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Wednesday, September 23, 2015

नाग--

" अरे कहाँ जा रहे हो फूल माला लेकर ?
" चाचा के यहाँ | आज उनकी पूजा करना जरुरी है "|
चाचा ने तो धोखे से उनका सब कुछ हड़प लिया था और वो सड़क पर आ गए थे , फिर उनकी पूजा | अचानक उसे याद आया , आज नागपंचमी है |

ढहती दीवारें--

" आज मुझे ये मानने में कोई गुरेज नहीं है कि तुम मुझसे बेहतर लिखती हो ", कंधे पर पत्नी का हाथ महसूस करते ही उनके मुँह से ये बेसाख्ता निकल गया | 
" पुरुष होने का अहंकार मुझे आजतक ये मानने से रोकता रहा था , लेकिन सच्चाई यही है तनू ", और पलट कर देखा उन्होंने उसकी तरफ | 
हांथ में पत्नी की पुरष्कृत पुस्तक और उनके चेहरे की हँसी बता रही थी कि वो बांध टूट चुका था | तनू भी उनकी हँसी में शामिल हो गयी , आज उसे अपने जीवन का सबसे कीमती पुरस्कार मिल गया था |

यक़ीन--

" लड़की होकर बाहर काम करेगी , यही दिन देखने बाक़ी थे ", दादी की ये आवाज़ जब से कानों में पड़ी थी तब से परेशान थी सकीना | अब्बू के इंतकाल के बाद घर की माली हालत जर्जर हो चुकी थी और उस सदमे में अम्मी का सिलाई का काम भी ठप हो चला था | वो तो अब्बू ने दादी के तमाम विरोध के बाद भी उसको पढ़ाया था जिससे वो आत्मनिर्भर हो सके |
" बाहर की दुनियाँ बहुत खराब है और तू लड़की है ", दादी का विरोध जारी था | 
" दादी , बाहर की चुनौतियों से जूझने की शक्ति अब्बू ने दी है मुझे , बस मुझ पर यक़ीन रखो "| 
दादी ने सकीना की आँखों में देखा , उसमे उन्हें अपने मरहूम बेटे का अक्स दिखाई दिया | उनके हाथों की सख़्त पकड़ ढीली पड़ने लगी , सकीना ने मुस्कुराते हुए उनके माथे को चूम लिया |

रस्म-

" भाभी , बहुत अच्छी साड़ी है ये | आप लोग कितना ध्यान रखते हैं मेरा ", छोटी बहन ने दोनों हाथों से साड़ी लेते हुए कहा तो अम्मा के सामने पिछले साल का दृश्य घूम गया |
" ऐसी साड़ी तो मेरे यहाँ कामवाली भी नहीं पहनती , रखिये अपने पास | राखी बाँधने आई हूँ तो रस्म अदायगी करने लगी आप ", और साड़ी को छुआ तक नहीं बड़ी बहन ने | बड़ी मुश्किल से भैया ने उनको २५०० देकर मनाया था |
छोटी ने आकर अम्मा का पैर छुआ और धीरे से ५०० निकाल कर उनके हाँथ में रख दिया | काश बाबूजी होते , सोचते हुए अम्मा की आँख भर गयी | लेकिन उनको अपनी छोटी बेटी गरीब घर में होते हुए भी बहुत अमीर लग रही थी |

फ़ौज़ी--

मारिया के साथ सभी बच्चों के हाँथ भी प्रार्थना में जुड़े थे | वो सब हस्पताल में जीवन और मृत्यु के बीच संघर्ष कर रहे अपने धर्म पिता के लिए दुआ कर रहे थे | 
उसने मारिया को बाढ़ प्रभावित क्षेत्र से बचाया था और फिर वो उसकी जीवन रेखा बन गयी थी | फिर मारिया ने भी उसी धर्म को अपनाया , अनाथ और बेघर बच्चों को आश्रय देने का | उसके अनाथालय में पलने वाले बच्चों को मारिया और उसके धर्म पिता ने कभी भी माँ बाप की कमी नहीं महसूस होने दी थी | 
फोन की घंटी बजने पर मारिया वर्तमान में लौटी , अपनी जिंदगी के तमाम ज़ंग जीतने वाला उसका धर्म पिता आज जीवन की ज़ंग भी जीत गया था |

मन का अँधेरा -

" कुछ मदद कर दूँ " सामने उस बैसाखी सँभालते युवक को देखते ही निकल गया उसके मुँह से|
" मैं रख लूंगा सब सामान, शुक्रिया ", उसने दृढ़ता से जवाब दिया|
फिर उसे लगा की शायद ज्यादा ही रुखा जवाब हो गया तो नरमी से बोला " मुझे कोई दिक्कत नहीं होती है, बिलकुल आराम से सब कुछ कर लेता हूँ| शायद आपको लगा होगा कि मैं ये सब कैसे कर पाउँगा "|
" जी हाँ , मुझे यही लगा था, दरअसल आदत सी पड़ गयी है ऐसे लोगों को मदद की याचना करते हुए देख कर "|
" जब तन के बदले मन में अँधेरा हो तो ऐसा ही होता है| बहरहाल ऐसे लोगों की वज़ह से कभी किसी जरूरतमंद की मदद करने से पीछे मत हटियेगा "|
बैसाखी संभाले एक खुशनुमा रौशनी बिखेरता वो आगे बढ़ गया|

हिंदुस्तान की खोज़--

" बहुत बहुत बधाई इस प्रतिष्ठित पुरस्कार के लिए , क्या गज़ब का चित्र खींचा आपने और श्वेत श्याम में तो अद्भुत लग रहा है | ऊपर से ये बेहतरीन शीर्षक " हिंदुस्तान की खोज़ "| 
" एक महानगर में रहने वाले के लिए ऐसे चित्रों की कल्पना करना भी दुरूह है और आपने तो इसे जीवंत ही कर दिया ", किसी और ने हाँथ पकड़कर कहा | 
" शुक्रिया आप सब का , बस कोशिश की थी गाँवों की हक़ीक़त सामने लाने की ", मुस्कुराते हुए उन्होंने सबको धन्यवाद दिया |
मन ही मन वो अपने बेटे को धन्यवाद दे रहे थे जिसने उनसे अपने गाँव चलने की ज़िद की थी और वहां पर उन्होंने पिताजी की अखबार पढ़ती तस्वीर खींच ली थी |