Translate

Wednesday, October 1, 2014

ऊँट की सवारी--

ऊँट को राजस्थान का जहाज कहा जाता है लेकिन हमारी यादें इससे किसी और रूप में जुड़ी हुई हैं | गर्मियों की छुट्टियाँ तो हर साल गाँव में ही बीतती थीं | बिजली तो थी ही नहीं सड़कों का भी बुरा हाल था | अव्वल तो सड़कें थी हीं नहीं और थीं भी तो कच्ची और टूटी फूटी | यातायात के साधन बहुत सीमित थे , इक्का दुक्का बसें चलती थीं | अधिकतर हम लोग पैदल , साइकिल या बैलगाड़ी की सवारी करते थे | एक और वाहन हुआ करता था जिसे सगड़ी कहते थे | ये एक तीन पहिया वाहन होता था जिस पर बड़े बुजुर्ग सवारी करते थे |
हमारे घरों में दुधारू पशु खूब होते थे और उनको चराने ले जाना अपने आप में बड़ा रोमांचक अनुभव हुआ करता था | पता नहीं कितने लोगों ने भैंस की सवारी की है , लेकिन बहुत मजा आता था | खेतों में चरी और बरसीम उगाई जाती थी ताकि पशुओं को हरा चारा मिल सके | लेकिन एक और बहुत आवश्यक चीज होती थी पशुओं के लिए " खली " , जो उनको खिलाई जाती थी ताकि वे खूब दूध दें | ये खली अक्सर शहर से आती थी और इसको लाने का वाहन था ऊँट | लगभग हर हफ्ते ऊँट हमारे घर आया करता था और जितने देर वो रहता था , हमारी उत्सुकता बनी रहती थी | हम लोग उसी के चारो ओर घूमते रहते थे क्योंकि उसका उठना और बैठना जितना दिलचस्प होता था उतना ही मजेदार होता था उसको चलते देखना |
कई बार इच्छा होती की हम भी ऊँटवान की तरह उसकी सवारी करें लेकिन  हिम्मत नहीं पड़ती थी | आखिरकार हिम्मत जुटाकर एक बार उसपर सवारी करने की इच्छा जताई | ऊँटवान ने कहा की ठीक है चलो घुमा देतें हैं | उसने ऊँट के ऊपर बैठा दिया और कहा कि कस कर पकड़ लो क्योंकि ऊँट बहुत हिलता है | खैर खूब कस कर पकड़ कर बैठे थे हम , ऊँट ने पहले एक पैर उठाया , हमें लगा की अब गिरे , तब गिरे , फिर उसने दूसरा पैर भी उठाया तो लगा की पीछे की तरफ लुढ़के , फिर उसने बाकी दोनों पैर भी उठाये और खड़ा हो गया | बस इतने में ही हालत ख़राब हो गयी थी और जब उसने चलना शुरू किया तो लगा कि पूरी दुनिया घूम रही है | थोड़ी देर बाद हम उतर गए लेकिन सर घूमता रहा | उसके बाद आगे भी वो ऊँटवाला आता रहा और हम लोग उसको देख कर रोमांचित होते रहे | 

No comments:

Post a Comment