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Monday, September 11, 2017

सिंदूर-- लघुकथा

बगल वाली खोली से हंसने की आवाज़ आ रही थी और रानू के बड़े बेटे की आवाज़ भी "आज नौकरी की चिट्ठी मिल गयी माई, बहुत जल्दी यहाँ से निकल जायेंगे"| उसके हाथ झाड़ू लगाते हुए रुक गए और वह सोचने लगी कि जाकर रानू को बधाई दे या नहीं| उसकी नज़र एक कोने में पड़े अपने पति पर पड़ी जो दारू पीकर बेसुध सोया पड़ा था और उसके मुंह से लार बहकर चेहरे पर फ़ैल गया था|
कुछ ही दिन पहले वह कितना खुश थी कि उसका पति उस गटर में नहीं गया था| उस दिन भी वह इसी तरह दारू पीकर पड़ा हुआ था और रानू का पति चला गया था गटर साफ़ करने| फिर कुछ ही घंटों में उसका शव बाहर निकला और उसने अपने सिंदूर की सलामती के लिए भगवान को ढेर सारा धन्यवाद दिया|
बाद में जैसे जैसे खबर आती गयी कि रानू को बड़ा मुवावज़ा मिलेगा और उसके बेटे को नौकरी भी मिलेगी, उसका दिल बैठने लगा| पुरे दिन हाड़तोड़ मेहनत के बाद भी उसे दो जून की रोटी मुश्किल से मिलती थी और उसपर निकम्मा पति दारू पीकर मारपीट करता और घर में पड़ा रहता| बेटा भी अब अपने बाप के नक़्शे पर चलने लगा था और कभी कभी वह भी दारू पीकर आता था|
यही सब सोचते विचारते वह भारी मन से रानू के खोली में पहुंची| रानू के बेटे ने उसे ख़ुशी ख़ुशी एक मिठाई खिलाई और उसने भी फीकी हंसी हँसते हुए उसको आशीर्वाद दिया| रानू की सूनी मांग को देखकर एक बार फिर उसे अपना सिंदूर अच्छा लगने लगा लेकिन उसके घर में आये बदलाव को वह देखती रह गयी|
हाथ में मिठाई लिए वह वापस अपनी खोली में पहुंची और पति को जगाने लगी| पति के उठते ही एक बदबू का झोंका उसके आस पास तैर गया और वह उबकाई लिए हुए नल की तरफ चली गयी| मुंह धुलने के बाद नल के ऊपर लगे आईने में उसको अपना चेहरा दिखा, माथे का सिंदूर काफी धुल चुका था| एक बार फिर उसने अपने शराबी पति को हताशा से देखा और फिर थोड़ा सा पानी लेकर अपने माथे का पूरा सिंदूर पोंछ दिया|

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