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Tuesday, July 17, 2018

हिचक-- लघुकथा

"कभी बेटे को भी गले से लगा लिया कीजिये, वह भी आपके सीने से लगकर कुछ देर रहना चाहता है", रिमी ने गहरी सांस लेते हुए कहा. रमन को सुनकर तो अच्छा लगा लेकिन वह उसे दर्शाना नहीं चाहता था.
"ठीक है, इससे क्या फ़र्क़ पड़ जायेगा. वैसे भी तुम तो जानती हो कि मैं इन सब दिखावों में नहीं पड़ता", रमन ने अपनी तरफ से पूरी लापरवाही दिखाते हुए कहा. अंदर ही अंदर वह जानता था कि इसकी कितनी जरुरत है आजकल के माहौल में, लेकिन एक हिचक थी जो उसे रोकती थी.
"फ़र्क़ पड़ता है, आखिर उसके अधिकतर दोस्त तो अपने पिता से कितने दोस्ताना तरीके से रहते हैं. और आप इतने रिजर्व, आखिर आप ऐसे क्यूँ रहते हैं?
रमन को मालूम था कि वह इन बातों का जवाब नहीं दे पायेगा, एक हिचक थी जो शुरू से उसे यह सब करने से रोकती थी. और उसने बात बदलने के लिए बोला "उसकी सब तैयारी हो गयी ना, देखना कुछ छूट न जाए".
रिमी वापस बेटे का बैग पैक करने लगी, रमन ने धीरे से अपनी बाँहों का घेरा कुछ यूँ बनाया जैसे बेटे को सीने से लगा रहा हो. उसी समय बेटा कमरे में आया और रमन से ख़ामोशी से लिपट गया. हौले से उसने अपना हाथ बेटे के पीठ पर फेरना शुरू किया, सामने से रिमी ने देखा तो वह भी आकर दोनों से लिपट गयी.
हिचकियों के बीच बरसों पुरानी हिचक हौले हौले बह निकली. 

Thursday, May 31, 2018

फायदा- लघुकथा

"अच्छा हरिलाल, कितना कमीशन मिलता है तुमको इस दुकान से", दुकान से निकलकर उसके ऑटो पर बैठते हुए उसने पूछा. आगरा में घूमने के लिए उसने जिस ऑटोवाले को लिया था उसने न सिर्फ पूरा आगरा घुमाया, बल्कि उसके जरा से इशारे पर इस दुकान पर भी लाया था. पेठा ही लेना था उसको सभी दोस्तों के लिए लेकिन हरिलाल के कहने पर वह बगल की जूते की दुकान पर भी चला गया और बढ़िया क्वालिटी के जूते भी काफी कम कीमत पर ले लिए.
"कमीशन तो कुछ नहीं मिलता है साहब, बस दिवाली पर ५०० रुपये दे देते हैं रफ़ीक बाबू", हरिलाल ने ऑटो को आगे बढ़ाते हुए कहा. अब उसने एक बार फिर गौर से हरिलाल को देखा, उम्र तो लगभग उसके बराबर ही होगी लेकिन काफी बुजुर्ग लग रहा था. उसके आश्चर्य का पारावार नहीं रहा, अब उसे दो बातें परेशान करने लगीं. एक तो हरिलाल उसे लेकर रफ़ीक की दुकान पर गया और दूसरे वह कमीशन भी नहीं देता.
"तो फिर इसकी दुकान पर ही क्यों लाये, कहीं और जाते तो शायद कमीशन भी मिल जाता!", उसने अपनी जिज्ञासा को दूर करने के लिए फिर से पूछा.
"साहब, रफ़ीक बाबू बहुत भले आदमी हैं, हमें जब भी कुछ रुपयों की जरुरत होती है तो बेहिचक दे देते हैं और हम अपनी सुविधा से लौटा देते है. कोई ब्याज नहीं लेते हमसे, नहीं तो कहीं और से लेने जाएँ तो ब्याज में ही सब ख़त्म हो जायेगा", हरिलाल ने बड़े आराम से कहा.
अभी वह सोच ही रहा था कि क्या कहे तब तक हरिलाल ने फिर कहा "और जानते हैं साहब, यह ऑटो खरीदने के लिए भी पैसे रफ़ीक बाबू ने ही दिया है, हम हर महीने ५ हजार करके चुका रहे हैं. पहले हमारे पास रिक्शा था लेकिन उम्र के साथ मुश्किल हो रहा था तो इन्होने ही कहा कि इसे खरीद लो", हरिलाल की आवाज़ में अब उसे भी संतुष्टि साफ़ साफ़ सुनाई दे रही थी.
उसका दिमाग उलझ गया, आज के माहौल में जब हर जगह डर पैदा किया जा रहा है और बाँटने की कोशिश चल रही है, वहीँ हरिलाल और रफ़ीक जैसे लोग भी हैं. जोड़ने घटाने पर उसे लग रहा था कि इस वाकये में फायदे में तो दोनों ही हैं लेकिन सबसे ज्यादा फायदा अगर किसी को हो रहा है तो वह अपनी गंगा जमुनी तहजीब को. आगरा शहर अब उसे और खूबसूरत लगने लगा था.  

