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Monday, October 29, 2018

बेचैनी-लघुकथा

संध्या को समझ में नहीं आ रहा था कि मनीष की बेचैनी कैसे दूर करे, दुःख तो उसे भी बहुत हुआ था जब वह हादसा हुआ था. कितने ही लोग, जिनमें बच्चे और महिलाएं भी थीं, मारे गए थे और उसका सदमा बहुत गहरा पड़ा था मनीष के ऊपर. लेकिन उसको भी पता था और मनीष को भी कि गलती मनीष की नहीं थी और वह चाह कर भी उस हादसे को टाल नहीं सकता था.
आज मनीष की छुट्टी का सातवां दिन था, हादसे के बाद ही उसे विभाग ने कुछ दिन की छुट्टी पर भेज दिया था. सबको उम्मीद थी कि कुछ दिन बाद सब कुछ यथावत हो जायेगा और मनीष वापस अपने काम में लग जायेगा. लेकिन मनीष की बेचैनी और उदासी कम होने का नाम ही नहीं ले रही थी और यही बात संध्या को भी बेतरह परेशान किये हुए थी.
"अब उसे भूलने की कोशिश करो नहीं तो कैसे चलेगा. तुम्हारी तो कोई गलती नहीं थी उस हादसे में, लोग ही अपनी जान को खतरे में डालते रहते हैं तो कोई क्या करे", संध्या ने मनीष को समझाने की एक और कोशिश की.
मनीष उसे सुन कर भी जैसे अनसुना कर रहा था, उसने अपना सर हिलाया और उदास स्वर में बोला "मैं कुछ नहीं कर पाया संध्या और इतने लोगों की मौत की वजह बन गया. भले मेरा विभाग मुझे इसका जिम्मेदार नहीं मानता लेकिन मैं इस आत्मग्लानि से निकल नहीं पा रहा हूँ".
संध्या ने एक गहरी सांस ली, उसके जेहन में कुछ समय पहले का एक हादसा आ गया जिसमें ड्राइवर का धर्म अलग होने के चलते उसपर एक दूसरे तरीके का आरोप लग गया था.
"वो तो अच्छा हुआ कि वो लोग भी अपने ही धर्म के थे वर्ना लोग तो इसे एक अलग ही रंग दे देते. आजकल तो बस कोई बहाना चाहिए लोगों को", संध्या ने जैसे राहत की सांस ली.
मनीष ने उसकी तरफ देखा और कुछ सोचकर बुदबुदाया "काश इसी बहाने से ही लोग मुझे कोसते, गुनाहगार ठहराते तो शायद मेरे दिल का बोझ कुछ कम होता!

Thursday, October 25, 2018

फिर भी - लघुकथा

"आज फिर नींद नहीं आ रही है आपको, भूलने की कोशिश कीजिये उसे", रश्मि ने बेचैनी से करवट बदलते हुए राजन से कहा और उठकर बैठ गयी. कुछ देर तक तो वह अँधेरे में ही राजन का सर सहलाते रही, फिर उसने कमरे की बत्ती जला दी.
"लाइट बंद कर दो रश्मि, अँधेरे में फिर भी थोड़ा ठीक लगता है. उजाला तो अब बर्दास्त नहीं होता, काश उस दिन मैं नहीं रहा होता", राजन ने रश्मि की गोद में सर छुपा लिया.
धीरे धीरे रश्मि ने अब अपने आप को संभाल लिया था लेकिन अभी भी जब वह बाहर निकलती, उसे लगता जैसे लोगों की निगाहें उससे लगातार सवाल कर रही हैं. और उसे राजन की मनःस्थिति का भी भरपूर अंदाजा था.
"मेरी कोई गलती नहीं थी रश्मि, मोड़ पर अँधेरे के चलते मुझे दिखाई नहीं पड़ा और जबतक मुझे दिखा, लोग सामने थे", राजन ने एक बार फिर वही दुहराया जो वह पिछले एक हफ्ते से कहता आ रहा था.
"किसने कहा कि तुम्हारी गलती थी, सबने तो तुम्हें बेकसूर बता दिया है. अख़बारों में भी तुम्हारे बारे में कुछ गलत नहीं छपता अब तो", रश्मि ने उसे फिर से दिलासा देने की कोशिश की.
राजन ने करवट बदली और उसने रश्मि की तरफ देखते हुए गहरी सांस ली "लेकिन अपने आप को कैसे समझाऊँ रश्मि, उसमें कुछ बच्चे भी थे हमारे बच्चों के उम्र के". 

