कतरा कतरा ज़िन्दगी
सिसकियाँ भरती रही
मौत अपने जीत पर
फिर जश्न मनाने लगी
किसी ने भी नहीं समझा
दर्द ऐसी ज़िन्दगी का
जब किसी से नहीं कर सके
फ़रियाद अपनी मौत का
क्या ऐसा जीवन ही निहित है
अगर हाँ तो फिर क्यूँ जिए कोई
क्यूँ न बाहें पसार स्वागत करे
उस इच्छा का जिसे लोग कुछ भी कहें
लेकिन जो छुटकारा तो दिला दे
ऐसी बेमतलब लाचार ज़िन्दगी से !!
सिसकियाँ भरती रही
मौत अपने जीत पर
फिर जश्न मनाने लगी
किसी ने भी नहीं समझा
दर्द ऐसी ज़िन्दगी का
जब किसी से नहीं कर सके
फ़रियाद अपनी मौत का
क्या ऐसा जीवन ही निहित है
अगर हाँ तो फिर क्यूँ जिए कोई
क्यूँ न बाहें पसार स्वागत करे
उस इच्छा का जिसे लोग कुछ भी कहें
लेकिन जो छुटकारा तो दिला दे
ऐसी बेमतलब लाचार ज़िन्दगी से !!
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