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Monday, October 10, 2016

देवी दर्शन--लघुकथा

सब लोग तैयार हो रहे थे, पूरे घर में गहमागहमी मची हुई थी| बच्चों में भी बहुत उत्साह था, आज छुट्टी तो थी ही, साथ में दुर्गा पंडाल देखना और मेले का आनंद भी लेना था| रजनी ने भी अपनी चुनरी वाली साड़ी पहनी और शीशे के सामने खड़ी होकर अपने को निहारने लगी|
"माँ जल्दी चलो, पूजा को देर हो जाएगी", बेटे ने आवाज़ लगायी जो बाहर कार निकाल रहा था|
"आ रही हूँ, अरे अपने पापा को बोलो जल्दी निकलने के लिए", साड़ी सँभालते हुए रजनी कमरे से बाहर निकली|
"अच्छा किनारे वाला कमरा भी भिड़का देना, आने में तो देर हो जाएगी", रजनी ने आवाज़ लगायी|
"तुम लोग जाओ, मेरा सर दर्द कर रहा है| वैसे भी मुझे कुछ खास दिलचस्पी नहीं है इन पंडालों में", रवि की आवाज़ से रजनी चौंकी|
"पिछले साल तक तो बड़े खुश होकर जाते थे, इस बार क्या हो गया", रजनी ने कहा|
"बस यूँ ही, सर भारी है, तुम लोग जाओ और आराम से लौटना", रवि ने अंदर से ही जवाब दिया|
"चलो मम्मी, देर हो जाएगी, पापा का मन नहीं है तो जाने दो उनको", बेटे शोर करने लगे| रजनी उनके साथ निकल गयी|
रवि ने दरवाजा बंद किया और किनारे वाले कमरे में आ गया| माँ बिस्तर पर पड़ी हुई दरवाजे की ओर ही देख रही थी| छह महीने पहले आये लकवे के अटैक ने उसकी जबान और चलने फिरने की ताक़त छीन ली थी| रवि को देखते ही उसकी आँख में चमक आ गयी और उसने अपने हाथ उठाने की असफल कोशिश की|
"तुझे छोड़कर किसी और देवी के दर्शन करने कैसे जा सकता हूँ माँ", कहते हुए रवि उसके पास बैठ गया| कमरा एकदम से अगरबत्तियों की सुगंध से भर गया|    

Saturday, October 8, 2016

रावण दहन--लघुकथा

पूरे इलाके में हंगामा मचा हुआ था, अब तो पुलिस की गाड़ियां भी आ गयी थीं कि किसी अनहोनी को टाला जा सके| खैर, हुई तो बहुत अनहोनी बात ही थी इस दशहरा पर जिसे हजम कर पाना किसी के लिए सहज नहीं था|
हर साल की तरह इस बार भी रज्जन और उसका परिवार दशहरा के काफी दिन पहले से ही रावण का पुतला बनाने में जुट गया था, आखिर ये न सिर्फ उसका बल्कि उसके पुरखों का भी काम था| लेकिन इस बार वो हवा का रुख नहीं भांप पाया जो बदली हुई थी| और इसी वजह से उसने रामलीला समिति या गांव के सरपंच से पूछा भी नहीं| इधर गांव से बाहर उसके दरवाजे पर उसका काम चलता रहा और उधर गांव में कुछ चेहरे लगातार कुछ अलग सोच पाले अपनी तैयारी करते रहे|
दशहरा के एक दिन पहले ही उसका पुतला तैयार हो चुका था, एकदम सजीव और विशाल| इसबार उसने कुछ ज्यादा ही मेहनत की थी और अब तक का सर्वश्रेष्ठ बनाने में सफल हो गया था| जैसे ही पुतला तैयार हुआ, उसने साइकिल उठाया और सरपंच के घर की ओर चल पड़ा| उसे प्यास बहुत तेज लगी हुई थी लेकिन अपनी उत्तेजना में उसे पानी पीने का भी होश नहीं था, जल्दी जल्दी पैडल मारता वो सरपंच के दरवाजे पहुंच और दूर ही साइकिल से उतर गया|
"आओ रज्जन, कुछ काम था क्या ?, सरपंच के ठन्डे स्वर ने उसे चकित कर दिया|
उसे तो लगा था कि सरपंच उससे देखते ही पूछेंगे कि पुतला बन गया कि नहीं| लेकिन फिर भी उसने बेहद प्रसन्नता से कहा "इस बार का पुतला देखेंगे सरकार तो देखते ही रह जायेंगे, जान लगा दी हैं मैंने"|
" लेकिन रज्जन, तुमने तो बताया नहीं कि पुतला इस बार भी तुम ही बना रहे हो| गांव वालों ने तो इस बार पुतला शहर से मंगवा लिया है", सरपंच ने कुटिलता से मुस्कुराते हुए कहा|
रज्जन तो जैसे गश खा गया, कितनी मेहनत और लगन से बनाया था उसने पुतला और अपनी सारी जमा पूंजी खर्च कर दी थी उसमें| कब वो पलटा और कैसे वो घर आया, उसे खुद होश नहीं रहा|
और दशहरे पर जब गांव में रावण का पुतला जला तो रज्जन ने भी अपनी जेब से माचिस निकाली और अपने बनाये पुतले में आग लगा दी| इधर उसका बनाया पुतला धू धू कर जल रहा था, उधर किसी ने ये देख लिया और पुरे इलाके में खबर फ़ैल गयी "एक विधर्मी ने इस बार रावण का पुतला जला दिया"| 

