रविवार का दिन कितने दिनों बाद आता है और ऐसे बीत जाता है जैसे आया ही नहीं था. आज
फिर रविवार की सुबह थी, ठंड अब अपने शबाब पर आ रही थी और ऐसे में रज़ाई में ही लेटे
लेटे चाय पीते हुए अखबार पढ़ने का आनंद ही कुछ और है. आज न तो दफ्तर जाने की हड़बड़ी
है और न ही रोज के हिसाब से नहाने धोने और शेविंग करने की. वैसे भी उसने एक नियम
अपने लिए बना रखा है कि रविवार के दिन जाड़े भर न तो स्नान करेगा और न ही शेविंग,
आखिर इस दिन में और बाकी के दिनों में कुछ तो फर्क होना ही चाहिए.
पत्नी सुबह एक प्याला चाय दे गयी थी और अखबार भी उलट पलट कर पूरा पढ़ा जा चुका था.
ऐसे में एक प्याली चाय और मिल जाये तो कुछ देर तक फोन पर मैसेज इत्यादि भी देख लिए
जाएँ, कुछ यही सोचते हुए उसने पत्नी को आवाज दी “बेगम, अगर आपकी नजरे इनायत हो
जाये तो गरीब को एक प्याली चाय की और नसीब हो जाती”. यह भी उसका आजमाया हुआ
नुस्खा था. बस एक चीज उसे कभी समझ में नहीं आती कि इन महिलाओं को छुट्टी के दिन
ऐसा आलस क्यूँ नहीं होता, आखिर वह भी तो एक दिन आराम चाहती होंगी. उसे किचेन से
कुछ आवाज सुनाई दी जिसपर उसने आदतन ध्यान नहीं दिया और फोन देखता रहा. थोड़ी देर
में उसकी चाय आ गयी और वह फिर से रविवार के आनंद में डूब गया.
कुछ देर बाद दरवाजे की घंटी बजी, वह उससे बेफिकर आराम से लेटा रहा. शायद बाई होगी या
दूधवाला पैसे लेने आया होगा, अक्सर पैसे लेने वाले रविवार को ही आते थे. लेकिन पत्नी ने
कमरे में आते ही कहा कि उठकर रद्दी वाले को अखबार वगैरह दे दीजिये. उसे खराब तो लगा
कि इसको भी आज ही आना था जब पिताजी गाँव गए हैं, वर्ना यह सब काम तो वही निपटा
देते थे. कुछ मिनट वह वैसे ही पड़ा रहा लेकिन जब पत्नी की दुबारा आवाज आई तो उसे
बिस्तर छोडना ही पड़ा. कमरे से बाहर निकलते समय उसकी नजर घड़ी पर पड़ी, 11 बज गए
थे. रोज तो वह अब तक एक घंटा दफ्तर में बिता चुका होता है लेकिन आज लेटे लेटे ही बीत
गया. बाहर बरामदे में निकलने पर उसे गुनगुनी धूप फैली दिखी तो काफी अच्छा लगा. अब
उसका ध्यान रद्दी वाले की तरफ गया, बरामदे के एक किनारे बैठा एक अधेड़ व्यक्ति जिसकी
खिचड़ी दाढ़ी और उलझे बाल उसकी दशा बताने के लिए काफी थे. उसने एक हाफ स्वेटर पहना
हुआ था जो उतना ही बदरंग था जितनी शायद उसकी अपनी जिंदगी होगी.
बाहर उसकी साइकल खड़ी थी जो शायद 10 साल पुरानी तो रही ही होगी और पीछे कैरियर के
दोनों तरफ झोले लटके हुए थे जिसमें वह रद्दी रखता था. रद्दी वाला बड़ी तल्लीनता से वहाँ
रखे रद्दी में से मैगजीन और कापी किताब अलग कर रहा था और अखबार एक तरफ रख रहा
था. उसने एक बार खाँसा तो रद्दीवाले ने उसकी तरफ देखा और सर हिलाकर उसको नमस्ते
किया. उसने भी बदले में सर हिला दिया और वहीं राखी कुर्सी पर बैठ गया. उसने कई बार
पिताजी को देखा था रद्दी बेचते और उसको याद था कि पहले वह रेट जरूर पुछते और फिर
मोल भाव करते. कई बार तो उन्होने एक रद्दीवाले को वापस करके दूसरे रद्दीवाले को बेचा
जिसने सिर्फ 50 पैसा प्रति किलो ज्यादा दिया था.
