शाम से रात हो गई लेकिन अभी तक मामला हल नहीं हुआ, बात ही कुछ ऐसी थी। कोठरी में बैठे सभी लोगों के मन में बहुत कुछ चल रहा था, लेकिन खुल कर कहने की किसी की हिम्मत नहीं पड़ रही थी। सबसे बड़ी समस्या थी कि पैसे का इंतज़ाम कैसे हो, बिटिया की शादी सर पर थी और जितनी भी माँग की थी लड़के वालों ने, सितला सब के लिए हुंकारी पार आए थे।
"अब कउनो और रास्ता बचा है क्या, कहाँ से इतना पैसे का इंतज़ाम होगा।", सितला के माथे पर पसीना चुचुआ रहा था।
"जब शादी वाला बात हो रहा था तब काहें नहीं सोचे यह सब। उस समय तो सब कुछ ऐसे क़बूल रहे थे जैसे कउनो ख़ज़ाना मिल गया हो।", बच्चन ने टोका।
"उस समय तो तुम लोग भी थे, किसी के भी ज़ुबान से लड़को वालों के सामने कुछ निकला कि वह इतना काहे माँग रहे हैं, सब लोग तो ज़ुबान पर दही जमा कर बैठे थे। अब बिटिया का बियाह तो करना ही है, चाहे जैसे भी पैसे का इंतज़ाम हो। ", सितला सर पकड़ के बैठ गए।
"लेकिन समाज क्या कहेगा, यह भी तो हमको ही सोचना है भाई। ऊ छोटकी जात वाला अपना ज़मीन खरीदेगा तो कहीं मुँह दिखाने लायक़ नहीं बचेंगे हम लोग।", विजयी भी बोल पड़े।
'बड़ा बिरादरी का बात करते हो सब लोग, कोई मदद को आगे आया? चलो ठीक है, अपनी बिरादरी में कोई तैयार हो जाए, हम ज़मीन उसी को बेच देंगे। लेकिन शादी करनी है तो कउनो हालत में पैसा तो चाहिए हमको", सितला उठ गए।
"अरे का पिनिक के भाग रहे हो, जब देखो तब उठ जाते हो। यहाँ किसी का भी हाल छुपा नहीं है, भला किसके पास इतना पैसा है कि ज़मीन ख़रीद सके", बच्चन ने हाथ पकड़ लिया सितला का।
थोड़ी देर ख़ामोशी रही, फिर सितला ने कहा "हम भी अपने सब रिश्तेदारी में पूछ लिए हैं, किसी के पास इतना पैसा नहीं है। और आप लोग भी तो अपने-अपने रिश्तेदारों से पूछ लिए हो, सबका हाल तो एक जैसा ही है", इतना कहकर सितला फिर से खड़े हो गए। धीरे-धीरे सब पट्टीदार भी अपने-अपने घर निकल गए।
किसी जमाने में इन्हीं लोगों की तूती बोलती थी गाँव में, आख़िर ऊँची जात वाले थे और ज़मीन भी अधिकतर इनके पास ही थी। समय के साथ-साथ आमदनी तो घटती गई, लेकिन ख़र्चे कम नहीं हुए। गाँव के अहिरान, गोड़ान और कुन्बियान के लोग काम धंधे के तलाश में बाहर शहर का रुख़ किए और उसमें से रग्घू महतो का लड़का तो पढ़कर अच्छी पोस्ट पर चला गया। धीरे-धीरे उसने गाँव में खेत ख़रीदना शुरू किया और अब रग्घू के पास ठीक-ठाक खेत हो गया था। रग्घू के मन में चाहे जो हो लेकिन ऊपर से दिखाने के लिए अब भी पुराना लिहाज़ बाक़ी था, तो जब भी सितला को देखता, झुककर पलग्गी ज़रूर करता।
एक दिन ऐसे ही सितला अपने दरवाज़े पर सोच में बैठे हुए थे, तभी रग्घू आया और पलग्गी करके मचिया पर बैठ गया। सितला ने सर हिलाकर उसके पलग्गी का जवाब दिया और कहा "और सब ठीक हौ न महतो।“
रग्घू ने हाँ में सर हिलाया और पूछा "का बात है चच्चा, बहुत चिंता में लगते हैं। कौनो परेशानी है तो कहिए, कुछ उपाय हम भी सोचें।”
