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Saturday, May 23, 2015

दाँव--

गाँव में एक नयी बीमारी का प्रकोप फैला और लगातार कुछ बच्चों की मौत हो गयी । एक तरफ जहाँ लोग भयभीत थे वहीँ दूसरी तरफ ठाकुर के चेहरे पर मुस्कान खिल उठी ।
अगले दिन उसके कोठी के पास अपनी कोठरी में रहने वाली अकेली विधवा को लोगों के हुजूम ने डायन कह कर गाँव से बाहर खदेड़ दिया ।
बच्चों की मौत का सिलसिला तो नहीं रुका लेकिन वो ज़मीन अब ठाकुर की थी ।

अनुत्तरित प्रश्न --

" काश उसने नहीं देखा होता मलिन बस्ती के बच्चों को , दिमाग जैसे संज्ञाशून्य हो गया था उसका । पर प्रोजेक्ट रिपोर्ट तो बनानी ही थी "। 
अब शाम ढलने के बाद उसी पेड़ के सहारे खड़ी थी , जहाँ वो हर शाम जाती थी । मन में विचारों का अंधड़ चल रहा था । एक वो थी जिसे आज तक़ ज़िन्दगी में किसी चीज़ की कमी महसूस नहीं हुई थी और एक वो बच्चे थे जिनकी ज़िन्दगी अभावों का प्रतीक थी । लौट कर उसने माँ से पूछा भी था कि आखिर ऐसा क्यों है , उन बच्चों का क्या कुसूर है जो वे ऐसी नारकीय जिंदगी बसर कर रहे हैं । माँ ने भी जवाब नहीं दिया । 
उसने एक बार आसमान की ओर देखा , जैसे पूछ रही हो कि ये सब क्यों नहीं दिखता तुम्हें । जवाब तो नहीं मिला लेकिन उसके मन में इन बच्चों के लिए कुछ करने की इच्छा पुख़्ता हो गयी । एक नए सबेरे का उदय हो रहा था उसके मन में ।

Friday, May 22, 2015

बड़प्पन--

" मैंने तो बिना पैसे दिए ही शॉपिंग कर ली | वो बाजार में एक छोटी सी किराने की दुकान है न , आज वहां चली गयी थी | सामान लेने के बाद उसने पैसे लेने से इंकार कर दिया, बोला कि वो आपको जानता है और इसलिए पैसे नहीं लेगा "|
वो सोच में पड़ गया , अपने गाँव का छोटी जात का दुकानदार , जिसकी बेटी की शादी में १०१ रुपये देकर उसने अपने कर्तव्यों की इतिश्री कर ली थी |
आज वो अपने आप को बहुत छोटा महसूस कर रहा था |

Wednesday, May 20, 2015

नयी परम्परा--

कुछ दिन पहले ही उसके पिताजी की अचानक मौत हो गयी और अमेरिका में लगी नयी नौकरी की दिक्कतों के चलते वो कश्मकश में था कि कैसे गाँव पहुंचे | लेकिन फ़ोन पर माँ ने उसकी उलझन दूर कर दी |
और तेरहवीं के दिन उसके यहाँ सारे समाज को भोज नहीं दिया गया , बल्कि हस्पताल की नींव डाली गयी | पिताजी की अंतिम इच्छा को पूरा करते हुए एक नए परंपरा की शुरुवात हो गयी थी |

अपने अपने फ़र्ज़--

" पापा , आपने अगर मुझे बेटी माना है तो मुझे इस अधिकार से कभी वंचित मत कीजियेगा ", विदा होते समय वो उनसे लिपट कर रो पड़ी थी और वहाँ मौज़ूद लोगों की आँखें नम हो गयी थीं । 
वो अपने एकलौते पुत्र को खो बैठे थे जिसकी नयी नयी शादी हुई थी , और हर उस आवाज़ के सामने चट्टान बन कर खड़े हो गए थे जो उनकी बहू को इस हादसे के लिए दोषी ठहरा रहे थे । फिर उन्होंने बहू को धीरे धीरे सँभाला और उसे अपनी बेटी का दर्ज़ा दे दिया । उसके अपने माता पिता भी संतुष्ट थे कि वो अब उस घर की बेटी बन गयी थी । 
आजीवन उनका ध्यान रखने के बाद उनकी अर्थी को अपना कन्धा देकर वो बेटे का फ़र्ज़ भी निभा गयी ।
ग़ज़ल हो या गीत , यारों फ़र्क़ क्या है,
आजकल किसको बताएं , फ़र्ज़ क्या है,
ना रहे दुनियां में अब ,दुःख बाँटने वाले,
ना रहे अब लोग , जो पूछें मर्ज़ क्या है,
चल पड़े हैं राह में , दिखती नहीं मंज़िल,
मिल गए गर दोस्त, फिर तो हर्ज़ क्या है,
खुद की ही चिंता , ज़माने भर में सबको,
जब लूट लें अपनों को , लेना क़र्ज़ क्या है,
ग़ज़ल हो या गीत , यारों फ़र्क़ क्या है,
आजकल किसको बताएं , फ़र्ज़ क्या है !! 

Tuesday, May 19, 2015

ज़िन्दगी--

कतरा कतरा ज़िन्दगी 
सिसकियाँ भरती रही 
मौत अपने जीत पर 
फिर जश्न मनाने लगी 
किसी ने भी नहीं समझा
दर्द ऐसी ज़िन्दगी का
जब किसी से नहीं कर सके
फ़रियाद अपनी मौत का
क्या ऐसा जीवन ही निहित है
अगर हाँ तो फिर क्यूँ जिए कोई
क्यूँ न बाहें पसार स्वागत करे
उस इच्छा का जिसे लोग कुछ भी कहें
लेकिन जो छुटकारा तो दिला दे
ऐसी बेमतलब लाचार ज़िन्दगी से !!