वैसे उसकी आदत नहीं थी मोलभाव की, वह सब्जी खरीदते वक़्त भी मोलभाव नहीं करता था.
और इस आदत के लिए पत्नी द्वारा कई बार “आप तो राजा हैं”, या “आपको तो कोई भी लूट
सकता है” जैसी उपाधियों से नवाजा जा चुका था. लेकिन उसे इन सब बातों से फर्क नहीं पड़ता
था और वह मुस्कुरा कर रह जाता. आज पता नहीं कैसे उसके मन में रद्दी का रेट पूछने की
इच्छा आ गयी, शायद पिताजी के हिस्से का काम करने के चलते एक अतिरिक्त दबाव उसके
मन में आ गया था.
“अखबार कैसे खरीदते हो?, उसने पूछा तो रद्दीवाले ने तुरंत जवाब दिया, मानो वह इस सवाल
का इंतजार ही कर रहा था “बाबूजी, वैसे तो हम लोग 6 रुपये किलो खरीदते हैं और किताब
कापी का रेट अखबार से कम होता है लेकिन आपके यहाँ से हमेशा ले जाता हूँ तो साढ़े छ रुपये
किलो दूँगा”.
उसको एक बार तो लगा कि चाहे छ हो या साढ़े छ, क्या फर्क पड़ता है. लेकिन उसने यूँ ही
कहा “रेट थोड़ा और बढ़ाओ, कम दे रहे हो”. अब वह पूरी तरह पिताजी की ज़िम्मेदारी को
निभाने के लिए तैयार हो गया था.
रद्दीवाले ने एक बार उसकी तरफ देखा और फिर वह तैयार हो गया “बाबूजी मंहगाई बहुत बढ़
गयी है और परिवार का खर्चा चलाना काफी मुश्किल हो रहा है आजकल. लेकिन आप के यहाँ
कोई बात नहीं, आप 7 रुपये ले लीजिएगा”. अब तक वह सारी रद्दी को अलग अलग कर चुका
था और एक एक कर उसने उन्हें तौलना शुरू कर दिया.
उसे ध्यान आया, सचमुच तेल की कीमतों में आजकल आग लगी हुई है और मंहगाई इंडेक्स में
भी इजाफा हुआ है. उसके ऑफिस में आजकल बस नए वेतन वृद्धि की ही चर्चा चलती रहती है
और हर आदमी बढ़े हुए वेतन को लेकर क़यास लगाता रहता है. कुछ लोग तो तीन महीने में
बढ्ने वाले डी ए को लेकर ही जोड़ घटाव में लगे रहते कि इस बार तो डी ए काफी बढ़ेगा. इन
चर्चाओं से उसे भी एहसास होने लगता है कि मंहगाई काफी बढ़ रही है और वेतन में अच्छी
ख़ासी बढ़ोत्तरी आवश्यक है.
रद्दीवाला अब अखबार तौलने लगा था और उसे बताता जा रहा था कि कितना वजन हुआ.
उसकी नजर एक बार फिर उसके स्वेटर और शर्ट पर पड़ी और वह पिताजी के सोच से वापस
अपनी सोच में आ गया.
“बाबूजी, कुल 26 किलो रद्दी हुआ और 7 रुपये के हिसाब से 182 रुपये हुआ”, उसने सारा
हिसाब बताया और अपनी जेब से पैसे निकाल कर गिनने लगा. 182 रुपये, इतने में क्या होता
है आजकल, पाँच किलो आटा भी तो नहीं मिलता होगा. फिर उसे पिताजी याद आए, पूरे समय
रद्दीवाले के सामने बैठकर वजन देखते और फिर दाम को अपने से जोड़कर ही लेते. वह इन्हीं
ख़यालों में खोया था तभी रद्दीवाले ने उसके सामने पैसे रखे “बाबूजी, 180 रुपये हैं, अगली बार
2 रुपये जोड़कर दे दूँगा”.
उसने अपने हाथ में 180 रुपये देखे, रद्दीवाला अखबार वगैरह उठाकर अपने साइकल के झोले
में रख रहा था. उसने आगे बढ़कर रद्दीवाले को बुलाया और उसके हाथ में 180 रुपये पकड़ाते
हुआ कहा “मंहगाई सचमुच बहुत बढ़ गयी है, बच्चों के लिए इससे कुछ खरीद लेना”, और फिर
बिना रद्दीवाले की तरफ देखे वह वापस मुड़ गया.