"अब तुमसे क्या छिपा है महतो, बिटिया का बियाह तंय कर दिए हैं, लेकिन लड़का वालों की माँग बहुत है। अब कहाँ से इंतज़ाम होगा इतना पैसे का, इसी चक्कर में थोड़ा परेशान हूँ।”
महतो थोड़ी देर सोच में डूबे रहे, दिमाग़ में तो आ रहा था लेकिन उनको लगा कि अभी कहना पता नहीं ठीक हो या नहीं। फिर उन्होंने टोह लेने के गरज से पूछा "अच्छा त इ बात है, अब आजकल त सब लोग लड़के की शादी में मुँह खोल देते हैं। अब त इ सब दहेज़ वाला बीमारी हम लोगों में भी आने लगी है, ज़माना बहुत ख़राब हो गया है। लेकिन हमारे लायक़ कोई सेवा हो तो ज़रूर हुक्म करिएगा, आख़िर वह हमारी भी बिटिया है।”
"हाँ महतो, पहले तो पैसे का इंतज़ाम करें, फिर देखा जाएगा।" सितला का चेहरा उदास ही था।
"अब किसी से कुछ कर्ज़ लेकर ही काम चलाना पड़ेगा, कौनो रिश्तेदार से पूछे आप", महतो ने थोड़ा खुल के पूछा।
"अरे सब रिश्तेदार तो हमारे जैसे ही हैं, अब कोई हज़ार दो हज़ार की बात तो है नहीं। हम तो ज़मीन भी बेचने के लिए तैयार हैं लेकिन किसके पास इतना पैसा है आजकल।", सितला गहरी साँस लेकर बोले।
अब तक महतो को थोड़ी हिम्मत आ गई थी, लेकिन मन में डर भी था कि कहीं बुरा न मान जाएँ, इसलिए थोड़ा इशारे में उन्होंने कहा "अब आप कहें तो हम अपने लड़के से बात करें, कौनो शहर की पार्टी खोजे ज़मीन ख़रीदने के लिए।”
सितला एकदम से चौंके, इसका ख़याल तो उनको आया ही नहीं था। कोई शहर वाला तो ज़रूर ले सकता है ज़मीन और दाम भी वाजिब देगा। अब उन्होंने महतो को ग़ौर से देखा और बोले, "अब देख लो महतो, कोई मिल जाए तो ठीक हो जाए।”
रग्घू ने सोचा आज बात यहीं ख़तम की जाए, फिर मौक़ा देख के अपने लड़के की बात करेंगे। वह पलग्गी करके उठ गए, सितला भी उठे और हैंडपम्प की ओर बढ़े, एक लोटा पानी पीने की इच्छा हो गई थी उनकी।
रग्घू ने घर पहुँचकर बेटे को लगाने के लिए फोन उठाया, जिसे घर पर बेटे ने ज़बरदस्ती लगवा दिया था। वह तो मना कर रहे थे कि क्या ज़रूरत है पइसा बर्बाद करने की, लेकिन बेटा नहीं माना। अब इसी फोन के चलते उनके दरवाज़े पर भीड़ लगी रहती थी, किसी का लड़का लखनऊ था तो किसी का दिल्ली। कोई कोई फोन तो बम्बई से भी आता था और रग्घू सबको कभी झल्लाकर तो कभी यथोचित आदर के साथ बात करवा देते।
बात सुनते ही बेटे ने तुरंत कहा कि ख़रीद लो ज़मीन, फिर कुछ और बात करके रग्घू खटिया पर लेट गए। उनको अंदेसा तो था ही कि अगर उन्होंने सीधे कह दिया ख़ुद ज़मीन ख़रीदने के लिए तो शायद ही सितला तैयार होंगे। और हो सकता है कि बुरा भी मान जाएँ, इसलिए बात बहुत सँभल कर करना चाहते थे।
सितला भी अपने पट्टीदारों से बात किए कि महतो ने ऐसा कहा है। अब कोई शहर वाला ज़मीन ख़रीदे तो किसको आपत्ति होती, लिहाज़ा सबने हामी भर दी।
अगले दिन रग्घू जान बूझ कर धीरे-धीरे सितला के घर के सामने आ रहा था, वह समझना चाहता था कि सितला ज़मीन बेचने के लिए कितने उतावले हैं। उसको देखते ही सितला खटिया से खड़े हो गए और आवाज़ लगाए "अरे आओ महतो, कुछ बात हुई क्या?”
