Translate

Monday, October 3, 2016

कचरा--लघुकथा

आज तीन दिन बाद सफाई वाला अपनी हाथ गाड़ी लेकर मोहल्ले में घुसा और हर घर के सामने रुक कर कचरा उठाने लगा| रग्घू अपने दरवाजे पर बैठा उसका इंतज़ार कर रहा था कि कब वो उसके घर के सामने आये और कचरा उठाये| तीन दिन से रखा कचरा अब बदबू करने लगा था और जैसे ही वो बदबू उसके नाक में घुसती, उसका पारा भी चढ़ जाता|
"कामचोर हैं सब के सब, बिना वजह के गायब हो जाते हैं", मन ही मन बुदबुदाते हुए उसने सोच रखा था कि आज उसको कस के डाँटेगा| मोहल्ले से निकलने वाले अपनी नाक पर रुमाल रखकर निकल रहे थे और मोटरसाइकिल वाले कुछ ज्यादा ही तेज निकल रहे थे|
"क्या भाई, तुम लोग भी जब देखो तब गायब हो जाते हो, पूरा मोहल्ला बदबू कर रहा है| पैसा लेने तो पहली तारीख को ही आ जाते हो, उसमें तो कभी नागा नहीं करते", रग्घू ने चिल्लाते हुए कहा| सफाई वाला, जो चुपचाप कचरा उठा रहा था, ने उसकी तरफ देखा और काँपती आवाज़ में बोला "तीन दिन से बुखार में पड़ा था, आज कुछ ठीक हुआ तो चला आया, कमजोरी बहुत लग रही है", और वहीँ चबूतरे पर साँस लेने बैठ गया|
रग्घू ने उसे गौर से देखा, चेहरा पीला हो गया था उसका और काफी कमजोर लग रहा था| उसे थोड़ी दया आयी लेकिन कुछ पूछता उसके पहले ही सफाई वाला उठा और अपनी हाथ गाड़ी लेकर आगे बढ़ गया|
इतने में घर से दो बच्चे दौड़ते हुए बाहर आये और सड़क पर भागे| दूसरी तरफ से तेज आती गाड़ी ने ब्रेक लगाया लेकिन बच्चे से टकरा गयी| बच्चे को ज्यादा चोट तो नहीं लगी लेकिन उसने चिल्लाना शुरू कर दिया| गाड़ी वाला डर कर भागा, रग्घू जब तक उठे तब तक सफाई वाले ने बच्चे को उठाया और अपनी गोद में ले लिया| बच्चा गोद में आने से चुप हो गया, रग्घू ने बच्चे को उससे लिया और गाड़ी वाले को बुरा भला कहते हुए घर आ गया|
बच्चा रग्घू के गोद में ही सो गया, कचरा उसके कपड़ों पर अभी भी लगा हुआ था|  

No comments:

Post a Comment