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Friday, May 21, 2021

समानांतर लकीर- लघुकथा

 घाट पर हर तरफ ग़मगीन माहौल था, जिधर देखो उधर मृत शरीर अंतिम संस्कार के लिए रखे हुए थे और उनके आस पास उनके दुखी और परेशान परिजन मौजूद थे. वह खुद बेहद दुखी और उदास था, उसने भी अपने पिता को खोया था. एक खाली जगह पर दाह संस्कार के लिए लकड़ियां जमाई जा रही थीं और कुछ लोग उसमें हाथ बंटा रहे थे.

चाचा ने उसके कंधे पर हाथ रखा तो वह एक बार फिर सिसक उठा. अभी पिता की उम्र ही कितनी थी, दो साल पहले ही तो रिटायर हुए थे. लेकिन इस आपदा ने उनको छीन लिया और वह कुछ कर भी नहीं पाया. उसने तो किसी का भी कभी गलत नहीं चाहा और न किसी का अहित ही किया, फिर उसे ही क्यों यह दुःख झेलना पड़ रहा है. इन्हीं विचारों में खोया वह सामने देख रहा था तभी एक और परिवार सामने से गुजरा. दो युवक, एक महिला जो बमुश्किल 35 साल की थी और उसका हाथ थामे एक छोटा बच्चा. महिला सुबक रही थी और दोनों युवक उसका कन्धा थपथपा रहे थे. अचानक उनके कान में उस बच्चे की आवाज आयी "मम्मी, पापा कहाँ हैं?

उसको अंदाजा लग गया कि उस बच्चे ने भी इतनी कम उम्र में अपने पिता को खो दिया है. उसके साथ खड़े सभी लोग उस बच्चे की तरफ देखने लगे, अधिकांश की आँखों में आंसू आ गए.

उसे बचपन में पढ़ा एक पाठ याद आ गया "अगर किसी लकीर को बिना मिटाये छोटा करना हो तो उसके सामानांतर एक बड़ी लकीर खींच देनी चाहिए". उसके दुःख की लकीर को उस बच्चे ने छोटा कर दिया था.

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