फिर रविवार की सुबह थी, ठंड अब अपने शबाब पर आ रही थी और ऐसे में रज़ाई में ही लेटे
लेटे चाय पीते हुए अखबार पढ़ने का आनंद ही कुछ और है. आज न तो दफ्तर जाने की हड़बड़ी
है और न ही रोज के हिसाब से नहाने धोने और शेविंग करने की. वैसे भी उसने एक नियम
अपने लिए बना रखा है कि रविवार के दिन जाड़े भर न तो स्नान करेगा और न ही शेविंग,
आखिर इस दिन में और बाकी के दिनों में कुछ तो फर्क होना ही चाहिए.
पत्नी सुबह एक प्याला चाय दे गयी थी और अखबार भी उलट पलट कर पूरा पढ़ा जा चुका था.
ऐसे में एक प्याली चाय और मिल जाये तो कुछ देर तक फोन पर मैसेज इत्यादि भी देख लिए
जाएँ, कुछ यही सोचते हुए उसने पत्नी को आवाज दी “बेगम, अगर आपकी नजरे इनायत हो
जाये तो गरीब को एक प्याली चाय की और नसीब हो जाती”. यह भी उसका आजमाया हुआ
नुस्खा था. बस एक चीज उसे कभी समझ में नहीं आती कि इन महिलाओं को छुट्टी के दिन
ऐसा आलस क्यूँ नहीं होता, आखिर वह भी तो एक दिन आराम चाहती होंगी. उसे किचेन से
कुछ आवाज सुनाई दी जिसपर उसने आदतन ध्यान नहीं दिया और फोन देखता रहा. थोड़ी देर
में उसकी चाय आ गयी और वह फिर से रविवार के आनंद में डूब गया.
कुछ देर बाद दरवाजे की घंटी बजी, वह उससे बेफिकर आराम से लेटा रहा. शायद बाई होगी या
दूधवाला पैसे लेने आया होगा, अक्सर पैसे लेने वाले रविवार को ही आते थे. लेकिन पत्नी ने
कमरे में आते ही कहा कि उठकर रद्दी वाले को अखबार वगैरह दे दीजिये. उसे खराब तो लगा
कि इसको भी आज ही आना था जब पिताजी गाँव गए हैं, वर्ना यह सब काम तो वही निपटा
देते थे. कुछ मिनट वह वैसे ही पड़ा रहा लेकिन जब पत्नी की दुबारा आवाज आई तो उसे
बिस्तर छोडना ही पड़ा. कमरे से बाहर निकलते समय उसकी नजर घड़ी पर पड़ी, 11 बज गए
थे. रोज तो वह अब तक एक घंटा दफ्तर में बिता चुका होता है लेकिन आज लेटे लेटे ही बीत
गया. बाहर बरामदे में निकलने पर उसे गुनगुनी धूप फैली दिखी तो काफी अच्छा लगा. अब
उसका ध्यान रद्दी वाले की तरफ गया, बरामदे के एक किनारे बैठा एक अधेड़ व्यक्ति जिसकी
खिचड़ी दाढ़ी और उलझे बाल उसकी दशा बताने के लिए काफी थे. उसने एक हाफ स्वेटर पहना
हुआ था जो उतना ही बदरंग था जितनी शायद उसकी अपनी जिंदगी होगी.
बाहर उसकी साइकल खड़ी थी जो शायद 10 साल पुरानी तो रही ही होगी और पीछे कैरियर के
दोनों तरफ झोले लटके हुए थे जिसमें वह रद्दी रखता था. रद्दी वाला बड़ी तल्लीनता से वहाँ
रखे रद्दी में से मैगजीन और कापी किताब अलग कर रहा था और अखबार एक तरफ रख रहा
था. उसने एक बार खाँसा तो रद्दीवाले ने उसकी तरफ देखा और सर हिलाकर उसको नमस्ते
किया. उसने भी बदले में सर हिला दिया और वहीं राखी कुर्सी पर बैठ गया. उसने कई बार
पिताजी को देखा था रद्दी बेचते और उसको याद था कि पहले वह रेट जरूर पुछते और फिर
मोल भाव करते. कई बार तो उन्होने एक रद्दीवाले को वापस करके दूसरे रद्दीवाले को बेचा
जिसने सिर्फ 50 पैसा प्रति किलो ज्यादा दिया था.
