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Tuesday, September 26, 2017

दर्द का एहसास-- लघुकथा

"मैडम, इस तरह कैसे चलेगा, बिना छुट्टी लिए आप गायब हो जाती हैं| यह ऑफिस है, ध्यान रखिये, पहले भी आप ऐसा कर चुकी हैं", जैसे ही वह ऑफिस में घुसी, बॉस ने बुलाकर उसे झाड़ दिया| उसने एक बार नजर उठाकर बॉस को देखा, उसकी निगाहों में गुस्सा कम, व्यंग ज्यादा नजर आ रहा था| बगल में बैठी बॉस की सेक्रेटरी को देखकर उसको उबकाई सी आ गयी|
लगभग तीन महीने हो रहे थे उसको इस ऑफिस में, पूरी मेहनत से और बिना किसी से लल्लो चप्पो किये वह अपना काम करती थी| ऑफिस में कुछ महिलाएं भी थीं जिनके साथ वह रोज लंच करती थी लेकिन उनके सोच के स्तर को देखकर उसने उनसे ज्यादा बात करना लगभग छोड़ दिया था| इसी बात को लेकर कुछ महिलाओं ने उसे नीचा दिखाने का सोच लिया था| कई बार उनकी बातों का वह मुंहतोड़ जवाब भी दे चुकी थी और इनको नज़रअंदाज करना भी उसने धीरे धीरे सीख लिया था|
पिछले कई सालों से उसे कम से कम महीने में एक दिन बिस्तर पकड़ना ही पड़ता था| इतना भयानक दर्द होता था कि काम करना तो दूर, वह ठीक से चल फिर भी नहीं पाती थी| दवा से बस इतना होता कि आराम से लेट लेती थी लेकिन घर से निकलना तो सोच भी नहीं सकती थी| अगले दिन भी बहुत दिक्कत होती थी लेकिन किसी तरह दिन बीत जाता था| पिछले महीने ही उसने बॉस की सेक्रेटरी और साथ की महिलाओं को बता भी दिया था कि उस एक दिन वह किसी भी हालत में काम पर आने लायक नहीं रहती|
उसने एक बार सोचा कि बात ख़त्म की जाए और वह मुड़कर जाने को हुई| लेकिन तभी बॉस और सेक्रेटरी की हंसी ने उसके मन में आग लगा दी| पलटकर उसने बॉस की आँखों में ऑंखें डालते हुए कहा " शायद आपको इसके बारे में पता हो यही सोचकर तो मैंने आपकी सेक्रेटरी को अपने तकलीफ के बारे में बता दिया था| मैंने सोचा था कि वह आपको बता देगी और आप समझ जाएंगे| आपकी पत्नी तो शायद इस दर्द के बारे में आपसे बात नहीं करती होगी लेकिन मैं अब आपको हर महीने बता दिया करुँगी और उस एक दिन नहीं आ पाऊँगी"|
वह बॉस के केबिन से बाहर निकल गयी और पीछे बंद हुए दरवाजे की आवाज पूरे ऑफिस को सुनाई पड़ रही थी|  

Friday, September 22, 2017

जरुरत- लघुकथा

"सुबह मैंने शैम्पू लाने के लिए कहा था, फिर भूल गए", जैसे ही वह घर में घुसा, पत्नी बोली|
"एकदम दिमाग में ही नहीं आया, अच्छा कल जरूर लेता आऊंगा| छुटकी जगी नहीं अबतक", कहते हुए वह बैग रखकर कमरे में भागा| जैसे ही उसने जेब से चॉकलेट निकालकर उसके सिरहाने रखा, पत्नी ने नाराजगी दिखाते हुए कहा "बेटी के लिए चॉकलेट लाना नहीं भूले, लेकिन मेरा कहा याद नहीं रहा"|
"चाय पिलाओ ना, थोड़ी थकान लग रही है", उसने छुटकी के पास ही लेटते हुए कहा|
"ठीक है, पहले कपडे तो बदल लो", बोलती हुई पत्नी किचन में चली गयी| चाय पैन गैस पर चढ़ाकर जब पत्ती डालने चली तो याद आया कि चाय की पत्ती तो ख़त्म है|
ओह, सुबह ही सोचा था लेकिन दुकान पर ध्यान नहीं रहा| अब क्या करे सोचते हुए उसने आवाज़ लगायी "जरा चाय की पत्ती तो लेते आओ, ख़त्म हो गयी है"|
"कितनी भुलक्कड़ हो गयी हो आजकल, कुछ याद ही नहीं रहता बेटी के आगे", मुस्कुराते हुए उसने कहा|
"और तुम्हें सब याद रहता है", कहकर दोनों हंस पड़े|
"कुछ देर बाद ले आऊंगा चाय की पत्ती, अब थकान कम लग रही है", उसने बेटी के पास लेटे लेटे ही कहा| पत्नी भी आकर वहीँ बैठ गयी, दोनों की प्यार भरी निगाहें बेटी पर टिकी हुई थीं| 

