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Tuesday, July 1, 2014

टीचर

आज ये महसूस हो रहा था कि जिंदगी उतनी आसान नहीं होती , जितना हम सोचते हैं | पढ़ते समय जब ये भी नहीं सोचा था कि आगे चल कर क्या बनना है तो बहुत सारे रास्ते दिखते थे , लेकिन जैसे जैसे समय गुजरता गया वैसे वैसे जिंदगी एक संकरी सुरंग लगने लगी | अपने एक टीचर का कहा अब समझ में आ रहा था कि समय सबसे कीमती चीज होती है , इसकी इज्जत करो | 
इस बार आखिरी मौका था सिविल सर्विसेज का एग्जाम देने का और ये भी निकल गया | अब तो कोई रास्ता ही नज़र नहीं आ रहा था , क्या करें , किधर जाएँ | हर एग्जाम के लिए उम्र निकल चुकी थी |
अचानक उम्मीद कि किरण दिखी , याद आया कि टीचर तो बन सकते हैं अभी | उसके लिए तो उम्र है ,और आखिर उसी मोड़ पे आ गए जहाँ जाने के नाम पे सबकी हंसी उड़ाते थे | घर वालो कि उम्मीद और खुद कि नज़रों में अपनी इज्जत बचाने के लिए थके कदमो से बीएड का फॉर्म भरने चल दिए |

Thursday, June 26, 2014

भागीरथी

भागीरथ ने सोचा की क्यों न धरती पर चलकर गंगा को देखा जाये , वो गंगा जिसे वो कई वर्षों की तपस्या के बाद धरती पर लाये थे | वो सोच रहे थे की गंगा ने तो अब तक समस्त मानवों एवम अन्य प्राणियों का उद्धार कर दिया होगा | धरती पर पहुँच कर वो जिस नदी के किनारे पहुंचे , वो नदी तो बिलकुल नहीं थी | एक सूखी हुई नदी , या नाला कह लें तो बेहतर , गन्दगी से भरी हुई और बुरी तरह से प्रदूषित | उन्होंने कई बार अलग अलग लोगों से पूछ कर तस्दीक करने की कोशिश की , लेकिन हर बार उन्हें एक ही जवाब मिला कि यही गंगा है | वो बहुत दुखी और उदास हो गए |
चिंतित भागीरथ फिर से तपस्या करने चल दिए | अनेक वर्षों की अथक तपस्या के बाद एक बार फिर प्रभु प्रकट हुए और पूछा कि क्या चाहते हो | भागीरथ बोले कि हमारी गंगा नदी , जो कभी सबको जीवनदान देती थी , अब उसे ही जीवनदान की जरुरत है | किसी तरह उसे नया जीवन दीजिये प्रभु |
इतना सुनते ही प्रभु अदृश्य हो गए और थोड़ी देर में ही आकाशवाणी हुई कि हे भागीरथ , इस गंगा को जीवनदान देना तो असंभव जान पड़ता है | जब ये मानव खुद का ही विनाश करने पर तुल गया है तो इसे बचाना अत्यंत दुरूह प्रतीत होता है | अब तो तुम्हे एक बार फिर से गंगा को धरती पर ले जाना पड़ेगा , शायद इस बार वो जीवन दान दे सके इस सृष्टि के सभी प्राणियों को |