Thursday, October 6, 2016

सौदा-- कहानी

शाम से रात हो गई लेकिन अभी तक मामला हल नहीं हुआ, बात ही कुछ ऐसी थी। कोठरी में बैठे सभी लोगों के मन में बहुत कुछ चल रहा था, लेकिन खुल कर कहने की किसी की हिम्मत नहीं पड़ रही थी। सबसे बड़ी समस्या थी कि पैसे का इंतज़ाम कैसे हो, बिटिया की शादी सर पर थी और जितनी भी माँग की थी लड़के वालों ने, सितला सब के लिए हुंकारी पार आए थे।
"अब कउनो और रास्ता बचा है क्या, कहाँ से इतना पैसे का इंतज़ाम होगा।", सितला के माथे पर पसीना चुचुआ रहा था।
"जब शादी वाला बात हो रहा था तब काहें नहीं सोचे यह सब। उस समय तो सब कुछ ऐसे क़बूल रहे थे जैसे कउनो ख़ज़ाना मिल गया हो।", बच्चन ने टोका।
"उस समय तो तुम लोग भी थे, किसी के भी ज़ुबान से लड़को वालों के सामने कुछ निकला कि वह इतना काहे माँग रहे हैं, सब लोग तो ज़ुबान पर दही जमा कर बैठे थे। अब बिटिया का बियाह तो करना ही है, चाहे जैसे भी पैसे का इंतज़ाम हो। ", सितला सर पकड़ के बैठ गए।
"लेकिन समाज क्या कहेगा, यह भी तो हमको ही सोचना है भाई। ऊ छोटकी जात वाला अपना ज़मीन खरीदेगा तो कहीं मुँह दिखाने लायक़ नहीं बचेंगे हम लोग।", विजयी भी बोल पड़े।
'बड़ा बिरादरी का बात करते हो सब लोग, कोई मदद को आगे आया? चलो ठीक है, अपनी बिरादरी में कोई तैयार हो जाए, हम ज़मीन उसी को बेच देंगे। लेकिन शादी करनी है तो कउनो हालत में पैसा तो चाहिए हमको", सितला उठ गए।
"अरे का पिनिक के भाग रहे हो, जब देखो तब उठ जाते हो। यहाँ किसी का भी हाल छुपा नहीं है, भला किसके पास इतना पैसा है कि ज़मीन ख़रीद सके", बच्चन ने हाथ पकड़ लिया सितला का।
थोड़ी देर ख़ामोशी रही, फिर सितला ने कहा "हम भी अपने सब रिश्तेदारी में पूछ लिए हैं, किसी के पास इतना पैसा नहीं है। और आप लोग भी तो अपने-अपने रिश्तेदारों से पूछ लिए हो, सबका हाल तो एक जैसा ही है", इतना कहकर सितला फिर से खड़े हो गए। धीरे-धीरे सब पट्टीदार भी अपने-अपने घर निकल गए।
किसी जमाने में इन्हीं लोगों की तूती बोलती थी गाँव में, आख़िर ऊँची जात वाले थे और ज़मीन भी अधिकतर इनके पास ही थी। समय के साथ-साथ आमदनी तो घटती गई, लेकिन ख़र्चे कम नहीं हुए। गाँव के अहिरान, गोड़ान और कुन्बियान के लोग काम धंधे के तलाश में बाहर शहर का रुख़ किए और उसमें से रग्घू महतो का लड़का तो पढ़कर अच्छी पोस्ट पर चला गया। धीरे-धीरे उसने गाँव में खेत ख़रीदना शुरू किया और अब रग्घू के पास ठीक-ठाक खेत हो गया था। रग्घू के मन में चाहे जो हो लेकिन ऊपर से दिखाने के लिए अब भी पुराना लिहाज़ बाक़ी था, तो जब भी सितला को देखता, झुककर पलग्गी ज़रूर करता।
एक दिन ऐसे ही सितला अपने दरवाज़े पर सोच में बैठे हुए थे, तभी रग्घू आया और पलग्गी करके मचिया पर बैठ गया। सितला ने सर हिलाकर उसके पलग्गी का जवाब दिया और कहा "और सब ठीक हौ न महतो।“
रग्घू ने हाँ में सर हिलाया और पूछा "का बात है चच्चा, बहुत चिंता में लगते हैं। कौनो परेशानी है तो कहिए, कुछ उपाय हम भी सोचें।”
"अब तुमसे क्या छिपा है महतो, बिटिया का बियाह तंय कर दिए हैं, लेकिन लड़का वालों की माँग बहुत है। अब कहाँ से इंतज़ाम होगा इतना पैसे का, इसी चक्कर में थोड़ा परेशान हूँ।”
महतो थोड़ी देर सोच में डूबे रहे, दिमाग़ में तो आ रहा था लेकिन उनको लगा कि अभी कहना पता नहीं ठीक हो या नहीं। फिर उन्होंने टोह लेने के गरज से पूछा "अच्छा त इ बात है, अब आजकल त सब लोग लड़के की शादी में मुँह खोल देते हैं। अब त इ सब दहेज़ वाला बीमारी हम लोगों में भी आने लगी है, ज़माना बहुत ख़राब हो गया है। लेकिन हमारे लायक़ कोई सेवा हो तो ज़रूर हुक्म करिएगा, आख़िर वह हमारी भी बिटिया है।”
"हाँ महतो, पहले तो पैसे का इंतज़ाम करें, फिर देखा जाएगा।" सितला का चेहरा उदास ही था।
"अब किसी से कुछ कर्ज़ लेकर ही काम चलाना पड़ेगा, कौनो रिश्तेदार से पूछे आप", महतो ने थोड़ा खुल के पूछा।
"अरे सब रिश्तेदार तो हमारे जैसे ही हैं, अब कोई हज़ार दो हज़ार की बात तो है नहीं। हम तो ज़मीन भी बेचने के लिए तैयार हैं लेकिन किसके पास इतना पैसा है आजकल।", सितला गहरी साँस लेकर बोले।
अब तक महतो को थोड़ी हिम्मत आ गई थी, लेकिन मन में डर भी था कि कहीं बुरा न मान जाएँ, इसलिए थोड़ा इशारे में उन्होंने कहा "अब आप कहें तो हम अपने लड़के से बात करें, कौनो शहर की पार्टी खोजे ज़मीन ख़रीदने के लिए।”
सितला एकदम से चौंके, इसका ख़याल तो उनको आया ही नहीं था। कोई शहर वाला तो ज़रूर ले सकता है ज़मीन और दाम भी वाजिब देगा। अब उन्होंने महतो को ग़ौर से देखा और बोले, "अब देख लो महतो, कोई मिल जाए तो ठीक हो जाए।”
रग्घू ने सोचा आज बात यहीं ख़तम की जाए, फिर मौक़ा देख के अपने लड़के की बात करेंगे। वह पलग्गी करके उठ गए, सितला भी उठे और हैंडपम्प की ओर बढ़े, एक लोटा पानी पीने की इच्छा हो गई थी उनकी।