रग्घू ने थोड़ा चेहरा गंभीर किया और दबे सुर में कहा "लड़के से कहे हैं, अब देखिए कुछ-न-कुछ तो वह कर ही देगा।”
सितला के ऊपर तो जैसे पानी पड़ गया, अब हाथ जोड़ के चिरौरी तो कर नहीं सकते थे महतो से, लेकिन निगाहों में कुछ वही भाव था। महतो भी ताड़ गए लेकिन अपनी तरफ़ से जान बूझ के कुछ नहीं बोले।
थोड़ी देर दोनों चुपचाप बैठे रहे, सितला सोच रहे थे कि अपनी तरफ़ से ज़्यादा गरज दिखाया तो शायद दाम कम मिले। उधर महतो सोच रहे थे कि कुछ दिन और ऐसे ही चलेगा तो समय देखकर वे अपनी बात रख देंगे।
महतो पलग्गी करके चले, सितला उठे और घर में घुसे। अब जब भी भेंट होती, सितला पूछते और महतो एक और आश्वासन दे देते।
समय नज़दीक आने लगा, पट्टीदारों ने भी पूछना शुरू कर दिया कि इंतज़ाम हुआ कि नहीं। सितला इसी परेशानी में एक दिन महतो के दुआर पर पहुँचे तो महतो मन ही मन मुस्कुराए। अब उनको समय सही लग रहा था, जल्दी से खटिया से उठे और पलग्गी करके बोले "अरे हमको बुला लिए होते, यहाँ आने की कौन ज़रूरत थी चच्चा", और खटिया आगे कर दिए।
सितला बैठ गए और महतो को देखते हुए बोले "अब का काहें महतो, समय नज़दीक आ गया है और पैसे का कोई इंतज़ाम नहीं हुआ है। अब तुम्हारे ऊपर ही भरोसा था, कुछ बात बनी क्या ?
महतो ने एक बार गहरी साँस ली और सितला के सामने हाथ जोड़ दिए। सितला तो भौचकिया गए, उनको लगा कि इ आख़िरी सहारा भी निकल गया तो क्या होगा। अभी वे कुछ बोलते, उसके पहले ही महतो ने गंभीर होकर कहा "अब का कहें चच्चा, लड़के ने तो बहुत कोशिश की लेकिन कोई भी शहर वाला गाँव की ज़मीन का ठीक दाम देने को तैयार नहीं है। वैसे हम तो आपके पास ही आने वाले थे, एक आदमी कल आने वाला है ज़मीन देखने, शायद बात बन जाए।”
सितला को एक झटका सा लगा, एक बार सोचे कि मना कर दें। लेकिन इसके अलावा कोई और चारा भी तो नहीं था उनके पास। अंदर से ग़ुस्सा निकलने को जैसे तैयार ही था लेकिन उसे क़ाबू करते हुए और भरसक अपने आपको सामान्य बनाते हुए उन्होंने कहा "कल वो आदमी जब आएगा, सीधे हमारे घर ही ले आना उसको।”
महतो ने एक बार फिर हाथ जोड़ लिया और खड़े हो गए। इधर सितला भरी क़दमों से अपने घर की तरफ़ बढ़े, उधर महतो ने कंधे पर पड़ी गमछी से चेहरा पोंछा और अपने चाल पर ख़ुद ही मुस्कुरा दिए। दरअसल उन्होंने ही बेटे को बोला था कि किसी को शहर से भेज दे जो ज़मीन का दाम ऐसा लगाए कि सितला साफ़ मना कर दें। बेटे ने अपने ही ऑफ़िस के एक कर्मचारी को सब समझाकर कह दिया था गाँव जाने को।
अगले दिन जैसे ही वह आदमी महतो के घर आया, सितला ने एक बार उससे ज़मीन के दाम के बारे में पूछ लिया और संतुष्ट होकर सितला के घर की तरफ़ चल पड़े। उधर सितला ने भी एक बढ़िया सा कप और गिलास बाहर के कमरे में रखवा लिया था, मन में तो आया था कि पता नहीं किस बिरादरी का होगा, लेकिन ऐसे समय में वह कोई मौक़ा भी नहीं देना चाहते थे। वैसे कहीं-न-कहीं उनके मन में यह भी था कि अगर किसी निचली जात का हुआ तो महतो ख़ुद ही बता देंगें।