बदनसीब--

आज फिर शाम को चला गया था वो सुरेश के यहाँ| पता नहीं क्यों बड़ा अपनापन सा महसूस होता था उसे वहां पर| जब भी मन उदास होता, उसके पैर खुद ब खुद सुरेश के घर की तरफ चल पड़ते थे| 
क्या नहीं था उसके अपने घर में, ऐशो आराम के सब साधन मौजूद थे| पिता बहुत बड़े बिजनेसमैन थे लेकिन उनके पास कमी थी तो सिर्फ समय की| माँ बचपन में ही चल बसी थी, ऐसे में जब भी मन बहुत उदास हो जाता था तो वो सुरेश के यहाँ निकल जाता था|
जैसे ही वो सुरेश के घर के अंदर घुसा, उसे सुरेश के चिल्लाने की आवाज आई| वो अपनी माँ को बुरी तरह डाँट रहा था, लेकिन उसकी माँ खामोश थी और उसे देखते ही वो चुप हो गया|
" क्या बात है बेटा, आज बहुत दिन बाद आये, सब ठीक तो है न"|
" हाँ आँटी, सब ठीक है, बस बहुत दिनों से आप के हाथ का खाना नहीं खाया था तो सोचा की आज चल के खा लिया जाए"|
" क्यों नहीं बेटा, जरूर, बैठो तुम"| इतना कह कर वो किचेन में चली गयीं, कुछ देर पहले कुछ हुआ भी था ये उनके चेहरे पर नजर भी नहीं आ रहा था|
खाना खा कर वो वापस अपने घर पहुंचा और सोचने लगा कि वो कितना बड़ा बदनसीब है| लेकिन फिर उसे लगा कि उससे बड़ा बदनसीब तो सुरेश है जिसे माँ की कोई क़द्र ही नहीं है, क्योंकि उसे एहसास ही नहीं है कि माँ के नहीं होने का दर्द क्या होता है| 

बीज--

" मुझे देखो, मेरी मदद करो, मैं आपके ही काम आता हूँ फिर मुझे क्यों इस तरह नष्ट कर रहे हो"| मैं चौंक कर इधर उधर देखने लगा कि ये किसकी आवाज है| सब तरफ तो कंक्रीट का जंगल नज़र आ रहा था, फिर ये आवाज़ कहा से आई| अचानक मुझे लगा कि ये आवाज़ तो मेरे पैर के नीचे से आ रही है| मेरे पैर के नीचे एक बीज पड़ा हुआ था, मैंने उसे उठाया और अपने हाथ में लेकर पूछने लगा
" अब बताओ क्या कह रहे थे तुम"|
बीज की आँखों में आंसू थे, उसने कराहते हुए कहा " आखिर क्यों ये मानव हमें इस तरह से ख़त्म करने पे तुला हुआ है, हम तो उसे हर तरह से जिन्दा रहने में मदद ही करते हैं "|
मैंने बीज को बताया कि आबादी बढ़ रही है, रहने की जगह कम होती जा रही है, सड़के बनानी हैं, कल कारखाने बनाने हैं, विकास करना है तो ये करना ही पड़ेगा| बीज मुस्कुराया और बोला " ठीक है कि आप अपने रहने के लिए जगह बना रहे हो लेकिन हमारे बिना रह कैसे पाओगे, ये भी सोचा है कभी| जिन्दा रहने के लिए ऑक्सीजन भी तो चाहिए न, वो कहा से लाओगे| मैं मानता हूँ कि मज़बूरी में आप हमें काट देते हो, लेकिन आप नए लगा भी तो सकते हो| विकास तो ठीक है लेकिन विनाश पे क्यों तुले हुए हो"|
मेरे हाथ कांपने लगे, बीज मेरे हाथ से गिर पड़ा| फिर मैंने उसे उठाया और बोला " चलो शुरुआत तुम्हीं से करते हैं, तुमको अपने बगीचे में लगाते हैं"|
अब बीज मुस्कुरा रहा था, अपने लिए भी और मानव समाज के लिए भी|

