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Wednesday, September 23, 2015

मन का अँधेरा -

" कुछ मदद कर दूँ " सामने उस बैसाखी सँभालते युवक को देखते ही निकल गया उसके मुँह से|
" मैं रख लूंगा सब सामान, शुक्रिया ", उसने दृढ़ता से जवाब दिया|
फिर उसे लगा की शायद ज्यादा ही रुखा जवाब हो गया तो नरमी से बोला " मुझे कोई दिक्कत नहीं होती है, बिलकुल आराम से सब कुछ कर लेता हूँ| शायद आपको लगा होगा कि मैं ये सब कैसे कर पाउँगा "|
" जी हाँ , मुझे यही लगा था, दरअसल आदत सी पड़ गयी है ऐसे लोगों को मदद की याचना करते हुए देख कर "|
" जब तन के बदले मन में अँधेरा हो तो ऐसा ही होता है| बहरहाल ऐसे लोगों की वज़ह से कभी किसी जरूरतमंद की मदद करने से पीछे मत हटियेगा "|
बैसाखी संभाले एक खुशनुमा रौशनी बिखेरता वो आगे बढ़ गया|

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