उसने ग़ौर से पिताजी को देखा, बहुत
उदास दिख रहे थे और शायद निराश भी थे। सेवानिवृत्ति के 5 वर्ष बाद लगभग 65 साल की
उम्र पार कर चुके पिताजी को उसने शायद ही कभी इस तरह से निराश देखा हो। दरअसल
सेवानिवृत्ति के पहले भी कभी वह हम लोगों पर निर्भर नहीं रहे और अब पिछले कुछ
सालों से हम दोनों के साथ बारी-बारी से रह रहे हैं। सेवानिवृत्ति के बाद भी जब तक माँ थी, तब
तक उन्होने अपना जीवन अपने तरीक़े से ही जिया। पेंशन के पैसों को कहाँ और कैसे ख़र्च करना है, इसका निर्णय उन्होने माँ से पूछकर ही किया लेकिन माँ के नहीं रहने
पर उन्होने जैसे सब कुछ छोड़ दिया। अब जिसके घर जाते हैं, अपने
बैंक खाते की चेकबुक उसे ही पकड़ा देते हैं और फिर जीवन को एक अलग ढर्रे पर चलने के
लिए छोड़ देते हैं। शायद जीवन को अब वह एक अलग ही नज़रिए से देखने लगे थे जहाँ उनकी अपनी इच्छाएँ बहुत मायने नहीं रखती थीं।
पिछले क़रीब तीन महीने से पिताजी बड़े भाई के यहाँ रह रहे
थे और उसकी भी इच्छा थी कि पिताजी से मिल लिया जाए। वह पिताजी से ज़्यादा क़रीब था लेकिन सिर्फ़ अपने घर उनको रखना भी उसके लिए संभव नहीं था। एक तो बड़े भाई ख़ुद भी कहते थे कि कुछ महीने पिताजी उनके घर
रहेंगे। और दूसरे उसने जब घर में पिताजी को हमेशा अपने साथ ही रखने की बात की तो
पत्नी ऊषा का रुख़ उसे बहुत सकारात्मक नहीं लगा। हालाँकि उसने खुले शब्दों में कुछ नहीं कहा लेकिन कई और तरीक़ों से उसने ज़ाहिर कर दिया कि पिताजी को हमेशा रखना मुमकिन नहीं है।
“अब बड़े भैया भी तो चाहते हैं कि पिताजी उनके साथ
रहें और पिताजी का भी तो मन होगा ही कि वह बड़े बेटे के घर कुछ दिन रहें। उनसे
पूछने पर तो शायद खुल के नहीं बोल पाएँ लेकिन हमें तो सोचना ही चाहिए”, ऊषा का तर्क था।
उसे भी लगा कि ठीक ही है, पिताजी
का मन भी लगा रहेगा और ऊषा को भी बहुत दिक़्क़त नहीं होगी। वह भी इसी समाज का हिस्सा था और
अपने कुछ दोस्तों के घर पर उनके माँ पिताजी की हालत देख चुका था।
“यह भी ठीक रहेगा, पिताजी
भी सब जगह घूम फिर लेंगें और सबका मन लगा रहेगा”, उसने कहा तो ऊषा ने
अपनी ख़ुशी ज़ाहिर करने में कोई कोताही नहीं की।
माँ के गुज़रने के बाद उसने शुरू में पिताजी को अपने घर ही
रखा। ठीक-ठाक पेंशन मिल रही थी लेकिन पिताजी ने जैसे पैसे
निकालने या ख़र्च करने से तौबा कर ली। उसने कई बार समझाया कि अपनी पासबुक और चेकबुक आप अपने
पास ही रखिए लेकिन पिताजी ने उसे पकड़ा दिया।
“अब मुझे क्या ज़रूरत है, हर चीज़ तो तुम ला ही देते हो। कभी ज़रूरत पड़ेगी तो तुमसे माँग लूँगा, कुछ चेक मैंने साइन कर दिए हैं, जब ज़रूरत हो निकाल लिया करना”, पिताजी
ने इन सब चीज़ों से अपने आपको एकदम परे कर लिया।
उसने भी नियम बना लिया था, हफ़्ते में एक दिन पिताजी को सैलून लेजाकर उनकी हजामत बनवाना, पूरे
महीने की दवा एक साथ शुरू में ही मँगवा लेना और दो हिंदी अख़बार उनके लिए रोज़ मँगवाना। उसे याद था कि कैसे सुबह-सुबह अख़बार पढ़ने के लिए पिताजी हाकर का इंतज़ार करते रहते थे और उसकी साइकल की आवाज़ भी
वह दूर से ही पहचान जाते थे। गाहे-बगाहे उसे उलाहना भी देते रहते “अरे रामचरण, आजकल