Wednesday, October 24, 2018

धरती का बोझ-लघुकथा

शोक सभा चालू थी, हर आदमी आता और मरे हुए लोगों के प्रति श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए अपनी बात शुरू करता और फिर प्रशासन को कोसते हुए अपनी बात ख़त्म करता. बीच बीच में लोग उस एक व्यक्ति की भी तारीफ़ जरूर करते जिसने कई लोगों को बचाया था लेकिन अपनी जान से भी हाथ धो बैठा था.
उधर कही आसमान में रूहें एक जगह बैठी हुई जमीन पर चलने वाले इस कार्यक्रम को देख रही थीं. उनमें अधिकांश तो उस एक रूह से बहुत खुश थीं जिसने उनके कुछ अपनों को बचा दिया था लेकिन एक रूह बहुत बेचैन थी. उसे यह बात जरा भी हजम नहीं हो रही थी कि मंच पर आने वाले उसका तो जिक्र ही नहीं कर रहे हैं.
तभी श्रोताओं में से कुछ लोग बोलने लगे "खैर बहुत बुरा हुआ लेकिन कम से कम वह नेता भी इसमें मर गया, धरती का बोझ कम हो गया". 
ऊपर सभी रूहों ने उस एक रूह की तरफ देखा, अब वह सबसे नजरें चुरा रही थी. 

मिलन-लघुकथा

चारो तरफ मची भगदड़ अब धीरे धीरे कम हो चली थी, बस घायल लोगों की चीखें ही चारो तरफ गूंज रही थीं. इस भयानक हादसे में सैकड़ों लोग मरे थे और उससे ज्यादा ही घायल थे. राहत में पहुंचे लोग मृत शरीरों को एक तरफ इकट्ठा कर रहे थे और घायलों को हस्पताल भेजने की तैयारी में भी जुटे थे.
पटरी के एक तरफ पड़े एक युवा के मृत शरीर को लोगों ने उठाकर एक तरफ कर दिया. कुछ ही देर बाद कुछ और लोग एक लड़की के मृत शरीर को भी वहीँ डाल गए. कुछ घंटे बीतते बीतते तमाम लाशें एक दूसरे से गड्डमड्ड पड़ीं थीं और लड़के का हाथ लड़की के हाथ में था.
ऊपर कहीं आसमान के किसी कोने में दोनों की आत्माएं बेहद सुकून महसूस कर रही थीं. लड़के की आत्मा ने मुस्कुराते हुए लड़की की आत्मा से कहा "ऊपरवाले ने तुम्हारी बात कितनी जल्दी सुन ली, कल ही तुम कह रही थी कि समाज अगर साथ जीने नहीं देता तो कम से कम साथ साथ मरने तो देगा. और देखो आज मरने के बाद तुम्हारा हाथ मेरे हाथ में है".
लड़की की आत्मा भी मुस्कुरायी और उसने लड़के की आत्मा का हाथ अपने हाथ में ले लिया. नीचे लाशों के अंतिम संस्कार की तैयारियां चल रही थीं, लड़के और लड़की के घर वाले हादसे के स्थल पर एक दूसरे से अलग बैठकर उनके मौत पर विलाप कर रहे थे.

Wednesday, October 17, 2018

परछाईयों का भय - लघुकथा

पिछले कुछ घंटों से उदास दिख रहे अपने दोस्त को देखकर उससे रहा नहीं गया. "क्या हो गया राजमन, बहुत उदास लग रहे हो".
राजमन ने एक नजर उसकी तरफ डाली और सोच में पड़ गया कि तेजू को बात बताएं कि नहीं. लेकिन तेजू तो उसकी हर बात, हर राज से वाकिफ़ था इसलिए उसे बताने में कोई हर्ज भी नहीं था.
"यार, तुम तो देख ही रहे हो ये आजकल का ट्रेंड, जिसे देखो वही इस #मी टू# के बहाने लोगों के नाम उछाल रहा है. रिटायरमेंट के बाद अब कहीं कोई मेरे खिलाफ भी यह चैप्टर न खोल दे, यही सोचकर घबरा रहा हूँ".
तेजू ने गहरी सांस ली "अच्छा तो यह वजह है, वैसे तुम्हारा कोई अफेयर मुझसे तो छिपा नहीं है. लेकिन शोषण तो तुमने किया ही था कई महिलाओं का".
"अब तुम भी यही कहोगे, मैंने शोषण किया है. अरे सबके अपने अपने स्वार्थ थे और सारे समझौते उसी के लिए तो हुए थे", राजमन ने अपनी दलील दी.
तेजू के चेहरे पर मुस्कराहट आ गयी "अब इतना तो तुम भी जानते हो कि उस समय तुम ऐसे पद पर थे कि लोगों की मदद कर सकते थे. लेकिन क्या उस समय तुम्हारी नैतिक जिम्मेदारी कुछ नहीं थी? 