वैसे उसकी आदत नहीं थी मोलभाव की, वह सब्जी खरीदते वक़्त भी मोलभाव नहीं करता था.
और इस आदत के लिए पत्नी द्वारा कई बार “आप तो राजा हैं”, या “आपको तो कोई भी लूट
सकता है” जैसी उपाधियों से नवाजा जा चुका था. लेकिन उसे इन सब बातों से फर्क नहीं पड़ता
था और वह मुस्कुरा कर रह जाता. आज पता नहीं कैसे उसके मन में रद्दी का रेट पूछने की
इच्छा आ गयी, शायद पिताजी के हिस्से का काम करने के चलते एक अतिरिक्त दबाव उसके
मन में आ गया था.
“अखबार कैसे खरीदते हो?, उसने पूछा तो रद्दीवाले ने तुरंत जवाब दिया, मानो वह इस सवाल
का इंतजार ही कर रहा था “बाबूजी, वैसे तो हम लोग 6 रुपये किलो खरीदते हैं और किताब
कापी का रेट अखबार से कम होता है लेकिन आपके यहाँ से हमेशा ले जाता हूँ तो साढ़े छ रुपये
किलो दूँगा”.
उसको एक बार तो लगा कि चाहे छ हो या साढ़े छ, क्या फर्क पड़ता है. लेकिन उसने यूँ ही
कहा “रेट थोड़ा और बढ़ाओ, कम दे रहे हो”. अब वह पूरी तरह पिताजी की ज़िम्मेदारी को
निभाने के लिए तैयार हो गया था.
रद्दीवाले ने एक बार उसकी तरफ देखा और फिर वह तैयार हो गया “बाबूजी मंहगाई बहुत बढ़
गयी है और परिवार का खर्चा चलाना काफी मुश्किल हो रहा है आजकल. लेकिन आप के यहाँ
कोई बात नहीं, आप 7 रुपये ले लीजिएगा”. अब तक वह सारी रद्दी को अलग अलग कर चुका
था और एक एक कर उसने उन्हें तौलना शुरू कर दिया.
उसे ध्यान आया, सचमुच तेल की कीमतों में आजकल आग लगी हुई है और मंहगाई इंडेक्स में
भी इजाफा हुआ है. उसके ऑफिस में आजकल बस नए वेतन वृद्धि की ही चर्चा चलती रहती है
और हर आदमी बढ़े हुए वेतन को लेकर क़यास लगाता रहता है. कुछ लोग तो तीन महीने में
बढ्ने वाले डी ए को लेकर ही जोड़ घटाव में लगे रहते कि इस बार तो डी ए काफी बढ़ेगा. इन
चर्चाओं से उसे भी एहसास होने लगता है कि मंहगाई काफी बढ़ रही है और वेतन में अच्छी
ख़ासी बढ़ोत्तरी आवश्यक है.
रद्दीवाला अब अखबार तौलने लगा था और उसे बताता जा रहा था कि कितना वजन हुआ.
उसकी नजर एक बार फिर उसके स्वेटर और शर्ट पर पड़ी और वह पिताजी के सोच से वापस
अपनी सोच में आ गया.
“बाबूजी, कुल 26 किलो रद्दी हुआ और 7 रुपये के हिसाब से 182 रुपये हुआ”, उसने सारा
हिसाब बताया और अपनी जेब से पैसे निकाल कर गिनने लगा. 182 रुपये, इतने में क्या होता
है आजकल, पाँच किलो आटा भी तो नहीं मिलता होगा. फिर उसे पिताजी याद आए, पूरे समय
रद्दीवाले के सामने बैठकर वजन देखते और फिर दाम को अपने से जोड़कर ही लेते. वह इन्हीं
ख़यालों में खोया था तभी रद्दीवाले ने उसके सामने पैसे रखे “बाबूजी, 180 रुपये हैं, अगली बार
2 रुपये जोड़कर दे दूँगा”.
उसने अपने हाथ में 180 रुपये देखे, रद्दीवाला अखबार वगैरह उठाकर अपने साइकल के झोले
में रख रहा था. उसने आगे बढ़कर रद्दीवाले को बुलाया और उसके हाथ में 180 रुपये पकड़ाते
हुआ कहा “मंहगाई सचमुच बहुत बढ़ गयी है, बच्चों के लिए इससे कुछ खरीद लेना”, और फिर
बिना रद्दीवाले की तरफ देखे वह वापस मुड़ गया.
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