Thursday, March 29, 2018

मैडम प्लीज- लघुकथा

उसने अपने कदम एक बार फिर आगे बढ़ाए, लेकिन फिर रुक गया. आफिस की जल्दी थी, महीने का आखिरी हफ्ता था तो काम भी बहुत था. फिर वह वापस लौटा, किचेन की खुली हुई खिड़की से नजर आ रही उस महिला को उसने आज के पहले कभी नहीं देखा था. अब ऐसे मे क्या करे, उसे कह दे या नहीं, इसी कश्मकश मे वह खड़ा था.
किसी ने यहाँ खड़े देख लिया तो बखेड़ा हो जाएगा, आजकल वैसे भी बहुत खबरें आ रही हैं अखबार मे. एक बार फिर उसने किचेन की तरफ देखते हुए कदम आगे बढ़ाया. शायद उस महिला की नजर भी उसकी तरफ पड़ गई थी और अब उसे थोड़ी घबराहट भी होने लगी थी.
खैर किस किस को वह कहेगा, लोग जब खुद ही ख्याल नहीं रखते हैं तो वह करे भी तो क्या करे. घड़ी पर नजर पड़ी, देर होने और उसके बाद बास की जलती नजर सब दिमाग मे आ गया और वह सर झटक कर आगे चला.
बमुश्किल चार पाँच कदम चलने के बाद उसके कदम खुद ब खुद मुड़ गए और वह लपककर उस घर के पास पहुंचा. किचेन से आवाज तो आ रही थी लेकिन वह महिला नहीं दिख रही थी. आखिरकार उससे रहा नहीं गया और वह आवाज लगाने वाला ही था कि वह महिला खिड़की के सामने प्रकट हुई. वह गुस्से मे कुछ बोलती इसके पहले ही उसने हाथ जोड़े और ऊँची आवाज मे बोला "मैडम, प्लीज नल बंद कर दीजिए, ऐसे पानी मत बर्बाद कीजिए".
उस महिला ने चौंककर उसको देखा और नल बंद कर दिया. उसने घड़ी पर नजर डाली और बस पकड़ने के लिए दौड़ पड़ा.

Monday, February 26, 2018

जिंदगी का खूबसूरत रंग--लघुकथा

गाड़ी रुकते ही चरो तरफ से बच्चों ने घेर लिया, सभी हाथ फैलाये कुछ पाने की उम्मीद मे लगातार आवाज लगा
रहे थे. उसने दरवाजा खोला और बाहर निकला, अब बच्चे उसके आमने सामने थे. कुछ अधनंगे लड़के, कुछ छोटी लड़कियां हाथ फैलाये सामने खड़ी थीं और कुछ बुजुर्ग पुरुष और महिलाएं भी उसकी तरफ बढ़ रही थीं. मंदिर के सामने हर जगह उसे ऐसी ही भीड़ दिखाई देती थी और वह कुछ न कुछ गाड़ी मे लेकर ही चलता था.
पिछली सीट पर रखे बैग को उसने निकाला और उसमें से एक एक फल वह सभी को पकड़ाने लगा. किसी को केले मिले तो किसी को संतरे, लगभग सभी बच्चों और बुजुर्गों को कुछ न कुछ देकर वह सामने वाली दुकान पर चाय पीने बैठ गया. उसे सभी के, खासकर बच्चों के चेहरे पर आई खुशी देखकर बहुत सुकून मिल रहा था और वह मुसकुराते हुए चाय पीने लगा.
अचानक उसकी नजर एक छोटी सी बच्ची पर पड़ी जो थोड़ी दूर पर बैठी एक अशक्त महिला भिखारी के पास खड़ी थी. उस बच्ची ने अपने केले का आधा हिस्सा तोड़ा और उस महिला को देते हुए बाकी हिस्सा खुद खाने लगी. अब उसके दिमाग में चीजें गड्डमड्ड होने लगींजिंदगी का सबसे खूबसूरत रंग दिख रहा था उसे. वह छोटी बच्ची उसे माँ दिख रही थी और केला खाती हुई वह अशक्त महिला उसकी बेटी.