Tuesday, October 16, 2018

आत्मनिर्भरता- कहानी

उसने ग़ौर से पिताजी को देखाबहुत उदास दिख रहे थे और शायद निराश भी थे। सेवानिवृत्ति के 5 वर्ष बाद लगभग 65 साल की उम्र पार कर चुके पिताजी को उसने शायद ही कभी इस तरह से निराश देखा हो। दरअसल सेवानिवृत्ति के पहले भी कभी वह हम लोगों पर निर्भर नहीं रहे और अब पिछले कुछ सालों से हम दोनों के साथ बारी-बारी से रह रहे हैं। सेवानिवृत्ति के बाद भी जब तक माँ थीतब तक उन्होने अपना जीवन अपने तरीक़े से ही जिया। पेंशन के पैसों को कहाँ और कैसे ख़र्च करना हैइसका निर्णय उन्होने माँ से पूछकर ही किया लेकिन माँ के नहीं रहने पर उन्होने जैसे सब कुछ छोड़ दिया। अब जिसके घर जाते हैंअपने बैंक खाते की चेकबुक उसे ही पकड़ा देते हैं और फिर जीवन को एक अलग ढर्रे पर चलने के लिए छोड़ देते हैं। शायद जीवन को अब वह एक अलग ही नज़रिए से देखने लगे थे जहाँ उनकी अपनी इच्छाएँ बहुत मायने नहीं रखती थीं।

पिछले क़रीब तीन महीने से पिताजी बड़े भाई के यहाँ रह रहे थे और उसकी भी इच्छा थी कि पिताजी से मिल लिया जाए। वह पिताजी से ज़्यादा क़रीब था लेकिन सिर्फ़ अपने घर उनको रखना भी उसके लिए संभव नहीं था। एक तो बड़े भाई ख़ुद भी कहते थे कि कुछ महीने पिताजी उनके घर रहेंगे। और दूसरे उसने जब घर में पिताजी को हमेशा अपने साथ ही रखने की बात की तो पत्नी ऊषा का रुख़ उसे बहुत सकारात्मक नहीं लगा। हालाँकि उसने खुले शब्दों में कुछ नहीं कहा लेकिन कई और तरीक़ों से उसने ज़ाहिर कर दिया कि पिताजी को हमेशा रखना मुमकिन नहीं है।

अब बड़े भैया भी तो चाहते हैं कि पिताजी उनके साथ रहें और पिताजी का भी तो मन होगा ही कि वह बड़े बेटे के घर कुछ दिन रहें। उनसे पूछने पर तो शायद खुल के नहीं बोल पाएँ लेकिन हमें तो सोचना ही चाहिएऊषा का तर्क था।

उसे भी लगा कि ठीक ही हैपिताजी का मन भी लगा रहेगा और ऊषा को भी बहुत दिक़्क़त नहीं होगी। वह भी इसी समाज का हिस्सा था और अपने कुछ दोस्तों के घर पर उनके माँ पिताजी की हालत देख चुका था।

यह भी ठीक रहेगापिताजी भी सब जगह घूम फिर लेंगें और सबका मन लगा रहेगाउसने कहा तो ऊषा ने अपनी ख़ुशी ज़ाहिर करने में कोई कोताही नहीं की।

माँ के गुज़रने के बाद उसने शुरू में पिताजी को अपने घर ही रखा। ठीक-ठाक पेंशन मिल रही थी लेकिन पिताजी ने जैसे पैसे निकालने या ख़र्च करने से तौबा कर ली। उसने कई बार समझाया कि अपनी पासबुक और चेकबुक आप अपने पास ही रखिए लेकिन पिताजी ने उसे पकड़ा दिया।