देर करने लगे हो आने में, सामने शर्माजी के घर तो आधे घंटे पहले ही अख़बार आ जाता है।” और रामचरण
उनको अगले दिन से जल्दी आने का वादा करते हुए निकल जाता। एक-दो दिन बाद फिर वही समय हो जाता लेकिन पिताजी ने
कभी भी रामचरण को अख़बार बंद करने के लिए नहीं कहा। और उनका अख़बार भी एक ही था “दैनिक जागरण” जो
पिछले कई सालों से चला आ रहा था। शर्माजी के यहाँ हिंदुस्तान आता था और कभी-कभार वह उसे भी पढ़ लेते थे लेकिन संतुष्टि उनको सिर्फ़ दैनिक जागरण से ही होती थी। बड़े भाई को अख़बार में बहुत दिलचस्पी नहीं थी लेकिन वह भी पिताजी
के ही ढर्रे पर था, अक्सर पिताजी के साथ ही बीच के पन्ने निकालकर पढ़ता रहता।
शुरू-शुरू में तो उसने हमेशा कुछ रुपये पिताजी के कुर्ते के जेब में रखा। पिताजी ने
कई बार कहा भी कि क्या ज़रूरत है इसकी लेकिन उसे लगता था कि एक ऐसे व्यक्ति के पास पैसे हमेशा होने
चाहिए जिसने पूरी ज़िंदगी अपने पैसों से ही जीवन काटा हो, कभी किसी के सामने
हाथ नहीं फैलाया हो। पिताजी भी रोज़ टहलने जाते और आते समय बच्चों के लिए चॉकलेट या मूँगफली ले आते। एकाध बार
ऊषा ने उसे टोका भी कि पिताजी को मना करो लेकिन उसने ऊषा को समझा दिया “पिताजी का आत्मसम्मान रखने के लिए कभी मना मत करना, वैसे
भी उनके पेंशन का हिस्सा ही वह ख़र्च करते हैं।”
“वो तो ठीक है लेकिन जब ज़रूरत नहीं हो तो पैसे क्यों ख़र्च करते हैं, आख़िरकार अंत में काम तो उनके ही आने हैं”, ऊषा
ने अपना मत रखा लेकिन उसने ध्यान नहीं दिया।
समय के साथ मनुष्य चीज़ों को भूलने लगता है या यूँ कहें कि मस्तिष्क को
अपनी सहूलियत से भूल जाने देता है। मैं भी जैसे-जैसे अपनी जाती ज़िंदगी में व्यस्त होने लगा, पिताजी के प्रति थोड़ा
लापरवाह होने लगा। अब मैं कभी-कभी उनके जेब में पैसे रखना भूल जाता, पिताजी भी अमूमन कुछ
नहीं कहते। जब दो-चार दिन ऐसा हो जाता तो सीधे तो नहीं लेकिन दूसरे तरीक़े से बता देते कि उनके पास पैसे नहीं हैं “आज पार्क के बाहर बहुत बढ़िया मूँगफली मिल रही थी, हमने
सोचा कि बच्चों के लिए ले लें लेकिन शायद दूसरा कुर्ता पहन लिया था मैंने।”
मुझे यह अच्छी तरह से मालूम था कि पिताजी के कमरे में उनके सुबह के
टहलने के लिए एक ही कुर्ता टँगा रहता और बाक़ी कुर्ते अलमारी में रहते। और यह बात पिताजी भी जानते थे लेकिन एक हिचक सी
होने लगी थी उनको पैसे के लिए कहने में। दो-चार बार जब यह घटना हुई तो मुझे अहसास हुआ कि यह ग़लत हो रहा है तो मैंने फिर से नियम से पैसे पिताजी के कुर्ते में रखना शुरू
कर दिया।
मैंने यह बात बड़े भाई को भी बता
दी थी और उनको ताकीद भी किया था कि वह इसका ख़याल रखें। लेकिन भैया तो शुरू से ही इन सब चीज़ों के प्रति लापरवाह थे और उन्होने कभी-कभार ही इसके लिए ध्यान दिया। आज पिताजी की उदासी
को मैं तो भाँप गया लेकिन बड़े भाई ने महसूस ही नहीं किया। जब बड़े भाई ऑफ़िस निकल गए और भाभी भी घर के काम में व्यस्त हो
गईं तो मैंने पिताजी से पूछा “क्या बात है पिताजी, तबीयत
थोड़ी गड़बड़ है क्या, आप उदास लग रहे हैं?