रग्घू ने घर पहुँचकर बेटे को लगाने के लिए फोन उठाया, जिसे घर पर बेटे ने ज़बरदस्ती लगवा दिया था। वह तो मना कर रहे थे कि क्या ज़रूरत है पइसा बर्बाद करने की, लेकिन बेटा नहीं माना। अब इसी फोन के चलते उनके दरवाज़े पर भीड़ लगी रहती थी, किसी का लड़का लखनऊ था तो किसी का दिल्ली। कोई कोई फोन तो बम्बई से भी आता था और रग्घू सबको कभी झल्लाकर तो कभी यथोचित आदर के साथ बात करवा देते।
बात सुनते ही बेटे ने तुरंत कहा कि ख़रीद लो ज़मीन, फिर कुछ और बात करके रग्घू खटिया पर लेट गए। उनको अंदेसा तो था ही कि अगर उन्होंने सीधे कह दिया ख़ुद ज़मीन ख़रीदने के लिए तो शायद ही सितला तैयार होंगे। और हो सकता है कि बुरा भी मान जाएँ, इसलिए बात बहुत सँभल कर करना चाहते थे।
सितला भी अपने पट्टीदारों से बात किए कि महतो ने ऐसा कहा है। अब कोई शहर वाला ज़मीन ख़रीदे तो किसको आपत्ति होती, लिहाज़ा सबने हामी भर दी।
अगले दिन रग्घू जान बूझ कर धीरे-धीरे सितला के घर के सामने आ रहा था, वह समझना चाहता था कि सितला ज़मीन बेचने के लिए कितने उतावले हैं। उसको देखते ही सितला खटिया से खड़े हो गए और आवाज़ लगाए "अरे आओ महतो, कुछ बात हुई क्या?”
रग्घू ने थोड़ा चेहरा गंभीर किया और दबे सुर में कहा "लड़के से कहे हैं, अब देखिए कुछ-न-कुछ तो वह कर ही देगा।”
सितला के ऊपर तो जैसे पानी पड़ गया, अब हाथ जोड़ के चिरौरी तो कर नहीं सकते थे महतो से, लेकिन निगाहों में कुछ वही भाव था। महतो भी ताड़ गए लेकिन अपनी तरफ़ से जान बूझ के कुछ नहीं बोले।
थोड़ी देर दोनों चुपचाप बैठे रहे, सितला सोच रहे थे कि अपनी तरफ़ से ज़्यादा गरज दिखाया तो शायद दाम कम मिले। उधर महतो सोच रहे थे कि कुछ दिन और ऐसे ही चलेगा तो समय देखकर वे अपनी बात रख देंगे।
महतो पलग्गी करके चले, सितला उठे और घर में घुसे। अब जब भी भेंट होती, सितला पूछते और महतो एक और आश्वासन दे देते।
समय नज़दीक आने लगा, पट्टीदारों ने भी पूछना शुरू कर दिया कि इंतज़ाम हुआ कि नहीं। सितला इसी परेशानी में एक दिन महतो के दुआर पर पहुँचे तो महतो मन ही मन मुस्कुराए। अब उनको समय सही लग रहा था, जल्दी से खटिया से उठे और पलग्गी करके बोले "अरे हमको बुला लिए होते, यहाँ आने की कौन ज़रूरत थी चच्चा", और खटिया आगे कर दिए।
सितला बैठ गए और महतो को देखते हुए बोले "अब का काहें महतो, समय नज़दीक आ गया है और पैसे का कोई इंतज़ाम नहीं हुआ है। अब तुम्हारे ऊपर ही भरोसा था, कुछ बात बनी क्या ?
महतो ने एक बार गहरी साँस ली और सितला के सामने हाथ जोड़ दिए। सितला तो भौचकिया गए, उनको लगा कि इ आख़िरी सहारा भी निकल गया तो क्या होगा। अभी वे कुछ बोलते, उसके पहले ही महतो ने गंभीर होकर कहा "अब का कहें चच्चा, लड़के ने तो बहुत कोशिश की लेकिन कोई भी शहर वाला गाँव की ज़मीन का ठीक दाम देने को तैयार नहीं है। वैसे हम तो आपके पास ही आने वाले थे, एक आदमी कल आने वाला है ज़मीन देखने, शायद बात बन जाए।”
सितला को एक झटका सा लगा, एक बार सोचे कि मना कर दें। लेकिन इसके अलावा कोई और चारा भी तो नहीं था उनके पास। अंदर से ग़ुस्सा निकलने को जैसे तैयार ही था लेकिन उसे क़ाबू करते हुए और भरसक अपने आपको सामान्य बनाते हुए उन्होंने कहा "कल वो आदमी जब आएगा, सीधे हमारे घर ही ले आना उसको।”
महतो ने एक बार फिर हाथ जोड़ लिया और खड़े हो गए। इधर सितला भरी क़दमों से अपने घर की तरफ़ बढ़े, उधर महतो ने कंधे पर पड़ी गमछी से चेहरा पोंछा और अपने चाल पर ख़ुद ही मुस्कुरा दिए। दरअसल उन्होंने ही बेटे को बोला था कि किसी को शहर से भेज दे जो ज़मीन का दाम ऐसा लगाए कि सितला साफ़ मना कर दें। बेटे ने अपने ही ऑफ़िस के एक कर्मचारी को सब समझाकर कह दिया था गाँव जाने को।
अगले दिन जैसे ही वह आदमी महतो के घर आया, सितला ने एक बार उससे ज़मीन के दाम के बारे में पूछ लिया और संतुष्ट होकर सितला के घर की तरफ़ चल पड़े। उधर सितला ने भी एक बढ़िया सा कप और गिलास बाहर के कमरे में रखवा लिया था, मन में तो आया था कि पता नहीं किस बिरादरी का होगा, लेकिन ऐसे समय में वह कोई मौक़ा भी नहीं देना चाहते थे। वैसे कहीं-न-कहीं उनके मन में यह भी था कि अगर किसी निचली जात का हुआ तो महतो ख़ुद ही बता देंगें।
जैसे ही महतो आते दिखे, सितला खड़े हो गए और लपककर महतो के पास पहुँचे। महतो के नमस्कार का जवाब देते हुए उन्होंने उनके साथ के आदमी को मन ही मन तौला और पलटकर घर में आवाज़ लगाए "अरे ज़रा चाय तो भिजवाना बाहर।”