मनोरंजन--लघुकथा

जंगल से गुजरते हुए उसकी निगाह सड़क के चारो तरफ घूम रही थी. प्रकृति के बीच रहना उसे बहुत अच्छा लगता था और जैसे ही मौका मिलता वह निकल पड़ता. अचानक उसकी निगाह सड़क के किनारे बैठे एक स्थानीय आदिवासी युवक पर पड़ी जो गुलाबी पगड़ी पहने बैठा हुआ था. उसके सामने पांच छह मुर्गे थे और एक बड़ा सा झोला भी था. बढ़िया फोटो आएगी, उसने सोचा और ड्राइवर को रुकने के लिए कहा. युवक ने उसकी तरफ प्रश्नवाचक निगाह डाली और कुछ पूछता उसके पहले ही उसने पूछ लिया "ये मुर्गे क्यों लेकर बैठे हो यहाँ?
"आगे हाट में लेकर जाना है बेचने के लिए", युवक ने आशाभरी निगाहों से उसकी तरफ देखते हुए कहा.
"तो तुम्हारा घर यहीं कहीं होगा!, उसने पूछा तो युवक ने बताया कि कोई ५ किमी दूर है.
"फिर यहाँ क्यों बैठे हो और कैसे आये यहाँ?, उसकी उत्सुकता थोड़ी बढ़ गयी थी.
"किसी गाड़ी वाले ने यहाँ तक पहुंचा दिया, अब हाट तक के लिए भी कोई और गाड़ी ही मिल जाएगी", युवक ने बताया.
उस स्थानीय आदिवासी युवक के साथ उसने झट से चार छह फोटो, एकाध सेल्फी भी ली और फिर चलने को हुआ.
तभी उस युवक ने विनती के स्वर में पूछा "साहब हाट की तरफ जा रहे हो तो हमको भी लेते चलो".
एक बार तो वह ठिठका, सोचा लेता ही चले, आखिर उधर ही तो जा रहा है. फिर एकदम से उसकी निगाह अपने ड्राइवर की तरफ पड़ी, वह भी मना करता लग रहा था. उसकी अफसरी वापस आ गयी, इस गाड़ी में इसको मुर्गे लेकर कैसे ढोऊँगा.
"नहीं भाई, उधर नहीं जा रहा हूँ", कहते हुए वह गाड़ी में बैठा और गाड़ी आगे बढ़ गयी.
साइड मिरर से उसने देखा, उस युवक की निगाहें उसकी गाड़ी का बहुत दूर तक पीछा करती रहीं.  