अब मुझे क्या ज़रूरत हैहर चीज़ तो तुम ला ही देते हो। कभी ज़रूरत पड़ेगी तो तुमसे माँग लूँगाकुछ चेक मैंने साइन कर दिए हैंजब ज़रूरत हो निकाल लिया करनापिताजी ने इन सब चीज़ों से अपने आपको एकदम परे कर लिया।

उसने भी नियम बना लिया थाहफ़्ते में एक दिन पिताजी को सैलून लेजाकर उनकी हजामत बनवानापूरे महीने की दवा एक साथ शुरू में ही मँगवा लेना और दो हिंदी अख़बार उनके लिए रोज़ मँगवाना। उसे याद था कि कैसे सुबह-सुबह अख़बार पढ़ने के लिए पिताजी हाकर का इंतज़ार करते रहते थे और उसकी साइकल की आवाज़ भी वह दूर से ही पहचान जाते थे। गाहे-बगाहे उसे उलाहना भी देते रहते अरे रामचरणआजकल देर करने लगे हो आने मेंसामने शर्माजी के घर तो आधे घंटे पहले ही अख़बार आ जाता है।और रामचरण उनको अगले दिन से जल्दी आने का वादा करते हुए निकल जाता। एक-दो दिन बाद फिर वही समय हो जाता लेकिन पिताजी ने कभी भी रामचरण को अख़बार बंद करने के लिए नहीं कहा। और उनका अख़बार भी एक ही था दैनिक जागरणजो पिछले कई सालों से चला आ रहा था। शर्माजी के यहाँ हिंदुस्तान आता था और कभी-कभार वह उसे भी पढ़ लेते थे लेकिन संतुष्टि उनको सिर्फ़ दैनिक जागरण से ही होती थी। बड़े भाई को अख़बार में बहुत दिलचस्पी नहीं थी लेकिन वह भी पिताजी के ही ढर्रे पर थाअक्सर पिताजी के साथ ही बीच के पन्ने निकालकर पढ़ता रहता।

शुरू-शुरू में तो उसने हमेशा कुछ रुपये पिताजी के कुर्ते के जेब में रखा। पिताजी ने कई बार कहा भी कि क्या ज़रूरत है इसकी लेकिन उसे लगता था कि एक ऐसे व्यक्ति के पास पैसे हमेशा होने चाहिए जिसने पूरी ज़िंदगी अपने पैसों से ही जीवन काटा होकभी किसी के सामने हाथ नहीं फैलाया हो। पिताजी भी रोज़ टहलने जाते और आते समय बच्चों के लिए चॉकलेट या मूँगफली ले आते। एकाध बार ऊषा ने उसे टोका भी कि पिताजी को मना करो लेकिन उसने ऊषा को समझा दिया पिताजी का आत्मसम्मान रखने के लिए कभी मना मत करनावैसे भी उनके पेंशन का हिस्सा ही वह ख़र्च करते हैं।

वो तो ठीक है लेकिन जब ज़रूरत नहीं हो तो पैसे क्यों ख़र्च करते हैंआख़िरकार अंत में काम तो उनके ही आने हैंऊषा ने अपना मत रखा लेकिन उसने ध्यान नहीं दिया।

समय के साथ मनुष्य चीज़ों को भूलने लगता है या यूँ कहें कि मस्तिष्क को अपनी सहूलियत से भूल जाने देता है। मैं भी जैसे-जैसे अपनी जाती ज़िंदगी में व्यस्त होने लगापिताजी के प्रति थोड़ा लापरवाह होने लगा। अब मैं कभी-कभी उनके जेब में पैसे रखना भूल जातापिताजी भी अमूमन कुछ नहीं कहते। जब दो-चार दिन ऐसा हो जाता तो सीधे तो नहीं लेकिन दूसरे तरीक़े से बता देते कि उनके पास पैसे नहीं हैं आज पार्क के बाहर बहुत बढ़िया मूँगफली मिल रही थीहमने सोचा कि बच्चों के लिए ले लें लेकिन शायद दूसरा कुर्ता पहन लिया था मैंने।मुझे यह अच्छी तरह से मालूम था कि पिताजी के कमरे में उनके सुबह के टहलने के लिए एक ही कुर्ता टँगा रहता और बाक़ी कुर्ते अलमारी में रहते। और यह बात पिताजी भी जानते थे लेकिन एक हिचक सी होने लगी थी उनको पैसे के लिए कहने में। दो-चार बार जब यह घटना हुई तो मुझे अहसास हुआ कि यह ग़लत हो रहा है तो मैंने फिर से नियम से पैसे पिताजी के कुर्ते में रखना शुरू कर दिया।