महतो ने उनका हाथ पकड़ लिया और बोले कि चलिए पहले खेत दिखा लिया जाए, फिर चाय पानी देखा जाएगा। सितला भी चाय पिलाने के बहुत मूड में नहीं थे, वह महतो को लेकर खेत की तरफ़ चल पड़े। रास्ते भर उनके दिमाग़ में दाम को लेकर उथल-पुथल चल रही थी, पता नहीं कितना बोलेगा। एक बार इच्छा हुई कि रास्ते में ही पूछें लेकिन फिर दिल ने गवाही नहीं दी। महतो भी क़ीमत के बारे में कुछ बोल नहीं रहे थे और इधर-उधर की बात करते हुए सितला के साथ-साथ चल रहे थे। साथ वाला व्यक्ति चारो तरफ़ देखता हुआ पीछे-पीछे आ रहा था, शायद उसका पहला मौक़ा था ऐसी जगह में आने का।
थोड़ी देर में तीनों खेत पर पहुँच गए, सितला ने अपनी तरफ़ से ख़ूब तारीफ़ की खेत की और महतो ने भी बहुत कुछ कहा अपनी तरफ़ से। लेकिन बात तो पहले से ही तंय थी तो साथ आए व्यक्ति ने लगभग इनकार के अंदाज़ में ऐसी क़ीमत बताई कि सितला का दिल ही बैठ गया। महतो ने भी एक दिखावटी नाराज़गी दिखाई और लगभग उसको डपट ही दिया "क्या समझे हो, खेत है कि हवा मिठाई, बस मुँह खोले और गपक लिए। अरे कोई गरजू समझे हो का सितला चच्चा को, ठीक से बताओ।”
ख़ैर बात न तो बननी थी और न बनी और महतो सितला को लगभग खींचते हुए वापस आने लगे।
"वैसे अगर आप बुरा न माने तो एक बात कहें", महतो ने धीरे-से कहा।
सितला कुछ भी सोच नहीं पा रहे थे, उन्होंने फट से कहा "कहो महतो, क्या बात है।”
"दरअसल लड़का कह रहा था कि चच्चा कहें तो यह ज़मीन हमहीं ख़रीद लें। लेकिन हम उसको मना कर दिए कि समाज क्या कहेगा। अब रहना तो हमको इसी समाज में है तो हमको यह ठीक नहीं लगा, बाक़ी आप जइसन कहें, आख़िर बिटिया की बात है", रग्घू ने बात कहकर हाथ जोड़ दिए।
सितला एक बार तो अंदर से तिलमिलाए कि महतो की ऐसी मज़ाल, हमारी ज़मीन खरीदेगा। लेकिन फिर उन्होंने अपने ग़ुस्से को पी-लिया, आख़िर कोई और रास्ता भी तो नहीं दिख रहा था। वह थोड़ा रुके लेकिन फिर आगे बढ़ने लगे। महतो ने एक बार फिर हाथ जोड़ के छमा माँगी और उनको आगे चलते देखते रहे। लेकिन अब महतो को यक़ीन हो चला था कि अब कहाँ जाएँगे सितला, ज़मीन मिल ही जाएगी उनको।
घर पहुँचकर सितला ने एक बार फिर अपने सभी पट्टीदारों को बुलाया और बात उनके सामने रखी। किसी के पास कोई हल नहीं था इस मसले का, लोग निकल गए। उस रात नींद नहीं आई सितला को, क्या करें, एक तरफ़ बिटिया की शादी तो दूसरी तरफ़ समाज की चिंता। अगले दिन सुबह होने तक उन्होंने मन बना लिया था और चाय पीकर महतो के घर की ओर चल पड़े। महतो ने सितला को आते देखा तो समझ गए कि बात बन गई है। उन्होंने मुस्कुराते हुए सितला को पलग्गी की और खटिया पर बिठाया। सितला ने ही बात चलाई "अब ठीक है महतो, किसी बाहरी आदमी से तो ज़मीन तुमको देना ही ठीक है। बस एक बात का ध्यान रखना, बियाह से पहले इस बात का पता गाँव में किसी और को न चले।”
"अरे चच्चा, यह भी कोई कहने वाली बात है, आख़िर हम लोग तो आपके पुराने आसामी ही हैं। आप बिल्कुल नीफिरक रहें, किसी को कानोकान ख़बर नहीं होगी, बस कितना पैसा चाहिए, हमको बता दीजिएगा", महतो ने कहते हुए एक बार फिर हाथ जोड़ लिए।
सितला ने महतो का हाथ पकड़ा और बोले "लगभग दो लाख चाहिए, देख लेना जितना इंतज़ाम हो जाए।”
महतो ने एक मिनट सोचा और ज़मीन की क़ीमत के हिसाब से दो लाख उनको बहुत फ़ायदे का सौदा लगा। लेकिन फिर उनको याद आया कि इसी सितला चच्चा के ख़ानदान ने उनकी बड़ी बेटी के शादी के समय दरवाज़े पर बजते बैंड को लेकर कितना हंगामा किया था और उनको बैंड बंद करवाना पड़ा था। इधर वह मन ही मन अपने पुराने ज़ख़्मों को याद कर रहे थे, उधर सितला उनकी तरफ़ आस लगाए देख रहे थे। एक बार तो महतो के मन ने कहा कि छोड़ो जो हो गया सो हो गया, अभी ज़मीन भी मिल जाएगी और सितला हमेशा के लिए उनसे दब भी जाएँगे, लेकिन फिर पुराने ज़ख़्मों ने उनको भावुक होने से रोक दिया। लेकिन सितला की तरफ़ हाथ जोड़े हुए ही उन्होंने कहा "चच्चा, दो लाख तो इसके लिए मुश्किल है, लड़के के पास सिर्फ़ डेढ़ लाख का इंतज़ाम है। बाक़ी आप सोच लीजिए, हम कोशिश करेंगे कि अगले हफ़्ते तक पैसा मिल जाए। इसके अलावा भी कोई ज़रूरत हो तो बता दीजिएगा, आख़िर आपस की बात है।”
सितला तो दो लाख के हिसाब से सोच रहे थे, उन्होंने एक बार महतो की तरफ़ देखा। महतो अपने चेहरे का भाव ऐसा बना लिए थे की सितला कुछ बोल नहीं पाए। कहीं यह डेढ़ लाख भी नहीं मिला तो कहाँ जाएँगे, वैसे भी उनको उम्मीद नहीं थी कि दो लाख मिल ही जाएगा, यही सोचते हुए उन्होंने भारी मन से महतो के आगे हामी भर दी। महतो ने अपना हाथ सितला की तरफ़ जोड़ा और खड़े हो गए।
सितला अपने घर की ओर चले, उनके मन में संतोष था कि अब बिटिया की शादी ठीक से निपट जाएगी। उधर महतो भी ख़ुश थे कि आख़िर सितला की ज़मीन उनको मिल ही गई। इस चीज़ का सपना पिछले कई सालों से देखते आ रहे थे और आज वह पूरा हो रहा था। लेकिन कहीं-न-कहीं उनके मन में एक बड़ी संतुष्टि भी थी, एक बेटी के शादी में मदद कर पाने की, आख़िर वह भी एक इनसान ही थे।