कुछ खूबसूरत पल-- लघुकथा

अब से मैं पूरा ध्यान रखूंगी मुकुल का, बहुत परेशान हो जाते हैं आजकल, उसके दिमाग में पूरे दिन यही घूम रहा था| जब से बेटी पैदा हुई थी, उसे एकदम व्यस्त रख रही थी, समय तो जैसे पंख लगा कर उड़ जाता था| बेचारे मुकुल खुद ही सब कुछ करते रहते थे, कभी कुछ कहते नहीं थे लेकिन उसे तकलीफ होती थी| आखिर कभी भी मुकुल को कुछ करने जो नहीं दिया था उसने|
"कपडे आयरन नही हैं, ओह फिर याद नहीं रहा", कहते हुए आज सुबह जब मुकुल ने सिकुड़े कपडे पहने तो उसे थोड़ी खीझ हुई| जल्दी से उसने नाश्ता निकालने का सोचा तभी बच्ची रोने लगी|
"नाश्ता किचन से लेकर खा लेना", बोलती हुई वह भागी|
"तुम मेरी चिंता मत करो, बेटी को देखो", और मुकुल ने नाश्ता लिया और आकर उसे देखने लगे| उसे पता ही नहीं चला कि कब वह आया और उसे देखने लगा, वह तो बेटी में ही खोयी थी|
"चलता हूँ, शाम को कुछ लाना तो नहीं है", मुकुल ने पूछा तो उसे उसके आने का एहसास हुआ|
"नहीं ठीक है, मैं दिन में ले आउंगी, तुम जल्दी आने की कोशिश करना", उसने मुस्कुराते हुए कहा| जाते जाते एक बार फिर पलटकर मुकुल ने बेटी को देखा और मुस्कुराते हुए निकल गए|
शाम को किसी तरह उसने नाश्ता बनाया और चायपैन गैस पर रखकर वह अभी बैठी ही थी कि बेटी जग कर रोने लगी| उसे लेने कमरे में गयी थी कि घंटी बजी| गोद में बेटी को लिए हुए उसने दरवाजा खोला और बैग रखकर मुकुल ने बेटी को लेना चाहा| लेकिन बेटी चुप होने का नाम ही नहीं ले रही थी, उधर चाय भी गैस पर चढ़ी हुई थी|
"तुम इसे चुप कराओ, शायद भूखी है, मैं कपडे बदल लेता हूँ तब तक", बोलता हुआ मुकुल कमरे में चला गया|
थोड़ी देर बाद उसे लगा कि कमरे में कोई है तो सामने मुकुल ट्रे में नाश्ता और चाय लेकर खड़ा था| उसे अपने आप पर एक बार फिर झेंप आयी और वह खड़ा होना चाह रही थी कि मुकुल ने उसे रोका और ट्रे रखकर बैठ गया|
"तुम नहीं जानती कि तुम्हें इस तरह देखना कितना सुखकर होता है मेरे लिए", कहकर मुकुल ने उसके बाल सहला दिए और बेटी के गाल पर धीरे धीरे हाथ फेरने लगा| वह धीरे से मुकुल के गोद में सर रखकर लेट गयी, बेटी भी सोते सोते मुस्कुरा रही थी और चाय ट्रे में ठंडी हो रही थी|  

