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Wednesday, September 23, 2015

यक़ीन--

" लड़की होकर बाहर काम करेगी , यही दिन देखने बाक़ी थे ", दादी की ये आवाज़ जब से कानों में पड़ी थी तब से परेशान थी सकीना | अब्बू के इंतकाल के बाद घर की माली हालत जर्जर हो चुकी थी और उस सदमे में अम्मी का सिलाई का काम भी ठप हो चला था | वो तो अब्बू ने दादी के तमाम विरोध के बाद भी उसको पढ़ाया था जिससे वो आत्मनिर्भर हो सके |
" बाहर की दुनियाँ बहुत खराब है और तू लड़की है ", दादी का विरोध जारी था | 
" दादी , बाहर की चुनौतियों से जूझने की शक्ति अब्बू ने दी है मुझे , बस मुझ पर यक़ीन रखो "| 
दादी ने सकीना की आँखों में देखा , उसमे उन्हें अपने मरहूम बेटे का अक्स दिखाई दिया | उनके हाथों की सख़्त पकड़ ढीली पड़ने लगी , सकीना ने मुस्कुराते हुए उनके माथे को चूम लिया |

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