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Thursday, September 29, 2016

अंतहीन पीड़ा का सफर-- कहानी

ट्रेन के उस जनरल डिब्बे में अब सब कुछ सामान्य हो चुका था, लोगों ने उसे एक बेहद दुखी और पीड़ित समझ कर मुंह मोड़ लिया. हर यात्री वहां की स्थिति के हिसाब से अब अपने आप को ढाल चुका था और अपनी मंजिल की तरफ झटके खाता हुआ बढ़ रहा था. दुखी तो हर कोई था लेकिन किससे कहे, इसलिए लोग खामोश ही थे. जब सबको अपनी मंजिल पर पहुँचने की जल्दी हो और परिस्थितियां विपरीत हों तो लोग आस पास की घटनाओं से अपने आप को अलग रखना बेहतर समझते हैं या यह उनकी मज़बूरी भी हो सकती है.

कुछ महीने पहले ही वो उस महानगर की बजबजाती गलियों में अपनी जगह बनाने आया था. गाँव में भी गन्दगी थी, बदहाली थी लेकिन कम से कम सांस लेने में घुटन महसूस नहीं होती थी. लेकिन जब गाँव में खाने के लाले पड़ने लगे तो उसे लगा कि इस जगह से कहीं और जाना पड़ेगा. उसके साथ के अधिकतर साथी पहले ही इस महानगर की ओर रुख कर चुके थे, उन्हें एहसास था कि जिन्दा रहने के लिए ताज़ी हवा से ज्यादा भरा पेट जरुरी है. पिता के रहते उसने कभी सोचा भी नहीं था, जीवन अभाव में ही सही लेकिन कट रहा था. लेकिन पिता का साया जब से सर से हटा था, बहन की शादी की जिम्मेदारी उसे शिद्दत से महसूस हो रही थी. माँ कुछ कहती तो नहीं थी, वह शायद चाहती भी नहीं थी कि वह गाँव छोड़े. लेकिन उसकी बेबस निगाहें बहुत कुछ कह जाती थीं. फिर उसके सामने भी इस महानगर की ओर देखने के अलावा कोई और चारा नहीं बचा था.

महानगर में आने के बाद एक महीना तो उसे अपना ठिकाना पक्का करने में ही लग गया. गाँव के वे लोग जो उसके चाचा या ताऊ लगते थे, उन्होंने बस एक बार पूछा और फिर इस तरह से मुंह मोड़ लिया मानो वह उनके यहाँ ही रहने के लिए आया हो. गनीमत थी कि उसका एक दोस्त था जिसने न सिर्फ उसे अपने खोली में रहने की जगह दी, बल्कि अपने सेठ के यहाँ उसे नौकरी भी दिलवाई. उसका दोस्त अकेले ही रहता था और उसके रहने से उसका खोली का किराया शेयर होने लगा. अब दोनों को थोड़ा सुकून मिल गया था, साथ भी मिला और थोड़े पैसों की बचत भी. आखिरकार वह पैसों के लिए ही तो अपना गाँव छोड़कर इस महानगर में आया था.

पिछले कुछ महीनों में हाड़तोड़ मेहनत करके उसने कुछ पैसा बचा लिया और एक बार गांव जाने का सोचा. उसने अपने दोस्त से भी पूछा कि क्या वह भी गाँव चलना चाहेगा लेकिन उसने मना कर दिया. दरअसल इस महानगर में रहने वाले उस जैसे लोग अपने गाँव या तो शादी ब्याह में जाते थे या किसी मरनी करनी में. कभी कभार त्यौहार में भी जाना होता था लेकिन त्यौहार के समय टिकट का हाल बेहद खराब रहता था. उसकी बात अलग थी, वह पहली बार वह अपने गाँव और परिवार से दूर था इसलिए घर की याद भी आ रही थी. और साथ ही साथ उसके मन में यह इच्छा भी थी कि माँ को वह दिखा सके कि अब वह सचमुच बड़ा हो गया है और परिवार को चला सकने में समर्थ हो गया है. इस महानगर से वैसे तो कई ट्रेन उसके गाँव की तरफ जाती थीं लेकिन जाने के लिए कन्फर्म सीट मिलना सबके लिए सपने के समान था. महीनों पहले से बुकिंग कराने पर भी वेटिंग का ही टिकट मिलता. और अगर किसी के पास पैसा हो तो कुछ दिन पहले भी उसको कन्फर्म सीट मिल जाती. टिकट का ये खेल उसकी समझ से बाहर था लेकिन वह कुछ कर भी नहीं सकता था. खैर सफर लंबा था और उसके पास ट्रेन के जनरल डिब्बे के अलावा और कोई जरिया नहीं था गाँव जाने का. स्टेशन पर डिब्बे के सामने लगी कतार को देखकर उसका कालेज मुंह को आ गया. आते समय तो स्थिति फिर भी ठीक थी, गाँव का ही एक व्यक्ति साथ था और उसके पास कोई कीमती सामान भी नहीं था. अभी वो अपने झोले को अपने सीने से लगाए सोच ही रहा था कि इस डिब्बे में वह घुस भी पायेगा या नहीं, तभी  एक कुली ने उसको टोका "सीट चाहिए क्या जाने के लिए". पहले तो वह हिचकिचाया लेकिन फिर उसे महसूस हो गया कि बिना कुली के मदद के वह डिब्बे में घुस भी नहीं पायेगा. फिर कुछ रुपये खर्च करके थोड़ी देर बाद वो ट्रेन के उस जनरल डिब्बे में, जिसमें पैर रखने की भी जगह नहीं थी, ठूंस दिया गया.