Thursday, September 21, 2017

खबर--कहानी

बीस साल बाद आज जोखन लौटा था गाँव, कितनी बार घरवालों ने बुलाया, कितने प्रयोजन पड़े, लेकिन जोखन ने कभी भी गाँव की तरफ जाने का नाम नहीं लिया था| लोगों ने बहुत बार पूछा, लेकिन कभी उसने वजह नहीं बताया| आज गाँव में आकर उसे सब कुछ बदला बदला लग रहा था, कुछ भी पहचाना नहीं लग रहा था| पिताजी से हाल चाल करके वह गाँव में घूमने निकला और कुछ ही देर में गाँव के बाहर खेतों में खड़ा था| खेत भी अब खेत कम, प्लाट ज्यादा लग रहे थे| खेतों को पार करता हुआ वह बगल के गाँव के रास्ते पर चल पड़ा| कभी पगडण्डी जैसा रास्ता अब कंक्रीट का बन गया था लेकिन उसपर से गुजरने वाले कदम अब कम हो गए थे|
बगल के गाँव में पहुँच कर उसने उस घर की तरफ कदम बढ़ाया जहाँ बीस साल पहले वह आखिरी बार आया था| उस आखिरी बात के बाद कि "हमारा साथ संभव नहीं है, अपनी अलग जिंदगी बसा लो| हाँ मेरी दुआएं हमेशा साथ रहेंगी और तुम जितना आगे बढ़ोगे, मैं भी उतना ही खुश रहूंगी", जोखन ने कभी पलट कर नहीं देखा| इस बात का पता उन दोनों ने आज तक किसी किसी को भी नहीं लगने दिया था|
इस बीच उसे खबर मिलती रही कि रंजू की शादी हो गयी और वह किसी और गाँव में चली गयी| वह भी अपनी जिंदगी में व्यस्त होता गया और अपनी हर तरक्की उसे यह सुकून जरूर देती रही कि रंजू को भी ख़ुशी मिल रही होगी| लेकिन पिछले हफ्ते जो खबर उसे मिली उसने उसके होश उड़ा दिए|
अब तो बस मन में एक इच्छा थी कि एक बार पता चल जाए कि जो खबर उसने सुनी थी वह सच है कि नहीं| बड़ी जद्दोजहद के बाद उसने गाँव आकर एक बार रंजू के घर जाकर पता लगाने का फैसला लिया था| घर में तो वह किसी से पूछ नहीं सकता था इसलिए मन ही मन वह मनाता आया था कि खबर गलत ही हो| आखिर उसकी बात गलत कैसे हो सकती थी, उसकी तरक्की से तो रंजू की खुशियाँ बढ़नी थी| बस दो ही घर बाद उसकी गली आने वाली थी और जोखन का दिल बुरी तरह धड़क रहा था कि किसी आवाज ने उसको रोका "अरे जोखन, कैसे हो और कब आये, बहुत साल हो गया था तुमको देखे"|
उसने पलट कर देखा, रंजू के पिताजी थे| ऐसा लगा जैसे उसने किसी बहुत ही बुजुर्ग व्यक्ति का चेहरा देख लिया हो, उदास ऑंखें, पीला पड़ा चेहरा और उलझे बाल| कहाँ उनका नाम लेकर रंजू उसे चिढ़ाती थी कि काश तुम भी पापा की तरह स्मार्ट होते तो तुमको कोई भी पसंद कर लेता| उनका चेहरा देखते ही उसे सब समझ आ गया, क्या कहे, क्या पूछे, उसके दिमाग ने जैसे काम करना बंद कर दिया| बस किसी तरह इतना कह कर कि "आज ही आया था चाचा, ठीक हूँ", पलट कर अपने गाँव की तरफ चल पड़ा| रंजू को ससुराल वालों ने जला दिया था, इस खबर को अब किसी से भी पूछने की हिम्मत नहीं थी उसमें | पीछे से आती आवाज उसे जैसे सुनाई ही नहीं पड़ रही थी और कुछ भी सोचने की ताक़त जोखन गँवा चुका था| 