फौजी की माँ--लघुकथा

फोन की घंटी लगातार बज रही थी, रश्मि दूसरे कमरे में बैठी काँप गयी| किसी तरह फोन बंद हुआ तब तक विवेक भी अंदर आ गया और दूसरे कमरे में आकर बोला "यहीं बैठी हो, फोन क्यों नहीं उठाया?
रश्मि कुछ बोल नहीं पायी, उसके चेहरे पर जैसे सन्नाटा छाया हुआ था| तभी विवेक के मोबाइल पर बेटी का फोन आया "पापा, मम्मी घर में नहीं है क्या, फोन नहीं उठाया उन्होंने"|
"नहीं बेटा, वो घर में ही है, लो बात कर लो", कहते हुए उसने फोन रश्मि को पकड़ा दिया|
"सब ठीक है बेटी, बस ऐसे ही झपकी आ गयी थी इसलिए फोन नहीं उठा पायी", रश्मि ने झूठ बोल दिया और थोड़ी देर बात करके फोन विवेक को दे दिया|
"झूठ क्यों बोलती हो रश्मि, पिछले कई दिनों से देख रहा हूँ, आखिर फोन क्यों नहीं उठाती तुम", विवेक अब झुंझला गया था|
"ऐसे माहौल में एक बार फोन उठा चुकी हूँ मैं, अब हिम्मत नहीं पड़ती मेरी| अब दूसरा बेटा भी सीमा पर है और आजकल के हालात तो तुम भी देख रहे हो", कहते हुए फफक के रो पड़ी वह|
"एक फौजी की पत्नी और माँ होकर ये बात तुमको शोभा नहीं देती रश्मि| हमारा वो बेटा देश के लिए शहीद हुआ है", विवेक ने दृढ़ता से उसके कंधे को सहलाया|
"एक फौजी की माँ होने से पहले एक माँ भी हूँ मैं| और नम तो तुम्हारी ऑंखें भी होती हैं, बस छुपा लेते हो मुझसे", रश्मि की हिचकियाँ बंध गयीं|
विवेक भी वहीँ बैठ गया, कुछ बूँद आंसू के उसके गाल पर भी लुढ़क गए| 