ट्रेन चली और कुछ ही देर में डब्बा लोगों के शोरगुल और बदबू से भर गया. महानगर में कुछ माह बिता लेने के चलते उसकी आदत हो गई थी इसलिए उसे ज्यादा दिक्कत नहीं हुई लेकिन बाथरूम के लिए जाना लगभग असंभव था. लोग पूरे रास्ते भरे हुए थे और उधर जाने के लिए शायद उनके सर पर होकर ही जाना पड़ता. उसने बाथरूम जाने का ख्याल ही छोड़ दिया और अपने झोले को अपने से सटाये हुए एक सीट पर आधा बैठे हुए सफर तंय करता रहा. झोले में रखे हुए कुछ नए कपडे और कुछ और घरेलू सामान उसके लिए बेशकीमती थे, दरअसल वो सब उसने माँ और बहन के लिए ख़रीदे थे.

रात होने लगी थी और डिब्बे की धूमल बत्ती में ज्यादा साफ़ नहीं दिख रहा था. उसने एक बार फिर अपने अंदर की जेब में रखे हुए पैसे टटोले और पीछे की तरफ पीठ टिका कर लेटने का उपक्रम करने लगा. खाने के लिए कुछ था झोले में जो उसने खा तो लिया लेकिन पानी डर के मारे नहीं पिया कि कहीं पेशाब न लग जाए. अभी बमुश्किल उसकी आंख झपकी ही थी कि उसे डब्बे में कोलाहल सुनाई दिया. ध्यान से सामने देखने पर दो कांस्टेबल नज़र आये जो लोगों को अपने डंडे से कोंचते हुए गालियां बक रहे थे. फिर उसकी आँखों के सामने उसने उनको लोगों के पैसे भी छीनते देखा तो उसकी आत्मा कांप गयी. जल्दी से उसने एक बार फिर अपनी अंदर की जेब टटोली और हिम्मत जुटाकर बैठ गया.

खैर उसके पास तो टिकट था इसलिए उसे अंदर से थोड़ी हिम्मत भी थी लेकिन जैसे जैसे वो हवलदार उसके नजदीक आ रहे थे, उसकी हिम्मत जवाब देती जा रही थी. उसने जेब से टिकट निकाल कर हाथ में पकड़ लिया और झोले को अपने पीठ से लगाकर बैठ गया. हर बार उन हवलदारों का उठता डंडा जैसे उसके ऊपर ही पड़ने वाला हो, उसे ऐसा ही लग रहा था. उसकी रूह कांप जा रही थी ये सब देखकर. सामने वाली सीट पर बैठे युवक की जेब को जब हवलदार ने टटोला तो उसे लगा कि आज बच पाना मुश्किल ही है. उसने घबराकर आंख बंद कर ली और जितने भी देवी देवता याद आ सकते थे, सबको याद करना शुरू कर दिया.

चंद छण बाद उसने आंख खोली तो सामने हवलदार डंडा लेकर खड़ा था. पहले भी जिंदगी में उसे पुलिस वालों से बेहद डर लगता था लेकिन आज तो जैसे उसे लगा कि साक्षात् यमदूत ही सामने खड़ा हो. कांपते हाथों से उसने टिकट को आगे बढ़ाया और घुटी जबान से इतना ही बोल पाया "साहब टिकट है हमारे पास".