बढ़ता धुआं-- लघुकथा

खाला अपने रसोई में लगी हुई थीं, अब रमजान महीने के बस दो ही दिन तो बचे थे और अलीम बड़के शहर से आज ही आ रहा था. सबेरे सबेरे उन्होंने पड़ोसी मियां की दूकान से एक बार फिर लगभग गिड़गिड़ाते हुए सामान ख़रीदा था. अभी पिछले महीने का भी पूरा पैसा दिया नहीं था उन्होंने तो उम्मीद कम ही थी कि सामान मिल ही जायेगा. लेकिन एक तो उन्होंने बेटे के आने की खबर सुना दी थी और दूसरे आने वाली ईद, मियां ने थोड़े ना नुकुर के बाद सामान दे दिया.
"देखो खाला, इस बार अगला पिछला सब हिसाब चुकता हो जाना चाहिए, मेरे भी बाल बच्चे हैं".
"इस बार अल्लाह की दुआ से सब चुकता कर दूंगी मियां, बेटा आ रहा है ना" कहते कहते उनका चेहरा जैसे रोशन हो उठा.
जल्दी जल्दी पूरे टपरी में उन्होंने झाड़ू लगाया और धूल के चलते उनकी पुरानी खांसी फिर उभर आयी. अब मुआं इस खांसी को भी अभी ही उभरना था, सोचते हुए वह दो मिनट के लिए दम लेने बैठ गयीं.
"अम्मी, इस बार आऊंगा तो तुमको डाक्टर को दिखा दूंगा, तुम्हारी खांसी नहीं जा रही है", एक दिन वह फोन पर कह रहा था. दरअसल जब भी उसका फोन आता, बगल वाली रशीदा अपने टपरी से ही आवाज लगाती कि खाला आओ, तुम्हारे अलीम का फोन है, और वह भागते हुए जातीं. अब इस उम्र में भागने से उनकी सांस फूल जाती और वह खांसने लगतीं.
"अरे मुझे कुछ नहीं हुआ है रे, तू अपना ख्याल रखिओ. खाना पीना तो ठीक से करता है कि नहीं", और अलीम को इससे ज्यादा कुछ पूछने का मौका नहीं देती थीं वह.
जब तक उसके अब्बा जिन्दा थे, ज्यादा कुछ सोचने के लिए नहीं था उनके पास. एक बड़ी बेटी थी जिसका निकाह करवाकर वह बहुत सुकून से थीं. दामाद राजमिस्त्री था और वह बेटी को लेकर बड़े शहर चला गया था . लेकिन अलीम के अब्बा के इंतकाल के बाद तो जैसे एकदम से उनकी समझ बढ़ गयी थी. अलीम भी १० वीं पास कर चुका था और काम के सिलसिले में बड़े शहर निकल गया. पिछले एक साल में एक बार ही आया था और इस ईद पर उसके आने की खबर ने जैसे उनको फुर्तीला बना दिया था.
कड़ाही से निकलती सालन की खशबू ने उनको वर्तमान में ला खड़ा किया. अब तो अलीम के आने का समय भी हो रहा है और इफ्तार का समय भी, उनके हाथ जल्दी जल्दी कड़ाही में चलने लगे. कितना कुछ बनाना है बेटे के लिए, सोचकर उनके चेहरे पर मुस्कराहट फ़ैल गयी.
बाहर गली में हो रहे कुछ शोर सुनकर उनको लगा की अलीम आ गया लगता है. इतने में उनके दरवाजे की कुण्डी जोर जोर से खड़खड़ाने की आवाज आने लगी.
"आती हूँ, क्यों इस कुण्डी की जान ले रहा है तू", कहकर उन्होंने कमर को हाथ लगाया और खड़ी होकर उन्होंने दरवाजा खोला.
"अलीम, कहाँ छुपा है रे, सामने क्यों नहीं आता? सामने पड़ोसियों की भीड़ देखकर उनको लगा कि शैतानी में अलीम इनके बीच छुपा हुआ है. लेकिन भीड़ में से लोगों के उतरे चेहरे को देखकर उनको अजीब सा लगा. अभी वह कुछ और सोच पाती कि रशीदा ने रोते हुए उनको अपने बाँहों में भर लिया.
"क्या हुआ, क्यों रो रहे हो तुम सब, मेरा अलीम कहाँ है?, खाला को यह सब देखकर जैसे लकवा मार गया. वह गिरने को हुईं तभी रशीदा ने उनको पकड़कर फर्श पर बैठा दिया और बोली "अभी फोन आया था खाला, कुछ लोगों ने हाथापाई में अलीम की जान ले ली", और भी बहुत कुछ कहती जा रही थी रशीदा लेकिन खाला को कुछ सुनाई नहीं दे रहा था.
कड़ाही में पकता सालन जलने लगा था और उससे उठता धुआं टपरी में फैलने लगा था|