Monday, October 3, 2016

कचरा--लघुकथा

आज तीन दिन बाद सफाई वाला अपनी हाथ गाड़ी लेकर मोहल्ले में घुसा और हर घर के सामने रुक कर कचरा उठाने लगा| रग्घू अपने दरवाजे पर बैठा उसका इंतज़ार कर रहा था कि कब वो उसके घर के सामने आये और कचरा उठाये| तीन दिन से रखा कचरा अब बदबू करने लगा था और जैसे ही वो बदबू उसके नाक में घुसती, उसका पारा भी चढ़ जाता|
"कामचोर हैं सब के सब, बिना वजह के गायब हो जाते हैं", मन ही मन बुदबुदाते हुए उसने सोच रखा था कि आज उसको कस के डाँटेगा| मोहल्ले से निकलने वाले अपनी नाक पर रुमाल रखकर निकल रहे थे और मोटरसाइकिल वाले कुछ ज्यादा ही तेज निकल रहे थे|
"क्या भाई, तुम लोग भी जब देखो तब गायब हो जाते हो, पूरा मोहल्ला बदबू कर रहा है| पैसा लेने तो पहली तारीख को ही आ जाते हो, उसमें तो कभी नागा नहीं करते", रग्घू ने चिल्लाते हुए कहा| सफाई वाला, जो चुपचाप कचरा उठा रहा था, ने उसकी तरफ देखा और काँपती आवाज़ में बोला "तीन दिन से बुखार में पड़ा था, आज कुछ ठीक हुआ तो चला आया, कमजोरी बहुत लग रही है", और वहीँ चबूतरे पर साँस लेने बैठ गया|
रग्घू ने उसे गौर से देखा, चेहरा पीला हो गया था उसका और काफी कमजोर लग रहा था| उसे थोड़ी दया आयी लेकिन कुछ पूछता उसके पहले ही सफाई वाला उठा और अपनी हाथ गाड़ी लेकर आगे बढ़ गया|
इतने में घर से दो बच्चे दौड़ते हुए बाहर आये और सड़क पर भागे| दूसरी तरफ से तेज आती गाड़ी ने ब्रेक लगाया लेकिन बच्चे से टकरा गयी| बच्चे को ज्यादा चोट तो नहीं लगी लेकिन उसने चिल्लाना शुरू कर दिया| गाड़ी वाला डर कर भागा, रग्घू जब तक उठे तब तक सफाई वाले ने बच्चे को उठाया और अपनी गोद में ले लिया| बच्चा गोद में आने से चुप हो गया, रग्घू ने बच्चे को उससे लिया और गाड़ी वाले को बुरा भला कहते हुए घर आ गया|
बच्चा रग्घू के गोद में ही सो गया, कचरा उसके कपड़ों पर अभी भी लगा हुआ था|  

Thursday, September 29, 2016

सौदा--लघुकथा

नयी नयी आयी बहू कुछ सोच नहीं पा रही थी, वैसे उसे शक़ तो हो गया था| खटका तो तब ही था जब उसके जैसी ख़राब सूरत की और इतने गरीब घर की लड़की के लिए इतने बड़े घर से रिश्ता आया था| उसकी माँ ने उसकी कितनी बलैया ली थी कि क्या किस्मत पायी है उसने और साथ ही साथ तमाम हिदायत भी कि कोई नाखुश ना रहे ससुराल में|
कल रात में भी सुमित अचानक बिस्तर से गायब हो गया| पहले भी कई बार ये हो चुका था लेकिन वो इंतज़ार करते करते सो जाती थी| अगले दिन सुमित कोई न कोई बहाना बना देता और ज्यादा पूछने पर नाराज़ हो जाता| काफी देर तक इंतज़ार करने के बाद भी जब वो नहीं आया तो उसने बाहर देखने का फैसला किया| लेकिन उसने जब सुमित को बड़ी बहू के कमरे से निकलते देखा तो वो स्तब्ध हो चुपके से वापस आ गयी थी|
पूरी रात इसी कशमकस में गुजरी कि वो क्या करे| लेकिन सुबह होते होते उसने स्थिति का सामना करने का फैसला कर लिया था| जैसे ही सुमित बाथरूम से निकला, उसने सीधा सवाल किया "कल रात में आप कहाँ गए थे"|
सुमित इस सवाल के लिए तैयार नहीं था, उसने अचकचा कर कहा "ऐसे ही बाहर निकला था, तुमको पहले भी कहा है कि ज्यादा पूछा मत करो"|
"मैंने देख लिया था कि आप कहाँ गए थे, और आज मैं बता देती हूँ कि आज के बाद ये सब नहीं चलेगा इस घर में", भावावेश में उसकी आवाज़ काफी तेज हो गयी|
सुमित घबराया लेकिन उसने भी काफी तल्ख़ लहज़े में जवाब दिया "ऐसी शक्ल सूरत और परिवार की होकर यहाँ ऊँची आवाज़ में बात करोगी? तुमको समझ नहीं आता कि तुम्हें क्यों इस घर की बहू बनाया गया है| आगे से चुप चाप पड़ी रहो और जैसे चल रहा है, चलने दो"|
"दो बात तुम भी सुन लो, अगर तुम सोचते हो कि मैं चुप रहूंगी तो तुम गलत हो| और दूसरी बात, अगर मैं इस घर से बाहर निकली तो ये बात घर के अंदर नहीं रह पायेगी"|
वो कमरे से बाहर निकल गयी, सुमित वहीँ बिस्तर पर धम्म से बैठ गया|






अंतहीन पीड़ा का सफर-- कहानी

ट्रेन के उस जनरल डिब्बे में अब सब कुछ सामान्य हो चुका था, लोगों ने उसे एक बेहद दुखी और पीड़ित समझ कर मुंह मोड़ लिया. हर यात्री वहां की स्थिति के हिसाब से अब अपने आप को ढाल चुका था और अपनी मंजिल की तरफ झटके खाता हुआ बढ़ रहा था. दुखी तो हर कोई था लेकिन किससे कहे, इसलिए लोग खामोश ही थे. जब सबको अपनी मंजिल पर पहुँचने की जल्दी हो और परिस्थितियां विपरीत हों तो लोग आस पास की घटनाओं से अपने आप को अलग रखना बेहतर समझते हैं या यह उनकी मज़बूरी भी हो सकती है.

कुछ महीने पहले ही वो उस महानगर की बजबजाती गलियों में अपनी जगह बनाने आया था. गाँव में भी गन्दगी थी, बदहाली थी लेकिन कम से कम सांस लेने में घुटन महसूस नहीं होती थी. लेकिन जब गाँव में खाने के लाले पड़ने लगे तो उसे लगा कि इस जगह से कहीं और जाना पड़ेगा. उसके साथ के अधिकतर साथी पहले ही इस महानगर की ओर रुख कर चुके थे, उन्हें एहसास था कि जिन्दा रहने के लिए ताज़ी हवा से ज्यादा भरा पेट जरुरी है. पिता के रहते उसने कभी सोचा भी नहीं था, जीवन अभाव में ही सही लेकिन कट रहा था. लेकिन पिता का साया जब से सर से हटा था, बहन की शादी की जिम्मेदारी उसे शिद्दत से महसूस हो रही थी. माँ कुछ कहती तो नहीं थी, वह शायद चाहती भी नहीं थी कि वह गाँव छोड़े. लेकिन उसकी बेबस निगाहें बहुत कुछ कह जाती थीं. फिर उसके सामने भी इस महानगर की ओर देखने के अलावा कोई और चारा नहीं बचा था.