मैंने यह बात बड़े भाई को भी बता दी थी और उनको ताकीद भी किया था कि वह इसका ख़याल रखें। लेकिन भैया तो शुरू से ही इन सब चीज़ों के प्रति लापरवाह थे और उन्होने कभी-कभार ही इसके लिए ध्यान दिया। आज पिताजी की उदासी को मैं तो भाँप गया लेकिन बड़े भाई ने महसूस ही नहीं किया। जब बड़े भाई ऑफ़िस निकल गए और भाभी भी घर के काम में व्यस्त हो गईं तो मैंने पिताजी से पूछा क्या बात है पिताजीतबीयत थोड़ी गड़बड़ है क्याआप उदास लग रहे हैं?

पिताजी ने मेरी तरफ़ ग़ौर से देखा और सर हिलाते हुए बोले तबीयत तो ठीक ही हैबस ऐसे ही। अब उम्र के साथ थोड़ी-बहुत दिक़्क़त तो लगी ही रहेगी।

मैं समझ गया कि पिताजी खुलकर बात नहीं करेंगे और मैं उनसे काफ़ी देर तक इधर-उधर की बात करता रहा। शाम को बड़े भाई आए तो उनसे भी इस बाबत सीधे बात करना उचित नहीं लगा। मैंने थोड़ा घुमाकर बात शुरू की पिताजी का पेंशन आपने कभी निकाला कि नहींबीच-बीच में खाता देख लिया कीजिए

बड़े भाई समझ नहीं पाए कि मैं यह क्यों पूछ रहा हूँउन्होने मेरी तरफ़ अचरज से देखा। पिछले महीने एक बार कुछ रुपये निकाले तो थेउसके बाद ज़रूरत नहीं महसूस हुई। तुम्हें पैसों की ज़रूरत है तो बोलोमैं दे देता हूँ।

मुझे लग गया कि बड़े भाई ग़लत समझ गए हैंअब मैंने उनसे खुल कर बात की दरअसल बात यह है भैया कि पिताजी के पास भी कुछ पैसे रहने चाहिए लेकिन वह कभी माँगते नहीं। इसीलिए मैं उनके जेब में हमेशा कुछ रुपये डाल देता था जिससे उनको जो भी ठीक लगेख़र्च करें। और उनके पेंशन से ही पैसे निकालता हूँ जिससे उनको यह न लगे कि वह हमारे पैसे पर आश्रित हैं। आप उनके जेब में आजकल रुपये नहीं डालते हैं और शायद उनको यही बात अंदर से साल रही है कि उनके पास बच्चों के लिए ख़र्च करने के लिए भी पैसे नहीं हैं।

बड़े भाई को जैसे झटका लगाउन्होने इस विषय में कभी ध्यान ही नहीं दिया था। मैंने उनको इशारों इशारों में यह बात पहले भी बताई थी लेकिन खुलकर नहीं कह पाया था कि कहीं उनको बुरा न लग जाए

अरे मैंने तो यह बात कभी सोची ही नहींमुझे लगा कि उनकी हर ज़रूरत का सामान तो घर में रहता ही है और बाहर का वह कुछ खाते पीते नहीं। इसलिए उनको पैसे की क्या ज़रूरत होगीबड़े भाई को अपनी भूल का अहसास हुआ और वह बाहर निकल गए। थोड़े देर में जब वह वापस लौटे तो उनके चेहरे पर संतुष्टि के भाव थेउन्होने पिताजी के कुर्ते में कुछ रुपये डाल दिए थे।

अगली सुबह पिताजी टहल कर लौटे तो उनके हाथ में एक दर्जन केले थे जिसे सबने बड़े मज़े में मिलकर खाया। उनके चेहरे पर उदासी अब दूर-दूर तक नज़र नहीं आ रही थी। बड़े भाई ने इसी बीच उनकी चेकबुक भी लाकर रख दीपिताजी बड़ी प्रसन्नता से उसमें कुछ रकम लिख रहे थे।