बाप-- लघुकथा

घर के बाहर ही जब उसने अपने चचेरे भाई रग्घू को देखा तो उसका माथा ठनका| आज यह घर क्यों आया था, जरूर कुछ गड़बड़ होगी, वर्ना पिताजी को गुजरे इतने साल हो गए, कभी हाल पूछने भी नहीं आया था| उसकी मुस्कराहट को नजरअंदाज करते हुए वह भागती हुई घर में घुसी|
"माँ, माँ, कहाँ है तू", सामने माँ नजर नहीं आयी तो वह बेचैन हो गयी| जल्दी से उसने पिछले कमरे में प्रवेश किया तो माँ को खाट पर बैठे पाया|
"तू यहाँ बैठी है और जवाब भी नहीं दे रही है, मैं तो घबरा गयी थी| आज रग्घू क्यों आया था घर, तूने तो नहीं बुलाया था ना ?, वह एक ही सांस में सब पूछ बैठी|
"अरे सब ठीक है, बस यूँ ही आया था मिलने", माँ ने उठते हुए कहा|
"यह पैसे कैसे रखे हैं, किसने दिए, रग्घू ने दिए क्या माँ?, एक बार फिर उसका माथा घूम गया|
"कहीं तुमने वह सड़क वाली जमीन का टुकड़ा तो नहीं बेच दिया उसको", अब वह गुस्से से हांफने लगी थी|
"अरे नहीं, मैंने कुछ नहीं बेचा", अभी माँ की बात ख़त्म भी नहीं हुई थी कि वह फिर बोल पड़ी "मैंने कहा था ना कि मुझे अभी नहीं करनी शादी, फिर तूने ऐसा क्यों किया", उसके अंदर से जैसे क्रोध का ज्वालामुखी फूट पड़ा|
"तू बिना मतलब परेशान हो रही है, ऐसा कुछ भी नहीं है", माँ ने उसे समझाना चाहा लेकिन वह फिर बोल पड़ी|
"पिताजी के नहीं रहने पर किस तरह से तूने मुझे पाला पोसा और आज तूने यह कर दिया| और उस रग्घू ने या चाचा ने कभी पलटकर देखा भी नहीं था और अब एक आखिरी जमीन भी हड़पकर बैठ गया"|
"उसने कोई जमीन नहीं हड़पी और न मैंने उसे बेचा", माँ के इतना कहते ही वह बिफर पड़ी "मुझसे झूठ क्यों बोल रही है, बताती क्यों नहीं कि उसने पैसे क्यों दिए तुझे"|
"अब उसकी बेटी भी बड़ी हो गयी है, बाप है ना", कहते हुए माँ ने उसे पुचकारा|
वह वहीँ खाट पर धम्म से बैठ गयी, माँ उसके लिए पानी लेने चली गयी थी| 

सुख और दुःख-- लघुकथा

"लकवा मार गया है, अब बिस्तर पर ही रहना पड़ेगा इसको| शायद मालिश और दवा से कुछ फायदा हो और चलने फिरने लायक हो जाए कुछ दिन में", डॉक्टर ने एक कागज पर कुछ दवा लिखा और बाहर निकलने लगा|
"हस्पताल में भर्ती कराने से कुछ फायदा होगा क्या डॉक्टर साहब", बिटिया ने पूछा|
"कह नहीं सकता, हो भी सकता है", कहकर डॉक्टर निकल गया|
"माँ, बापू को हस्पताल ले चलते हैं, शायद ठीक हो जाए", बिटिया ने माँ की तरफ देखते हुए कहा|
उसने एक बार खाट पर पड़े लल्लू को देखा और फिर अपनी कमर में बंधे गांठ से कुछ रुपये निकाले|
"जा जरा पंसारी के यहाँ से टमाटर और प्याज तो ले आ", उसने बिटिया को रुपये पकड़ाते हुए कहा| बिटिया अचरज से उसका मुंह देखने लगी "अरे तू पगला गयी है, बापू खटिया पर पड़ा है और तुमको सब्जी की पड़ी है| बापू को कल हस्पताल ले चलते हैं किसी तरह"|
"रहने दे उसको ऐसे ही, कम से कम अब मुझे लात घूंसे तो नहीं लगाएगा| खाने के लिए तो वैसे भी मैं ही कमाती थी, यह तो सिर्फ दारू और मारपीट के लिए कमाता था| जा जल्दी से सामान लेकर आ, आज ठीक से खाना खाएंगे", कहकर उसने एक बार अपने पल्लू से आंसू पोंछा और जाकर लल्लू के सिरहाने बैठ गयी| बिटिया ने थोड़ी देर उसको और बापू को देखा और धीरे से किवाड़ भिड़काकर बाहर निकल गयी|