जैसे ही महतो आते दिखे, सितला खड़े हो गए और लपककर महतो के पास पहुँचे। महतो के नमस्कार का जवाब देते हुए उन्होंने उनके साथ के आदमी को मन ही मन तौला और पलटकर घर में आवाज़ लगाए "अरे ज़रा चाय तो भिजवाना बाहर।”
महतो ने उनका हाथ पकड़ लिया और बोले कि चलिए पहले खेत दिखा लिया जाए, फिर चाय पानी देखा जाएगा। सितला भी चाय पिलाने के बहुत मूड में नहीं थे, वह महतो को लेकर खेत की तरफ़ चल पड़े। रास्ते भर उनके दिमाग़ में दाम को लेकर उथल-पुथल चल रही थी, पता नहीं कितना बोलेगा। एक बार इच्छा हुई कि रास्ते में ही पूछें लेकिन फिर दिल ने गवाही नहीं दी। महतो भी क़ीमत के बारे में कुछ बोल नहीं रहे थे और इधर-उधर की बात करते हुए सितला के साथ-साथ चल रहे थे। साथ वाला व्यक्ति चारो तरफ़ देखता हुआ पीछे-पीछे आ रहा था, शायद उसका पहला मौक़ा था ऐसी जगह में आने का।
थोड़ी देर में तीनों खेत पर पहुँच गए, सितला ने अपनी तरफ़ से ख़ूब तारीफ़ की खेत की और महतो ने भी बहुत कुछ कहा अपनी तरफ़ से। लेकिन बात तो पहले से ही तंय थी तो साथ आए व्यक्ति ने लगभग इनकार के अंदाज़ में ऐसी क़ीमत बताई कि सितला का दिल ही बैठ गया। महतो ने भी एक दिखावटी नाराज़गी दिखाई और लगभग उसको डपट ही दिया "क्या समझे हो, खेत है कि हवा मिठाई, बस मुँह खोले और गपक लिए। अरे कोई गरजू समझे हो का सितला चच्चा को, ठीक से बताओ।”
ख़ैर बात न तो बननी थी और न बनी और महतो सितला को लगभग खींचते हुए वापस आने लगे।
"वैसे अगर आप बुरा न माने तो एक बात कहें", महतो ने धीरे-से कहा।
सितला कुछ भी सोच नहीं पा रहे थे, उन्होंने फट से कहा "कहो महतो, क्या बात है।”
"दरअसल लड़का कह रहा था कि चच्चा कहें तो यह ज़मीन हमहीं ख़रीद लें। लेकिन हम उसको मना कर दिए कि समाज क्या कहेगा। अब रहना तो हमको इसी समाज में है तो हमको यह ठीक नहीं लगा, बाक़ी आप जइसन कहें, आख़िर बिटिया की बात है", रग्घू ने बात कहकर हाथ जोड़ दिए।
सितला एक बार तो अंदर से तिलमिलाए कि महतो की ऐसी मज़ाल, हमारी ज़मीन खरीदेगा। लेकिन फिर उन्होंने अपने ग़ुस्से को पी-लिया, आख़िर कोई और रास्ता भी तो नहीं दिख रहा था। वह थोड़ा रुके लेकिन फिर आगे बढ़ने लगे। महतो ने एक बार फिर हाथ जोड़ के छमा माँगी और उनको आगे चलते देखते रहे। लेकिन अब महतो को यक़ीन हो चला था कि अब कहाँ जाएँगे सितला, ज़मीन मिल ही जाएगी उनको।