Tuesday, February 13, 2018

यक़ीन क़ायम है—लघुकथा

“लगता है आपने दुनियाँ नहीं देखी और खबरों से दूर रहते हैं आप”, ज़हूर भाई ने अपनी बात तेज आवाज मे कही, गोया वह आवाज के ज़ोर पर ही अपनी बात सही बताना चाहते थे. वह नए नए पड़ोसी बने थे रफ़ीक़ के और हाल मे ही हुए कौमी दंगों पर बहस कर रहे थे. रफ़ीक़ उनको लगातार समझाने की कोशिश कर रहे थे कि वक़्त का तक़ाज़ा इन चीजों से ऊपर उठकर सोचने का है.
“आप जितनी तो नहीं देखी लेकिन कुछ तो देखी ही है ज़हूर भाई, दुनियाँ इतनी भी बुरी नहीं है. आज भी इंसानियत जिंदा है और मोहब्बत का खुलूस कायम है”, रफ़ीक़ ने मुसकुराते हुए जवाब दिया.
“अमा मियां, आप ने लगता है कुछ नहीं झेला है इसीलिए ये बहकी बहकी बातें कर रहे हो. आँखें खोल के देखो, पूरी दुनियाँ हमारी दुश्मन बनी हुई है”, बहुत तैश मे आ गए थे ज़हूर भाई.
“एक और बात, कभी किसी ऐसे परिवार से आप मिले होते जिसने उनके हाथों अपना सगा खोया है तो समझते आप. मेरे पड़ोसी का हाल मैंने देखा था पिछले मोहल्ले मे”, ज़हूर भाई ने बात खत्म की.
थोड़ी देर तक तो रफ़ीक़ चुप रहे और फिर एक गहरी सांस लेते हुए बोले “आपने शायद इसी शहर की कई साल पहले की एक खबर पढ़ी होगी जिसमे एक नौजवान का क़त्ल ऐसी ही सोच के कुछ लोगों ने कर दिया था”.
ज़हूर भाई ने तुरंत टोका “वही तो मैं भी कह रहा हूँ, जो हालत मेरे पड़ोसी की हुई थी, वैसी ही हालत हुई होगी. अब वह परिवार भला मोहब्बत और इंसानियत की बात करेगा कभी”.
“लेकिन शायद आपने यह नहीं पढ़ा होगा कि उसके बाद उस कौम के तमाम लोगों ने आकर उस गुनाह की माफ़ी भी मांगी थी”, रफ़ीक़ ने कहीं दूर देखते हुए कहा.
ज़हूर भाई जब तक कुछ कहते, रफ़ीक़ ने फिर कहा “वह नौजवान मेरा बेटा था ज़हूर भाई”.

Thursday, February 8, 2018

जरुरत- लघुकथा

आज वह बहुत खुश थी, सारे गुलाब बिक गए थे. रात काफी हो चली थी और एक आखिरी गुलाब को पास रखकर वह पैसे गिनने में तल्लीन थी तभी एक कार उसके पास रुकी.
"वो गुलाब देना", अंदर से एक नवयुवक ने आवाज लगायी. उसने एक उड़ती हुई नजर युवक पर डाली और उसकी बात अनसुना करते हुए वापस पैसे गिनने में लग गयी.
"अरे सुना नहीं क्या, वो गुलाब तो दे, कितने पैसे देने हैं", युवक ने इस बार थोड़ी ऊँची आवाज में कहा, उसके स्वर में झल्लाहट टपक रही थी.
उसने सर उठाकर युवक को देखा और पैसे अपनी थैली में रखते हुए बोली "यह बेचने के लिए नहीं है भैया".
युवक यह सुनकर गाड़ी से नीचे उतर आया और थोड़े खुशामदी स्वर में बोला "क्यों नहीं बेचेगी इसे, अच्छा एक काम कर, दुगुनी कीमत ले ले".
उसने युवक को देखा और मुस्कुराते हुए बोली "यह मैंने अपनी माँ के लिए रखा है, आज के दिन उनको गिफ्ट करना है".
"अच्छा तू सौ रुपये ले ले लेकिन गुलाब दे दे, मुझे गिफ्ट करना ही है आज. समझा कर, माँ को नहीं भी दिया तो क्या फ़र्क़ पड़ेगा", युवक ने लगभग मिन्नत करते हुए कहा. उसने युवक के हाथ में पकडे सौ के नोट को देखा और सोचने लगी. युवक शायद किसी और विकल्प के अभाव में हर कीमत पर गुलाब लेना चाहता था और वह माँ को ही देना चाहती थी.
उसने गुलाब उठाया और अपने सीने से लगा लिया, युवक अब मायूस हो गया और पलट कर जाने लगा. उसने आवाज लगायी "भैया, ले जाओ गुलाब".
युवक ने झपट कर गुलाब लिए और सौ रुपये पकड़ा दिए, उसने नोट को मुट्ठी में कस कर बंद किया और जल्दी जल्दी घर की तरफ चल पड़ी, शौक पर जरुरत भारी पड़ गयी.
मौलिक एवम अप्रकाशित