महानगर में आने के बाद एक महीना तो उसे अपना ठिकाना पक्का करने में ही लग गया. गाँव के वे लोग जो उसके चाचा या ताऊ लगते थे, उन्होंने बस एक बार पूछा और फिर इस तरह से मुंह मोड़ लिया मानो वह उनके यहाँ ही रहने के लिए आया हो. गनीमत थी कि उसका एक दोस्त था जिसने न सिर्फ उसे अपने खोली में रहने की जगह दी, बल्कि अपने सेठ के यहाँ उसे नौकरी भी दिलवाई. उसका दोस्त अकेले ही रहता था और उसके रहने से उसका खोली का किराया शेयर होने लगा. अब दोनों को थोड़ा सुकून मिल गया था, साथ भी मिला और थोड़े पैसों की बचत भी. आखिरकार वह पैसों के लिए ही तो अपना गाँव छोड़कर इस महानगर में आया था.

पिछले कुछ महीनों में हाड़तोड़ मेहनत करके उसने कुछ पैसा बचा लिया और एक बार गांव जाने का सोचा. उसने अपने दोस्त से भी पूछा कि क्या वह भी गाँव चलना चाहेगा लेकिन उसने मना कर दिया. दरअसल इस महानगर में रहने वाले उस जैसे लोग अपने गाँव या तो शादी ब्याह में जाते थे या किसी मरनी करनी में. कभी कभार त्यौहार में भी जाना होता था लेकिन त्यौहार के समय टिकट का हाल बेहद खराब रहता था. उसकी बात अलग थी, वह पहली बार वह अपने गाँव और परिवार से दूर था इसलिए घर की याद भी आ रही थी. और साथ ही साथ उसके मन में यह इच्छा भी थी कि माँ को वह दिखा सके कि अब वह सचमुच बड़ा हो गया है और परिवार को चला सकने में समर्थ हो गया है. इस महानगर से वैसे तो कई ट्रेन उसके गाँव की तरफ जाती थीं लेकिन जाने के लिए कन्फर्म सीट मिलना सबके लिए सपने के समान था. महीनों पहले से बुकिंग कराने पर भी वेटिंग का ही टिकट मिलता. और अगर किसी के पास पैसा हो तो कुछ दिन पहले भी उसको कन्फर्म सीट मिल जाती. टिकट का ये खेल उसकी समझ से बाहर था लेकिन वह कुछ कर भी नहीं सकता था. खैर सफर लंबा था और उसके पास ट्रेन के जनरल डिब्बे के अलावा और कोई जरिया नहीं था गाँव जाने का. स्टेशन पर डिब्बे के सामने लगी कतार को देखकर उसका कालेज मुंह को आ गया. आते समय तो स्थिति फिर भी ठीक थी, गाँव का ही एक व्यक्ति साथ था और उसके पास कोई कीमती सामान भी नहीं था. अभी वो अपने झोले को अपने सीने से लगाए सोच ही रहा था कि इस डिब्बे में वह घुस भी पायेगा या नहीं, तभी  एक कुली ने उसको टोका "सीट चाहिए क्या जाने के लिए". पहले तो वह हिचकिचाया लेकिन फिर उसे महसूस हो गया कि बिना कुली के मदद के वह डिब्बे में घुस भी नहीं पायेगा. फिर कुछ रुपये खर्च करके थोड़ी देर बाद वो ट्रेन के उस जनरल डिब्बे में, जिसमें पैर रखने की भी जगह नहीं थी, ठूंस दिया गया.

ट्रेन चली और कुछ ही देर में डब्बा लोगों के शोरगुल और बदबू से भर गया. महानगर में कुछ माह बिता लेने के चलते उसकी आदत हो गई थी इसलिए उसे ज्यादा दिक्कत नहीं हुई लेकिन बाथरूम के लिए जाना लगभग असंभव था. लोग पूरे रास्ते भरे हुए थे और उधर जाने के लिए शायद उनके सर पर होकर ही जाना पड़ता. उसने बाथरूम जाने का ख्याल ही छोड़ दिया और अपने झोले को अपने से सटाये हुए एक सीट पर आधा बैठे हुए सफर तंय करता रहा. झोले में रखे हुए कुछ नए कपडे और कुछ और घरेलू सामान उसके लिए बेशकीमती थे, दरअसल वो सब उसने माँ और बहन के लिए ख़रीदे थे.

रात होने लगी थी और डिब्बे की धूमल बत्ती में ज्यादा साफ़ नहीं दिख रहा था. उसने एक बार फिर अपने अंदर की जेब में रखे हुए पैसे टटोले और पीछे की तरफ पीठ टिका कर लेटने का उपक्रम करने लगा. खाने के लिए कुछ था झोले में जो उसने खा तो लिया लेकिन पानी डर के मारे नहीं पिया कि कहीं पेशाब न लग जाए. अभी बमुश्किल उसकी आंख झपकी ही थी कि उसे डब्बे में कोलाहल सुनाई दिया. ध्यान से सामने देखने पर दो कांस्टेबल नज़र आये जो लोगों को अपने डंडे से कोंचते हुए गालियां बक रहे थे. फिर उसकी आँखों के सामने उसने उनको लोगों के पैसे भी छीनते देखा तो उसकी आत्मा कांप गयी. जल्दी से उसने एक बार फिर अपनी अंदर की जेब टटोली और हिम्मत जुटाकर बैठ गया.