Tuesday, September 19, 2017

समझ-- लघुकथा

जैसे ही वह ऑफिस से लौटी एक बार फिर वही नज़ारा उसके आँखों के सामने था| कितना भी समझा ले, न तो बेटा समझता था और न ही बाप, दोनों अपने आप को ही समझदार मानते थे| उसके घर में घुसते ही कुछ पल के लिए दोनों खामोश हो गए और उसकी तरफ फीकी मुस्कान फेंकते हुए देखने लगे|
"कब समझोगे तुम विक्की, मान क्यों नहीं लेते कि वह तुमसे ज्यादा समझते हैं| आखिर पिता हैं तुम्हारे, तुमसे ज्यादा दुनिया देखी है उन्होंने", कहते हुए बैग उसने टेबल पर रखा और सोफे पर अधलेटी हो गयी|
राजन ने उसकी तरफ आश्चर्य से देखा, अक्सर तो इसके विपरीत ही होता था, आज ऐसा क्या हो गया| तब तक विक्की बोल पड़ा "उम्र या अनुभव ज्यादा होने से अगर व्यक्ति समझदार होता तो अपना माली काका हम सबसे समझदार होता माँ"|
बात बहुत तीखी थी और उसके दिल पर लग गयी| लेकिन उसने इसको नज़रअंदाज करते हुए कहा "तुलना करते समय लोगों की परिस्थिति और उनके बौद्धिक स्तर को भी ध्यान में रखना चाहिए विक्की"|
"यही तो मैं भी कहता हूँ, पापा जब तब अपने दोस्तों के बेटों से मेरी तुलना करते रहते हैं| मैं उनकी तरह एम बी ए करके इनके बिज़नेस में लग गया होता तो इनकी नज़र में मैं बेहतर होता", विक्की ने अपने पिता की तरफ देखते हुए कहा|
"तो क्या तुम ही समाज सुधार का काम करने के लिए पैदा हुए हो| जब पेट भरा हो तो मुँह से ऐसी बातें खूब निकलती हैं, दो निवाले के लिए तरसते तब समझ में आता", राजन का लहज़ा भी बहुत तल्ख़ हो गया था|
विक्की ने एक बार उसकी तरफ देखा, वह सोच नहीं पा रही थी कि अब किसे समझाए|
विक्की अपने पिता की तरफ मुड़ा और बेहद संयत स्वर में बोला "आप जो सोच रहे हैं, वह ठीक नहीं है पिताजी| मैं भी अगर निवाले को तरस रहा होता तो यह सब सोच भी नहीं पाता, भरे हुए पेट से जब मैं उन भूखे लोगों के बीच में जाता हूँ तो उनको बेहतर समझ पाता हूँ, आप नहीं समझेंगे"|
उसके राजन की तरफ देखा, राजन भी शायद समझ रहे थे लेकिन उनका पिता भाव उनको यह मान लेने से रोकता था| वह सोफे से उठी, राजन की तरफ मुस्कुरा कर देखा और विक्की के सर पर हाथ फेरते हुए किचन की तरफ बढ़ गयी|

एक छोटी सी बात-- लघुकथा

बहुत परेशान थे मिसिरजी, अब इस उम्र में पिताजी को समझाना चीन को समझाने जैसा था| पिछले कुछ महीनों की घटनाएं भी उनकी परेशानियों में इज़ाफ़ा ही कर रही थीं| जितना ही वह सोचते कि माहौल थोड़ा सुधरे तो पिताजी को समझायें उतना ही सब उल्टा हो रहा था| एक ही मोहल्ले में रहते हुए उन्होंने कभी फ़र्क़ महसूस नहीं किया लेकिन पिताजी तो जैसे अलग ही सोचने लगे थे|
हर त्यौहार और हर सुख दुःख उन्होंने साथ ही मनाया और बांटा था| पहले तो पिताजी ही उनको भेजते थे कि जाओ और उनके साथ मिल कर खेलो, लेकिन अब तो जैसे उस घर की तरफ देखना भी नहीं चाहते थे| उस दिन तो रफ़ीक चाचा ने भी कहा "अमां नाहक ही परेशान हो रहे हो, अब इस उम्र में तो ऐसा होता ही है| तुम्हारे पिताजी तो फिर भी ठीक हैं, हमारे अब्बाजान तो इस उम्र में आते आते इतने बड़े नमाजी हो गए थे कि उनका बस चलता तो हम सब को सिर्फ इबादत में ही बैठा के रखते| अल्लाह उनको सुकून अता फरमाए"|
लेकिन उनको तो महसूस होता ही था कि अब रफ़ीक़ चाचा या उनके परिवार के लोग पहले की तरह बेधड़क उनके घर नहीं आते थे, हाँ उनका परिवार पिताजी से नजर बचाकर गाहे बगाहे उनके घर जरूर हो आता था|
मिसिरजी को लग रहा था कि अब कुछ नहीं हो सकता और इसी उधेड़बुन में खोये ऑफिस चले गए| शाम को अचानक घर से फोन आया कि जल्दी घर आओ, पिताजी बहुत बीमार हैं तो वह भागते हुए घर पहुंचे| घर में घुसते ही पत्नी मिल गयी और उनके कुछ पूछने से पहले ही उनका हाथ पकड़कर पिताजी के कमरे की तरफ ले चली| कमरे में पिताजी बिस्तर पर लेटे हुए थे और आरिफ चाचा का पोता उनको रामायण पढ़कर सुना रहा था|
आहट सुनकर पिताजी ने उनकी तरफ देखा और उनकी निगाहें बिना कुछ कहे बहुत कुछ कह गयीं| 