सोच- कहानी

रविवार का दिन कितने दिनों बाद आता है और ऐसे बीत जाता है जैसे आया ही नहीं था. आज
फिर रविवार की सुबह थी, ठंड अब अपने शबाब पर आ रही थी और ऐसे में रज़ाई में ही लेटे
लेटे चाय पीते हुए अखबार पढ़ने का आनंद ही कुछ और है. आज न तो दफ्तर जाने की हड़बड़ी
है और न ही रोज के हिसाब से नहाने धोने और शेविंग करने की. वैसे भी उसने एक नियम
अपने लिए बना रखा है कि रविवार के दिन जाड़े भर न तो स्नान करेगा और न ही शेविंग,
आखिर इस दिन में और बाकी के दिनों में कुछ तो फर्क होना ही चाहिए.
पत्नी सुबह एक प्याला चाय दे गयी थी और अखबार भी उलट पलट कर पूरा पढ़ा जा चुका था.
ऐसे में एक प्याली चाय और मिल जाये तो कुछ देर तक फोन पर मैसेज इत्यादि भी देख लिए
जाएँ, कुछ यही सोचते हुए उसने पत्नी को आवाज दी “बेगम, अगर आपकी नजरे इनायत हो
जाये तो गरीब को एक प्याली चाय की और नसीब हो जाती”. यह भी उसका आजमाया हुआ
नुस्खा था. बस एक चीज उसे कभी समझ में नहीं आती कि इन महिलाओं को छुट्टी के दिन
ऐसा आलस क्यूँ नहीं होता, आखिर वह भी तो एक दिन आराम चाहती होंगी. उसे किचेन से
कुछ आवाज सुनाई दी जिसपर उसने आदतन ध्यान नहीं दिया और फोन देखता रहा. थोड़ी देर
में उसकी चाय आ गयी और वह फिर से रविवार के आनंद में डूब गया.
कुछ देर बाद दरवाजे की घंटी बजी, वह उससे बेफिकर आराम से लेटा रहा. शायद बाई होगी या
दूधवाला पैसे लेने आया होगा, अक्सर पैसे लेने वाले रविवार को ही आते थे. लेकिन पत्नी ने
कमरे में आते ही कहा कि उठकर रद्दी वाले को अखबार वगैरह दे दीजिये. उसे खराब तो लगा
कि इसको भी आज ही आना था जब पिताजी गाँव गए हैं, वर्ना यह सब काम तो वही निपटा
देते थे. कुछ मिनट वह वैसे ही पड़ा रहा लेकिन जब पत्नी की दुबारा आवाज आई तो उसे
बिस्तर छोडना ही पड़ा. कमरे से बाहर निकलते समय उसकी नजर घड़ी पर पड़ी, 11 बज गए
थे. रोज तो वह अब तक एक घंटा दफ्तर में बिता चुका होता है लेकिन आज लेटे लेटे ही बीत
गया. बाहर बरामदे में निकलने पर उसे गुनगुनी धूप फैली दिखी तो काफी अच्छा लगा. अब
उसका ध्यान रद्दी वाले की तरफ गया, बरामदे के एक किनारे बैठा एक अधेड़ व्यक्ति जिसकी
खिचड़ी दाढ़ी और उलझे बाल उसकी दशा बताने के लिए काफी थे. उसने एक हाफ स्वेटर पहना
हुआ था जो उतना ही बदरंग था जितनी शायद उसकी अपनी जिंदगी होगी.