एहसान

सो गयी क्या , वल्लभ ने रूपा को हिलाते हुए पूछा | हाँ , सोने दो ना , बहुत थक गयी हूँ मैं | रूपा फिर करवट बदल कर सो गयी | वल्लभ बहुत देर तक जगा रहा , सोचता रहा अख़बार में निकले सम्पादकीय के बारे में |
आज का सम्पादकीय कोर्ट के उस निर्णय के बारे में था , जिसमे कहा गया था कि पत्नी की सहमति के बिना किया गया सहवास भी बलात्कार की श्रेणी में आता है | क्या सच में ऐसा है , क्या पति की इच्छा की कोई जगह नहीं है दांपत्य जीवन में | महिला अधिकार के समर्थक और बहुत सारी महिलाएं इस फैसले को लेकर बेहद उत्साहित थीं और उनकी नज़र में ये स्त्री सशक्तिकरण की ओर एक बहुत बड़ा कदम था |
वल्लभ सोचने लगा की रूपा पहले तो ऐसी नहीं थी , लेकिन शादी के पांच - छह वर्षों में ही उसका रवैया बहुत बदल गया | अब उसे ये एक निहायत गैरजरूरी और उबाऊ काम लगता था | बेमन से कभी कभी वो इसमें साथ दे तो देती थी , लेकिन अधिकांश मौकों पर वल्लभ को एहसास भी करा देती थी की वो उसकी ख़ुशी के लिए ही ये कर रही है |
अब अगर वल्लभ की इच्छा हो तो वो क्या करे , कब तक एहसान लेता रहे रूपा का | तो हल क्या है इसका ? क्या सिर्फ पति ही सम्मान करे पत्नी की इच्छा का , पत्नी नहीं | नहीं , उसे बात करनी चाहिए रूपा से और वो भी नींद के आगोश में समां गया |

Wednesday, June 25, 2014

गलती

" तू अभी तक गयी नहीं चाय बनाने" , मम्मी चिल्ला रही थी| 
" देख नहीं रही , मैं पढ़ रही हूँ , अभी नहीं उठ सकती मैं ", शिखा ने दो टूक जवाब दिया और पढ़ाई में लगी रही| 
मम्मी का पारा अब सातवें आसमान पर था , उधर भाई भी चाय के लिए चिल्ला रहा था|
" पता नहीं पढ़ के क्या कर लेना है इसने , मैं बीमार क्या पड़ी , लड़के का ख्याल ही नहीं रखती ये लड़की ", मम्मी का बिसूरना जारी था| शिखा ने भी सब सुनते हुए भी अनसुना कर दिया और पढ़ती रही| भाई भी बिस्तर पर लेटे लेटे चुप हो गया| 
थोड़ी देर में घर पहुचने पर पत्नी की शिकायत आई, कि शिखा बात नहीं सुनती और भाई का तो बिलकुल ख्याल नहीं रखती| मैंने पूछा "शिखा , ऐसा क्यों किया तुमने", तो वो फ़ट पड़ी |
" मेरे एग्जाम हैं अगले हफ्ते और मैं पढ़ाई कर रही थी| भाई तो बेड पर लेट कर गाने सुन रहा था, पढ़ाई लिखाई से तो उसका नाता ही नहीं है| मेरे कहने से वो पढ़ता नहीं और मम्मी कभी उसको बोलती नहीं| अगर इसको वो ध्यान देना कहती है तो शायद उन्हें नहीं पता कि वो कितनी बड़ी गलती कर रही है"| 
मैं अवाक् था और उसकी मम्मी खामोश| 

फादर्स डे

अरे मिश्राजी , आज का दिन याद हैं आपको | 
क्या खास हैं आज , मुझे तो याद नहीं आ रहा , आप ही बताईये |
आज तो फादर्स डे है , आप भूल गए | 
लेकिन आपको कैसे याद रहा , इस वृद्धाश्रम में तो कोई आता भी नहीं और आपके बच्चे भी तो आये नहीं थे |
हाँ मेरे बच्चे तो नहीं आये थे लेकिन बाहर चलिए , कुछ बच्चे आये हुए हैं हम लोगों को इस दिवस की शुभकामनाएँ देने के लिए |
मिश्राजी के चेहरे पे मुस्कान आ गयी | तुरंत उठे , कुर्ता डाला शरीर पर और बाहर आ गए | बाहर हाल में कुछ बच्चे आये हुए थे , और टेबल पर फल , मिठाईयां और कुछ फूल भी रखे हुए थे | वहां के लगभग सारे बुजुर्ग हाल में इकठ्ठा थे और सबके चेहरे पर मुस्कराहट खिली हुई थी | लेकिन उस मुस्कान के पीछे छुपा हुआ दर्द भी हर कोई महसूस कर रहा था |