जड़ें-- लघुकथा

घर में घुसते ही उसे लग गया कि आज भी पिताजी कुछ अनमने से हैं, अब यह बात उसे परेशान करने लगी थी| कमरे में पहुँच के उसने शर्ट उतारी तब तक मिन्नी भी आ गयी| जब मिन्नी के बढ़े हुए हाथ से उसने पानी का ग्लास नहीं लिया तो मिन्नी को भी खटका|
"क्या बात है, आज परेशान हो, कुछ खास वजह?, मिन्नी ने ग्लास मेज पर रखते हुए कहा|
"पता नहीं मैं सच सोच रहा हूँ या गलत, लेकिन मुझे लगता है जैसे पिताजी आजकल कुछ उदास रहने लगे हैं", उसने पानी का ग्लास उठाते हुए कहा|
"मैं तो हमेशा उनसे बात करती रहती हूँ, अक्सर उनसे पूछ कर ही खाना बनाती और खिलाती हूँ, कहीं तुम कुछ और तो नहीं सोच रहे?, मिन्नी के माथे पर चिंता की लकीरें फ़ैल गयीं|
"अरे तुम तो उनका जितना ख्याल रखती हो, उतना तो मैं भी नहीं रखता| लेकिन उनकी उदासी की वजह जानना जरुरी है, आज ही पूछता हूँ", कहकर वह ड्राइंग रूम में चल दिया| मिन्नी भी पीछे पीछे आयी और खड़ी हो गयी|
"क्या बात है पिताजी, आप आजकल थोड़े उदास लग रहे हैं? माँ की याद आ रही है क्या आजकल", उसने पिताजी के मन को हल्का करने की कोशिश करते हुए कहा|
पिताजी इस अचानक हुए सवाल से चौंक गए और संभलते हुए बोले "अभी तू थका मांदा ऑफिस से आ रहा है और ये सब क्या बात करने लगा| अरे बेटी तूने इसे पानी वानी दिया कि नहीं", बात टालने की गरज से पिताजी ने कहा|
"नहीं पिताजी, सच सच बताईये, पहले तो आप बहुत मजे में मुझसे बात करते थे लेकिन आजकल कुछ कम बात करते हैं| बेटी को भी नहीं बताएँगे आप?, मिन्नी ने भी पिताजी के पास बैठते हुए कहा| 
"कोई बात नहीं है, अब इस बंगले में किसी चीज की कमी भी तो नहीं है, हर सुख सुविधा तो है यहाँ| बस ऐसे ही कभी कभी हो जाता है, अब उम्र भी तो हो चली मेरी", पिताजी ने स्नेह से मिन्नी के सर पर हाथ फेरा|
"तो फिर आप पहले जैसे खुश रहा कीजिये ना, हमारे लिए ही सही", मिन्नी ने एक बार फिर उनसे मनुहार किया|
"अरे तू चिंता मत कर, मैं बहुत खुश रहता हूँ| बस तू एक काम कर सकता है क्या, बंगले के पिछवाड़े का फर्श हटाकर वहां मिट्टी की एक क्यारी बनवा दे, मिट्टी से बहुत दूर हो गया हूँ आजकल", पिताजी ने जैसे कुछ याद करते हुए कहा|
अब उसे समझ में आ गया था, किसान पिता को मिट्टी से दूर करके वह कैसे खुश रख सकता है| उसने मिन्नी की तरफ देखा और दोनों मुस्कुरा पड़े|
पिताजी इन सबसे बेखबर दूर कहीं अपने गांव और खेतों में खो गए थे|