बाहर उसकी साइकल खड़ी थी जो शायद 10 साल पुरानी तो रही ही होगी और पीछे कैरियर के
दोनों तरफ झोले लटके हुए थे जिसमें वह रद्दी रखता था. रद्दी वाला बड़ी तल्लीनता से वहाँ
रखे रद्दी में से मैगजीन और कापी किताब अलग कर रहा था और अखबार एक तरफ रख रहा
था. उसने एक बार खाँसा तो रद्दीवाले ने उसकी तरफ देखा और सर हिलाकर उसको नमस्ते
किया. उसने भी बदले में सर हिला दिया और वहीं राखी कुर्सी पर बैठ गया. उसने कई बार
पिताजी को देखा था रद्दी बेचते और उसको याद था कि पहले वह रेट जरूर पुछते और फिर
मोल भाव करते. कई बार तो उन्होने एक रद्दीवाले को वापस करके दूसरे रद्दीवाले को बेचा
जिसने सिर्फ 50 पैसा प्रति किलो ज्यादा दिया था.
वैसे उसकी आदत नहीं थी मोलभाव की, वह सब्जी खरीदते वक़्त भी मोलभाव नहीं करता था.
और इस आदत के लिए पत्नी द्वारा कई बार “आप तो राजा हैं”, या “आपको तो कोई भी लूट
सकता है” जैसी उपाधियों से नवाजा जा चुका था. लेकिन उसे इन सब बातों से फर्क नहीं पड़ता
था और वह मुस्कुरा कर रह जाता. आज पता नहीं कैसे उसके मन में रद्दी का रेट पूछने की
इच्छा आ गयी, शायद पिताजी के हिस्से का काम करने के चलते एक अतिरिक्त दबाव उसके
मन में आ गया था.
“अखबार कैसे खरीदते हो?, उसने पूछा तो रद्दीवाले ने तुरंत जवाब दिया, मानो वह इस सवाल
का इंतजार ही कर रहा था “बाबूजी, वैसे तो हम लोग 6 रुपये किलो खरीदते हैं और किताब
कापी का रेट अखबार से कम होता है लेकिन आपके यहाँ से हमेशा ले जाता हूँ तो साढ़े छ रुपये
किलो दूँगा”.
उसको एक बार तो लगा कि चाहे छ हो या साढ़े छ, क्या फर्क पड़ता है. लेकिन उसने यूँ ही
कहा “रेट थोड़ा और बढ़ाओ, कम दे रहे हो”. अब वह पूरी तरह पिताजी की ज़िम्मेदारी को
निभाने के लिए तैयार हो गया था.
रद्दीवाले ने एक बार उसकी तरफ देखा और फिर वह तैयार हो गया “बाबूजी मंहगाई बहुत बढ़
गयी है और परिवार का खर्चा चलाना काफी मुश्किल हो रहा है आजकल. लेकिन आप के यहाँ
कोई बात नहीं, आप 7 रुपये ले लीजिएगा”. अब तक वह सारी रद्दी को अलग अलग कर चुका
था और एक एक कर उसने उन्हें तौलना शुरू कर दिया.

उसे ध्यान आया, सचमुच तेल की कीमतों में आजकल आग लगी हुई है और मंहगाई इंडेक्स में
भी इजाफा हुआ है. उसके ऑफिस में आजकल बस नए वेतन वृद्धि की ही चर्चा चलती रहती है
और हर आदमी बढ़े हुए वेतन को लेकर क़यास लगाता रहता है. कुछ लोग तो तीन महीने में
बढ्ने वाले डी ए को लेकर ही जोड़ घटाव में लगे रहते कि इस बार तो डी ए काफी बढ़ेगा. इन
चर्चाओं से उसे भी एहसास होने लगता है कि मंहगाई काफी बढ़ रही है और वेतन में अच्छी
ख़ासी बढ़ोत्तरी आवश्यक है.
रद्दीवाला अब अखबार तौलने लगा था और उसे बताता जा रहा था कि कितना वजन हुआ.
उसकी नजर एक बार फिर उसके स्वेटर और शर्ट पर पड़ी और वह पिताजी के सोच से वापस
अपनी सोच में आ गया.
“बाबूजी, कुल 26 किलो रद्दी हुआ और 7 रुपये के हिसाब से 182 रुपये हुआ”, उसने सारा
हिसाब बताया और अपनी जेब से पैसे निकाल कर गिनने लगा. 182 रुपये, इतने में क्या होता
है आजकल, पाँच किलो आटा भी तो नहीं मिलता होगा. फिर उसे पिताजी याद आए, पूरे समय
रद्दीवाले के सामने बैठकर वजन देखते और फिर दाम को अपने से जोड़कर ही लेते. वह इन्हीं
ख़यालों में खोया था तभी रद्दीवाले ने उसके सामने पैसे रखे “बाबूजी, 180 रुपये हैं, अगली बार
2 रुपये जोड़कर दे दूँगा”.
उसने अपने हाथ में 180 रुपये देखे, रद्दीवाला अखबार वगैरह उठाकर अपने साइकल के झोले
में रख रहा था. उसने आगे बढ़कर रद्दीवाले को बुलाया और उसके हाथ में 180 रुपये पकड़ाते
हुआ कहा “मंहगाई सचमुच बहुत बढ़ गयी है, बच्चों के लिए इससे कुछ खरीद लेना”, और फिर
बिना रद्दीवाले की तरफ देखे वह वापस मुड़ गया.