घर पहुँचकर सितला ने एक बार फिर अपने सभी पट्टीदारों को बुलाया और बात उनके सामने रखी। किसी के पास कोई हल नहीं था इस मसले का, लोग निकल गए। उस रात नींद नहीं आई सितला को, क्या करें, एक तरफ़ बिटिया की शादी तो दूसरी तरफ़ समाज की चिंता। अगले दिन सुबह होने तक उन्होंने मन बना लिया था और चाय पीकर महतो के घर की ओर चल पड़े। महतो ने सितला को आते देखा तो समझ गए कि बात बन गई है। उन्होंने मुस्कुराते हुए सितला को पलग्गी की और खटिया पर बिठाया। सितला ने ही बात चलाई "अब ठीक है महतो, किसी बाहरी आदमी से तो ज़मीन तुमको देना ही ठीक है। बस एक बात का ध्यान रखना, बियाह से पहले इस बात का पता गाँव में किसी और को न चले।”
"अरे चच्चा, यह भी कोई कहने वाली बात है, आख़िर हम लोग तो आपके पुराने आसामी ही हैं। आप बिल्कुल नीफिरक रहें, किसी को कानोकान ख़बर नहीं होगी, बस कितना पैसा चाहिए, हमको बता दीजिएगा", महतो ने कहते हुए एक बार फिर हाथ जोड़ लिए।
सितला ने महतो का हाथ पकड़ा और बोले "लगभग दो लाख चाहिए, देख लेना जितना इंतज़ाम हो जाए।”
महतो ने एक मिनट सोचा और ज़मीन की क़ीमत के हिसाब से दो लाख उनको बहुत फ़ायदे का सौदा लगा। लेकिन फिर उनको याद आया कि इसी सितला चच्चा के ख़ानदान ने उनकी बड़ी बेटी के शादी के समय दरवाज़े पर बजते बैंड को लेकर कितना हंगामा किया था और उनको बैंड बंद करवाना पड़ा था। इधर वह मन ही मन अपने पुराने ज़ख़्मों को याद कर रहे थे, उधर सितला उनकी तरफ़ आस लगाए देख रहे थे। एक बार तो महतो के मन ने कहा कि छोड़ो जो हो गया सो हो गया, अभी ज़मीन भी मिल जाएगी और सितला हमेशा के लिए उनसे दब भी जाएँगे, लेकिन फिर पुराने ज़ख़्मों ने उनको भावुक होने से रोक दिया। लेकिन सितला की तरफ़ हाथ जोड़े हुए ही उन्होंने कहा "चच्चा, दो लाख तो इसके लिए मुश्किल है, लड़के के पास सिर्फ़ डेढ़ लाख का इंतज़ाम है। बाक़ी आप सोच लीजिए, हम कोशिश करेंगे कि अगले हफ़्ते तक पैसा मिल जाए। इसके अलावा भी कोई ज़रूरत हो तो बता दीजिएगा, आख़िर आपस की बात है।”
सितला तो दो लाख के हिसाब से सोच रहे थे, उन्होंने एक बार महतो की तरफ़ देखा। महतो अपने चेहरे का भाव ऐसा बना लिए थे की सितला कुछ बोल नहीं पाए। कहीं यह डेढ़ लाख भी नहीं मिला तो कहाँ जाएँगे, वैसे भी उनको उम्मीद नहीं थी कि दो लाख मिल ही जाएगा, यही सोचते हुए उन्होंने भारी मन से महतो के आगे हामी भर दी। महतो ने अपना हाथ सितला की तरफ़ जोड़ा और खड़े हो गए।
सितला अपने घर की ओर चले, उनके मन में संतोष था कि अब बिटिया की शादी ठीक से निपट जाएगी। उधर महतो भी ख़ुश थे कि आख़िर सितला की ज़मीन उनको मिल ही गई। इस चीज़ का सपना पिछले कई सालों से देखते आ रहे थे और आज वह पूरा हो रहा था। लेकिन कहीं-न-कहीं उनके मन में एक बड़ी संतुष्टि भी थी, एक बेटी के शादी में मदद कर पाने की, आख़िर वह भी एक इनसान ही थे।
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