खैर उसके पास तो टिकट था इसलिए उसे अंदर से थोड़ी हिम्मत भी थी लेकिन जैसे जैसे वो हवलदार उसके नजदीक आ रहे थे, उसकी हिम्मत जवाब देती जा रही थी. उसने जेब से टिकट निकाल कर हाथ में पकड़ लिया और झोले को अपने पीठ से लगाकर बैठ गया. हर बार उन हवलदारों का उठता डंडा जैसे उसके ऊपर ही पड़ने वाला हो, उसे ऐसा ही लग रहा था. उसकी रूह कांप जा रही थी ये सब देखकर. सामने वाली सीट पर बैठे युवक की जेब को जब हवलदार ने टटोला तो उसे लगा कि आज बच पाना मुश्किल ही है. उसने घबराकर आंख बंद कर ली और जितने भी देवी देवता याद आ सकते थे, सबको याद करना शुरू कर दिया.

चंद छण बाद उसने आंख खोली तो सामने हवलदार डंडा लेकर खड़ा था. पहले भी जिंदगी में उसे पुलिस वालों से बेहद डर लगता था लेकिन आज तो जैसे उसे लगा कि साक्षात् यमदूत ही सामने खड़ा हो. कांपते हाथों से उसने टिकट को आगे बढ़ाया और घुटी जबान से इतना ही बोल पाया "साहब टिकट है हमारे पास".

"साले जनरल ट्रेन का टिकट लेकर सुपरफास्ट में बैठा है, तेरा तो चालान बनाना पड़ेगा", टिकट को उसकी तरफ फेंक कर हवलदार गुर्राया.

"साहब, टिकट तो यही दिया था खिड़की पर", उसने फिर से थूक निगलते हुए किसी तरह कहा.

"मतलब हम झूठ बोल रहे हैं, तुम लोगों से ठीक से बात क्या कर ली, दिमाग ख़राब हो गया. अगले स्टेशन पर उतर जाना हमारे साथ, कुछ दिन हवालात में बिताएगा तो सब समझ आ जायेगा" हवलदार ने डंडा उसके पैर पर मारा.

उसे कुछ समझ नहीं आया कि क्या करे, घबरा कर उसने दोनों हाथ जोड़ दिए और गिड़गिड़ाने लगा.

"ठीक है, निकाल 500 और आगे से ध्यान रखना, नहीं तो मार मार के भूसा बना देंगे".

500 रुपये, उसने तो कुल 4000 रूपये बमुश्किल जमा किये थे पिछले कुछ महीने में. अभी उसका दिमाग ये सब सोच ही रहा था कि एक बार और डंडा पड़ा उसके पैर पर, इस बार डंडा ज्यादा तेज था.

"चल उठ, तू हवालात में ही मानेगा अब" कहते हुए हवलदार ने उसका हाथ पकड़ा तो उसकी आत्मा कांप गयी. एक बार उसने हवलदार के चेहरे को देखा लेकिन हिम्मत जवाब दे गयी. कांपते हाथों से उसने अंदर की जेब में हाथ डाला और पैसे निकाल कर 500 हवलदार को पकड़ा दिए. तब तक दूसरे हवलदार की नज़र उसके झोले पर पड़ी और उसने झोला उठा लिया.

"क्या छुपा रखा है इसमें, कहीं कुछ चोरी का सामान तो नहीं है" सुनते ही उसे लगा जैसे उसने कुछ चुरा कर ही रखा हो झोले में. डरते डरते बस इतना ही बोल पाया "माँ और बहन के लिए कुछ कपडे हैं साहब, चोरी का कुछ नहीं है".

झोले को उलट कर देखने के बाद हवलदार आगे बढ़ गया, उसने वापस सब कुछ झोले में रखा और सिमटकर सीट पर बैठ गया. लगभग एक घंटे तक उन हवलदारों का ये तांडव चलता रहा, जिसके पास पैसे नहीं थे, उनका सामान लूट लिया और पिटाई अलग की. ट्रेन चले लगभग ६ घंटे हो चुके थे और अब उसकी भूख प्यास सब मिट गयी थी. पूरा डिब्बा उन हवलदारों को कोस रहा था और जिन लोगों को चोट लगी थी उनकी कराह भी सुनाई पड़ थी. लेकिन उसे लगा कि अब शायद कोई नहीं आएगा, यही सोचकर उसने झोले को पीठ पर लगाया और आंख बंद कर लिया.

सुबह तड़के ही उसकी नींद खुली और उसने देखा कि झोला उसके कंधे से गायब है. झटके से वो उठा और चारो तरफ देखने लगा, कुछ लोग ऊंघ रहे थे और कुछ जाग भी रहे थे. उसने एकदम से चिल्लाना शुरू किया "अरे मेरा झोला किसी ने चुरा लिया" और ऊपर नीचे ढूंढने लगा. तब तक किसी और की आवाज़ आयी "मेरी जेब किसी ने काट ली, सब पैसा चला गया", और वो जोर जोर से चिल्लाने लगा.

यह सुनते ही उसका हाथ भी अपने अंदर वाली जेब पर गया और उसे लगा जैसे वो खाली हो. अब उसने दुबारा तिबारा देखा, जेब खाली ही थी, किसी ने सामने से काट कर सारे पैसे निकाल लिए थे. उसे लगा जैसे चक्कर आ गया हो और वो वहीं गिर जायेगा और उसकी कस कर रुलाई फूट गयी. कितनी मेहनत से और पसीना बहाकर उसने ये पैसे बचाये थे घर के लिए, कितनी रातों को वो सिर्फ पानी पीकर सो गया था. उसके दिमाग ने जैसे काम करना ही बंद कर दिया और वो वहीं सीट के पास लुढ़क गया. किसी को उसकी हालात देखने या समझने की चिंता नहीं थी, अधिकांश लोग अपनी अपनी पीड़ा से परेशान थे. समय गुजरने लगा, ट्रेन अपनी गति से भागी जा रही थी.