Monday, September 11, 2017

सिंदूर-- लघुकथा

बगल वाली खोली से हंसने की आवाज़ आ रही थी और रानू के बड़े बेटे की आवाज़ भी "आज नौकरी की चिट्ठी मिल गयी माई, बहुत जल्दी यहाँ से निकल जायेंगे"| उसके हाथ झाड़ू लगाते हुए रुक गए और वह सोचने लगी कि जाकर रानू को बधाई दे या नहीं| उसकी नज़र एक कोने में पड़े अपने पति पर पड़ी जो दारू पीकर बेसुध सोया पड़ा था और उसके मुंह से लार बहकर चेहरे पर फ़ैल गया था|
कुछ ही दिन पहले वह कितना खुश थी कि उसका पति उस गटर में नहीं गया था| उस दिन भी वह इसी तरह दारू पीकर पड़ा हुआ था और रानू का पति चला गया था गटर साफ़ करने| फिर कुछ ही घंटों में उसका शव बाहर निकला और उसने अपने सिंदूर की सलामती के लिए भगवान को ढेर सारा धन्यवाद दिया|
बाद में जैसे जैसे खबर आती गयी कि रानू को बड़ा मुवावज़ा मिलेगा और उसके बेटे को नौकरी भी मिलेगी, उसका दिल बैठने लगा| पुरे दिन हाड़तोड़ मेहनत के बाद भी उसे दो जून की रोटी मुश्किल से मिलती थी और उसपर निकम्मा पति दारू पीकर मारपीट करता और घर में पड़ा रहता| बेटा भी अब अपने बाप के नक़्शे पर चलने लगा था और कभी कभी वह भी दारू पीकर आता था|
यही सब सोचते विचारते वह भारी मन से रानू के खोली में पहुंची| रानू के बेटे ने उसे ख़ुशी ख़ुशी एक मिठाई खिलाई और उसने भी फीकी हंसी हँसते हुए उसको आशीर्वाद दिया| रानू की सूनी मांग को देखकर एक बार फिर उसे अपना सिंदूर अच्छा लगने लगा लेकिन उसके घर में आये बदलाव को वह देखती रह गयी|
हाथ में मिठाई लिए वह वापस अपनी खोली में पहुंची और पति को जगाने लगी| पति के उठते ही एक बदबू का झोंका उसके आस पास तैर गया और वह उबकाई लिए हुए नल की तरफ चली गयी| मुंह धुलने के बाद नल के ऊपर लगे आईने में उसको अपना चेहरा दिखा, माथे का सिंदूर काफी धुल चुका था| एक बार फिर उसने अपने शराबी पति को हताशा से देखा और फिर थोड़ा सा पानी लेकर अपने माथे का पूरा सिंदूर पोंछ दिया|

फंदा-- लघुकथा

"मैं उसे मारना नहीं चाहता था सर, बस उसका मुंह दबा कर उसे किडनैप करना चाहता था| मुझसे अनर्थ हो गया, अब जो चाहे सजा दिलवा दीजिये", बोलते बोलते सोनू फूट फूट कर रोने लगा|
"बस किडनैप करने के चक्कर में तूने उस मासूम का खून कर दिया, पैसों के चक्कर में तुम लोग कुछ भी कर सकते हो| तुझ जैसे दरिंदों को तो समाज में जिन्दा रहने का कोई हक़ नहीं है", इन्स्पेक्टर ने शब्दों को चबाते हुए कहा| पुलिस स्टेशन में काफी भीड़ इकठ्ठा हो गयी थी और तब तक बच्चे के पिता डॉ सरकार भी पहुँच गए|
"इसे जिन्दा मत छोड़ना सर, हत्यारा है यह, अरे क्या बिगाड़ा था मेरे बच्चे ने तेरा", कहते हुए डॉ वहीं रखी कुर्सी पर लुढ़क गए| पास खड़े एक व्यक्ति ने उनके चेहरे पर पानी छिड़का और कुछ और लोग उनको सँभालने लगे|
सोनू हाथ जोड़े खड़ा था और पुलिस उसके खिलाफ रिपोर्ट लिख रही थी| तब तक डॉ फिर से बिफर पड़े "अरे तेरे जैसे हत्यारों को तो चौराहे पर फांसी दे देनी चाहिए"|
सोनू ने एक बार डॉ की तरफ देखा और फिर हाथ जोड़े हुए ही उसने कहा "डॉ साहब मेरे बच्चे का क्या कसूर था, क्यों आपने सिर्फ पैसे के लिए उसे अपने यहाँ भर्ती करने से मना कर दिया था?
डॉ सरकार ने उसे गौर से देखा और उनको कुछ दिन पहले का वाकया याद आ गया| इसी का बच्चा था जिसे उन्होंने भर्ती करने से मना कर दिया था और वहीँ बच्चे की मौत हो गयी थी| वह धीरे से कुर्सी से उठे और वापस मुड़ गए, रास्ते में हर चौराहे पर उनको फांसी का फंदा लटकता नज़र आ रहा था|