पिताजी ने मेरी तरफ़ ग़ौर से देखा और सर हिलाते हुए बोले “तबीयत तो ठीक ही है, बस
ऐसे ही। अब उम्र के साथ थोड़ी-बहुत दिक़्क़त तो लगी ही रहेगी।”
मैं समझ गया कि पिताजी खुलकर बात
नहीं करेंगे और मैं उनसे काफ़ी देर तक इधर-उधर की बात करता रहा। शाम को बड़े भाई आए तो उनसे भी इस बाबत सीधे बात करना उचित नहीं लगा। मैंने थोड़ा
घुमाकर बात शुरू की “पिताजी का पेंशन आपने कभी निकाला कि
नहीं, बीच-बीच में खाता देख लिया कीजिए।”
बड़े भाई समझ नहीं पाए कि मैं यह क्यों पूछ रहा हूँ, उन्होने मेरी तरफ़ अचरज से देखा। “पिछले महीने एक बार कुछ रुपये निकाले
तो थे, उसके बाद ज़रूरत नहीं महसूस हुई। तुम्हें पैसों की ज़रूरत है तो बोलो, मैं दे देता हूँ।”
मुझे लग गया कि बड़े भाई ग़लत समझ गए हैं, अब
मैंने उनसे खुल कर बात की “दरअसल बात यह है भैया कि पिताजी के पास भी कुछ पैसे
रहने चाहिए लेकिन वह कभी माँगते नहीं। इसीलिए मैं उनके जेब में हमेशा कुछ रुपये डाल देता था जिससे उनको जो
भी ठीक लगे, ख़र्च करें। और उनके पेंशन से ही पैसे निकालता हूँ
जिससे उनको यह न लगे कि वह हमारे पैसे पर आश्रित हैं। आप उनके जेब में आजकल रुपये
नहीं डालते हैं और शायद उनको यही बात अंदर से साल रही है कि उनके पास बच्चों के
लिए ख़र्च करने के लिए भी पैसे नहीं हैं।”
बड़े भाई को जैसे झटका लगा, उन्होने
इस विषय में कभी ध्यान ही नहीं दिया था। मैंने उनको इशारों इशारों में यह बात पहले
भी बताई थी लेकिन खुलकर नहीं कह पाया था कि कहीं उनको बुरा न लग जाए।
“अरे मैंने तो यह बात कभी सोची ही नहीं, मुझे
लगा कि उनकी हर ज़रूरत का सामान तो घर में रहता ही है और बाहर का वह कुछ खाते पीते नहीं। इसलिए
उनको पैसे की क्या ज़रूरत होगी”, बड़े भाई को अपनी भूल का अहसास हुआ और वह बाहर निकल गए। थोड़े देर में जब वह
वापस लौटे तो उनके चेहरे पर संतुष्टि के भाव थे, उन्होने
पिताजी के कुर्ते में कुछ रुपये डाल दिए थे।
अगली सुबह पिताजी टहल कर लौटे तो
उनके हाथ में एक दर्जन केले थे जिसे सबने बड़े मज़े में मिलकर खाया। उनके चेहरे पर उदासी अब दूर-दूर तक नज़र नहीं आ रही थी। बड़े भाई ने इसी बीच उनकी चेकबुक भी लाकर रख दी, पिताजी
बड़ी प्रसन्नता से उसमें कुछ रकम लिख रहे थे।
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