"साले जनरल ट्रेन का टिकट लेकर सुपरफास्ट में बैठा है, तेरा तो चालान बनाना पड़ेगा", टिकट को उसकी तरफ फेंक कर हवलदार गुर्राया.

"साहब, टिकट तो यही दिया था खिड़की पर", उसने फिर से थूक निगलते हुए किसी तरह कहा.

"मतलब हम झूठ बोल रहे हैं, तुम लोगों से ठीक से बात क्या कर ली, दिमाग ख़राब हो गया. अगले स्टेशन पर उतर जाना हमारे साथ, कुछ दिन हवालात में बिताएगा तो सब समझ आ जायेगा" हवलदार ने डंडा उसके पैर पर मारा.

उसे कुछ समझ नहीं आया कि क्या करे, घबरा कर उसने दोनों हाथ जोड़ दिए और गिड़गिड़ाने लगा.

"ठीक है, निकाल 500 और आगे से ध्यान रखना, नहीं तो मार मार के भूसा बना देंगे".

500 रुपये, उसने तो कुल 4000 रूपये बमुश्किल जमा किये थे पिछले कुछ महीने में. अभी उसका दिमाग ये सब सोच ही रहा था कि एक बार और डंडा पड़ा उसके पैर पर, इस बार डंडा ज्यादा तेज था.

"चल उठ, तू हवालात में ही मानेगा अब" कहते हुए हवलदार ने उसका हाथ पकड़ा तो उसकी आत्मा कांप गयी. एक बार उसने हवलदार के चेहरे को देखा लेकिन हिम्मत जवाब दे गयी. कांपते हाथों से उसने अंदर की जेब में हाथ डाला और पैसे निकाल कर 500 हवलदार को पकड़ा दिए. तब तक दूसरे हवलदार की नज़र उसके झोले पर पड़ी और उसने झोला उठा लिया.

"क्या छुपा रखा है इसमें, कहीं कुछ चोरी का सामान तो नहीं है" सुनते ही उसे लगा जैसे उसने कुछ चुरा कर ही रखा हो झोले में. डरते डरते बस इतना ही बोल पाया "माँ और बहन के लिए कुछ कपडे हैं साहब, चोरी का कुछ नहीं है".

झोले को उलट कर देखने के बाद हवलदार आगे बढ़ गया, उसने वापस सब कुछ झोले में रखा और सिमटकर सीट पर बैठ गया. लगभग एक घंटे तक उन हवलदारों का ये तांडव चलता रहा, जिसके पास पैसे नहीं थे, उनका सामान लूट लिया और पिटाई अलग की. ट्रेन चले लगभग ६ घंटे हो चुके थे और अब उसकी भूख प्यास सब मिट गयी थी. पूरा डिब्बा उन हवलदारों को कोस रहा था और जिन लोगों को चोट लगी थी उनकी कराह भी सुनाई पड़ थी. लेकिन उसे लगा कि अब शायद कोई नहीं आएगा, यही सोचकर उसने झोले को पीठ पर लगाया और आंख बंद कर लिया.

सुबह तड़के ही उसकी नींद खुली और उसने देखा कि झोला उसके कंधे से गायब है. झटके से वो उठा और चारो तरफ देखने लगा, कुछ लोग ऊंघ रहे थे और कुछ जाग भी रहे थे. उसने एकदम से चिल्लाना शुरू किया "अरे मेरा झोला किसी ने चुरा लिया" और ऊपर नीचे ढूंढने लगा. तब तक किसी और की आवाज़ आयी "मेरी जेब किसी ने काट ली, सब पैसा चला गया", और वो जोर जोर से चिल्लाने लगा.

यह सुनते ही उसका हाथ भी अपने अंदर वाली जेब पर गया और उसे लगा जैसे वो खाली हो. अब उसने दुबारा तिबारा देखा, जेब खाली ही थी, किसी ने सामने से काट कर सारे पैसे निकाल लिए थे. उसे लगा जैसे चक्कर आ गया हो और वो वहीं गिर जायेगा और उसकी कस कर रुलाई फूट गयी. कितनी मेहनत से और पसीना बहाकर उसने ये पैसे बचाये थे घर के लिए, कितनी रातों को वो सिर्फ पानी पीकर सो गया था. उसके दिमाग ने जैसे काम करना ही बंद कर दिया और वो वहीं सीट के पास लुढ़क गया. किसी को उसकी हालात देखने या समझने की चिंता नहीं थी, अधिकांश लोग अपनी अपनी पीड़ा से परेशान थे. समय गुजरने लगा, ट्रेन अपनी गति से भागी जा रही थी.   

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