों अहिंसा का पाठ पढ़ाने वाले बापू के आश्रम का क्षेत्र भी हिंसा से अछूता नहीं है ?