तुम तो जुदा हो गए थे ,
मौसमों की तरह ,
मैं ही भूल नहीं पाया तुम्हे ,
सावन , पतझड़ की तरह ,
लेकिन फिर से नईं कोंपलें निकल रहीं हैं ,
मन का कोना फिर हरा सा हो रहा है ,
काश सूरज न डूबे फिर कभी ,
काश चांदनी रहे हमेशा कायम ,
अब शायद सह न पाऊँ फिर से ,
बदलते हुए मौसमों की दस्तक़ !!
मौसमों की तरह ,
मैं ही भूल नहीं पाया तुम्हे ,
सावन , पतझड़ की तरह ,
लेकिन फिर से नईं कोंपलें निकल रहीं हैं ,
मन का कोना फिर हरा सा हो रहा है ,
काश सूरज न डूबे फिर कभी ,
काश चांदनी रहे हमेशा कायम ,
अब शायद सह न पाऊँ फिर से ,
बदलते हुए मौसमों की दस्तक़ !!
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