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Monday, October 29, 2018

बेचैनी-लघुकथा

संध्या को समझ में नहीं आ रहा था कि मनीष की बेचैनी कैसे दूर करे, दुःख तो उसे भी बहुत हुआ था जब वह हादसा हुआ था. कितने ही लोग, जिनमें बच्चे और महिलाएं भी थीं, मारे गए थे और उसका सदमा बहुत गहरा पड़ा था मनीष के ऊपर. लेकिन उसको भी पता था और मनीष को भी कि गलती मनीष की नहीं थी और वह चाह कर भी उस हादसे को टाल नहीं सकता था.
आज मनीष की छुट्टी का सातवां दिन था, हादसे के बाद ही उसे विभाग ने कुछ दिन की छुट्टी पर भेज दिया था. सबको उम्मीद थी कि कुछ दिन बाद सब कुछ यथावत हो जायेगा और मनीष वापस अपने काम में लग जायेगा. लेकिन मनीष की बेचैनी और उदासी कम होने का नाम ही नहीं ले रही थी और यही बात संध्या को भी बेतरह परेशान किये हुए थी.
"अब उसे भूलने की कोशिश करो नहीं तो कैसे चलेगा. तुम्हारी तो कोई गलती नहीं थी उस हादसे में, लोग ही अपनी जान को खतरे में डालते रहते हैं तो कोई क्या करे", संध्या ने मनीष को समझाने की एक और कोशिश की.
मनीष उसे सुन कर भी जैसे अनसुना कर रहा था, उसने अपना सर हिलाया और उदास स्वर में बोला "मैं कुछ नहीं कर पाया संध्या और इतने लोगों की मौत की वजह बन गया. भले मेरा विभाग मुझे इसका जिम्मेदार नहीं मानता लेकिन मैं इस आत्मग्लानि से निकल नहीं पा रहा हूँ".
संध्या ने एक गहरी सांस ली, उसके जेहन में कुछ समय पहले का एक हादसा आ गया जिसमें ड्राइवर का धर्म अलग होने के चलते उसपर एक दूसरे तरीके का आरोप लग गया था.
"वो तो अच्छा हुआ कि वो लोग भी अपने ही धर्म के थे वर्ना लोग तो इसे एक अलग ही रंग दे देते. आजकल तो बस कोई बहाना चाहिए लोगों को", संध्या ने जैसे राहत की सांस ली.
मनीष ने उसकी तरफ देखा और कुछ सोचकर बुदबुदाया "काश इसी बहाने से ही लोग मुझे कोसते, गुनाहगार ठहराते तो शायद मेरे दिल का बोझ कुछ कम होता!

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